निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४० ) ११अ० ३पा० ११खं०
'स्तुकः' स्त्यायतेः । संघातः ।
पृथु केशस्तुके ! पृथुष्टुते ! वा, या त्वं देवानाम्
असि स्वसा ।
'स्वसा' सुअसा । स्वेषु सीदति इति वा ।
जुषस्व 'हव्यम् अदनं, प्रजां च देवि दिशनः ।
'कुहूः' गूहतेः । क्व अभूत्-इति वा, क्व सती
हूयते इति वा, क्व आहुतं हविः जुहोति इति वा ।
तस्या एषा भवति— ११ ( ३२ ) ॥
अर्थः-“ सिनीवालि पृथुष्टुके०” इस ऋचा का
गृत्समद् ऋषि और देविकाओं में विनियोग है ।
'सिनीवालि ! हेसिनीवालि ! 'पृथुष्टुके !' (पृथु जघने ?)
हे मोटी साथलों वाली ! अथवा 'स्तुक' 'स्त्यै' [भ्वा० प० ]
धातु से संघात [समूह ] का नाम है । इससे हे पृथुकेशस्तुके ?
पृथुकेशकलापेः = मोटे चोटेवाली! अथवा 'पृथुष्टुके' बहुत स्तुति
कीगई ! 'या' जो [ त्वम् ] तू 'देवानाम्' देवताओंकी 'स्वसा'
बहिन 'असि' है ( सा ) सो तू 'आहुतम्' विधिसे होम किये
हुये 'हव्यम्' ( अदनम् ) अन्न यो हविः को ' जुषस्व ' सेवन
कर । 'देवि !' हे देवि ! [च] और 'नः' हमें 'प्रजाम्' सन्तान
'दिदिङ्ढि' [ दिश ] दे ॥
'स्वसा' क्यों ? 'सु असा'वह सुन्दर धनको असन (क्षेपण)
करती है- पिता के घर से धन को फेंकती है = ले जाती है ।
अथवा 'स्वेषु सीदति' वह पर कुल में चली जानेपर भी अपने
भ्राता आदि में ही बैठती है-उन्हीं का पक्ष रखती है ।