पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५९
भावदुष्टं न भुञ्जीत नोच्छिष्टं कृमिदूषितम्।
दधि क्षीरस्य त्रिपलं पलमेकं घृतस्य तु॥३८॥
यदि यावक, अपवित्र (भावदुष्ट), उच्छिष्ट अथवा कृमि से दूषित
हो, तो उसे न खावे। तीन दिनों तक यावक से खाये जानेवाले दही
तथा दूध का परिमाण प्रतिदिन तीन पल (बारह तोले) तथा घी का
परिमाण एक पल (चार तोले) होना चाहिए ॥३८॥
भस्मना तु भवेच्छुद्धिुरुभयोः ताम्र कांस्ययोः।
जलशौचेन वस्त्राणां परित्यागेन मृण्मयम् ॥३९॥
काँसे एवं ताँबे के पात्रों की शुद्धि भस्म (राख) से, वस्त्रों की
शुद्धि जल के द्वारा तथा मिट्टी के पात्रों की शुद्धि उसे त्यागकर करनी
चाहिए ॥३९॥
कुसुम्भं गुड कार्पास लवणं तैल मर्पिषी।
द्वारे कृत्वा तु धान्यानि दद्याद् वेश्मनि पावकम् ॥४०॥
कुसुम्भ, गुड़, कपास, नमक, तेल तथा घी और अन्न को घर से
बाहर द्वार पर निकालकर उस घर में आग लगा देनी चाहिए जिसमें
चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४०॥
एवं शुद्धस्ततः पश्चात् कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम्।
१विंशति गा वृषं चैकं दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥४१॥
इस प्रकार घर की शुद्धि तथा अपनी शुद्धि कर उस पुरुष को
ब्राह्मण-भोजन कराने के उपरान्त बीस गौ तथा एक बैल का दान
करना चाहिए, जिसके घर में चाण्डाल ने निवास किया हो ॥४१॥
१. 'त्रिंशतं' इत्यपि पाठः।