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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 170 में से

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पृष्ठ 72

६० पाराशरस्मृतिः [षष्ठो-
पुनर्लेपन खातेन होम जंप्येन शुद्धयति ।
आधारेण च विप्राणां भूमिदोषो न विद्यते ॥४२॥
प्रथम उस घर की भूमि को लीपने, खनने, होम तथा जपादि से
शुद्ध करना चाहिए। फिर ब्राह्मणों को बिठाकर भोजन कराना
चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणों के बैठने से ही भूमि का दोष नष्ट हो
जाता है ॥४२॥
चाण्डालैः सह सम्पर्कं मासं मासार्द्धमेव वा ।
गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्धयति ॥४३॥
यदि चाण्डालों का साथ एक महीने अथवा एक पाख तक रहा हो
तो १५ दिन तक गोमूत्र में पके हुए जव के खाने से उस पुरुष की शुद्धि
होती है ॥४३॥
रजकी कर्मकारी च लुब्धकी वेणुजीविनी ।
चातुर्वर्ण्यस्य च गृहे त्वविज्ञाता तु तिष्ठति ॥४४॥
धोबिन, चमाइन, बहेलिन ( बहेलिये की स्त्री ) अथवा बाँस से
जीविका करनेवाली (घरकारिन) यदि चारों वर्गों के घर में अनजान
में निवास कर ले, तो ॥४४॥
ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् पूर्वोक्तस्यार्द्धमेव हि ।
गृहदाहं न कुर्वीत शेषं सर्वं च कारयेत् ॥४५॥
पता लगने पर चारों वर्गों को उसका प्रायश्चित्त करना चाहिए।
केवल घर में आग न लगावे, शेष जैसा चाण्डाल के निवास का प्रायश्चित्त
कहा है वह सभी प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥४५॥
१. 'जाप्येन' इति । २. 'अनुतिष्ठति' इति ।