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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1200, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1200

कर्मको 'सीव्यतु [सन्तनोतु] बढावे । इतनाही नही-'अच्छिद्यमा-
नया अच्छिद्यमान (न टूटने वाली) 'सूच्या' (प्रजासंतत्या) प्रजा
सन्तति से 'शतदायम्' ( शतपदम् ) बहुत दान करने वाले
'उक्थ्यम्' ( वक्तव्यप्रशंसम् ) प्रशंसा करने योग्य 'वीरम्' (पुत्रम्)
वीर पुत्र को 'ददातु' दे ।
'सूची' कैसे ? सीव्यति [सिव् दिवा०प०] धातु से है ।
'सिनीवाली' [२२] और 'कुहू' (२३) ये दो देवपत्निएं
हैं-ऐसा नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।
अमावास्याएं हैं-ऐसा याज्ञिक (कर्मठ) लोग मानते हैं।
क्योंकि- "जो पूर्वा अमावास्या है वह 'सिनीवाली'
और जो पिछली अमावास्या है, वह 'कुहू' है"
ऐसा ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है ।
'सिनीवाली' क्यों ? 'सिन' अन्न होता है । सो क्यों
'सिनाति भूतानि' वह रस आदि धातुओं से प्राणियों को
बांधता है ।
'वाल' क्या ? पर्व । कैसे ? 'वृणोति' ('वृ' स्वा० उ० )
धातु से है । क्यों ? 'वृण्वन्ति देवाः तत्र हवींषि' उसमें देवता
हविओं को वरण (स्वीकार) करते हैं । 'तस्मिन् पर्वणि
असौ सिनीनी (अन्नवती) इति सिनीवाली' उस पर्व में
वह सिमिनी (अन्न वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है।
अथवा वह सिमिनी (अन्नवाली) और वालिनी (वालों
वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है । अथवा बाल के समान
अणु (छोटा) होने से चन्द्रमा इस में सेवितव्य या जानने
योग्य होता है ।
"तस्याः०"उस 'सिनीवाली' की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥