पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८९
चार दिन केवल दिन में एक बार, फिर चार दिन तक रात्रि में
केवल एक बार, फिर चार दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार
भोजन करे। फिर चार दिन तक वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य
कृच्छ्र का चारों पाद (सम्पूर्ण रूप) कहा जाता है ॥४८॥
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ।
विप्राणां दक्षिणां दद्यात् पवित्राणि जपेद् द्विजः ॥४९॥
प्रायश्चित्त कर लेने पर, ब्राह्मणों को भोजन करावे। उन्हें दक्षिणा
देवे, फिर पवित्र मन्त्रों एवं पवमान सूक्तों का जप करे ॥४९॥
ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु गोघ्नः १शुद्धो न संशयः ॥५०॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥८॥
ब्राह्मणों को भोजन कराने मात्र से ही गोहत्या करनेवाला व्यक्ति
शुद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥५०॥
इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीकासहित पाराशरीय
धर्मशास्त्र में अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
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९. नवमोऽध्यायः
गवां संरक्षणार्थाय न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ।
तद्वधं तु न तं विद्यात् कामाऽकामकृतं तथा ॥ १ ॥
यदि गायों की रक्षा के उद्देश्य से कोई व्यक्ति उसे किसी घेरे या
अहाते में रोककर बांध ले और इस कारण गाय की मृत्यु हो
जाय तो वह मनुष्य गोवध का भागी नहीं होता। इसके अतिरिक्त
कामाकामकृत अर्थात् भूलवश या धोखे से होनेवाली हत्या को वध
कहते हैं ॥१॥
१. 'शुद्ध्येन्न' इति ।
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९० पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
दण्डादूर्ध्वं यदन्येन प्रहाराद् यदि पातयेत् ।
प्रायश्चित्तं तदा प्रोक्तं द्विगुणं गोवधे चरेत् ॥ २ ॥
हाथ के अँगूठे-जैसे मोटे दण्ड या लाठी आदि के आघात से गोवध
हो जाने पर दुगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२॥
रोध-बन्धन-योक्त्राणि घातश्चेति चतुर्विधम् ।
एकपादं चरेद् रोधे द्वौ पादौ बन्धने चरेत् ॥ ३ ॥
किसी गाय को रोक रखने, बाँध लेने, जोतने और मारने से गोवध
होता है। रोक लेने मात्र से ही यदि गाय की मृत्यु हो जाय तो चौथाई
व्रत करने का विधान है और बन्धन के कारण होनेवाले गोवध में
आधा व्रत करना उचित है ॥३॥
योक्त्रेषु तु त्रिपादं स्याच्चरेत् सर्वं निपातने ।
१गोव्राटे वा गृहे वाऽपि दुर्गे वाऽप्यसमस्थले ॥ ४ ॥
जोतने के समय गोवध होने से तीन चौथाई और मार डालने पर
सम्पूर्ण रूप से प्रायश्चित्त करना चाहिए। गोशाला, घर, किला और
असमतल भूमि, ॥४॥
नदीष्वथ समुद्रेषु त्वन्येषु च नदीमुखे ।
दग्धदेशे मृता गावः स्तम्भनाद्रोध उच्यते ॥ ५ ॥
नदी, समुद्र, नदियों के उद्गम स्थल या अग्नि से घिरे हुए स्थान
में रोक लेने से गाय की मृत्यु हो जाय तो उसे 'रोध' की संज्ञा दी
जाती है ॥५॥
योक्त्र-दामक-दोरैश्च कण्ठाभरण-भूषणैः ।
गृहे वाऽपि वने वाऽपि बद्धा स्याद् गौर्मृता यदि ॥६॥
हल जोतने की लकड़ी, गाड़ी के जुए, रस्सी, गले में पड़े हुए
आभूषण अर्थात् कण्ठी, माला आदि से बँधी हुई गौ का मरण हो जाय
१. 'गोचरे' इति पा० ।
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९ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९१
तो वह स्थान घर में हो या घर के बाहर वनादि में हो ॥६॥
तदेव बन्धनं विद्यात् कामाऽकामंकृतं च यत् ।
हले वा शकटे पंक्तौ पृष्ठे वा पीडितो नरैः ॥ ७ ॥
तो इसी को 'बन्धन' और 'कामाकामकृत' कहते हैं। हल, सग्गड़,
गाड़ी और कतार में बँधे अथवा पीठ पर लदे हुए भार के कारण मनुष्य
से पीड़ित होकर, ॥७॥
गोपतिर्मृत्युमाप्नोति योक्त्रो भवति तद्वधः ।
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तश्चेतनो वाऽप्यचेतनः ॥ ८ ॥
बैल की मृत्यु हो जाय तो उस बन्धन को शास्त्रों में 'योक्त्र' कहा
गया है। मत्त (धन से), प्रमत्त (सुरापान आदि से) और उन्मत्त
(भूत-प्रेतादि की बाधा), यदि चेतन या अचेतन अवस्था में, ॥८॥
कामाऽकामकृतक्रोधो दण्डैर्हन्यादथोपलैः ।
प्रहृता वा मृता वाऽपि तद्धि हेतुर्निपातने ॥ ९ ॥
इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक, क्रोध के वशीभूत होकर, दण्डे या
पत्थर से मार डाले तो इसी को 'निपातन' और वध करना
कहते हैं ॥९॥
अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रः प्रमाणतः ।
आर्द्रस्तु स-पलाशश्च दण्ड इत्यभिधीयते ॥१०॥
अँगूठे के बराबर मोटी, हाथ के बराबर लम्बी, पत्तीदार गीली
लकड़ी को 'दण्ड' कहते हैं ॥१०॥
मूर्च्छितः पतितो वाऽपि दण्डेनाऽभिहतः स तु ।
उत्थितस्तु यदा गच्छेत् पञ्च सप्त दशैव वा ॥११॥
दण्ड के प्रहार से आहत पशु मूर्च्छित हो जाय अथवा भूमि पर गिर
पड़े या फिर से उठकर पाँच, सात या दस पग चल पड़े ॥११॥
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९२ पराशरस्मृतिः [ नवमो-
ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वाऽपि पिबेद् यदि ।
पूर्वं व्याध्युपसृष्टश्चेत् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१२॥
अथवा तृणादि का भक्षण कर ले या पानी पी ले और पहले से ही
रोगग्रस्त हो तो उस पशु के मरने पर किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं
करना पड़ता है ॥१२॥
पिण्डस्थे पादमेकं तु द्वौ पादौ गर्भसम्मते ।
पादोनं व्रतमुद्दिष्टं हत्वा गर्भमचेतनम् ॥१३॥
गाय का पन्द्रह दिन का गर्भपात हो जाने से सम्पूर्ण व्रत का
चतुर्थांश, एक मास का गर्भ गिराने में आधा और सात मास से पूर्व
का गर्भ गिराने पर तीन चौथाई व्रत करने का विधान है ॥१३॥
पादेऽङ्गरोमवपनं द्विपादे श्मश्रुणोऽपि च ।
त्रिपादे तु शिखावर्जं स-शिखं तु निपातने ॥१४॥
चौथाई व्रत करने में शरीर के रोम, अर्ध व्रत में रोम, मूँछ और
दाढ़ी, तीन चौथाई में शिखा के अतिरिक्त सम्पूर्ण शरीर का मुण्डन
और निपातन अर्थात् वध करने पर शिखा के सहित समस्त शरीर का
मुण्डन कराना चाहिए ॥१४॥
पादे वस्त्रयुगं चैव द्विपादे कांस्यभाजनम् ।
त्रिपादे गोवृषं दद्याच्चतुर्थे गोद्वयं स्मृतम् ॥१५॥
चतुर्थांश व्रत करने पर ब्राह्मण को दक्षिणा-स्वरूप जोड़ा वस्त्र,
आधा व्रत करने पर काँसे को धातु का निर्मित पात्र, तीन चौथाई व्रत
में बैल और सम्पूर्ण व्रत में दो गौ का दान करना चाहिए ॥१५॥
निष्पन्नसर्वगात्रस्तु दृश्यते वा स-चेतनः ।
अङ्ग-प्रत्यङ्ग-सम्पूर्णो द्विगुणं गोव्रतं चरेत् ॥१६॥
जब गर्भस्थ पशु में प्राण का संचार हो गया हो और उसके सम्पूर्ण
अंगों का गठन हो गया हो तो उस समय गौ का घात करने से दुगुनी
गोहत्या का व्रत करना उचित है ॥१६॥
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