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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९३
पाषाणेनार्थ दण्डेन गावो येताऽभिघातिताः ।
शृङ्गभङ्गे चरेत् पादं द्वौ पादौ नेत्रघातने ॥१७॥
किसी व्यक्ति के द्वारा पत्थर या डण्डे से आघात करने पर यदि
गाय का सींग टूटकर गिर जाय, या उसकी आँखें फूट जायें, तो सींग
गिरने पर चौथाई व्रत और नेत्र-भंग होने पर आधा व्रत करना
चाहिए ॥१७॥
लाङ्गूले पादकृच्छ्रं तु द्वौ पादावस्थिभञ्जने ।
त्रिपादं चैव कर्णे तु चरेत् सर्वं निपातने ॥१८॥
पूँछ टूट जाने पर पादकृच्छ्र व्रत करे, हड्डी टूटने पर आधा कृच्छ्र,
कान टूटने पर तीन चौथाई व्रत और मरण होने पर सम्पूर्ण व्रत करना
उचित है ॥१८॥
शृङ्गभङ्गेऽस्थिभङ्गे च कटिभङ्गे तथैव च ।
यदि जीवति षण्मासान् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१९॥
किसी गाय का सींग टूटने, हड्डी टूटने या कमर टूटने पर भी यदि
वह छः मास तक जीवित रह जाय तो उसके लिए किसी प्रकार का
प्रायश्चित्त आवश्यक नहीं है ॥१९॥
व्रण-भङ्गे च कर्त्तव्यः स्नेहाभ्यङ्गस्तु पाणिना ।
यवसश्चोपहर्त्तव्यो * यावद् दृढबलो भवेत् ॥२०॥
यदि अपने हाथ से गाय का फोड़ा फूट जाय तो उसमें जब तक
गाय स्वाभाविक अवस्था में न हो जाय तब तक घी या तेल लगाते
रहना चाहिए और भोजन के लिए हरा चारा या घास देते रहना
चाहिए ॥२०॥
यावत्सम्पूर्ण-सर्वाङ्गस्तावत् तं पोषयेन्नरः ।
गोरूपं ब्राह्मणस्याऽग्रे नमस्कृत्या विसर्जयेत् ॥२१॥
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१. 'नैव' इति क्वचित्पुस्तके ।

९४ पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
जब तक उस गाय का सम्पूर्ण अंग पूरा न हो जाय, तब तक
उसकी सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए । तत्पश्चात् किसी ब्राह्मण को नम-
स्कार करके उसे अर्पित कर देना उचित है ॥२१॥
यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो हीनदेहो भवेत् तदा ।
गोघातकस्य तस्याऽर्द्ध प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२२॥
सम्पूर्ण अंग ठीक होने से पहले ही यदि उस गाय की मृत्यु हो जाय
तो हत्यारे को आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२२॥
काष्ठ-लोष्ठ-पाषाणैः शस्त्रेणैवोद्धतो बलात् ।
व्यापादयति यो गां तु तस्य शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥२३॥
काठ, ईंट, पत्थर या शस्त्र से सज्जित मनुष्य जब बलात् गाय का
वध करे, तो उसकी शुद्धि इस प्रकार कही गयी है—॥२३॥
चरेत् सान्तपनं काष्ठे प्राजापत्यं तु लोष्टके ।
तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चैवाऽतिकृच्छ्रकम् ॥२४॥
काठ से मारने पर सान्तपन नामक व्रत, ईंट से प्राजापत्य, पत्थर से
तप्तकृच्छ्र और शस्त्रों द्वारा आघात करने में अतिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान
करना चाहिए ॥२४॥
पञ्च सान्तपने गावः प्राजापत्ये तथा त्रयः ।
तप्तकृच्छ्रे भवन्त्यष्टावतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥२५॥
सान्तपन नामक व्रत में पाँच, प्राजापत्य में तीन, तप्तकृच्छ्र में
आठ और अतिकृच्छ्र में तेरह गोदान करने का विधान बतलाया
गया है ।२५।।
प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्प्रतिरूपकम् ।
तस्याऽनुरूपं मूल्यं वा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः ॥२६॥
महर्षि मनु ने कहा है कि जिस प्रकार के पशु का हनन किया
गया हो, पशुपालक को बदले में वैसा ही पशु देना चाहिए अथवा

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९५
किन्हीं दो मनुष्यों द्वारा मृत पशु के किये गये मूल्यांकन का मूल्य चुका
देना चाहिए ॥२६॥
अन्यत्राङ्कन-लक्ष्मभ्यां वाहने मोचने तथा ।
सायं सङ्गोपनार्थं च न दुष्येद् रोध-बन्धयोः ॥२७॥
वृषोत्सर्ग आदि के समय शङ्ख द्वारा अंकन करने तथा उस अंकन
के लिए गोमय के चिह्न बनाने, बोझ लादने, बोझ उतारने और
सायंकाल पशु के रक्षण के निमित्त रोध और बन्ध करने पर मरनेवाली
गाय का कोई दोष नहीं माना जाता ॥२७॥
अतिदाहेऽतिवाहे च नासिकाभेदने तथा ।
नदी-पर्वतसञ्चारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥२८॥
पशु को बहुत अधिक दागने, लादने, जोतने, नाक छेदने अथवा
नदी या पर्वतस्थल में चराने पर, गाय का मरण होने पर प्रायश्चित्त
करना चाहिए ॥२८॥
अतिदाहे चरेत् पादं द्वौ पादौ वाहने चरेत् ।
नासिक्ये पादहीनं तु चरेत् सर्वं निपातने ॥२९॥
अत्यधिक दागने के कारण होनेवाली मृत्यु में चतुर्थांश, बहुत
अधिक भार लादने से होनेवाली मृत्यु में आधा, नाथने में तीन चौथाई
और वध में पूरा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२९॥
दहनात्तु विपद्येत अनड्वान् योक्त्रयन्त्रितः ।
उक्तं पराशरेणैव ह्येकं पादं यथाविधि ॥३०॥
घर में आग लगने पर जुए में जुता हुआ बैल यदि मर जाय तो
उसके प्रायश्चित्त में महर्षि पराशर ने चौथाई व्रत करने का विधान
किया है ॥३०॥
रोधनं बन्धनं चैव भारप्रहरणं तथा ।
दुर्गप्रेरण-योक्त्रं च निमित्तानि वधेषु¹ षट् ॥३१॥
१. 'वधस्य' इति ।

९६ पराशरस्मृतिः [ नवमो-
अवरोध (रोकना), बन्धन, भार, आघात, बीहड़ स्थान में ले
जाना और जुए में जोतना—ये छः कर्म वध के कारण होते हैं ॥३१॥
बन्ध-पाश-सुगुप्ताङ्गो म्रियते यदि गोपशुः ।
भवने तस्य पापी स्यात् प्रायश्चित्तार्द्धमर्हति ॥३२॥
यदि किसी के घर में गाय या बैल बन्धन या फन्दे में बँधा हुआ
ही मर जाय तो वह भी पाप का भागी होता है । उसे दोष निवारण के
लिए आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३२॥
न नारिकेलैर्न च शाणवालै-
र्न चाऽपि मौञ्जैर्र्न च वल्कशृङ्खलैः ।
एतैस्तु गावो न निबन्धनीया
बन्ध्त्वाऽपि तिष्ठेत् परशुं गृहीत्वा ॥३३॥
किसी गाय को नारियल की बनी रस्सी, सन, बाल, मूँज और वृक्ष
की छाल के रस्से से अथवा लोहे की जंजीर से नहीं बांधना चाहिए ।
यदि उपर्युक्त वस्तुओं से बांधना आवश्यक ही हो तो उसे काटने का
शस्त्र लेकर तत्पर रहना चाहिए ॥३३॥
कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् गोपशुं दक्षिणामुखम् ।
पाशलग्नाग्निदग्धासु२ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३४॥
कुश और कास की रस्सी से गाय को दक्षिण मुख बाँधने पर यदि
वह जल मरे या फन्दा लगा ही रह जाय तो भी किसी प्रकार का दोष
नहीं लगता है ॥३४॥
यदि तत्र भवेत् काष्ठं प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ।
जपित्वा पावनीं देवीं मुच्यते तत्र किल्बिषात् ॥३५॥
कुश या कास की रस्सियों में लकड़ी पिरोकर यदि गाय को
बाँधा गया हो तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इसमें गायत्री
१. 'बद्ध्वा तु' इति । २. 'दग्धेषु' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९७
देवी का एक सौ आठ बार जप करने से मनुष्य के पाप का मोचन
होता है ॥३५॥
प्रेरयन् कूप-वापीषु वृक्षच्छेदेषु पातयन् ।
गवाशनेषु विक्रीर्णस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥३६॥
जब किसी कुएँ, तालाब और बड़े-बड़े वृक्ष काटने के स्थान में
गाय को ले जाय अथवा किसी कसाई के हाथ उसे विक्रय कर दे तो
गोवध करने का प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३६॥
आराधितस्तु यः कश्चिद् भिन्नकक्षो यदा भवेत् ।
श्रवणं हृदयं भिन्नं भग्नो वा कूपसङ्कटे ॥३७॥
यत्नपूर्वक बलवान् बनाकर किसी बैल को दौड़ाने पर जब वह
कक्षहीन हो जाय अथवा किसी कुएँ आदि में गिरने से उसके कान
और हृदय विदीर्ण हो जायें, ॥३७॥
कूपादुत्क्रमणे चैव भग्नो वा ग्रीव-पादयोः ।
स एव म्रियते तत्र त्रीन् पादांस्तु समाचरेत् ॥३८॥
कुएँ से निकालने के समय यदि गरदन या पैर टूट जाय तो उस
बैल के मरने पर तीन चौथाई प्राजापत्य नामक व्रत करने का विधान
बतलाया गया है ॥३८॥
कूपखाते तटाबन्धे नदीबन्धे प्रपासु च ।
पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३९॥
यदि कोई बैल पुराने कुएँ के गड्ढे, बाँध, पुल, पौसरे और पानी
के गड्ढे में डूबकर मर जाय तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं
करना पड़ता ॥३९॥
कूपखाते तटाखाते १दीर्घीखाते तथैव च ।
स्वल्पेषु धर्मखातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४०॥
१. 'दीर्घखाते' इति पा० ।
७

९८ पाराशरस्मृतिः [ नवमो-
कूपखात, तटाखात, दीर्घखात और घर्मखात-इन गड्डों में
गिरकर मृत्यु को प्राप्त होने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं करना
पड़ता ॥४०॥
वेश्मद्वारे निवासेषु यो नरः खातमिच्छति ।
स्वकार्यगृहखातेषु प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥४१॥
घर के दरवाजे पर, गोशाला में अथवा गृहनिर्माण के लिए किये
गये गड्ढे में गिरकर पशु के मरने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥४१॥
निशि बन्धनिरुद्धेषु सर्पव्याघ्रहतेषु च ।
अग्नि-विद्युद्विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४२॥
रात में रोकने या बाँधने से, सर्प या सिंह आदि हिंसक जन्तुओं के
द्वारा मारे जाने पर, अग्निकाण्ड होने अथवा बिजली गिरने से मृत
पशुओं के निमित्त किसी प्रायश्चित्त का विधान नहीं है ॥४२॥
ग्रामघाते शरौघेण वेश्मभाङ्गनिपातने ।
अतिवृष्टिहतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४३॥
शत्रु द्वारा ग्राम के घेरने, शत्रु द्वारा चलाये हुए बाणों से बिंधने,
मकान के ध्वस्त होने अथवा मूसलधार वृष्टि के कारण पशुमरण होने
पर प्रायश्चित्त नहीं किया जाता है ॥४३॥
संग्रामे प्रहतानां च ये दग्धा वेश्मकेषु च ।
दावाग्नि ग्रामघातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४४॥
युद्धस्थल में, दावानल की लपेट में आये हुए, घर में जलने और
सम्पूर्ण गांव के विध्वंस होने पर मृत गाय के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं
किया जाना चाहिए ॥४४॥
यन्त्रिता गौश्चिकित्सार्थं मूढगर्भविमोचने ।
यत्ने कृते विपद्येत प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४५॥
१. '-ऽपहृताना' इति पा० ।