निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
कर्म में जहां सप्त कपाल पुरोडाश होते हैं, तथा पुराणों में
इसी प्रकार से प्रसिद्ध हैं। दिति ने अपने पुत्र वृत्रासुरके वध
का बदला लेने के लिये पुंसवन व्रत धारण करके मारीच
कश्यप से इन्द्र का वध करने वाला एक गर्भ धारण किया था
इन्द्र ने समय पाकर उस गर्भ के ७ टुकड़े किये और उन में
एक १ के फिर सात २ टुकड़े किये। दिति के तप के प्रभाव
से वे मरे नहीं, किन्तु ४६ मरुत् देवता होगये। (श्री० भा०
स्कं० ६ अ० १८)
नैरुक्तों के मतमें तो ये सभी मध्यम लोक के आठों गण
(८-१५) मरुत् [वायु] ही हैं। जैसा कि-वार्त्तिक में
कहा है-
“मध्यमा वाक् स्त्रियः सर्वाः पुमान् सर्वश्च मध्यमः।
गणाश्च सर्वे मरुतो गणभेदाः पृथक्कृतेः ॥”
अर्थात्-अदिति (१६) आदि मध्यम लोक की २८ स्त्रियें
मध्यमा वाक् देवता है। मध्यम लोक के वायु आदि, पुरुष
देवता मध्यम वायु या इन्द्र देवता है। और मध्यम लोक के
सब मरुतः (८) आदि आठ गण देवता मरुत् ही हैं। इन के
गण भेद भी कर्म के भेद से कल्पित हैं।
( खं० २ )
निरु०-“ आविधुन्मद्भिर्मरुतः स्वकैरथेभिर्याति
ऋष्टिमद्भिरिश्वपर्णैः। आवार्विष्ठया न इषा वयो न
पप्तता सुमायाः ॥ ” ( ऋ० सं० १, ६, १४, १ ) ॥
“ विधुन्मद्भि र्मरुतः स्वकैः” स्वञ्चनैः-इति वा,
स्वर्चनैः-इति वा, स्वर्चिर्भिः-इति वा, रथैः आयात
हिन्दी निरुक्त ( ४०८ ) ११अ० २पा० ३ खं०
ऋष्टिमद्भिः अश्वपर्णैः अश्वपतनैः वर्षिष्ठेन च नः
अन्नेन वयः इव आपतत 'सुमायाः' कल्याणकर्मा-
णो वा, कल्याणप्रज्ञा वा ।
'रुद्रा' व्याख्याताः ।
तेषामे-एषा भवति- ॥ २ [ १४ ] ॥
अर्थ.-“आविद्युन्मद्भिः०” इस ऋचा का गोतमऋषि
है । आस्तार पंक्ति छन्द है ।
'मरुतः' हे मरुत् देवो! (यूयम्) तुम सब 'विद्युन्मद्भिः'नि-
राली चमक वाले (बिजली वाले ) 'स्वर्कैः' ( स्वञ्चनैः ) सुन्दर
गमन वाले ( स्वर्चनैः इति वा ) अथवा सुन्दर पूजन वाले
[पूजे जाने वाले](स्वर्चिभि इतिवा)अथवा सुन्दर किरणोंवाले
'ऋष्टिमद्भिः ' आयुधों वाले या अकाल के नाश करने वाले
'अश्वपर्णैः' अश्व (घोड़े) वाहनों वाले या वज्र के गिराने
वाले 'रथेभिः' रथों से या मेघों से 'आयात' आओ । 'सुमायाः'
(कल्याणकर्माणो वा ) हे सुन्दर कर्मों वाले ! (कल्याणप्रज्ञा
वा) या सुन्दर प्रज्ञा (बुद्धि)वाले ! मरुतों!'वर्षिष्ठया' (वर्षिष्ठेन)
बड़े श्रेष्ठ 'इषा' अन्नेन) अन्नके सहित 'वयः न' पक्षियों के
समान 'आपतत' [आपतत] आओ ।
'रुद्र' (९) व्याख्यान किये जाचुके [अ०१०पा०१खं०५ ] ।
“तेषाम्०” उन रुद्रों की यह ऋचा है ॥२(१४)॥
( सं० ३ )
निरु०-“आरुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्य-
हिन्दी निरुक्त (४०६) ११ अ० २पा० ३ ख०
रथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत् प्रति
हर्यते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सा उदन्धवे ॥ ”
(ऋ०सं०५, ३, २१, १) ॥
आगच्छत रुद्रा इन्द्रेण सहजोषणः सुविताय
कर्मणे इयं वो अस्मदपि प्रति कामर्थते मति-
तृष्णजे इव दिव उत्सा उदन्यवे इति ।
'तृष्णक्' तृष्यतेः।
'उदन्युः' उदन्यतेः ॥
'ऋभवः' उरु भान्ति-इति वा । ऋतेन भान्ति-
इति वा । ऋतेन भवन्ति- इति वा ।
तेषाम्- एषा भवति ॥३ (१५)॥
अर्थः-“आरुद्रासः०” यह ऋचा श्यावाश्व ऋषि की
है । जगती छन्द और आग्निमारुत में शस्त्र है ।
'रुद्रासः' (रुद्राः!) हे रुद्र देवो! (यूयम्)तुम“ इन्द्रव-
न्तः-सजोषसः” (इन्द्रेण सह जोषणाः) इन्द्र के साथप्रीति
युक्तहोते हुये या इन्द्र नाम ऐश्वर्यसे युक्त होते हुए 'हिरण्य-
रथाः' सोने के रथ वाले या जल के हरण के अर्थ रंहण (सर-
कने) वाले 'सुविताय' (कर्मणे) सुन्दर सगुण कर्म के लिये
वा शास्त्र के अनुसार किए जाते हुए कर्म की प्राप्ति के लिए
'आगन्तन' (-आगच्छत) आओ । 'इयम्'यह 'अस्मत्' आप
हमारी भी 'मतिः'मति(बुद्धि)'वः'(युष्मान्)तुम्हारे पास'प्रति-
हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) ११ अ० २पा० ३ खं०
हर्य्यन्ते' प्रति गमन करती है— जिस प्रकार पहिले से ही
तुम हमारे हविः की इच्छा करते हो, उसी प्रकार हमारी
बुद्धि भी तुम्हारे प्रति जाती हैकि-'तुम्हारे विना इनअङ्गों से
गुण युक्त भी हमारा यह कर्म विगुण (अङ्गहीन) न हो। जिस
प्रकार ब्राह्मण पहिले से ही न्यूते की इच्छा करते हैं, उसी
प्रकार देवता भी पहिले से हविः की इच्छा करते हैं। इस
अर्थ को श्रुति भी कहती है-
“देवता वै सर्वा आशंसन्ति ग्रहे गृह्यमाणे मह्यं
गृह्णाति”
अर्थात्-सब देवता ग्रह(हविः)लिए जाने के समय इच्छा
करते हैं कि-मेरे लिये ग्रहण करता है। इसीसे कहा है कि-
“हमारी मति तुम्हारे समीप प्रति गमन (गमन
के सामने गमन) करती है।”
कैसे जाती है? 'तृष्णाजे' ग्रीष्म (गरमी)में 'दिवः' द्युलोकसे
'उदन्यवे' जलके चाहने वाले लोक या चातक के लिए'उत्स्राः
न' जैसे मेघ आते हैं । उसीप्रकार तुम हमारे यज्ञ में आओ॥
'तृष्णाज्' कैसे ? पिपासा अर्थ में 'तृष' (दि० प०)
धातु से है।
'उदन्यु' कैसे ? 'उदन्य' नाम धातु से । 'उदन्यु' उदक
[जल] की इच्छा करने वाला ।
'ऋभु' [१०] कैसे ? ' उरु भान्ति ' वे बहुत चमकते हैं ।
'ऋतेन भान्ति इति वा'अथवा वे सत्य से चमकते हैं ।'ऋतेन
भवन्ति इति वा' अथवा वे सत्य से होते हैं ।
“तेषाम्०” उन ऋभुओं की यह ऋचा है ॥३[१५]॥
हिन्दी निरुक्त (४११) ११ अ० २ पा० ४ खं०
[खं० ४]
निरु० "विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाघतो मर्त्तासः
सन्तो अमृतत्वमानशुः । सौधन्वना ऋभवसूर-
चक्षमः संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभिः ॥" (ऋ०
सं० १, ७, ३०, ४) ॥
कृत्वा कर्माणि क्षिप्रत्वेन वोढारो मेधाविनो
वा मर्त्तासःसन्तःअमृतत्वम् आनशिरे, सौधन्वनाः
ऋभवः सूरख्याना वा, सूरप्रज्ञा वा,संवत्सरे सम-
पृच्यन्त धीतिभिः कर्मभिः ॥
ऋभुः'विभ्वा,वाजः,-इति सुधन्वनः आङ्गिरस-
स्य त्रयः पुत्रा बभूवुः, तेषां प्रथमोत्तमाभ्यां बहु-
वत् निगमा भवन्ति,न मध्यमेन। तदेतदृक्भोश्च
बहुवचनेन चमसस्य च संस्तवेन बहूनि दशतयीषु
सूक्तानि भवन्ति ।
आदित्यरश्मयः अपि ऋभवः उच्यन्ते ।
"अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो
नानुगच्छथ ।” [ऋ० सं० २, ३, ६, १] ॥
'अगोह्यः'आदित्यः । आगूहनीयः । तस्य यद्
अस्वपथ गृहे यावत् तत्र भवथ न तावद् इह भवथ
इति ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१२ ) ११ अ० २पा० ४खंड
'अङ्गिरसः' व्याख्याताः ।
तेषाम्—एषा भवति ॥४[१६]॥
अर्थ :-“विष्टी शमी०” इस ऋचा का कुत्स ऋषि हैं
आर्भवे विनियोग है ।
'सौधन्वनाः' ( सुधन्वनः पुत्राः ) सुधन्वा के पुत्र 'सूर-
चक्षसः' [ सूरख्याना वा ] सूर्य के समान प्रकाश वाले ( सूर-
प्रज्ञा वा ) सूर्य के समान ज्ञान वाले 'वाघतः' ( वोढारः )
यज्ञ के चलाने वाले ( मेधाविनो वा ) मेधा ( धारणा वाली
बुद्धि ) वाले 'ऋभवः' ऋभुओं ने “विष्टी शमी” ( कृत्वा
कर्माणि ) कर्मों को करके 'तरणित्वेन' [क्षिप्रत्वेन] जलदी से
“मर्त्तासः सन्तः” [ मनुष्याः सन्तः ] मनुष्य होते हुए
'अमृतत्वम्' अमर भाव ( देव भाव ) को 'आनशुः' प्राप्त कर
लिया था-सुधन्वा के पुत्र ऋभु कर्म की महिमा से शीघ्र ही
देवता होगए थे । 'संवत्सरे' एक वर्ष में 'धीतिभिः' (कर्मभिः)
कर्मों से 'समपृच्यन्त' संयुक्त हो गए थे - यज्ञ कर्म के अनु-
ष्ठान में अपने अपूर्व कौशल से उन्हों ने एक ही वर्ष में या
संवत्सर के विहित वसन्त आदि काल में कर्मों को समाप्त
किया और उसी कर्मकी यथार्थता के फलसे वे शीघ्र ही देवता
होगए-उनको कर्मके विपाक की बहुत काल तक प्रतीक्षा नहीं
करनी पड़ी ।
“ऋभुः०” । ऋभु, विभ्वा और वाज ये आङ्गिरस (अङ्गि-
रस के पुत्र) सुधन्वा के तीन पुत्र हुये थे, उनमें पहिले (ऋभु)
और तीसरे (वाज) के बहुतों के समान निगम हैं - इन दोनों
के नाम मन्त्रोंमें बहुवचनान्त आते हैं, किन्तु मध्यम (विभ्वा)
के नहीं। सो यह—ऋभु के बहुवचन के साथ और चमस के
संस्तव (एक साथ स्तुति) के साथ दशतयी [ऋग्वेद के दश
मण्डलों] में बहुत सूक्त हैं।
“आदित्यरश्मयः” । आदित्य (सूर्य) की रश्मिएँ
(किरणें) भी ऋभु कहलाती हैं।
“अगोह्यस्य०” । 'ऋभवः' हे ऋभुओ ! 'यद्' (यावत्)
जबतक 'अगोह्यस्य' (आदित्यस्य) सूर्य के 'गृहे' (मण्डले)
मण्डल में 'असतनाः' (अस्वपथ) तुम सोते हो (भवथ)
यो होते हो 'तद्' (तावत्) तब तक 'अद्य' (इह) यहां
'इदम्' इस जगत् को “न अनुगच्छथ” अनुसरण नहीं
करते हो (न भवथ) अथवा यहां नहीं होते हो— जब तुम
रात्रि के समय सूर्य मण्डल में प्रवेश कर जाते हो, तो यह
जगत् तुम्हारे बिना प्रकाश हीन होजाता है, इस तुम्हारे माहा-
भाग्य (महिमा) को मैं अनुकीर्त्तन करता हूं, तुम मेरे इस कार्य
को करो। इस मन्त्र में इस प्रकार 'ऋभु' नाम सूर्य की रश्मि-
ओं का है ॥
'अगोह्य' क्या ? आदित्य। क्यों वह अगूहनीय होता है
किसी से भी छिपाया नहीं छिपता।
“अङ्गिरसो व्याख्याताः” अङ्गिरसों की व्याख्या
[३. ३, ५] की जाचुकी।
“तेषाम्०” उन अङ्गिरसों की यह ऋचा है ॥ ४ [१६]
हिन्दी निरुक्त ( ४१४ ) ११ अ० २पा० ५ खं०
( खं० ५ )
निरु०-“विरूपास इदृषयस्तं इद् गम्भीरवेपसः'
ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥”
( ऋ० सं० ६, २, १, ५ ) ॥
बहुरूपा ऋषयः, ते गम्भीरकर्मणो वा, गम्भीर-
प्रज्ञा वा । ते अङ्गिरसः पुत्राः । ते अग्नेः अधि-
जज्ञिरे,-इति अग्निजन्म ।
'पितरो' व्याख्याताः ।
तेषाम् एषा भवति ॥५[१७]॥
अर्थ :-“‘विरूपासः’” इस ऋचाका नाभानेदिष्ट ऋषि
है अनुष्टुप् छन्द और पाष्ठिक षष्ठ (छठे) अहन् में विनि-
योग है ।
'विरूपास:' ( विरूपाः = नानारूपाः ) अनेक रूप वाले
( इत् ) 'ऋषयः' कभी निष्फल न होने वाले ब्रह्म ( वेद ) के
देखने वाले ( न केवल देखने वाले ही अपितु ) 'गम्भीरवेपसः'
( गम्भीरकर्मणो वा ) अथवा गम्भीर कर्म वाले ( गम्भीर-
प्रज्ञा वा ) अथवा गम्भीर बुद्धि वाले 'ते' वे ' अङ्गिरसः '
अङ्गिरा के 'सूनवः' (पुत्राः) पुत्र 'ते' वे 'अग्नेः' अग्नि के रूप
को प्राप्त हुए अङ्गिरा से 'परिजज्ञिरे' ( अधिजज्ञिरे ) उत्पन्न
हुए । वे नानारूप वाले और गम्भीर कर्म वाले मेरा यह इष्ट
करें । यह इनका अग्नि-जन्म है ।
'पितरः' (१२) (पितृ) व्याख्या किये जा चुके हैं [ ४, ३, ५ ]
उनकी यह ऋचा है-॥५(१७)॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१५ ) ११ अ० २ पा० ६ खं०
(खंड ६)
निरु०-“ उदी॑रता॒मव॑र॒ उत्परा॑स॒ उन्म॑ध्य॒माः
पि॒तरः॑ सो॒म्यास॑: । असुं॒ य ई॒युर॑वृ॒का ऋ॑त॒ज्ञा-
स्तेनो॑ऽवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु ॥” (ऋ० सं० ७, ३,
१७, १) (य० वाज० सं० १९, ४९) ॥८
उदीरताम् अवरे, उदीरतां परे, उदीरतां म-
ध्यमाः पितरः सोम्याः सोमसम्पादिनः ते, असुं
ये प्राणम् अन्वीयुः अवृकाः अनमित्राः सत्यज्ञा
वा, यज्ञज्ञा वा, ते नः आगच्छन्तु पितरोह्वा-
नेषु ॥
माध्यमिको यमः, तस्माद् माध्यमिकान् पितॄन्
मन्यन्ते ।
'अङ्गिरसो व्याख्याताः, पितरो व्याख्याताः,
भृगवो व्याख्याताः, 'अथर्वाणः' अथनवन्तः।
'थर्वतिः' चरतिकर्मा, तत्प्रतिषेधः।
तेषाम्- एषा साधारणा भवति- ॥ ६ (१८) ॥
अर्थः-“उदीरतामवरे०” इस ऋचाका शङ्ख ऋषि
और पितृमेधमें विनियोग है। (ये) जो 'पितरः' पितर 'अवरे'
(पृथिवीम् आश्रिताः) पृथिवी पर रहते हैं, (ते) वे (तावत्)
पहिले 'उदीरताम्' (ऊर्ध्वं गच्छन्तु) ऊपरको जावें-ऊपर
के लोक में जावें। 'परासः' (परे) (द्युलोकम् आश्रिताः) और
हिन्दी निरुक्त ( ४१६ ) ११अ० २पा० ६ खं०
जो द्युलोक में रहने वाले हैं (तेऽपि) वे भी 'उत्' (उदीरताम्)
ऊपर को जावें — नीचेकी ओर न गिरें या उनके उस अधिकार
के पूरे होजाने पर वे मुक्त होजावें । ( येऽपि ) और जो भी
'मध्यमाः' (पितरः)मध्यम लोक के निवासी पितर हैं,(तेऽपि)
वे भी 'उत्' (उदीरताम्) ऊपर को जावें — उत्तम लोक में चले
जावें । (येऽपि) और जो भी 'सोम्यास' ( सोम्याः = सोमस-
म्पादिनः सोम के सम्पादन करने वाले या हमारे यज्ञ मेंऽङ्ग
भाव को प्राप्त होने वाले 'ये' जो 'असुम्' [प्राणम्] प्राण (वायु)
रूप को 'ईयुः' (अन्वीयुः) प्राप्त हों — वायुमात्र — मूर्त्ति हों-
सूक्ष्म शरीर वाले हों, 'अवृकाः' और जो शत्रु रहित- केवल
समभाव को प्राप्त हों, 'ऋतज्ञाः' [सत्यप्रज्ञावा यज्ञप्रज्ञावा]
और जो सत्य के या यज्ञ के जानने वाले हों, 'ते' वे सब
'पितरः' पितर 'नः' हमारे हवेषु (दानेषु)आह्वानेषु बुलाओं
में 'अवन्तु' नित्य ही आवें ।
‘ यम देवता मध्यम लोक का है ’ यह नैरुक्त कहते हैं,
इससे 'पितृ' (पितर) देवताओं को माध्यमिक या मध्यमलोक
के मानते हैं । [क्यों कि- वह उनका राजा है ।]
‘अङ्गिरस्’ व्याख्यान किये गए ( ३, ३, ५ )
‘पितृ’ (पितर) व्याख्यान किये गए (४,३,५)
‘भृगु’ (१३) व्याख्यान किये गए (३,३,५)
‘अथर्वाणः’ (१३) (अथर्वा) क्या? ‘अथनवन्तः’ नहीं चलने
वाले = स्थिर-प्रकृति = स्थिर स्वभाव । सो कैसे ? ‘ थर्व ’
(भ्वा०प०) धातु गति अर्थ में है, उसका निषेध ‘अथर्वा’ है—
निषेधार्थक ‘अ’ और ‘थर्व’ धातु से है ।
उन सब (चारों) की यह साधारण ( सब के की ) ऋचा
है— ॥ ६ (१८) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४१७ ) ११अ० २पा० ७ खं०
[ खं० ७ ]
निरु०-“अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो
भृगवः सोम्यासः। तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि
भद्रे सोमनसे स्याम ॥” [ ऋ०सं० ७, ६. १५. १ ]
य० वा० सं० १९, ५०)
अङ्गिरसो नः पितरो नवगतयो नवनीतगतयो
वा अथर्वाणो भृगवः सोम्याः सोमसम्पादिनः तेषां
वयं सुमतौ कल्याणयां मतौ यज्ञियानामपि च
एषां भद्रे भन्दनीये भाजनवति वा कल्याणे मनसि
स्याम ।
“इति माध्यमिको देवगणः” इति नैरुक्ताः ।
“पितरः” इति अन्वाख्यानम् ।
अथापि ऋषयः स्तूयन्ते ॥७(१९)॥
अर्थः-“अङ्गिरसोनः०”इस ऋचा का यम ऋषि और
त्रिष्टुप् छन्द है ।
'अङ्गिरसः' अङ्गिरस् नाम वाले, जो 'सोम्यासः' (सोम्याः
सोमसम्पादिनः ) सोम के सम्पादन करने वाले, ( नित्यम् )
नित्य 'नः' हमारी 'सुमतौ' (कल्याणयां मतौ ) शुभ मति में
रहते हैं, और 'पितरः' पितर, जो 'नवग्वाः' (नवगतयः नव-
नीतगतयो या ) नवीन (नई) गतिवाले हैं-जिनका प्रतिमास
पितृयज्ञ के अर्थ यजमानों के घरों में नया २ गमन होता
रहता है, अथवा नवनीत ( मक्खन = घृत ) के प्रति जिनके
हिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) ११ अ० २पा० ७ खं०
मन की गति होती है कि-‘यह हमारा है’ ( क्योंकि-ऐसी
श्रुति है-‘‘ स्वयं विलीनं पितॄणाम् ’’ अर्थात्- अपने
आप पिंघलने वाला या शरीर में रमजाने वाला ( घृत )
पितरों का होता है । ) और ‘अथर्वाणः’ अथर्वा, और ‘भृगव ’
भृगु, जो ये-सोम के साधन करने वाले हैं-हमारी कल्याण
मति में रहते हैं, ‘वयम्’ हम भी ‘तेषाम्’ उन ‘यज्ञियानाम्’
यज्ञके सम्पादन करने वालो’ की ‘सुमतौ’ (कल्याणयां मतौ)
कल्याण मति में ‘स्याम’ हों । ‘अपिच’ और भी उनके ‘भद्रे’
( भन्दनीये भाजनवति वा कल्याणे ) स्तुति करने योग्य या
भक्तों को वाञ्छित अर्थों से संतुष्ट कराने वाले ‘सौमनसे’
( कल्याणे मनसि ) शुभ मन में ‘स्याम’ हो ।
‘‘ये-ऋभु, अङ्गिरस्, भृगु और अथर्वा मध्यम
लोक के देव समूह हैं।’’ ऐसा निरुक्त के आचार्य
मानते हैं- देवता पदों के मध्य में इनका पाठ होने से इनका
एक २ ( स्वतन्त्र २ ) देवगण है, ऐसा नैरुक्त मानते हैं।
‘‘ये सब पितर हैं’’ ऐसा आख्यान है-मन्त्रों में
देवताधर्म-से-देवताओं के प्रकार से पितरों की भी स्तुति
आती है,-अग्नि आदि देवताओं से विलक्षण ऐसे भी देवता
मन्त्रों में देखने चाहिए-ऋभु, सनत्कुमार आदि पितरों के
रूप में ये देवता ही हैं, ऐसा आख्यान (इतिहास) के विद्वान्
मानते हैं। [ ऐसा विचार इस लिये है कि-इन में ऋभु,
अङ्गिरस् और भृगु आदि नाम ऋषियों में भी प्रसिद्ध हैं
और मन्त्रों में देवता के स्थान में भी आते हैं। )
और भी ऋषियों की स्तुतिएं हैं- यह दूसरा कारण है
हिन्दी निरुक्त ( ४१६ ) ११ अ० २पा० ८ ख०
कि- ये ऋषि ही हैं। क्यों कि- मन्त्रों में और भी ऋषियों
की स्तुतिएं हैं ॥७(१६)॥
( खं० ८ )
“निरु०-सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव
महिमा गभीरः। वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो
वसिष्ठा अन्वेत्तवे वः ॥” (ऋ० सं०५,३,२३, ३)॥
इति यथा ॥
‘आप्त्याः’ आप्नोतेः ।
तेषाम्-एष निपातो भवति ऐन्द्रयाम् ऋचि
॥ ८ ( २७ ) ॥
अर्थः- “सूर्यस्येववक्षथः०” इसऋचाका इन्द्र ऋषिहै।
'सूर्यस्य-इव'जिस प्रकार सूर्य की'ज्योति'ज्योति वस्तुओं
का प्रकाश करती है, ऐसे ही 'एषाम्(वसिष्ठानाम्)इन वसिष्ठों
की 'वक्षथः' (वचनस्य दीप्तिः) वचन की दीप्ति है- मन्त्रो में
अध्यात्म, अधिदैव और अधियज्ञ अर्थों को असन्देहसे प्रकाश
करने वाली वचनशक्ति है । और'समुद्रस्य इव' समुद्र के समान
इनके वचनों की 'महिमा' महित्ता 'गभीरः' गम्भीर है- जिस
प्रकार समुद्र में जल अगाध है,उसी प्रकार इनके वचनों में अर्थ
अगाध है। और 'वातस्य इव प्रजवः' वायु के समान इनके
वचनों का वेग है- गम्भीर अर्थ वाले वचन होने परभी स्तुति
करने के समय इनकी स्तुतिएं बिलम्बयुक्त नहीं होतीं, किन्तु
वर्ण पद और वाक्योंमें शब्द और अर्थके संबन्ध सहित इनके
मन और वाणी की वृत्तिए शीघ्र प्रस्तुत होजाती हैं। क्योंकि
हिन्दी निरुक्त ( ४२१ ) ११ अ० २पा० ६ खं०
से है । “तेषाम्०” उसका इन्द्र देवता की ऋचा में यह नि-
पात है ॥ ८ (२०) ॥
( खं० ६ )
निरु०-“स्तुषेय्यं पुरुवर्पसमृभ्वमिनतममाप्त्यमा-
प्यानाम् । आ दर्षते शवसा सप्त दानून् प्रसाक्षते
प्रतिमानानि भूरि ॥” [ऋ०सं०८,७,२,१]
स्तोतव्यं बहुरूपम् उरुभूतम् ईश्वरतमम् आप्त्यम्
आप्त्यानाम् । आदृणाति यः शवसा बलेन सप्त-
दातॄन्-इति वा, सप्तदानवान्-इति वा । प्रसाक्षते
प्रतिमानानि बहूनि ।
‘साक्षतिः’ आप्नोतिकर्मा ॥९(२१)॥
इति एकादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥११,२॥
अर्थ:-“स्तुषेय्यं पुरु ” इस ऋचा का वृहदिव ऋषि
और महाव्रत में विनियोग है ।
(अहम्) मैं (इन्द्रम्) इन्द्र को (स्तौमि) स्तुति करता हूं ।
‘स्तुषेय्यम्’ ( स्तोतव्यम् ) जो स्तुति करने योग्य, ‘पुरुवर्पसम्’
( बहुरूपम् ) बहुत रूप वाला ‘ऋभ्वम्’ [ उरुभूतम् ] बहुत
‘इनतमम्’ ( ईश्वरतमम् ] ईश्वरों में बड़ा ईश्वर, ‘आप्त्या-
नाम्-आप्त्यम्’ [ ऋषीणाम् आप्तव्यम् ] आप्त्य ऋषियों
को स्तुतियों द्वारा प्राप्त करने योग्य है । ( यः ) जो ‘शवसा’
(बलेन) बल से ‘सप्त दानून्’ ( सप्त दातॄन् ) सात मेघों को
[ सप्त दानवान्-इतिवा ] अथवा सात असुरों को ‘आदर्षते’
[आदृणाति] विदारण करता है । और ‘भूरि’ (बहूनि) बहुत
हिन्दी निरुक्त ( ४२२ ) ११अ० ३पा० १खं०
'प्रतिमानानि' उपमानों को 'मस्रक्षते' ( प्राप्नोति ) प्राप्त
होता है ।
'सास्र' धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है ॥६(२१)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥११,२॥
तृतीयः पादः ।
( खं० १ )
निघ०-अदितिः ॥१६॥ सरमा ॥१७॥
सरस्वती ॥१८॥ वाक् ॥१९॥ अनुमतिः
॥२०॥ राका ॥२१॥ सिनीवाली ॥२२॥
कुहूः ॥२३॥ यमी ॥२४॥
निरु०-अथातो मध्यमस्थानाः स्त्रियः ।
तासाम्-अदितिः प्रथमागामिनी भवति ।
'अदितिः' व्याख्याता ।
तस्या एषा भवति ॥१(२२)॥
अर्थ :- अब यहां से मध्यमस्थान स्त्रियों की व्याख्या है ।
उन में 'अदिति' (१६) पहिले आती है ।
'अदिति' [१६] की व्याख्या होचुकी (४,४,१)
उस 'अदिति' की यह ऋचा है ॥१(२२)॥
व्याख्या
“अथातः” द्वितीय पाद में देवगण या बहुवचन वाले
“मरुतः” आदि ८ देवत्ताओंकेनामोंकी व्याख्या कीगई, अब
स्त्रीलिङ्ग “अदितिः” आदि २१ नामों की व्याख्या समा-
स्नाय के पाठ के अनुसार ही की जावेगी, जिसकी समाप्ति
इस अध्यायके अन्तमें होगी। इसी विशेष अधिकारकी सूचना
के लिये “अथातः” ये पद दिये हैं।
“मध्यस्थानाः” ‘मध्यस्थान’ क्यों ? ‘मध्यम् आसां
स्थानम्’ इनका मध्य [ अन्तरिक्ष ] स्थान है। वे कौन हैं ?
अदिति आदि देवस्त्रियें हैं ॥ १ [२२] ॥
[ खं० २ ]
निरु०- “दक्षस्य वाऽदिते जन्मनि व्रते राजा-
ना मित्रावरुणाविवाससि । अतूर्त्त पन्थाःपुरुरथो
अर्य्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु॥ ” (ऋ०सं०
८, २, ५, ६ ] ॥
दक्षस्य वा अदिते ! जन्मनि व्रते कर्मणि राजा
नौ मित्रावरुणौ परिचरसि । ‘विवासतिः’परिचर्या-
याम् । “ हविष्मान् आविवासति”— ऋ०मं० १,
२३, ३ ) इति-आशास्ते वा । ‘अतूर्तपन्थाः’
अत्वरमाणपन्थाः बहुरथः अर्यमा' आदित्यः।
अरीन् नियच्छति ।
‘सप्तहोता’ सप्त अस्मै रश्मयः रसान् अभिसन्नाम-
यन्ति । सप्तएनम्-ऋषयः स्तुवन्ति-इति वा । विषु-
रूपेषु जन्मसु कर्मसु उदयेषु ।
‘आदित्यो’ दक्षः-इति-आहुः । आदित्यमध्ये
च स्तुतः ॥
हिन्दी निरुक्त ( ४२४ ) ११ अ० ३ पा० २ खं०
‘ अदितिः ’ दाक्षायणी ।
अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि” (ऋ०
सं० ८, ३, १, ४ ) ॥ इति न ।
तत् कथम् उपपद्येत ?
समानजन्मानौ स्यातामिति ।
अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम्
इतरेतरप्रकृती ॥
अग्निरपि ‘ अदितिः ’ उच्यते ।
तस्य एषा भवति— ॥ २ ( २३ ) ॥
अर्थ—‘‘दक्षस्य वादिते०” इस ऋचा का शय
ऋषि है। वैश्वदेव में शस्त्र है। यहां दिन और रात्रि मित्र
वरुण हैं, उनकी सन्धि की वेला अदिति है। यही अवश्याय
रस [ओस] को देती है, इसी सम्बन्ध से इसे मध्यमा अदिति
समझ कर इस मन्त्र में कहा जाता है ।
‘अदिते!’ हे अदिति देवि! [त्वम्] तू ‘दक्षस्य (आदित्यस्य)
[वा] आदित्य के ‘ जन्मनि ’ उदयरूप ‘व्रते’ व्रतमें ‘राजाना’
[राजानौ] राजे ‘मित्रावरुणा’ [मित्रावरुणौ] मित्र वरुण देवोँ
को [रात्रि और दिन को ] ‘बिवाससि’ ( परिचरसि ) सेवन
करती है । अर्थात् — जब सूर्य देव आधे उदय होते हैं । उस
समय वह सन्धिवेला अदिति अपने आधे रूपसे दिनरूप मित्र
को व्यापन करती है, और आधे रूप से रात्रि रूप वरुण को
व्यापन करती है, जो दक्ष आदित्य ‘अर्यमा’ शत्रुओं को दमन
करने वाला ‘विषुरूपेषु’ (विषमरूपेषु) भिन्न २ प्रकाश देशों
हिन्दी निरुक्त ( ४२५ ) ११ अ० ३पा० २खं०
में होने वाले ‘जन्मसु’ ( कर्मसु = उदयेषु ) उदय रूप कर्मोंमें
अतूर्त्तपन्था’ (अत्वरमाणपन्थाः) वेग रहित या विषम गतिसे
रहित या नियत गति है-प्रतिमुहूर्त्त और प्रति दिन एक नियम
से चलने वाला है, पुरूरथः (बहुरथ = बहुंरंहण) बहुत गमन
करने वाला है, और ‘सप्तहोता’ सप्तहोता है-(सप्तअस्मैरश्मयः
रसान् अभिसन्नामयन्ति 'सात रश्मियें इसके लिये रसों को
लाती हैं, (सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा) अथवा सात
ऋषि इसको स्तुति करते हैं।
‘विवासति’ धातु परिचर्या सेवा अर्थ में है । जिसकायह
निगम है ।
“हविष्मान् आविवासति” अर्थात्- हे अग्नि देव !
‘हविष् के प्रदान से युक्त जो यजमान तेरी सेवा करता है ।
उसकी तू रक्षा कर’—यहहम आशा करतेहैं या चाहतेहैं-इस
आशिषा (आशास्ति) से ‘विवास’ धातु परिचर्या अर्थ में है ।
‘अर्यमा’ क्या ? आदित्य क्यों ? ‘अरीन् नियच्छति’ वह
शत्रुओं को वश करता है ।
यहां ‘दक्ष’आदित्यहै ऐसादेवतापदार्थ के जानने वालेकहते
हैं । क्यों कि- वह आदित्य के मध्य में स्तुति किया गया है
अर्थात्-उनके मत में देवता रूप वस्तु के निर्णय के लियेस्तुति
ही प्रमाण है-जिसकी स्तुति जिस देवता के मध्य में है, वह
वही देवता है । दक्ष भी आदित्य के मध्य में स्तुत है, इससे
यह आदित्य ही है । कहां ? “इमा गिरः” यहां से आरम्भ
कर तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः [ऋ०सं०२,७,६,१]
यहां पर आदित्य के मध्य में ‘दक्ष’ की स्तुति है ।
‘अदिति’ दाक्षायणी (दक्षकी पुत्री) है ।
हिन्दी निरुक्त (४२६) ११ अ० २पा० ३ खं०
क्यों कि—
“अदिते र्दक्षो अजायतः दक्षाददितिः परि”
[ऋ०सं० ८, ३, १, ४] अर्थात्-अदिति;से दक्ष प्रकट हुआ
और दक्ष से अदिति।
सो कैसे उपपन्न होगा (घटेगा) ? ।
“समान जन्मानौ स्याताम्” समान जन्मा यासमनन्तर
जन्मा होसकते हैं। अर्थात् एक के पीछे एक का जन्म होता है,
इससे ऐसा कहा गयो है।
“अपिवा देवधर्मेण०” अथवा देव धर्म से वे दोनों पर-
स्पर से उत्पन्न होते हैं। (क्योंकि- देवता अपने माहाभाग्य
मे ऐसा कर सकता है—उसी का उत्पन्न करने वाला होकर
भी उसी से उत्पन्न होता है।)
अग्नि भी अदिति कहा जाता है।
“तस्य०” उस अग्नि अदिति की यह ऋचा है॥२(२३)॥
(खं० ३)
निरु०-“यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्व-
मदिते सर्वताता। यम्भद्रेण शवसा चोदयासि
प्रजावता राधसा ते स्याम ॥” [ऋ० सं० १, ६,
३२, ५] ॥
यस्मै त्वं सुद्रविणो ! ददासि । अनागाः त्वम् ।
अनपराध ! त्वम् अदिते ! सर्वासु कर्मततिषु ।
‘आगः’ आङ्पूर्वाद् गमेः।
हिन्दी निरुक्त ( ४२७ ) ११ अ० ३ पा० ३ खं०
'एनः' एतेः ।
'किल्बिषम्' किल्भिदम् । सुकृतकर्मणो भयम् ।
कीर्त्तिम् अस्य भिनत्ति इति वा ।
यं भद्रेण शवसा बलेन चोदयसि प्रजावता च
राधसा अनेन ते वयम्-इह स्याम इति ।
'सरमा' सरणात् ।
तस्या एषा भवति-॥ ३ (२९) ॥
अर्थ :-"यस्मै त्वं सुद्रविणो०" इस ऋचा का कुत्स
ऋषि और प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
'सुद्रविणः !' हे सुन्दर धन वाले ! 'अदिते !' अग्निदेव !
'त्वम्' तू 'यस्मै' जिसके लिये 'ददाशः' ( ददासि ) देता है,
'यं' (च) और जिसको 'भद्रेण' शुभ 'शवसा' ( बलेन ) बल से
'प्रजावता' ( च ) और प्रजासंयुक्त 'राधसा' ( धनेन ) धन से
'चोदयसि' ( अनुगृह्णासि ) अनुग्रह करता है, "अनागाः
त्वं सर्वताता" ( अनपराध (:) त्वं सर्वासु कर्मसन्ततिषु ) तू
उसके सब कर्मों में अनपराध = निरपराध होता है- उससे
तेरा कोई अपराध नहीं बनता इसी से उसके सब कर्मों को
तू निर्दोष कर देता है। "ते स्याम" ऐसे प्रभाव वाले के
तेरे हम ' इह ' यहां यज्ञकर्म में अनुग्रह-पात्र हों ( यह हम
चाहते हैं) ।
'आगः' (पाप) कैसे ? 'आङ् (उप०) पूर्वक 'गम्' ( भ्वा०
प० ) धातु से है ।