निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (४३६) ११ अ० ३ पा० ११ खं०
व्याख्या ।
'सिनीवाली' । "सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा
नष्टेन्दुकला कुहूः।" [कां० १ व० ४ श्लो० ९] इत्यमरः
अर्थात्-जिस में चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो, वह अमावास्या
सिनीवाली है, और जिस में चन्द्रमा की कला सर्वथा नष्ट हो
जावे वह अमावास्या 'कुहू' है ।
"चतुर्दशी का अन्तिम प्रहर और अमावास्या के
आठ प्रहर, इस प्रकार चन्द्रमा का क्षयकाल नव
प्रहर का शास्त्र में प्रसिद्ध है । उन में पहिले दो
प्रहरों में चन्द्रमा की सूक्ष्मता रहती है और
अन्त के दो प्रहरों में सम्पूर्ण चन्द्रमा का क्षय
होजाता है । अतः प्रथम दो प्रहरों की सिनीवाली
संज्ञा, अन्त के दो प्रहरों की कुहू संज्ञा और
बीच के पांच प्रहरों की दर्श संज्ञा है।" (अमर
विवेक टीका) ॥ १० (३१) ॥
(खं० ११)
निरु०- "सिनीवालि पृथुष्टुके या दे॒वानाम-
सि स्वसा । जुषस्व॑ ह॒व्यमाहुतं प्र॒जां देवि दिदि-
ड्ढि नः ॥" [ऋ० सं० २, ७, १५, ६ । य० वा०
सं० ३४, १० । आ० गृ० १, १०।]
सिनीवालि ! पृथुजघने ! ।