पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से
६० पाराशरस्मृतिः [षष्ठो-
पुनर्लेपन खातेन होम जंप्येन शुद्धयति ।
आधारेण च विप्राणां भूमिदोषो न विद्यते ॥४२॥
प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से
शुद्ध करना चाहिए। फिर ब्राह्मणों को बिठाकर भोजन कराना
चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणों के बैठने से ही भूमि का दोष नष्ट हो
जाता है ॥४२॥
चाण्डालैः सह सम्पर्कं मासं मासार्द्धमेव वा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्धयति ॥४३॥
यदि चाण्डालों का साथ एक महीने अथवा एक पाख तक रहा हो
तो १५ दिन तक गोमूत्र में पके हुए जव के खाने से उस पुरुष की शुद्धि
होती है ॥४३॥
रजकी कर्मकारी च लुब्धकी वेणुजीविनी ।
चातुर्वर्ण्यस्य च गृहे त्वविज्ञाता तु तिष्ठति ॥४४॥
धोबिन, चमाइन, बहेलिन ( बहेलिये की स्त्री ) अथवा बाँस से
जीविका करनेवाली (घरकारिन) यदि चारों वर्गों के घर में अनजान
में निवास कर ले, तो ॥४४॥
ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेव हि ।
गृहदाहं न कुर्वीत शेषं सर्वं च कारयेत् ॥४५॥
पता लगने पर चारों वर्गों को उसका प्रायश्चित्त करना चाहिए।
केवल घर में आग न लगावे, शेष जैसा चाण्डाल के निवास का प्रायश्चित्त
कहा है वह सभी प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥४५॥
१. 'जाप्येन' इति । २. 'अनुतिष्ठति' इति ।
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ६१
गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेच्चाण्डालो यदि कस्यचित् ।
तमागाराद् विनिर्वास्य¹ मृद्भाण्डं तु विसर्जयेत् ॥४६॥
यदि किसी के घर में चाण्डाल चला जाय तो उस चाण्डाल को
घर से बाहर निकालकर घर के मिट्टी के बर्तनों को फेंक देना
चाहिए ॥४६॥
रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं न त्यजेत्तु कदाचन ।
गोमयेन तु सम्मिश्रैर्जलैः प्रोक्षेद् गृहं तथा ॥४७॥
जिन मिट्टी के बर्तनों में रस, तेल, घी आदि भरा हो उसका त्याग
नहीं करना चाहिए, गोबर से घर को लीप देना चाहिए ॥४७॥
ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूय-शोणितसम्भवे ।
कृमिरुत्पद्यते यस्य प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥४८॥
यदि ब्राह्मण को व्रण (फोड़ा-घाव) होकर उसमें से खून अथवा पीब
बहने लगे अथवा यदि उसमें कीड़े पड़ गये हों तो उसका प्रायश्चित्त
किस प्रकार करना चाहिए ? ॥४८॥
गवां मूत्र पुरीषेण ²दध्ना क्षीरेण सर्पिषा ।
त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च कृमिदुष्टः शुचिर्भवेत् ॥४९॥
उस पुरुष को जिसके व्रण में कृमि पड़ गयी हों, तीन दिन तक
पञ्चगव्य से स्नान करना चाहिए तथा पञ्चगव्य ही खाना चाहिए तो
कृमिदोष से शुद्ध हो जाता है ॥४९॥
क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य पञ्च माषान् ³प्रदाय तु ।
गोदक्षिणां तु वैश्यस्याऽप्युपवासं विनिर्दिशेत् ॥५०॥
१. ‘विनिःसार्य’ इति । २. ‘दधि-क्षीरेण’ इति । ३. ‘प्रदापयेत्’ इति ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
६२ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
यदि किसी क्षत्रिय के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे पांच मासे
सोने का दान करना चाहिए। यदि वैश्य हो तो उसे एक दिन उपवास
कर गो-दान करना चाहिए। इस प्रकार करने से क्षत्रिय तथा वैश्य की
शुद्धि होती है ॥५०॥
शूद्राणां नोपवासः स्यात् शूद्रो दानेन शुद्ध्यति ।
अच्छिद्रमिति यद्-वाक्यं वदन्ति क्षितिदेवताः ॥५१॥
यदि शूद्र के व्रण में कृमि पड़ गयी हों तो उसे उपवास करने की
आवश्यकता नहीं है । वह केवल दान मात्र से ही शुद्ध हो जाता है ।
ब्राह्मण दान के अनन्तर यदि 'अच्छिद्रमस्तु' कह दें, तो ॥५१॥
प्रणम्य शिरसा ग्राह्यमग्निष्टोमफलं हि तत् ।
जपच्छिद्रं तपश्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥५२॥
उन्हें प्रणाम कर, उनके दिये हुए अक्षत को माथे पर चढ़ाने से
अग्निष्टोम के तुल्य फल होता है। जप, तप तथा यज्ञादि में कोई छिद्र
(दोष-त्रुटि) हो जाय तो ॥५२॥
सर्वं भवति निश्चिद्रं ब्राह्मणैरुपपादितम् ।
व्याधि-व्यसनि-निश्रान्ते दुर्भिक्षे डामरे तथा ॥५३॥
ब्राह्मणों के द्वारा कहे गये 'अच्छिद्रमस्तु' इस वाक्य मात्र से ही
यजमान के समस्त जप, तप तथा यज्ञादि कर्म पूर्ण हो जाते हैं।
व्याधि में, व्यसन में, थकी हुई अवस्था में, दुर्भिक्ष तथा राज-विप्लव
होने पर, ॥५३॥
उपवासो व्रतं होमो द्विजसम्पादितानि वै ।
अथवा ब्राह्मणास्तुष्टाः सर्वे कुर्वन्त्यनुग्रहम् ॥५४॥
ब्राह्मणों के द्वारा जप, होम तथा व्रत करावे, यदि इस प्रकार
ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर अनुग्रह करें तो ॥५४॥