पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो-
अविज्ञातस्तु चाण्डालो यत्र वेश्मनि तिष्ठति ।
विज्ञाते तूपसंन्यस्य द्विजाः कुर्युItemरनुग्रहम् ॥३४॥
जिसके घर में बिना जाने चाण्डाल निवास करे। फिर ज्ञात हो
जाने पर उसे अपने घर से बाहर निकाल देवे और ब्राह्मण का अनुग्रह
प्राप्त कर, प्रायश्चित्त करे ॥३४॥
मुनिवक्त्रोद्गतान् धर्मान् गायन्तो वेदपारगाः ।
पतन्तमुद्धरेयुस्ते धर्मज्ञाः पापसङ्कटात् ॥३५॥
वेद-पारंगत धर्मज्ञ ब्राह्मण उस पतित हुए पुरुष का पराशरादि
धर्मज्ञ महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त बताकर धर्मसंकट से
उद्धार करें ॥३५॥
दध्ना च सर्पिषा चैव क्षीरे गोमूत्र यावकम् ।
भुञ्जीत सह भृत्यैश्च* त्रिसन्ध्यमवगाहनम् ॥३६॥
महर्षियों के द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्त जिसे उस पतित को करना
चाहिए, इस प्रकार है : पतित पुरुष-जिसके घर में अनजाने चाण्डाल
ने निवास किया हो-गोमूत्र में पके हुए यावक को दही, घी तथा
दूध से भृत्यों के साथ भोजन करे और तीनों काल स्नान भी
करे ॥३६॥
त्र्यहं भुञ्जीत दध्ना च त्र्यहं भुञ्जीत सर्पिषा ।
त्र्यहं क्षीरेण भुञ्जीत एकैकेन दिनत्रयम् ॥३७॥
उपर्युक्त गोमूत्र में पके हुए यावक को खाने की विधि इस प्रकार
है-तीन दिन तक ( यावक को ) दही से, तीन दिन तक घृत से
तथा तीन दिन तक दूध से । इस प्रकार एक-एक से तीन दिन भोजन
करे ॥३७॥
- 'सर्वैश्च' इति ।