निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ४२८ ) ११अ० ३पा० ४ खं०
'एनः' (पाप) कैसे ? 'इन्' ( अदा०प० ) धातुसे है ।
'किल्बिष' (पाप) क्यों ? 'सुकृतकर्मणो भयम्' उस में
सुकृत कर्म वाले से भय होता है । 'कीर्तिम् अस्य भिनत्ति
इति वा' अथवा इस पापकारी की कीर्त्ति को वह भेदन
करता है ।
'सरमा' (१७) ( ऐतिहासिक पक्षसे देवशुनी और नैरुक्त
पक्ष से (माध्यमिका वाक्) क्यों ? सरणा (गमन) से ।
“तस्या०” उस (सरमा) की यह ऋचा है—॥३(२४)॥
(खं० ४)
निरु०-“किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड् दूरे
ह्यध्वा जगुरिः पराचैः । कास्मे हितिः का परित-
क्म्या ऽसीत् कथं रसाया अतरः पयांसि ॥” (ऋ०
सं० ८, ६, ५, १) ।
किम् इच्छन्ती सरमा इदं प्रानड् दूरेहि अध्वा ॥
'जगुरिः' जङ्गम्यतेः ।
पराञ्चनैः अञ्चितः ।
का तव अस्मासु अर्थहितिः आसीत् ! किं
परितकनम् ?
'परितक्म्या रात्रिः' परितः एनां तक्म ।
'तक्म'-इति उष्णनाम । 'तकते'-इति सतः ॥
“कथं रसाया अतरः पयांसि” इति ।
'रसा' नदी । रसतेः शब्दकर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त ( ४२६ ) ११ अ० ३पा० ४ खं०
कथं रसानि तानि उदकानि-इति वा ।
देवशुनी इन्द्रेण प्रहिता पणिभिः असुरैः समूदे-
इत्याख्यानम् ।
‘सरस्वती’ व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति- ॥ ४ (२५) ॥
अर्थ:-“किमिच्छन्ती०” । ऐसा सुना गया है कि—
देवपणि असुरोंने देवताओं की गौओं को हर लिया था, फिर
इन्द्रने उनके ढूंढनेके अर्थ उनके स्थान में सरमा (देव-कुत्ती)
को भेजा। और उन देव पणिओं ने उसे देख कर इस ऋचा
से पूछा-किमिच्छन्ती०” हम से किस वस्तु की इच्छा
करती हुई ‘इदम्’ यहां ‘प्रानट्’ आई है, “दूरे हिअध्वा”
क्यों कि-- दूर मार्ग है— इतने दूर मार्ग से बिना प्रयोजन
कोई सहज में आनहीं सकता, ‘जगुरिः’ जो ही शीघ्र चलने
वाला हो, वही आसकता है। ‘पराचैः’ (पराङ्मुखैः अञ्चितः)
पराङ्मुख गमनों से गया हुआ है- यह मार्ग अरुचि यह शि-
थिल संकल्प से पार करना दुष्कर है- देवताओं के स्थान से
बहुत दूर है। इससे हम कहते हैं- हे सरमे ! “का अस्मै
हितिः” ( का तव अस्मासु अर्थहितिः आसीत् ) क्या तेरी
हम में अर्थ हिति = अर्थ की प्रार्थना है-क्या अर्थ तैनें
हम से प्राप्त करने योग्य विचारा है, जिसके कारण यह बड़ा
लम्बा मार्ग आना विचारा । और “का परितक्म्या
आसीत्” (कि परितकनम्) कौन या कैसी रात्रि हुई- क्या
हिन्दी निरुक्त ( ४३० ) ११ अ० ३ पा० ५ खं०
तुझे पिछली रात्रि सुख से बीती ? और कथं रसायाः
पयांसि अतरः", कैसे तैने नदी के जलों को तैरा ? —
आधे योजन से अधिक विस्तार वाली रसा नाम नदी है, उस
के दुस्तर जलों को तैने कैसे पार किया । (कथं रसानि तानि
उदकानि- इति वा ) वे कैसे मीठे जल हैं? क्या तुझे थका-
वट के समय कुछ विश्राम स्थानों में वे स्वादु जल मिले ?
इन्द्र की भेजी हुई देवशुनी (सरमा) ने पणि असुरों के
साथ संवाद किया-यह आख्यान (इतिहास) है ॥
'जगुरिः (शीघ्रगामी) कैसे ? 'जङ्गम्यतेः' यङन्त 'गम्'
धातु से है। क्योंकि-वह अतिशय गमन करने वाला है।
'परितक्म्या क्या ? रात्रि क्यों ? 'परितः एना तक्म' दोनों
ओर इसके तक्म (दिन) है। 'तक्म' यह उष्ण (गरम) का नाम
है । कैसे ? 'तकते' इस धातु से है। क्यों कि-प्राणियों को
वह कष्ट से ओसता है।
'रसा' क्या ? नदी किस धातु से ? 'रसतेः शब्द कर्मणः'
शब्द अर्थ में 'रस' (भ्वा० प०) धातु से है।
'सरस्वती (१८) की व्याख्या हो चुकी [२,७,१)
“तस्या०”उस (सरस्वती)की यह ऋचा है ॥४(२५)॥
( खं० ५ )
निरु०- पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनी-
वती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥” [ऋ० सं० १, १,
६, ४ । य० वा० सं० २०, ८४ ) ॥
पावका नः सरस्वती अन्नैः अन्नवती यज्ञं वष्टु
धियावसुः, कर्मवसुः
हिन्दी निरुक्त ( ४३१ ) ११ अ० ३ पा० ६ खं०
तस्य एषा अपरा भवति ॥५ (२६) ॥
अर्थः— "पावका नः सरस्वती०" इस ऋचा का
मधुच्छन्दस् ऋषि है, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में
विनियोग है ।
'पावका' जलको झारने वाली "वाजेभिः वाजिनीवती
(अन्नैः अन्नवती) अन्नों से अन्नवाली 'धियावसुः' (कर्मवसुः
कर्मधना) कर्म रूपधनवाली 'सरस्वती' मध्यम लोककी वाणी 'नः'
हमारे 'यज्ञम्' यज्ञ को 'वष्टु' (कामयताम्) चाहे = इच्छा करे ।
अथवा अन्न वाली मध्यमवाक् हमारे यज्ञ के अन्नों से युक्त
करे यां करने की कामना करे ॥
"तस्याः०" उस सरस्वती की यह और ऋचा है ॥५(२६)॥
[ खं० ६ ]
निरु०— "महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति के-
तुना । धियो विश्वा विराजति ॥" [ ऋ० सं०
१, १, ६, ६] ॥
महत् अर्णः सरस्वती 'प्रचेतयति' प्रज्ञापयति
'केतुना' कर्मणा प्रज्ञया वा, इमानि च सर्वाणि
प्रज्ञानानि अभि विराजति ।
'वाक्' अर्थेषु विधीयते तस्माद् माध्यमिकां
वाचं मन्यन्ते ॥
'वाग्' व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति— ६ ( २७ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४३२ ) ११ अ० ३पा० ७खं०
अर्थ:- “महो अर्णः सरस्वती०” इस ऋचा का
मधुच्छन्दम् ऋषि, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में
विनियोग है।
‘सरस्वती’ मध्यमा वाक् देवी ‘केतुना’ (कर्मणा) कर्म
से (प्रज्ञया वा) अथवा प्रज्ञान से ‘महः’ [महत्] बड़े या
बहुत ‘अर्णः’ (जलम्) जलको ‘प्रचेतयति’ (प्रज्ञापयति =
आविष्करोति) प्रकट करती है। (इमानिच) और इन
‘विश्वा’ [विश्वानि = सर्वाणि] सब ‘धियः’ (प्रज्ञानानि)
प्रज्ञानोंको ‘विराजति’ (अभिविराजति) आभिमुख्य = सम्मु-
खतासे विराजती है। क्योंकि—जलसे अन्न और अन्नसे सब
प्रज्ञान होते हैं, इस प्रकार वह सब प्रज्ञानों की ईश्वरी है॥
“वाग्-अर्थेषु०” क्योंकि-वाक् देवी मन्त्रों में उदक
कर्मों में विधान की गई है—उसके उदक वर्षण आदिकर्म कहे
गए हैं, इससे नैरुक्त आचार्य वाक् को मध्यम लोक की
मानते हैं॥
‘वाक्’ (१६) का व्याख्यान किया गया [२,७,१]।
“तस्याः०” उस वाक् की यह ऋचा है-॥ ६ (२७)॥
(खं० ७)
निरु०- “यद्वाग्वदन्त्यवि चेतनानि राष्ट्री दे
वानां निषसाद मन्द्रा। चतस्र ऊर्जन्दुदुहे पयांसि
क्व स्विदस्र्याः परमञ्जगाम॥” [ऋ०सं० ६,७,
५, ४]॥
यद् वाग् वदन्ती ‘अविचेतनानि’ अविज्ञा-
हिन्दी निरुक्त ( ४३३ ) ११ अ० ३पा० ७ ख०
तानि राष्ट्री देवानां निषसाद 'मन्द्रा'मदना 'चतस्रः'
अनुदिशः ऊर्जं दुदुहे पयांसि, क्व स्विद् अस्याः
परमं जगाम-इति यत् पृथिवीं गच्छति इति वा,
यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा०॥
तस्या एषा अपरा भवति—॥ ७ ( २८ ) ॥
अर्थः-“ यद्वाग्वदन्ती० ”इस ऋचा का नेम ऋषि
और सारस्वत पशु में विनियोग है ।
'यत्' ( यदा ) जब 'अविचेतनानि' [ अविज्ञाताथानि ]
अर्थ—शून्य गर्जना शब्दों को 'वदन्ती' बोलती हुई ' देवानां
राष्ट्री'माध्यमिक देवताओं की ईश्वरी 'मन्द्रा' [मदना] लोक
को हर्ष देने वाली 'वाक्' मध्यम लोक की वाणी 'निषसाद'
[ निषीदति = व्यापृणोति ] व्यापार युक्त होती है—वृष्टि
कर्म में लगती है, [ तदा ] तब 'चतस्रः' ( दिशः अनु ) चारों
दिशाओं के प्रति 'ऊर्जम्' ( अन्नम् ) अन्नको 'पयांसि' और
जलोंको ' दुदुहे ' दुहती है = भरती है । 'क्व—स्वित् ' कहां
'अस्याः ( वाचः ) इस वाक् देवी के 'परमम्' उत्कृष्ट ( बड़े )
स्थान को 'जगाम' (गच्छन्ति ) जाते हैं-यह नहीं जाना जाता
कि-इस वाक् देवी के बरसाए हुये जल ओषधियों को
उत्पन्न करके कहां जाते हैं और प्रतिवर्ष फिर कहां से आते
हैं. [ यत् पृथिवीं गच्छति (न्ति) ] जो पृथिवी में रहते हैं
( यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा ) और जिनको आ-
दित्य की रश्मिएं हर लेजाती हैं । [ सुतराम् वाग् देवी के
अपरिमित जल हैं, वे कभी क्षीण नहीं होते ।
हिन्दी निरुक्त ( ४३४ ) ११ अ० ३पा० ८खं०
“तस्या०” उस वाक् की यह और ऋचा है- जिसका
प्रयोजन 'यही वाक् सब प्राणियों के भीतर प्रविष्ट है और
यही सब अर्थों को कथन करती है'- इस प्रकार की विभूति
दिखाना है ॥७(२८)॥
( खं० ४ )
निरु०-“देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरू-
पाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना
धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥” (ऋ० सं० ६,७,५,५)
देवीं वाचम् अजनयन्त देवाः, तां सर्वरूपाः
पशवो वदन्ति व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च सा
नो मदना अन्नं च रसं च दुहाना धेनुः वाग्
अस्मान् उपैतु सुष्टुता ।
'अनुमतिः' 'राका' इति देवपत्न्यौ-इति
नैरुक्ताः ।
पौर्णमास्यौ-इति याज्ञिकाः । पूर्वा पौर्णमासी
सा अनुमतिः, या उत्तरा सा राका इति विज्ञायते ।
'अनुमतिः' अनुमननात् ।
तस्या एषा भवति-॥८(२९)॥
अर्थः- “देवींवाच०” इस ऋचा का नेम ऋषि और
सारस्वत पशु में विनियोग है ।
'देवाः' मध्यम लोक के देवताओं ने 'देवीम्' ( उद्कामां
हिन्दी निरुक्त ( ४३५ ) ११ अ० ३पा० ६ ख०
दात्रीम्) जलों को देने वाली [याम्] जिस ' वाचम् ' वाक् को
'अजनयन्त' जना (उत्पन्न किया) था, 'ताम्' उसी को 'विश्व-
रूपाः' (सर्वरूपाः व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च ) सब प्रकार
के = व्यक्तवाणी वाले मनुष्य आदि और अव्यक्त वाणी वाले
गौ आदि 'पशवः पशु 'वदन्ति' बोलते हैं,'सा' जो इस प्रकार
सब पशुओं से बोली जाती है, वह 'नः' [ अस्माकम् ] हमें
'मन्द्रा (मदना) हर्ष देने वाली 'इषम्' ( अन्नं च ) अन्न को
'ऊर्जम्' (रसं च) और रस को 'दुहाना' (प्रक्षरन्ती) झरतीहुई
'धेनुः' [तर्पयित्री] तृप्त करने वाली 'वाक् ' 'सुष्टुता' सुन्दर
स्तुति की गई 'उप ऐतु' हमारे यहां आवे- यह हम प्रार्थना
करते हैं ॥
'अनुमति (२०) और 'राका [२१] ये देवपत्निये' (देव
स्त्रिये') हैं- ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं ।
पौर्णमासी हैं, यह याज्ञिक (मीमांसक) मानते हैं ।
क्यों कि- "जो पहिली पौर्णमासी है,वह 'अनुमति'
है और जो पिछली पौर्णमासी है,वह 'राका'है"
यह ब्राह्मण में जाना जाता है ।
'अनुमति' ( २० ) क्यों अनुगमन से- ऋषियों ने और
देवताओं ने चौदह (१४)दिन के पक्ष में 'यह पौर्णमासी हो'
ऐसा माना है ।
"तस्या०" उस अनुमति की यह ऋचा है ॥८ (२९) ॥
( सं० १ )
निरु०- “ अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च
नस्कृधि । क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्रण आयूंषि
तारिषः ॥” (य० वा० सं० ३४, ८ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४३६ ) ११ अ० ३ पा० १० खं०
अनुमन्यस्व अनुमते त्वं सुखं च नः कुर्वन्, अन्नं
च नः अपत्याय घेहि, प्रवर्द्धय च नः आयुः ।
'राका' राते र्दानकर्मणः ।
तस्या एषा भवति ॥९ (३०) ॥
अर्थ:-“अन्विदनुमते०” इस ऋचाका वामदेवऋषि
और देविकाओं में विनियोग है ।
' अनुमते। ' हे अनुमति देवि 'त्वम्' तू 'अनु मन्यासे '
( अनुमन्यस्व ) अनुमति कर- जैसा कि- तुझे चाहिये ।
“शं च नः कृधि” और हमारे लिये सुख कर ।[ सुखं च
नः कुर्वन्]और हमारे लिये सुखकरते हुये “क्रत्वे दक्षायं नो
हिंनु” (अन्नं च नः अपत्याय घेहि) हमारे अपत्य(सन्तान)के
लिये अन्न धारण कर । 'नः' हमारी 'आयूंषि' ( आयुः )
आयु को 'प्र तारिषः' (प्रवर्द्धय)बढा ।
'राका' (२१) दान अर्थ में 'रा'(अदा० प०)धातु से है ।
“तस्या०” उस 'राका' की यह ऋचा है ॥६ [३०]॥
[ खं० १० ]
निरु०- “ राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु
नः सुभगा बोधतुत्मना । सीव्यत्वपः सूच्याच्छि-
द्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥ ” (ऋ०
सं० २, ३, १०, ४ )
राकाम् अहं सुह्वानां सुष्टुत्या आह्वये,शृणोतु
हिन्दी निरुक्त ( ४३७ ) ११अ० ३पा० १०खं०
नः सुभगा बोधतु आत्मना, सीव्यतु अपः प्रजनन-
कर्म सूच्या अच्छिद्यमानया ।
'सूची' सीव्यतेः ।
ददातु वीरं शतप्रदम् उक्थपवक्तव्यप्रशंसम् ॥
'सिनीवाली' 'कुहूः'-इति देवपत्न्यौ इति
नैरुक्ताः॥
अमावास्ये इति याज्ञिकाः ।
या पूर्वा अमावास्या सा सिनीवाली, या उत्तरा
सा कुहूः- इति विज्ञायते ।
'सिनीवाली' 'सिनम्' अन्नं भवति, सिनाति
भूतानि । 'वालं' पर्व । वृणोतेः । तस्मिन् अन्न-
वती । वालिनी-इति वा । वालेनेव अस्याम्
अणुत्वाच्चन्द्रमाः सेवितव्यो भवति-इति वा ।
तस्या एषा भवति ॥ १० ( ३१ ) ॥
अर्थः- "राकामहम्०" इस ऋचा का गृत्समद
ऋषि और देविकाओं में विनियोग है ।
'अहम्' मैं 'सुहवाम्' (सुह्वानाम् [ शुभ आवाहन वाली
राकाको 'सुष्टुती' (सुष्टुत्या] सुन्दर स्तुतिसे 'हुवे' (आह्वये)
बुलाता हूं । 'नः' हमें 'शृणोतु' सुने - हमारी पुकार सुने ।
'सुभगा' सुन्दर धनवाली 'त्मना' (आत्मना) अपने आपसे
'बोधतु' जाने 'अपः' (प्रजननकर्म ) सन्तान के उत्पत्ति के
कर्मको 'सीव्यतु [सन्तनोतु] बढावे । इतनाही नही-'अच्छिद्यमा-
नया अच्छिद्यमान (न टूटने वाली) 'सूच्या' (प्रजासंतत्या) प्रजा
सन्तति से 'शतदायम्' ( शतपदम् ) बहुत दान करने वाले
'उक्थ्यम्' ( वक्तव्यप्रशंसम् ) प्रशंसा करने योग्य 'वीरम्' (पुत्रम्)
वीर पुत्र को 'ददातु' दे ।
'सूची' कैसे ? सीव्यति [सिव् दिवा०प०] धातु से है ।
'सिनीवाली' [२२] और 'कुहू' (२३) ये दो देवपत्निएं
हैं-ऐसा नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।
अमावास्याएं हैं-ऐसा याज्ञिक (कर्मठ) लोग मानते हैं।
क्योंकि- "जो पूर्वा अमावास्या है वह 'सिनीवाली'
और जो पिछली अमावास्या है, वह 'कुहू' है"
ऐसा ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है ।
'सिनीवाली' क्यों ? 'सिन' अन्न होता है । सो क्यों
'सिनाति भूतानि' वह रस आदि धातुओं से प्राणियों को
बांधता है ।
'वाल' क्या ? पर्व । कैसे ? 'वृणोति' ('वृ' स्वा० उ० )
धातु से है । क्यों ? 'वृण्वन्ति देवाः तत्र हवींषि' उसमें देवता
हविओं को वरण (स्वीकार) करते हैं । 'तस्मिन् पर्वणि
असौ सिनीनी (अन्नवती) इति सिनीवाली' उस पर्व में
वह सिमिनी (अन्न वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है।
अथवा वह सिमिनी (अन्नवाली) और वालिनी (वालों
वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है । अथवा बाल के समान
अणु (छोटा) होने से चन्द्रमा इस में सेवितव्य या जानने
योग्य होता है ।
"तस्याः०"उस 'सिनीवाली' की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥
हिन्दी निरुक्त (४३६) ११ अ० ३ पा० ११ खं०
व्याख्या ।
'सिनीवाली' । "सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा
नष्टेन्दुकला कुहूः।" [कां० १ व० ४ श्लो० ९] इत्यमरः
अर्थात्-जिस में चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो, वह अमावास्या
सिनीवाली है, और जिस में चन्द्रमा की कला सर्वथा नष्ट हो
जावे वह अमावास्या 'कुहू' है ।
"चतुर्दशी का अन्तिम प्रहर और अमावास्या के
आठ प्रहर, इस प्रकार चन्द्रमा का क्षयकाल नव
प्रहर का शास्त्र में प्रसिद्ध है । उन में पहिले दो
प्रहरों में चन्द्रमा की सूक्ष्मता रहती है और
अन्त के दो प्रहरों में सम्पूर्ण चन्द्रमा का क्षय
होजाता है । अतः प्रथम दो प्रहरों की सिनीवाली
संज्ञा, अन्त के दो प्रहरों की कुहू संज्ञा और
बीच के पांच प्रहरों की दर्श संज्ञा है।" (अमर
विवेक टीका) ॥ १० (३१) ॥
(खं० ११)
निरु०- "सिनीवालि पृथुष्टुके या दे॒वानाम-
सि स्वसा । जुषस्व॑ ह॒व्यमाहुतं प्र॒जां देवि दिदि-
ड्ढि नः ॥" [ऋ० सं० २, ७, १५, ६ । य० वा०
सं० ३४, १० । आ० गृ० १, १०।]
सिनीवालि ! पृथुजघने ! ।
हिन्दी निरुक्त ( ४४० ) ११अ० ३पा० ११खं०
'स्तुकः' स्त्यायतेः । संघातः ।
पृथु केशस्तुके ! पृथुष्टुते ! वा, या त्वं देवानाम्
असि स्वसा ।
'स्वसा' सुअसा । स्वेषु सीदति इति वा ।
जुषस्व 'हव्यम् अदनं, प्रजां च देवि दिशनः ।
'कुहूः' गूहतेः । क्व अभूत्-इति वा, क्व सती
हूयते इति वा, क्व आहुतं हविः जुहोति इति वा ।
तस्या एषा भवति— ११ ( ३२ ) ॥
अर्थः-“ सिनीवालि पृथुष्टुके०” इस ऋचा का
गृत्समद् ऋषि और देविकाओं में विनियोग है ।
'सिनीवालि ! हेसिनीवालि ! 'पृथुष्टुके !' (पृथु जघने ?)
हे मोटी साथलों वाली ! अथवा 'स्तुक' 'स्त्यै' [भ्वा० प० ]
धातु से संघात [समूह ] का नाम है । इससे हे पृथुकेशस्तुके ?
पृथुकेशकलापेः = मोटे चोटेवाली! अथवा 'पृथुष्टुके' बहुत स्तुति
कीगई ! 'या' जो [ त्वम् ] तू 'देवानाम्' देवताओंकी 'स्वसा'
बहिन 'असि' है ( सा ) सो तू 'आहुतम्' विधिसे होम किये
हुये 'हव्यम्' ( अदनम् ) अन्न यो हविः को ' जुषस्व ' सेवन
कर । 'देवि !' हे देवि ! [च] और 'नः' हमें 'प्रजाम्' सन्तान
'दिदिङ्ढि' [ दिश ] दे ॥
'स्वसा' क्यों ? 'सु असा'वह सुन्दर धनको असन (क्षेपण)
करती है- पिता के घर से धन को फेंकती है = ले जाती है ।
अथवा 'स्वेषु सीदति' वह पर कुल में चली जानेपर भी अपने
भ्राता आदि में ही बैठती है-उन्हीं का पक्ष रखती है ।
हिन्दी निरुक्त (४४१) ११ अ०३पा०१२खंड०
'कुहू' (२३) कैसे ? 'गुह्' (भ्वा०उ०)धातु से है। क्योंकि-
वह चन्द्रमा को गूहन करती है-लुकालेती है। अथवा- 'क्व
अभूत्' कहां था इससे 'कुहू' है-क्यों कि उसमें चन्द्रमाऽप्र-
त्यक्ष (गुप्त) रहता है, इससे उसके पश्चात् उसे देखकर लोग
कहते हैं, यह कहां था। अथवा 'क्वसती हूयते' कहीं होती
हुई आवाहन की जाती है-वह अपने देवता रूपसे अप्रत्यक्ष
होने के कारण नहीं जानी जाती-वह कहां है, किन्तु कहीं
भी रहती हुई यज्ञ में आवाहन की जाती है, इससे 'कुहू'
है। अथवा 'क्व आहुतं हविः जुहोति' कहां होम किये हुये
हवि को लेती है, इससे 'कुहू' है।
"तस्या०" उस (कुहू) की यह ऋचा है ॥११ (३२)॥
(खं० १२)
"निरु०- कुहूमहं सुवृतं विद्मनापसमस्मिन्यज्ञे
सुहवां जोहवीमि। सा नो ददातु श्रवणं पितॄणां
तस्यै ते देवि हविषा विधेम ॥" (तै० ब्रा०३अष्ट ३
प्र० ११ अनु०, अथ०सं०७,१०,५,आ०गृ०१, १०]
कुहूम अहं सुकृतं विदितकर्माणम् अस्मिन्
यज्ञे सुह्वानाम् आह्वये, सा नो ददातु श्रवणं
पितॄणां पित्र्यं धनम्,- इति वा । पित्र्यं यशः
इति वा । तस्य ते देवि हविषा विधेम- इति ।
व्याख्यातम् ॥
'यमी' व्याख्याता ।
तस्य एषा भवति ॥१२ [३३) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४४२ ) ११अ० ३पा० २३खं०
अर्थः- “कुहुमहं सुवृतम्०” इस ऋचाका देविकाओं में
विनियोग है ।
‘अहम्’ मैं ‘सुवृतम्’ ( सुकृतम् विदितकर्माणाम्) सुन्दर
कर्मवाली अथवा विदितकर्मवाली ‘सुहवाम्’ ( सुहानाम् )
सुन्दर आवाहनवाली ‘कुहूम्’ कुहू को “अस्मिन् यज्ञे”
इस यज्ञ में ‘जोहवीमि’ ( आह्वये ) बुलाता हूं । “सा नो
ददातु श्रवणं पितॄणाम् ” [ पित्र्यं धनम् इति वा, पि-
त्र्यं यशः इति वा ) वह हमें पितरों का धन या यश दे ।
“तस्यै ते देवि ! हविषा विधेम ” ऐसे प्रभाववाली
तुझ को हे देवि ! हम हविः से सेवन करते हैं—हविः देते हैं
यह पहिलेँ व्याख्यान किया जाचुका है ।
‘यमी’ ( २४ ) शब्द की ‘यम’ शब्द से व्याख्या की
जाचुकी ( १०, २, ६ ) ।
“तस्या०” उस यमी की यह ऋचा है- १२ ( ३३ ) ॥
( खं० १३ )
निरु०-“अन्यमूषुतवं यम्यन्य उ त्वां परिष्वजाते
लिबुजेव वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा
तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥” [ऋ०सं० ७,
६, ७८, ४] ॥
अन्यमेव हि त्वं यमि !, अन्यः त्वां परिष्वङ्-
क्ष्यते लिबुजा-इव वृक्षम्, तस्य वा त्वं मनःइच्छ,
स वा तव, अधा अनेन कुरुष्व संविदं सुभद्राम्।
हिन्दी निरुक्त ( ४४३ ) ११अ० ३पा० १३खं०
“यमी यमं चकमे तां प्रत्याचचक्ष”- इति आ-
ख्यानम् ॥ १३ (३४) ॥
इति एकादशे तृतीयः पादः ॥ ११, ३ ॥
“अन्यमूहूष्वित्त्वम्०” यमी ने अपने भाई यमपर कामना
की थी, और यम ने उसका इस ऋचा के द्वारा प्रत्याख्यान या
उसकी प्रार्थना को अस्वीकार किया था ।
‘यमि !’ हे यमि ! ‘अन्यम् ऊ षु’ ( अन्यम् एव ) दूसरे
को ही ‘त्वम्’ तू ( परिष्वजस्व ) मैथुन के अभिप्राय से आ-
लिङ्गन कर या लिपट । कैसे ? “लिबुजा इव वृक्षम् ”
जैसे बेल किसी पास वाले वृक्ष से लिपटती है । “अन्यः उ”
(अन्यः एव ) दूसरा ही ‘त्वाम्’ तुझे ‘परिष्वजाते’ (परि-
ष्वङ्क्ष्यते ) आलिङ्गन करेगा- जिस के तू इस अभिप्राय से
लिपटाने योग्य हो । “तस्य वा त्वं मनः इच्छा (इच्छ)”
अथवा उसके तू मनको प्रवेश करने की इच्छा कर, “स वा
तव” अथवा वह तेरे मनको प्रवेश करने की इच्छा करे ।
“अधा कृणुष्व संविदम् सुभद्राम्” [ अधा अनेन
कुरुष्व संविदं सुभद्राम् ] अनन्तर इस प्रकार से एकचित्तता को
प्राप्त हुए उस पति के साथ तू सुभद्र = दोनों लोकों को न
बिगाड़ने वाली संविद् = मैथुन आदि की चर्चा ( सन्धि )
को कर ॥
यमी ने यम को पतिभाव से चाहा और यमने उसको
हिन्दी निरुक्त ( ४४४ ) ११ अ० ४ पा० १ खं०
प्रत्याख्यान किया-अस्वीकार या निषेध किया- यह आख्यान
( इतिहास ) है ॥ १३ (३४) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्याये तृतीयः पादः ॥ ११,(३)॥
चतुर्थः पादः ।
[ खं० १ ]
निघ०-उर्वशी ॥२५॥ पृथिवी ॥२६॥
इन्द्राणी॥ २७॥ गौरी ॥२८॥ गौः ॥२६॥
धेनुः ॥३०॥ अघ्न्या ॥३१॥ पथ्या ॥३२॥
स्वस्तिः ॥३३॥ उषाः ॥३४॥ इला॥३५॥
रोदसी ॥३६॥
इति षट्त्रिंशत् ( ३६ ) पदानि ॥५॥
निरु०—'उर्वशी' व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति– ॥ १ (३५) ॥
अर्थ :—'उर्वशी' [ २५ ] शब्द का व्याख्यान होचुका
( ५, ३, १ )
“तस्याः” उस ( उर्वशी ) की यह ऋचा है—॥१[३५]॥
( खं० २ )
निरु० “विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्धरन्ती मे
अप्याकाम्यानि । जनिष्ठो अपो नर्य्यः सुजातः
प्रोर्वशी तित दीर्घमायुः ॥” (ऋ०सं०८,५,२,५) ।
विद्युद् इव या पतन्ती अद्योतत हरन्ती मे,
हिन्दी निरुक्त ( ४४५ ) ११ अ० ४ पा० २ खं०
अप्याकाम्यानि उदकानि अन्तरिक्षलोकस्य यदा
नूनम् अयं जायेत अद्भ्योऽध्यप इति ।
‘नर्यः’ मनुष्यः । नृभ्यो हितः । नरापत्यम्
इति वा ।
‘सुजातः’ सुजाततरः ।
अथ उर्वशी प्रर्द्धयते दीर्घम् आयुः ॥
‘पृथिवी’ व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति- ॥ २ ( २६ ) ॥
अर्थः- “विद्युन्नया०” इस ऋचा में मध्यम लोकका
देवता पुरूरवाः त्रित्व पक्ष में (जब कि तीन वस्तुएं अलग २
कल्पित हैं) अपना ज्योति का और शब्द का विभाग जैसा
कल्पित करके कहता है-
‘या’ जो ‘विद्युत्’ (‘न’ अनर्थक) बिजली ‘पतन्ती’ मेघों
के भीतर चलती हुई ‘मे’ सारे लिये ‘काम्यानि’ वाञ्छित या
वाञ्छनीय ‘अप्या’ (अप्यानि = उदकानि) जलों को ‘भरन्ती’
(हरन्ती) लाती हुई (यदा) जब ‘दविद्योत’ (अद्योतत)
चमकी या चमकती है (तदा) तभी (नूनम्) निश्चय से
(अयम्) यह ‘नर्यः’ मनुष्यों के लिये हितरूप ‘सुजातः’
(सुजाततरः) सुन्दर से भी सुन्दर ‘अपः’ (अद्भ्यः अधि)
जलों की ऊर्मि (लहर या वृष्टि] ‘जनिष्ठः’ (जायेत) उत्पन्न
हुई या हो सकती है । (सा) वह ‘उर्वशी’ उर्वशी ‘दीर्घम्’
लम्बी ‘आयुको’ ‘प्रतिरते’ देती है— जलसे अन्न को उत्पन्न
करके उसके द्वारा आयुको बढ़ाती है ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४४६ ) ११ अ० ४ पा० ३ खं०
ऐतिहासिक पक्षमें ऐल पुरूरवा उर्वशी अप्सरासे वियुक्त
होकर कहता है-जो उर्वशी बिजली के समान चमकती हुई,
स्त्रियोंके अनेक हावभावों को धारण करती हुई, मुझे नित्य
प्यारी (प्राप्त करने योग्य) अपने सुन्दर शरीर से चमकी थी
और जिसने मुझसे गर्भ धारण किया था, उससे मेरे और
उसके गुणों से युक्त बलवान् और मनुष्योंके लिये हित मेरा
आयु नाम पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा (जिसको पुराण के जा-
नने वाले कहते हैं) और वह उर्वशी मेरे समीप में न होने
पर भी उस पुत्र को लम्बी आयु देगी-उसको पालन पोषण
से दीर्घ आयु देगी-उस पुत्र में मेरे सम्बन्ध से वैसी ही
प्रीति करेगी, जैसी कि-मेरे समीप में रहकर कर सकती थी ॥
'मर्य' क्या ? नरों के लिये हित मनुष्य । अथवा नरका
अपत्य [ पुत्र ] ॥
'पृथिवी' (२६) शब्द की व्याख्या होचुकी (१, ४, ३)
"तस्याः०" उस (पृथिवी) की यह ऋचा है ॥२(३६॥
(सं० ३)
निरु० "बळित्था पर्वतानां खिद्रम्बिभर्षिपृथि-
वि । प्रयाभूमिं प्रवत्वति मन्हा जिनोषिमहिनि॥'
(ऋ० सं० ४, ४, २९, १) ॥
सत्यं त्वं 'पर्वतानां' मेघानां खेदनं छेदनं
भेदनं बलम् अमुत्र धारयसि पृथिवि । प्रजिन्वसि
या भूमिं प्रवणवति महत्वेन महति ! इति वा ।
इन्द्राणी इन्द्रस्य पत्नी ।
तस्या एषा भवति- ॥ ३ (३७) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४४१ ) ११ अ० ४ पा० ४ खं०
अर्थः- “बलित्था०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि है।
‘बल्’ (बल्) (सत्यम्) सचमुच ‘पृथिवी’ हे मध्यम लोक
की पृथिवी देवि ! ‘त्वम्’ तू ‘इत्था’ (अमुत्र) उस मध्यम लोक
में रहती हुई ‘पर्वतानाम्’ (मेघानाम्) मेघों के ‘खिद्रम्’ (खेदनं
= छेदनं = भेदनं बलम्) छेदन करने वाले बल को बिभर्षि
(धारयसि) धारण करती है। क्यों कि ? ‘प्रवत्वति !’ (प्रवण-
वति !) हे गमन करने वाली ! ‘मन्हा’ (महत्त्वेन) बड़प्पन के
कारण ‘महिनि’ (महति ) हे महति ! (बड़ी !) (उदक-
वति ! इति वा) या हे जलवाली ! ‘या’ जो(त्वम्) तू ‘भूमिम्’
पृथ्वी को प्रजिन्वषि’ (प्रजिन्वसि) [इस प्रकार] जिलाती है—
जब कि- तू ऐसा पृथ्वी के जिलाने का महाकार्य करती है,
तो क्यों न मेघों को भेदन करने वाले बल को धारण करेगी ?
अवश्य करती है।
‘इन्द्राणी’ (२७) क्या ? इन्द्र की पत्नी ।
“तस्याः०” उस इन्द्राणी की यह ऋचा है ॥३[३७]॥
[खं० ४]
निरु०-इन्द्राणी॒मासु॒ नारि॑षु सु॒भगा॒मह॑मश्रवम्।
न ह्यस्या॑ अप॒रञ्च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पति॒र्विश्व॑स्मा-
दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, ३, १] ॥
इन्द्राणीम् आसु नारिषु सुभगाम् अहम् अशृण-
वम्, नहि अस्या अपरमपि समा जरया म्रियते
पतिः, सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः
तस्या एषा अपरा भवति ॥४ (३८) ॥