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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1197, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1197

हिन्दी निरुक्त ( ४३५ ) ११ अ० ३पा० ६ ख०
दात्रीम्) जलों को देने वाली [याम्] जिस ' वाचम् ' वाक् को
'अजनयन्त' जना (उत्पन्न किया) था, 'ताम्' उसी को 'विश्व-
रूपाः' (सर्वरूपाः व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च ) सब प्रकार
के = व्यक्तवाणी वाले मनुष्य आदि और अव्यक्त वाणी वाले
गौ आदि 'पशवः पशु 'वदन्ति' बोलते हैं,'सा' जो इस प्रकार
सब पशुओं से बोली जाती है, वह 'नः' [ अस्माकम् ] हमें
'मन्द्रा (मदना) हर्ष देने वाली 'इषम्' ( अन्नं च ) अन्न को
'ऊर्जम्' (रसं च) और रस को 'दुहाना' (प्रक्षरन्ती) झरतीहुई
'धेनुः' [तर्पयित्री] तृप्त करने वाली 'वाक् ' 'सुष्टुता' सुन्दर
स्तुति की गई 'उप ऐतु' हमारे यहां आवे- यह हम प्रार्थना
करते हैं ॥
'अनुमति (२०) और 'राका [२१] ये देवपत्निये' (देव
स्त्रिये') हैं- ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं ।
पौर्णमासी हैं, यह याज्ञिक (मीमांसक) मानते हैं ।
क्यों कि- "जो पहिली पौर्णमासी है,वह 'अनुमति'
है और जो पिछली पौर्णमासी है,वह 'राका'है"
यह ब्राह्मण में जाना जाता है ।
'अनुमति' ( २० ) क्यों अनुगमन से- ऋषियों ने और
देवताओं ने चौदह (१४)दिन के पक्ष में 'यह पौर्णमासी हो'
ऐसा माना है ।
"तस्या०" उस अनुमति की यह ऋचा है ॥८ (२९) ॥
( सं० १ )
निरु०- “ अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च
नस्कृधि । क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्रण आयूंषि
तारिषः ॥” (य० वा० सं० ३४, ८ ) ॥