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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३

CC-0. In Public Domain, Digitization by eGangotri
अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३
दयायुक्त होकर धर्मचिन्तन करने और अपने आश्रितों के भरण-
पोषण के लिए नीतिपूर्वक आचरण करनेवाला गृहस्थ ही बुद्धिमान
समझा जाता है ॥४२॥
न्यायोपार्जितवित्तेन कर्त्तव्यं ह्यात्मरक्षणम् ।
अन्यायेन तु यो जीवेत् सर्वकर्मबहिष्कृतः ॥४३॥
न्यायपूर्वक उपार्जित धन से आत्मरक्षा करना उचित है । इसके
विपरीत अन्याय द्वारा अर्जित धन सभी शुभ कर्मों का नाशक होता
है ॥४३॥
अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत्तु नित्यशः ॥४४॥
अग्निहोत्री, इष्ट का चयनकर्ता, कपिला गौ, यज्ञकर्ता, राजा,
संन्यासी और समुद्र के दर्शन मात्र से मनुष्य शुद्धता को प्राप्त होता है ।
इसलिए उपर्युक्त का दर्शन प्रतिदिन ही करना चाहिए ॥४४॥
अरणिं कृष्णमार्जारं चन्दनं सुमणिं घृतम् ।
तिलान् कृष्णाऽजिनं छागं गृहे चैतानि रक्षयेत् ॥४५॥
अपने घर में अग्निमन्थन दण्ड, काली बिल्ली, चन्दन, श्रेष्ठ मणि,
घी, तिल, काले मृग का चर्म और बकरे को रखना चाहिए ॥४५॥
गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम् ।
तत्क्षेत्रं दशगुणितं ‘गोचर्म’ परिकीर्तितम् ॥४६॥
भूमि की जितना दूरी में सौ गायें और एक बैल खड़ा हो उससे
दसगुनी विस्तृत भूमि को ‘गोचर्म’ कहते हैं ॥४६॥
ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो मनो-वाक्काय कर्मजैः ।
एतद् गोचर्मदानेन मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥४७॥
इस गोचर्म भूमि का दान करनेवाला व्यक्ति कायिक, वाचिक,
मानसिक और ब्रह्महत्यादि पापों से मुक्त हो जाता है ॥४७॥
१. ‘कर्मभिः’ इति ।
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१३४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
कुटुम्बिने दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः ।
यद्दानं दीयते तस्मै तद्दानं शुभकारकम् ॥४८॥
कुटुम्बी, दरिद्री और विशेषतः वेदपाठी ब्राह्मण को दिया जानेवाला
दान शुभ फलदायक कहा गया है । ४८॥
वापी कूप-तडागाद्यैर्वाजपेय-शतैर्मखैः ।
गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ॥४९॥
किसी की भूमि का हरण करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों वापी, कूप,
तालाव आदि का निर्माण कराने, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने तथा करोड़ों
गायें दान करने पर भी पापरहित होकर शुद्ध नहीं हाता ॥४९॥
अष्टादशदिनादर्वाक् स्नानमेव रजस्वला ।
अत ऊर्ध्वं त्रिरात्रं स्यादुशना मुनिरब्रवीत् ॥५०॥
उशना मुनि का कथन है कि यदि स्त्री अठारह दिन के अन्दर ही
रजस्वला हो जाती हो तो वह तीन दिनों तक अशुद्ध रहती है ॥५०॥
युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम् ।
चाण्डाल-सूतिकोदक्या-पतितानामधःक्रमात् ॥५१॥
पतिता स्त्री से चार हाथ, रजस्वला से आठ हाथ, प्रसूता से बारह
हाथ तथा चाण्डालिनी से सोलह हाथ की दूरी पर रहना चाहिए ।५१।
ततः सन्निधिमात्रेण स-चैलं स्नानमाचरेत् ।
स्नात्वाऽवलोकयेत् सूर्यमज्ञानात् स्पृशते यदि ॥५२॥
यदि उपर्युक्त रूप से वर्णित दायरे के निकट वे आ जायें तो वस्त्र
सहित स्नान कर डालना चाहिए । यदि अज्ञानवश इन्हें स्पर्श कर ले
तो स्नान के बाद सूर्य का दर्शन करना चाहिए । ज्ञान द्वारा स्पर्श करने
पर आठ हजार गायत्री मन्त्र का जप किया जाता है ॥५२॥
विद्यमानेषु हस्तेषु ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तोयं पिबति वक्त्रेण श्वयोनौ जायते ध्रुवम् ॥५३॥
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३५
हाथ का प्रयोग न करके नदी में मुँह लगाकर पानी पीनेवाला
अल्पज्ञ ब्राह्मण निश्चय ही कुत्ते की योनि में वास करता है ॥५३॥
यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयाज्जायायास्तु अगम्यताम् ।
पुनरिच्छति चेदेनां विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ॥५४॥
जो ब्राह्मण क्रोधावेश में अपनी पत्नी को माता या बहन की संज्ञा
दे दे और क्रोध शान्त होने के पश्चात् यदि उससे पुनः रमण करना चाहे
तो उस ब्राह्मण को परिषद् में इस बात को घोषणा करनी चाहिए-॥५४॥
श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो वा क्षुत्पिपासा-भयार्दितः ।
दानं पुण्यमकृत्वा तु प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥
मैंने श्रान्त, क्रोध, अज्ञान, क्षुधा-तृषा से क्लान्त एवं भयभीत होकर
ऐसा वाक्य कह दिया, अथवा दान, तीर्थ, यात्रादि पुण्य करता हूँ, कहकर
भी उसे न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूर्वोक्त कारण सुनाना चाहिए
और तीन दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५५॥
उपस्पृशेत् त्रिषवणं महानद्युपसङ्गमे ।
चीर्णान्ते चैव गां दद्याद् ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ॥५६॥
इसके बाद समुद्रगामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करे,
तत्पश्चात् एक गोदान देकर और दस ब्राह्मणों को भोजन कराना
चाहिए ॥५६॥
दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाचरणस्य च ।
अन्नं भुक्त्वा द्विजः कुर्याद् दिनमेकमभोजनम् ॥५७॥
दुराचरण और निषिद्धाचरण करनेवाले ब्राह्मण का यदि कोई
ब्राह्मण अन्न भक्षण कर ले तो उसे एक दिन तक उपवास करना
चाहिए ॥५७॥
सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदान्तवेदिनः ।
भुक्त्वाऽन्नं मुच्यते पापादहोरात्रान्तरान्तरः¹ ॥५८॥
१. '-न्तरः' इति ।

यदि स्वयं उपवास न कर सके तो किसी सदाचारी या वेदांगज्ञाता
ब्राह्मण का अन्न दो दिनों तक भक्षण करे तो उपर्युक्त पाप से वह छूट
जाता है ॥५८॥
ऊर्ध्वोच्छिष्टमथोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतौ तथा ।
कृच्छ्रत्रयं प्रकुर्वीत अशौचमरणे तथा ॥५९॥
जो कोई वमनादि करके जूठे मुँह, मल-मूत्र से अशुद्ध होकर या
अन्तरिक्ष में मृत हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिए कृच्छ्र व्रत करा देने
अर्थात् व्रत के बदले में उतनी ही गायें दान करने से शुद्ध होता है।
इसी प्रकार का प्रायश्चित्त अशौच में मरनेवाले का भी होता है ॥५९॥
कृच्छ्रे १ देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयम् ।
पुण्यतीर्थेऽनार्द्रशिरःस्नानं २ द्वादशसंख्यया ॥६०॥
दस हजार गायत्री का जप करने से भी कृच्छ्र व्रत का फल होता
है, दो सौ प्राणायाम करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है। किसी तीर्थ
स्थान में स्नान करके जब केश सूख जायें तो पुनः स्नान करे। इस
प्रकार बारह बार करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है ॥६०॥
द्वियोजने ३ तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं प्रकल्पितम् !
गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतः स्खलनं भुवि ॥६१॥
दो योजन अर्थात् आठ कोस तक किसी तीर्थस्थल की ओर गमन
करने से भी एक कृच्छ्र व्रत के समान होता है। जो गृहस्थ अपनी
स्वेच्छा से वीर्यपात करे तो ॥६१॥
सहस्रं तु जपेद् देव्याः प्राणायामस्त्रिभिः सह ।
चतुर्विद्योपपन्नस्तु धवद् विप्रघातके ४ ॥६२॥
उसे एक हजार गायत्री मन्त्र का जाप और तीन प्राणायाम करना
चाहिए। चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण ॥६२॥
१. 'कृच्छ्रे देव्ययुतं' । २. '-चाद्र'शिराः' । ३. 'द्वियोजनं' । ४. 'ब्रह्मघातके' इति ।

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[ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३७

समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।
सेतुबन्धपथे भिक्षां चातुर्वर्ण्यात् समाचरेत् ॥६३॥
को विप्रघाती के लिए सेतुबन्ध रामेश्वर दर्शन करने का प्रायश्चित्त
बतलाना चाहिए। प्रायश्चित्त करनेवाले ब्रह्मघाती को रामेश्वर दर्शन
के लिए जाते समय मार्ग में सभी वर्णों के यहाँ भिक्षाटन करना
चाहिए ॥६३॥
वर्जयित्वा विकर्मस्थान् छत्रोपानद्-विवर्जितः ।
अहं दुष्कृतकर्मा वै महापातककारकः ॥६४॥
विपरीत आचरण करनेवालों के घर भिक्षाटन न करे और न तो
अपने पास छाता, जूता आदि ही रखे। भिक्षा याचना के समय प्रायश्चित्त-
कर्त्ता को कहना चाहिए—'मैं दुराचरण करनेवाला पापी हूँ' ॥६४॥
गृहद्वारेषु तिष्ठामि भिक्षार्थी ब्रह्मघातकः ।
गोकुलेषु वसेच्चैव ग्रामेषु नगरेषु वा ॥६५॥
मैं घर के द्वार पर ब्रह्मघाती बनकर भिक्षा के उद्देश्य से आया हूँ।
गायों के समूह के साथ गाँव और नगरों में निवास करे ॥६५॥
तपोवनेषु तीर्थेषु नदीप्रस्रवणेषु वा² ।
एतेषु ख्यापयन्नेनः³ पुण्यं गत्वा तु सागरम् ॥६६॥
तपोवन, तीर्थ, नदी और जल-प्रपातों में अपने किये हुए दुष्कर्मों
का वर्णन करते हुए पवित्र सागर में जाय ॥६६॥
दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ।
रामचन्द्रसमादिष्टं¹ नरसञ्चय-सञ्चितम् ॥६७॥
भगवान् रामचन्द्र के कथनानुसार नल द्वारा निर्मित, दस योजन
चौड़े और सौ योजन लम्बे ॥६७॥


१. 'समादिशेत्' । २. 'च' इति । ३. '-न्नेव' ।

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१३८ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।
सेतुं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्ववगाहेत सागरम् ॥६८॥
उस समुद्र सेतु को देखकर मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से रहित हो
जाता है । सेतुदर्शन से शुद्ध शरीर को प्राप्त करके समुद्र में स्नान
करना चाहिए ॥६८॥
यजेत वाऽश्वमेधेन राजा तु पृथिवीपतिः ।
पुनः प्रत्यागतो वेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥६९॥
पृथिवीपति राजा को ब्रह्महत्यादि से मुक्त होने के निमित्त अश्वमेध
यज्ञ और निज गृह में वास करना उचित है ॥६९॥
सपुत्रः सह १भृत्यैश्च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ।
गाश्चैवैकशतं दद्याच्चातुर्विद्येषु दक्षिणाम् ॥७०॥
पुत्र, पत्नी, सेवक तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे और चारों वेद
के ज्ञाता ब्राह्मण को दक्षिणा में एक सौ गायों का दान करे ॥७०॥
ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महा तु विमुच्यते ।
विन्ध्यादुत्तरतो यस्य २निवासः परिकीर्तितः ॥७१॥
ब्राह्मणों की प्रसन्नता से ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है । विन्ध्य
पर्वतमाला के उत्तरी भाग में रहनेवालों के लिए ही ॥७१॥
पराशरमतं तस्य सेतुबन्धस्य दर्शनम् ।
सवनस्थां स्त्रियं हत्वा ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥७२॥
पराशर के मत से सेतुबन्ध दर्शनका विधान है। सोमयाग करनेवाली
स्त्री का वध करने से ब्रह्महत्या के समान ही व्रत करना चाहिए ॥७२॥
मद्यपञ्च द्विजः कुर्यान्नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।
चान्द्रायणे ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥७३॥
सुरापान करनेवाले ब्राह्मण को भी ब्रह्महत्या का व्रत करना उचित
है और समुद्र में मिलनेवाली नदियों में स्नान करने के पश्चात्
१. ‘भृत्यश्च’ । २. ‘संवासः’ । ३. ‘सुरापश्च’ ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३९
चान्द्रायण करने का विधान है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन
कराकर ॥७३॥
अनुडुत्सहितां गां च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ।
सुरापानं सकृत्कृत्वा अग्निवर्णां सुरां पिवेत् ॥७४॥
ब्राह्मण को दक्षिणास्वरूप एक बैल और गौ का दान करना
चाहिए। जो एक बार मदिरापान करे या अग्नि के समान तप्त सुरापान
करके मृत्यु को प्राप्त हो जाय ॥७४॥
स पावयेदथात्मानमिह लोके परत्र च।
अपहृत्य सुवर्णं तु ब्राह्मणस्य ततः स्वयम् ॥७५॥
तो वह व्यक्ति इस लोक तथा परलोक दोनों में अपनी आत्मा को
शुद्ध कर लेता है। ब्राह्मण का स्वर्ण चोरी करनेवाले को स्वयं ही ।७५।
गच्छेन्मुसलमादाय राजाभ्याशं^२ वधाय तु।
हतः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौ मुक्त एव च ॥७६॥
अपने वध के लिए हाथ में मूसल धारण कर राजा के पास जाना
चाहिए। चोर के द्वारा अपने वध का निवेदन करने पर यदि उसे
राजा मार डाले या छोड़ दे तो भी वह अपने किये हुए पापों से मुक्त
हो जाता है ॥७६॥
कामतस्तु कृतं यत्स्यान्नाऽन्यथा वधमर्हति ।
आसनाच्छयनाद्यानात् सम्भाषात् सहभोजनात् ॥७७॥
जान-बूझकर ब्राह्मण का स्वर्ण चुरानेवाले का वध करना विहित
है, अन्यथा वह वध के अयोग्य होता है। एक साथ बैठने, सोने,
एक ही वाहन पर सवारी करने, बोलने और एक साथ बैठकर भोजन
करने से ॥७७॥
संक्रामन्ति^३ हि पापानि तैलविन्दुरिवाऽम्भसि ।
१. 'पावयेदिहात्मानमिह' । २. 'राजानं स्ववधाय' इति । 'न्तीह' इति !

२४० पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
चान्द्रायणं यावकं च तुलापुरुष एव च ।
गवां चैवाऽनुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥७८॥
किसी पापी का पाप निर्दोष व्यक्ति को पानी पर तेल की बूँद पड़ने
के समान ही लग जाता है। चान्द्रायण, यावक, तुलापुरुष और गायों
के पीछे-पीछे अनुसरण करने से सभी प्रकार के पापों का शमन हो
जाता है ॥७८॥
एतत् पाराशरं शास्त्रं श्लोकानां शतपञ्चकम् ।
द्विनवत्या समायुक्तं धर्मशास्त्रस्य संग्रहः॥७९॥
यह महर्षि पाराशर रचित पाँच सौ बानवे श्लोकों का धर्मशास्त्र
संग्रह है ॥७९॥
यथाऽध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदं तथा ।
अध्येतव्यं प्रयत्नेन नियतं स्वर्गकामिना ॥८०॥
इति देवरिया-मण्डलान्तर्गत - 'मझौलाराज्य' निवासि-व्याकरणाचार्य-
साहित्यवारिधि-पण्डितश्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रिसम्पादिते पाराशरीये धर्म-
शास्त्रे सकलप्रायश्चित्तनिर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥
जिस प्रकार वेदाध्ययन से पुण्य-लाभ होता है उसी प्रकार इस
धर्मशास्त्र के पढ़ने से भी पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक स्वर्गाभिलाषी
व्यक्ति के लिए इस शास्त्र का पठन-पाठन नियमपूर्वक करना अत्यन्त
आवश्यक है ॥८०॥
इस प्रकार 'देवरिया'-मण्डलान्तर्गत 'मझौलीराज्य' (सम्प्रति वाराणसी) निवासि-
पण्डित श्रीसन्तशरणमिश्रात्मज-पण्डित-श्रीशिवदत्तमिश्र-शास्त्रिकृत
'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में सकल-
प्रायश्चित्त निर्णय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal