सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1204, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1204

हिन्दी निरुक्त ( ४४२ ) ११अ० ३पा० २३खं०
अर्थः- “कुहुमहं सुवृतम्०” इस ऋचाका देविकाओं में
विनियोग है ।
‘अहम्’ मैं ‘सुवृतम्’ ( सुकृतम् विदितकर्माणाम्) सुन्दर
कर्मवाली अथवा विदितकर्मवाली ‘सुहवाम्’ ( सुहानाम् )
सुन्दर आवाहनवाली ‘कुहूम्’ कुहू को “अस्मिन् यज्ञे”
इस यज्ञ में ‘जोहवीमि’ ( आह्वये ) बुलाता हूं । “सा नो
ददातु श्रवणं पितॄणाम् ” [ पित्र्यं धनम् इति वा, पि-
त्र्यं यशः इति वा ) वह हमें पितरों का धन या यश दे ।
“तस्यै ते देवि ! हविषा विधेम ” ऐसे प्रभाववाली
तुझ को हे देवि ! हम हविः से सेवन करते हैं—हविः देते हैं
यह पहिलेँ व्याख्यान किया जाचुका है ।
‘यमी’ ( २४ ) शब्द की ‘यम’ शब्द से व्याख्या की
जाचुकी ( १०, २, ६ ) ।
“तस्या०” उस यमी की यह ऋचा है- १२ ( ३३ ) ॥
( खं० १३ )
निरु०-“अन्यमूषुतवं यम्यन्य उ त्वां परिष्वजाते
लिबुजेव वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा
तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥” [ऋ०सं० ७,
६, ७८, ४] ॥
अन्यमेव हि त्वं यमि !, अन्यः त्वां परिष्वङ्-
क्ष्यते लिबुजा-इव वृक्षम्, तस्य वा त्वं मनःइच्छ,
स वा तव, अधा अनेन कुरुष्व संविदं सुभद्राम्।