निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1206, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४४ ) ११ अ० ४ पा० १ खं०
प्रत्याख्यान किया-अस्वीकार या निषेध किया- यह आख्यान
( इतिहास ) है ॥ १३ (३४) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्याये तृतीयः पादः ॥ ११,(३)॥
चतुर्थः पादः ।
[ खं० १ ]
निघ०-उर्वशी ॥२५॥ पृथिवी ॥२६॥
इन्द्राणी॥ २७॥ गौरी ॥२८॥ गौः ॥२६॥
धेनुः ॥३०॥ अघ्न्या ॥३१॥ पथ्या ॥३२॥
स्वस्तिः ॥३३॥ उषाः ॥३४॥ इला॥३५॥
रोदसी ॥३६॥
इति षट्त्रिंशत् ( ३६ ) पदानि ॥५॥
निरु०—'उर्वशी' व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति– ॥ १ (३५) ॥
अर्थ :—'उर्वशी' [ २५ ] शब्द का व्याख्यान होचुका
( ५, ३, १ )
“तस्याः” उस ( उर्वशी ) की यह ऋचा है—॥१[३५]॥
( खं० २ )
निरु० “विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्धरन्ती मे
अप्याकाम्यानि । जनिष्ठो अपो नर्य्यः सुजातः
प्रोर्वशी तित दीर्घमायुः ॥” (ऋ०सं०८,५,२,५) ।
विद्युद् इव या पतन्ती अद्योतत हरन्ती मे,