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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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प्रवृत्ति के पात्रों का रङ्गमञ्च पर प्रवेश उत्तर दिशा से तथा पाञ्चालमध्यमा
एवं औड्रमागधी प्रवृत्ति के पात्रों का दक्षिण दिशा के द्वार से होता है । जहाँ
मञ्च पर द्वार न हो वहाँ आवन्ती और दाक्षिणात्या के पात्र दाहिनी बाजू से
तथा पाञ्चाल मध्यमा एवं औड्रमागधी के पात्र बाईं बाजू से प्रवेश करते हैं ।
इस प्रकार नाट्य में किया गया यह विधान प्रवृत्तिभेद को दिखलाता है ।
प्रवृत्तियों की इन विभिन्नताओं का प्रयोग नाट्य ( अभिनय ) में ही होता है
गीत में नहीं । गीत में इनका समन्वित प्रयोग ही इष्ट होता है ।
महाराजाधिराज भोज ने भी प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण दिया है तथा
एक अतिरिक्त प्रवृत्ति पाञ्चाली या पौरस्त्या की भी परिगणना की है । यह
प्रवृत्ति पूर्व देशों का सङ्केत करती है परन्तु पूर्वदेशों का संकेत करने वाली
औड्रमागधी का भी उल्लेख भोज ने किया है । भोज के प्रवृत्तिविधान में
वेषभूषा की विभिन्नता का विवेचन करते हुए बतलाया गया कि लोक में
वेषभूषा केवल पात्र की विभिन्नता से ही परिवर्तित नहीं हो जाती परन्तु एक
ही पात्र की वेषभूषा अनेक कारणों एवं अवस्थाओं के सन्दर्भ में परिवर्तित भी
होती रहती है । इन कारणों तथा अवस्थाओं की परिगणना यद्यपि सम्भव
नहीं है परन्तु भोज ने इसे प्रवृत्ति के हेतु दिखलाया है । तदनुसार देश, काल,
पात्र, वय, शक्ति, साधन, अभिप्राय, व्याघात, विपरिणाम, निमित्त, बिहार,
उपहार, थल, छन्द, आश्रय, जाति, व्यक्ति, तथा विभव आदि के कारण
पात्र की ( मनुष्य की ) वेषभूषा में अन्तर आ जाता है तथा तदनुसार
नाट्यप्रयोग में उस लोकाचार का प्रयोग उचित होता है । उसे आहार्य
अभिनय के प्रसंग में भरत मुनि ने वेष, वय, अवस्था के अनुसार कथा के
परिवर्तन से प्रवृत्ति के विधान का संकेत किया है ।
भरतमुनि ने प्रवृत्तियों का विभाग मुख्यतः वृत्तियों के आधार पर ही
किया था । वृत्ति पात्रों की शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध
होती है जब कि प्रवृत्ति पात्रों की वेषभूषा, व्यवहार आदि से सम्बद्ध होती
है । वृत्ति व्यक्ति की अन्तश्चेतना तथा प्रवृत्ति उसकी बाह्य अभिव्यक्ति
होती है । इसीलिये नाट्यप्रयोग के चित्तवृत्ति प्रधान होने से उसमें वेषभूषादि
का प्रयोग सहायक हो जाता है ! इसका मूलतत्त्व यह है कि चित्तवृत्ति से
वेषभूषादि का प्रयोग होता है, जो वेष एवं भाषागत भेद तथा देशभेद से
स्वभाव भेद को नाट्यायित करने का है । स्वभावभिन्नता के आधार पर
ही उद्धत या मृदु वृत्तियों का विनिश्चय भी होता है । इस तथ्य को मुनि ने

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व्यापक दृष्टि से देखा था तथा उसे नियोजित करने का विधान भी दिखलाया
जिसकी अभिनवगुप्तपाद ने भी समर्थन करते हुए स्पष्ट व्याख्या दी ।
नाट्यप्रयोग के क्रम में देश, काल एवं अवस्था के अनुरूप प्रवृत्ति विधान
रहने पर ही रसास्वादन शक्य होता है। कभी प्रवृत्तियों का समन्वय भी
नाट्यप्रयोग के सौन्दर्य या अर्थ-युक्ति के आग्रहवश किया जाता है तथा
कभी देश, काल आदि के कारण भी। यदि यह होता है तो ही नाट्य की
समग्र परिकल्पना सम्भव है तथा ऐसे सामञ्जस्य के विपरीत नाट्य-प्रयोग
अयथार्थ एवं रसानुभूति की हीनता से ग्रसित हो सकता है । अतः प्रवृत्ति के
अनुरूप ही पात्रों की नाट्यप्रयोग में योजना का विधान रखा गया, क्योंकि
पात्र प्रेक्षकों के हृदय में भाव अङ्कित करने में इसी बाह्यपरिवेशमयी प्रवृत्ति
के योग से ही सफल होता है। यहाँ इन्हीं कारणों से प्रवृत्ति का ऐतिहासिक
महत्त्व एवं मूल्य भी है। यह सही है कि ये प्रवृत्तियाँ अपने स्वरूप में
कदाचित् भरतमुनि के पूर्व भी विद्यमान रहीं होंगी जिनको मुनि ने शास्त्र
बद्ध कर नाट्यप्रयोग में विनियोजित किया, क्योंकि ऐसा करने से नाट्यप्रयोग
समृद्ध एवं भाव सम्पन्न होता है यह निर्विवाद है ।
लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी—भरतमुनि ने अभिनय के इसी कथन
क्रम में नाट्याभिनय के अनुगामि होने से धर्मी का उल्लेख (अभिनय
कथन में बाद में) किया यद्यपि षष्ठ अध्याय में संग्रह तथा उद्देश्य
के कथन के प्रसंग में रस, भाव आदि एकादश (या त्रयोदश) तत्त्वों में
धर्मी का उल्लेख किया था। अभिनय अर्थात् नाट्यप्रयोग का जो अपना
धर्म या स्वभाव है उसके अनुकूल कार्य 'धर्मी' होता है। धर्म शब्द की
व्युत्पत्ति भी 'ध्रियते अनेन' 'धरति इति वा'। इस प्रकार √ धृ धातु से
मन् प्रत्यय निष्पन्न 'धर्म' शब्द है। अतः धर्मी का अर्थ हुआ जिसमें धर्म हो
या जो धर्म का अनुगमन करता हो। इसी कारण नाट्य में दो प्रकार के
धर्मी निरूपित किये गये—(१) लोकधर्मी तथा (२) नाट्यधर्मी ।
लोक में प्रचलित कार्य, आचार एवं व्यवहारों का शुद्ध अनुकरणात्मक
प्रस्तुतीकरण 'लोकधर्मी' होगा। जिसमें अपने सहज या प्रकृत भाग में स्वरूप
प्रस्तुत होता है तथा इसी कारण उसमें लोकजीवन की सहजवृत्तियों का
प्रभाव दिखता है। नाट्यधर्मी में शास्त्रीय उक्तियाँ या साङ्केतिक वाक्य,
स्वगत या आकाशभाषित आदि तथा रङ्गमञ्च पर प्रयोज्य वस्तु तथा भावों
का सङ्केत करने वाली असंख्य विधियाँ तथा निर्देश आते हैं। इसके अतिरिक्त
लोकदृष्ट सुख, दुःखादि के आङ्गिक अभिनयादि से प्रस्तुत नाट्य तथा

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अभिनयविधान एवं उनका प्रतिपादक यह नाट्यशास्त्र—ये सभी नाट्यधर्मी
कहलाते हैं।
लोकधर्मी (स्वरूप)—लोकधर्मी का स्वरूप बतलाते हुए मुनि ने
(नाट्यशास्त्र १४।६६-७० में) कहा कि—'यदि कोई रूपक लोकस्वभाव
के अनुसार भावप्रदर्शित करनेवाला, सादगी और बिना बाहरी दिखावट
वाला (अविकृत) कथावस्तु में प्रजाजन के सामान्य आचार, अवस्था
एवं क्रियाओं को प्रदर्शित करने वाला, लीला आदि ललित वर्तन से रहित
आङ्गिक चेष्टाओं से सहज भावों को प्रस्तुत करे तथा जिसमें अनेकविध
स्त्री एवं पुरुष पात्र हों तो वह 'लोकधर्मी' नाट्य है। आचार्य अभिनवगुप्त
ने भी कवि के द्वारा लोकधर्मी रूढ़ि के अनुसार यथावत् वस्तु मात्र के
रचना द्वारा तथा अभिनेता के द्वारा उसे तथैव प्रस्तुत करने को 'लोकधर्मी'
बतलाया क्योंकि इसमें स्वप्रतिभा से निर्मित अनुरञ्जनकारी वैचित्र्य की
कल्पित उद्भावनायें नहीं होतीं। आशय यही हैं कि यहाँ लोकानुसारी मानव
पात्रों की सहज प्रवृत्तियों को प्रमुखता देकर उपस्थित करने का उद्योग
रहता है अतः यह लोकधर्मी प्रयोग कहलाता है। इसके अतिरिक्त मानव की
सुख दुःखात्मक भावों में रहने वाली स्थिति का प्रकृतिसम्मत अङ्कन या प्रकृत
स्थिति में अभिनयविधान भी 'लोकधर्मी' ही होगा।
नाट्यधर्मी (स्वरूप)—इसी क्रम में भरतमुनि ने नाट्यधर्मी का
भी विशद विवरण दिया तथा उसे लोकधर्मी रूढ़ि की अपेक्षा अधिक
वैचित्र्याधायक, कल्पनासम्भरित तथा अनुरञ्जनक्षम बतलाया। तदनुसार
यदि किसी रूपकादि में इतिहास, पुराण आदि में प्रसिद्ध इतिवृत्त को
कल्पनात्मक परिवर्तन के द्वारा रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाए तो वह
'नाट्यधर्मी' होता है। इसी प्रकार नाट्यरचना या रूपकादि में वाक्यावलि,
क्रियायें, प्राणिवर्ग (पुरुष तथा स्त्री पात्रादि) तथा भाव असामान्य रहें,
लक्षण से युक्त अङ्गहारों, नृत्त, अभिनयादि को स्वर तथा अलङ्कारादि
की योजना से युक्त रखा जाए तथा दिव्य तथा अदिव्य पात्रों के चरित्र
कुशलतापूर्वक वहन किये जाए तो यह भी 'नाट्यधर्मी' ही होगा। इसी प्रकार
जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु के मूर्त रूप में कुशलता से प्रयोग किया जाता हो, जहाँ
समीपवर्ती पात्र के कथन न सुने जाते हों तथा अनुक्त कथन को सुनकर
उसका प्रत्युत्तर दिया जाय, जहाँ पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच,
शस्त्र तथा ध्वज आदि का मूर्त रूप में प्रयोग होता हो, जहाँ एक अभिनेता

एक भूमिका का निर्वाह करने के बाद पुनः दूसरी भूमिका को भी धारण कर
उसका भी अपने अभिनय कौशल से निर्वाह करता हो, जो स्त्री एक बार
अगम्य ( पूज्य या वृद्ध ) स्त्री की भूमिका ( को अभिनय द्वारा ) प्रस्तुत कर
पुनः गम्या ( नायिका या अन्य युवती स्त्री ) की भूमिका ले लेती हो तो यह
भी 'नाट्यधर्मी' हो जाता है।
इस प्रकार मुनि ने काव्य एवं नाट्य में चमत्कार तथा सौन्दर्य के
उद्भावन में लोकधर्मी रूढ़ियों की भाँति कुछ आधार ग्रहण करते हुए
सिद्धान्ततः 'नाट्यधर्मी' को दिखलाया है। यहाँ इतिहासादि प्रसिद्ध इतिवृत्त में
कल्पना के योग से नाट्यधर्मी' भाव रूढ़िबद्ध हो जाता है। इसी प्रकार
लक्षणादि सम्पन्न आङ्गिक अभिनय का अंगहारादि शास्त्रीय अङ्गों के साथ
प्रस्तुतीकरण तथा वाचिक अभिनय में अलङ्कारादि की योजना के साथ स्वर,
गीत आदि के साथ काव्य का व्यवस्थित रूप में नियमबद्ध उपस्थापन भी
'नाट्यधर्मी' है। नाट्यधर्मी का क्षेत्र व्यापक है जहाँ पात्रों की भूमिका में
विपर्यय होना, पात्रों का स्वभाव त्याग तथा परभाव में अभिनय करना,
संसार प्रसिद्ध पदार्थों एवं भावों का प्रतीकादि रूपों में प्रदर्शन तथा एक पात्र
का एक से अधिक भूमिका में आना, आङ्गिक अभिनय को विविध
वाद्यवादनादि के साथ प्रस्तुत करना, कक्ष्याविभाग के अन्तर्गत निर्दिष्ट
विधानों का अनुसरण करना तथा चित्राभिनयादि के सङ्केतात्मक विशिष्ट
अभिनय को सम्पन्न करना आदि अनेक बातें आती हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि लोक के सहज जीवन या भाव का अनुकरण करने
वाला सहज अभिनय 'लोकधर्मी' तथा शास्त्रीय परम्परा का अनुगमन करने
वाला प्रतीकात्मक अभिनय 'नाट्यधर्मी' होता है। प्राचीन नाट्याचार्यों का
भी ध्यान नाट्यप्रयोग में स्वाभाविकता तथा प्रभावोत्पादकता की समस्या पर
गया था जिसके लिये उनने इन दो धर्मियों का विभाग करते हुए अपना
प्रयोगगत रास्ता निकाल लिया। इस प्रकार से स्त्री-पुरुषों के सहज
प्रस्तुतियाँ भी नाट्यप्रयोग में रहे तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिष्कार
तथा अभिनयगत दक्षता के शास्त्रीय नियम तथा रूढ़ियों का भी
संयोजन रखा जाए। प्राचीन रङ्गकर्म के उपदेष्टा तथा प्रयोक्ता आचार्यों ने
इस सत्य को बहुत पहिले ही पहिचान लिया था कि वास्तविक कला की
उपलब्धि के लिये नाट्यधर्मी रूढ़ियों का परम्परानुगमन आवश्यक है। यदि
अतिवास्तविकतावादी ऐसी स्थिति में अस्वाभाविकता का दोषारोपण करें

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भी तो भी इस तथ्य से नकारा नहीं जा सकता है कि रूपक की रचनागत
स्थितियों के साथ-साथ उसके रङ्गमञ्च पर प्रयोग की सम्भावनाओं का
सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेक्षकवर्ग यदि वास्तविकता
का अतिशय कठोरता से आग्रह रखते होंगे तो किसी प्रकार भी रंगमञ्च पर
कोई भी नाट्यप्रयोग प्रस्तुत होना सम्भव नहीं है।
इससे यह भी विचार अल्पचिन्तन से विनिश्चित लगता है कि १"भरत-
काल में लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी परम्पराएँ स्वतन्त्र रूप में विकसित हो
रहीं थीं। धर्मी पद्धति की अनभिज्ञता, रंगमञ्च निर्माण की विस्तृतविधियों
से अपरिचय तथा वस्तुगत वैचित्र्य के अभाव में भी 'लोकधर्मी 'तत्व
जनपदों की छाया में विकसित हो रहा था। जब कि नगरों में आयोजित
नाट्यप्रयोग शास्त्रानुमोदित तथा सुसंस्कृत होते थे तो ग्रामों के आयोजन शुद्ध
तथा प्रकृतरूप में। इस प्रकार ग्रामों तथा नगरों में प्रचलित नाट्य की दो
धाराओं को भरतमुनि ने लोक तथा नाट्यधर्मी के रूप में परिगणित किया
है"। क्योंकि दोनों विधाएँ ही नाट्यप्रयोग को प्रभावित करती है तथा
इनकी समान रूप से विकासयात्रा भी रहती है। अतः जनपदीय नाट्यरूपों
को किसी भी स्थिति में शास्त्रसम्मत लोकधर्मी का उदाहरण नहीं माना जा
सकता है। इसी प्रकार यह भी समझने की बात है कि नाट्यप्रयोग जिसे
धारण करता हो वही 'धर्मी' होता है तो नाट्यप्रयोग एक ओर तो अनुकरण
मूलक होगा तथा दूसरी कल्पनामूलक भी। नाटक फिर चाहे संस्कृत का हो
या ग्रामीण भाषा का—अपने अभिनयन के लिये उन्हें स्वाभाविकता के साथ-
साथ प्रतीकात्मकता का आधार लेना ही पड़ेगा। परन्तु स्वाभाविक अभिनय
विधान को लोकधर्मी तथा प्रतीकात्मक विधि को 'नाट्यधर्मी' मान कर
प्रयोग की समस्या का भरतमुनि ने समाधान निकाला था। अतः देशी
नाट्यपद्धति के नाम पर अभिनय व्यापार को प्रयोग में प्रविष्ट कर श्री
हबीब तनवीर ने भवभूति के जिस परिनिष्ठित रूपक 'उत्तररामचरित'
नाटक का भोंड़ा प्रदर्शन उज्जयिनी के "कालिदास समारोह" (वि०
सं० २०३२) में किया था वह किसी भी प्रकार रंगकर्मिता की प्रतिष्ठित
लोकपरम्परा का अनुगमन नहीं करता, न ही अभिनय की एक शैली कहकर
उसे भारतीय परम्परा से अनुगत वस्तु माना जा सकता है। इनमें स्थित
अस्वाभाविकता को लोकवृत्ति का विशेष या अनगढ़ रूप भी नहीं माना जा
१. द्रष्ट-भरत और भारतीय नाट्यकला—पृष्ठ ४४८

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सकता है, क्योंकि वैसा रहने पर होने वाला नाट्यप्रयोग एक अतिहीन या
सस्ता मनोरंजन का रूप लेकर उसे अधम श्रेणी की ओर धकेल देगा।
इस प्रकार लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी के विवरण से जहाँ उनकी स्थिति
तथा स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है वहीं उनकी पारस्परिक विभेदकरेखाएँ भी
स्पष्टतः परिलक्षित हो जाती हैं। अतएव वाचिक अभिनय में प्रयुक्त संवाद
जहाँ लोकधर्मी होंगे वही 'गान' नाट्यधर्मी हो जायगा। इसी प्रकार स्वगत,
जनान्तिक, अपवारितक तथा आकाशभाषित जैसी विधियाँ नाट्यधर्मी ही
रहेंगी। आहार्याभिनय के अन्तर्गत अलङ्कारों तथा वस्त्रों का परिधान
लोकधर्मी होगा तो गति प्रचार में आने वाली आरोहण तथा अवरोहण आदि
की विधियाँ नाट्यधर्मी होंगी। सात्विक अभिनय के अन्तर्गत सहजभाव में
अश्रुप्रवाह की अवस्था लोकधर्मी तथा भावों के प्रदर्शन की स्थिति में शास्त्रीय
विधान के अन्तर्गत प्रस्तुत यही विधि 'नाट्यधर्मी' हो जायगी। इस प्रकार
इन विभेदों की कल्पना से ही स्पष्ट है कि 'लोकधर्मी' रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी
रूढ़ियों की आधार तथा अनुग्राहक है अतः उनकी नाट्यप्रयोग की सिद्धि में
समान उपयोगिता तथा सहकार रहता है तथा किसी एक ही परम्परा से
रूपक को मञ्च पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ( नहीं इसमें विशुद्धता
का कोई आग्रह ही होना चाहिए )।
भरतमुनि के उत्तरभावी नाट्याचार्यों की दृष्टि ऐसी प्रयोगप्रधान नहीं
रही तथा इसी कारण धनञ्जय, धनिक आदि ने नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी
तथ्यों पर कोई विवरण नहीं दिये। महाराणा कुम्भ, वेमभूपाल आदि के
विवरण भी इस तथ्य पर अधिक नवीनता नहीं देते। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में
अवश्य इस विषय में कुछ विशेष विवरण मिलता है। तदनुसार लोकधर्मी
तथा नाट्यधर्मी विधाओं की स्थिति को दिखलाते हुए बतलाया गया कि ये
'धर्मी' दो प्रकार के हैं लोक तथा नाट्य। इनमें 'लोकधर्मी विधा के दो
विभाग होंगे—( १ ) चित्तवृत्यर्थिका तथा ( २ ) बाह्यवस्त्वनुकारिणी। इसी
प्रकार नाट्यधर्मी के भी—(१) कैशिकी शोभिनी तथा (२) अंशोपजीविनो
जैसे विभाग होंगे।
इनमें लोकधर्मी रूढि के अन्तर्गत जिन दो भेदों को दिखलाया गया उनमें
एक के अन्तर्गत मानवके सुखदुःखात्मक स्वभावगत प्रकृत अभिनय का विधान
है जहाँ आन्तरचित्तवृत्तियों का प्रस्फुटन होता है। दूसरे में नाट्यवस्तुओं का
संकेत रहता है जो मानव जीवन के चारों ओर स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य है।
मानव जीवन उसकी आन्तरवृत्तियों तथा नाट्यपरिवेश दोनों ही लोकधर्मी

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प्रक्रियाओं से प्रयुक्त होता है। नाट्यधर्मी में कैशिकी शोभा की प्रक्रिया के
द्वारा अंगों के विलासपूर्ण हस्तव्यापार, गीत नृत्य आदि का प्रयोग होता है।
इसके अंशोपजीवनी नामक भेद के द्वारा ही कक्ष्याविभाग, प्रसाद, पर्वत, आदि
की विविध मुद्राओं तथा विधानों के द्वारा इच्छानुरूप प्रयोग होता है, क्योंकि
रंगमञ्च की सीमा के सीमित रहने से इनका पूर्णरूप में प्रयोग सम्भव नहीं
इसी कारण उनका अंशतः प्रयोग ही सम्भव रहता है तथा उसकी सूचना
दृश्यरूप में रङ्गमञ्च पर होती है तथा यही अंशोपजीवनी नाट्यधर्मी रूढ़ि या
विधा होती है।
भरतमुनि नाट्यविद्या के सिद्धान्त प्रदर्शक मात्र नहीं थे वे नाट्यप्रयोक्ता
भी थे, अतः स्वभावतः वे इन बातों में सन्तुलन रखते थे। उनकी यही वृत्ति
धर्मी निरूपण के प्रसंग में देखी जा सकती है। उनके लोकानुभूति तथा
लोकाचार से ही नाट्य तथा लोकधर्मी रूढ़ि के विकास को लिया भी था।
अतः लोकधर्मी रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी के लिये चित्राधारवत् रहेंगी ही, क्योंकि
जो शास्त्र, कर्म, शिल्प तथा अन्य क्रियाएँ लोकधर्म में प्रवृत्त हैं, वे
ही 'नाट्य' हैं। उनके इस कथन के अतिरिक्त यह भी कहना कि
"लोक जीवन के नितान्त प्रकृतरूप में प्रस्तुत होने पर नाट्यप्रयोग में न
सौन्दर्यविधान होगा न ही जीवन का प्रभावशाली रूप ही चित्रित हो
पाएगा। क्योंकि समस्त अभिनयों की रूपक में योजना नाट्यार्थ को ध्यान
में रख कर ही की जाती है तथा नाट्यधर्मिता रूप आंशिक तत्त्व के
( अभिनय के ) बिना सामाजिक के हृदय में राग की प्रतीति नही होगी
तथा रस की सिद्धि भी।" ( ना० शा० १४।८२ ) अतः उसे प्रयोग की
स्थिति के अनुरूप ही धर्मियों की सामञ्जस्यपूर्ण योजना रखना होगा यह स्पष्ट
हो जाता है।
वाचिक अभिनय—नाट्यशास्त्र के पञ्चदशअध्याय से आरम्भ होकर
उन्नीसवें अध्याय तक ( सामान्यतः ) चलने वाला अभिनय का द्वितीय प्रमुख
प्रभेद है 'वाचिक अभिनय' जिसका नाट्यप्रयोग में संवाद रूप-में विधान
( रहता ) है तथा उपयोग किया जाता है। नाट्य का यह प्रमुख आधार
भूत तत्त्व है तथा सर्वप्रमुख अभिनय भी। इसी कारण भरतमुनि ने इसे
नाट्य का शरीर भी कहा है जिसका कारण है इसका वाणी द्वारा प्रस्तुत
होना तथा वाणी ही जब सब का मूल हो तो फिर अन्य अभिनय इसी का
आधार लेकर प्रवृत्त होगें हीं। यद्यपि मानवीय अन्तर्भावों की अभिव्यक्ति
सात्विक अभिनय से करने का विधान है किन्तु इनकी भी पूर्ति या पूर्णता

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होती है वाचिक अभिनय से ही । इसलिये वाचिक अभिनय सभी का मूल
भूत आधार बन जाने के कारण इसका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है । इस वाचिक
अभिनय के अन्तर्गत शब्दविधान छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण, दोष, भाषा
तथा सम्बोधन विधान जैसे विषय आते हैं जिनका तात्त्विक एवं उपयोगी
विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया है ।
शब्दविधान—नाट्य के आधारभूत तत्त्व वाचिकअभिनय का प्रस्तुती-
करण वाणी से ही होता है—यह बात पूर्व में कही गयी थी । वाणी की
उत्पत्ति नाद से होती है । जब शरीर में स्थित वायु क्रमशः हृदय, कण्ठ, शीर्ष
से होकर मुख द्वारा ध्वनि रूप में प्रकट हो तो वह ‘नाद’ कहलाता है । इस
नाद के तीन प्रभेद माने गये हैं—मन्द्र, मध्य तथा तार । हृदय से उत्पन्न
होनेवाला नाद ‘मन्द्र’, कण्ठ से उत्पन्न होने वाला ‘मध्य’ तथा शीर्ष से
होने वाला ‘तार’ कहलाता है । नाद से उद्भूत वाक्तत्त्व का जब शब्दमय
प्रयोग होता है तो यही वाचिक अभिनय हो जाता है, यह स्पष्ट है । इस
वाचिक के अन्तर्गत शब्द का विवरण देते हुए नाट्यशास्त्र में ‘अ’ से आरम्भ
होने वाले ( चौदह ) स्वर, ‘क’ से ‘ह’ तक के व्यञ्जन तथा इनके
उच्चारण स्थान, प्रयत्न, घोष तथा अघोष वर्ण के विवरण के साथ ही
शब्द या पद के नाम, आख्यात, उपसर्ग एवं निपात को दिखला कर पदों
के साथ संयुक्त होने वाले प्रत्यय, सन्धि, समास, तद्धित, कृदन्त जैसे व्याकरण-
शास्त्र के प्रमुख एवं अन्य आवश्यक विषयों का ( बड़े ही ) संक्षेप में तथा
सरलता से उपयोगी विवेचन किया गया है । ऐसे शब्दविधान के अनुसार की
गयी रचना ही ‘पदबन्ध’ है जो ‘काव्य’ कहलाती है तथा जिसका अभिनय के
द्वारा प्रस्तुतीकरण ‘नाट्य’ हो जाता है । यहाँ भरतमुनि ने जिस शब्दशास्त्र
का विवरण दिया है वह अपने स्वरूप में अतिप्राचीन परम्परा से मेल खाता
है जिसमें अपने पूर्ववर्ती तथा समकालीन वैयाकरणों की अनेक मान्यताओं का
विवरण है किन्तु है यह सभी अतिप्राचीन ही ।
पदबन्ध—वाचिक अभिनय के पाठ्य रूप के मुनि ने सर्व प्रथम दो भेद
करते हुए उसका संस्कृत तथा प्राकृत में विभाजन किया तथा शब्द स्वरूप के
विवरण के क्रम में पदबन्ध को काव्य का जनक बतलाया । यह पदबन्ध
विभक्त्यन्त शब्द से निर्मित होता है । इसके दो विभेद होते हैं—( १ )
निबद्ध तथा ( २ ) चूर्णपद । ‘निबद्ध’ ( प्रकार ) में गुरु लघु युक्त अक्षरों
या मात्राओं की संख्या नियत रहती है जिससे आगे चल कर पद्य की
अवतारणा होती है । ‘चूर्णपद’ में अर्थ की अपेक्षा से अक्षर युक्त पदों की

योजना रखी जाती है । इसका प्रयोग अनियत स्वरूप वाले संवादों में होता
है । इसी के द्वारा 'गद्य' की अवतारणा होती है । रूपकादि नाट्य रचनाओं
के संवाद गद्य में प्रायः रहते ही हैं, किन्तु पात्रों के मनोभावों एवं संवेदनाओं
के अतिरिक्त उनके स्थान, वातावरण आदि को व्यक्त करने के लिये उनमें
'पद्य' की भी योजना ( संवादों में ) रखी जाती है जो गति एवं लय की
चारुता से सम्पन्न रहती है । इसमें चार पादों के रहने से इसकी पद्य-संज्ञा
अन्वर्थ है । इस प्रकार स्पष्ट है कि गद्य तथा पद्य का सम्मिलित रूप
'पदबन्ध' है जो नाट्य का प्रयोजक तत्त्व है । इसी पद्य की एक अन्य संज्ञा
'छन्द' होती है ।
पद्य तथा उसके प्रकार—आरम्भ में पद्य या छन्द के दो प्रभेद किये
गये—( १ ) जाति तथा वृत्त । इनमें अक्षरों की संख्या पर आधारित पाद
वाले 'छन्द' को 'जाति' तथा अक्षरों की गणना पर आधारित पाद वाले छन्द
को 'वृत्त' या वर्णिक वृत्त कहा जाता है । इसका ( जाति छन्दों की मात्रा
गणना के विपरीत ) अक्षरों की संख्या को नियत क्रम तथा त्रिकों या गणों
के आधार पर विधान किया गया है । प्रत्येक त्रिक या गण में गुरु, लघु वर्ण
नियत रहते हैं तथा प्रत्येक छन्द में गण से युक्त या नियत 'पाद' रखे जाते
हैं । भरतमुनि ने भी ( शास्त्र की परम्परानुसार ) इन गणादि का विवरण
दिया है । यथा :—
आदि गुरु भगण ( ऽ।। ), सर्वगुरु मगण ( ऽऽऽ ), मध्यगुरु जगण ( ।ऽ। )
अन्त गुरु सगण ( ।।ऽ ), मध्य लघु रगण ( ऽ।ऽ ), अन्त लघु तगण ( ऽऽ। ),
आदि लघु यगण ( ।ऽऽ ) तथा सर्व लघु नगण ( ।।। ) ।
इनमें गुरु अक्षर का संकेत 'ग' ( या ऽ तथा ◡ ) तथा लघु का संकेत 'ल'
अक्षर ( या । तथा - ) किया गया है । छन्दों में त्रिकों के स्वरों के ह्रस्व,
दीर्घ तथा प्लुत रूप के तथा ध्वनि के तार, मन्द्र और मध्य भेद की परिगणना
के भेद या दृष्टि से छन्दों के पादों को लेकर सम, विषम तथा अर्धसम वृत्त
के भेद बन जाते हैं । ये तीनों प्रभेद वर्णिक वृत्त के होते हैं, जिनका स्वरूप
विवरण तथा उदाहरणादि नाट्यशास्त्र में दिये गये हैं ।
इसी प्रकार अक्षरगत मात्राओं की संख्या पर आधारित पादों के भी
सम, विषम पाद गत भेद होते हैं । यहाँ लघु अक्षर की एक मात्रा तथा गुरु
अक्षर की दो मात्रायें परिगणित की जाती हैं । जाति छन्दों के अन्तर्गत मुनि
ने आर्या तथा उसके पाँच प्रभेदों के सोदाहरण स्वरूप के अतिरिक्त अन्य
छन्दों का स्वरूप विधान भी दिखलाया है । मात्राओं के भेद से जाति छन्द के
४ ना० द्वि० भू०

( ५० )
गीति तथा उपगीति प्रभेद होते हैं जिनमें गीति के प्राकृत भाषा में उद्गाथा
आदि प्रभेद किये गये है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद का इस विषय में मत
है कि जातिवृत्तों के प्रस्तार भेद से पूर्वापर गण की गणना करने पर अनन्त
प्रभेद हो सकते हैं।
छन्दः प्रभेद—भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में अक्षरगणना के अनुसार पाद
वाले छन्दों के विभेद करते हुए एक अक्षर के पाद वाले वृत्त से लेकर विवरण
दिया है जिनके गणादि प्रभेद से विभिन्न वृत्त बनते हैं। इस क्रम में मुनि ने
'उक्ता' से अतिकृति तक के वृत्तों को दिखला कर मालावृत्त आदि का स्वरूप
भी बतलाया जिनके पाद छब्बीस अक्षर से अधिक संख्या के होते हैं।
इसके अतिरिक्त इनका अन्य प्रकार से भी वर्गीकरण मुनि ने दिया है।
यथा:—दिव्यगण, दिव्येतरगण तथा दिव्यमानुषगण। इनमें दिव्यगण के
अन्तर्गत गायत्री, अनुष्टुप्, बृहती आदि सात छन्दों के गण एवं प्रस्तार को
रखा गया है, दिव्येतरगण के अन्तर्गत अतिजगती, शक्करी, अष्टि, अत्यष्टि
आदि को तथा दिव्यमानुषगण में कृति, प्रकृति, आकृति आदि गण एवं
प्रस्तार आते हैं। भरतमुनि तथा उनके अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रकार
प्रस्तार भेद से छन्दों के अनन्तप्रभेद की ओर भी संकेत किया। विभिन्न
छन्दों की परिगणना तथा स्वरूप आदि का विवरण नाट्यशास्त्र में सोदाहरण
दिया गया है। (अतः यहाँ प्रत्येक छन्दः की चर्चा नहीं की जा रही है, सभी
विवरण सम्बद्ध स्थान पर ही देखना चाहिए।)
नाट्यशास्त्रगत छन्दों के लक्षणादि देखने से एक बात स्पष्ट हो जाती है
कि भरतमुनि के समय तक छन्दःशास्त्र का जो विकास हो चुका था वह
उनके स्थितिकाल का भी थोड़ा बहुत संकेत दे सकता है। इस तथ्य की चर्चा
के समय हमने नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग में संकेत किया है परन्तु इस खण्ड
या भाग में इस पक्ष से भी इसके स्थितिकाल की विशेष चर्चा रखी गयी है।
इस प्रकार छन्दों के गायत्री से उत्कृति तक के विविध वृत्तों के स्वरूप के
अतिरिक्त मात्रिकवृत्तों के स्वरूपादि का विशद विवेचन नाट्यशास्त्र के
पञ्चदश तथा षोडशअध्याय में किया गया है।
छन्दों की रसानुगतता—यद्यपि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र छन्दःशास्त्र
या व्याकरणादि शास्त्र का न तो स्वतन्त्र और न ही प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें
तो शब्द के वाचिक अभिनय से सम्बद्ध सन्दर्भ में जो भी अपेक्षित विषय
नाट्यार्थ के उद्योतन में उपस्कारक थे उन सभी का अपेक्षित विस्तार से

( ५१ )
निरूपण किया गया है, जिससे नाट्यशास्त्र का स्वरूप पूर्ण तथा व्यवस्थित हो
सके । यह बात इसमें स्थित छन्दःशास्त्र के विवरण से स्पष्ट है तथा इस
विवरण का प्रभाव परवर्ती छन्दःशास्त्रीय रचनाओं पर देखा जा सकता है ।
यहाँ तो रसोद्बोध के लक्ष्य एवं नाट्यार्थ की समृद्धि में आवश्यक होने के
कारण छन्दोगत यह सभी विवेचन हुआ है, यह स्पष्ट ही है ।
इस विवरण से दूसरी बात यह भी दिखलाई देती है कि ये छन्दः
काव्यार्थ के द्वारा रसाभिव्यक्ति में सहायक रहते हैं । आचार्य अभिनवगुप्त-
पाद के मत में इन वृत्तों से भयानक, हास्य या शान्त आदि रसों में यथाशक्य
संवेदना के परिस्पन्दन व्यापार से आस्वाद्यमानता एवं आश्चर्यमयता की सृष्टि
द्वारा रस की अनुकूलता का निर्माण होता है; जिससे अर्थात् रसानुकूल छन्दों
के प्रयोग से—नाट्यार्थ उद्योतित हो उठता है¹। भरतमुनि के अनुसार भी²
शृङ्गाररस के लिये आर्या आदि मृदुवृत्तों का तथा वीर, अद्भुत जैसे रसों के
लिये लघु अक्षराश्रित वृत्तों का प्रयोग उपयुक्त होता है ।
परिभाषित छन्द—नाट्यशास्त्र के छन्दोविवरण तथा पिङ्गल के छन्दः
शास्त्र को देखने पर यह स्पष्ट (दिखने) लगता है कि पिङ्गलमुनि प्रणीत
‘छन्दःसूत्र’ नाट्यशास्त्र का परवर्ती ग्रन्थ है । इसका आपाततः कारण यह है
कि इस ग्रन्थ में नाट्यशास्त्र से अधिक संख्या में छन्दों का विवरण मिलता
है । नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में हमने यह भी संकेत किया था कि नाट्यशास्त्र
वाल्मीकि कृत रामायण तथा व्यास के महाभारत से परवर्ती तथा भास एवं
कालिदास का पूर्ववर्ती है । यह तथ्य देखने के लिये यदि वाल्मीकि रामायण
को ही सर्वप्रथम लिया जाय तो स्पष्ट प्रतीत हो जायगा । वाल्मीकि रामायण
को छन्द की दृष्टि से देखने पर उसमें— ( १ ) अनुष्टुप्, ( २ ) इन्द्रवज्रा,
( ३ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ४ ) उपजाति, ( ५ ) प्रहर्षिणी, ( ६ ) वसन्ततिलका,
( ७ ) नान्दीमुखी (मालिनी), ( ८ ) पुष्पिताग्रा, ( ६ ) वैतालीय तथा
( १० ) औपच्छन्दसकीय ( दोनों मात्रिक ) नामक छन्द प्राप्त हैं । इसी
प्रकार महाभारत में इन छन्दों के अतिरिक्त ( १ ) रथोद्धता, हरिणप्लुता
( द्रुतविलम्बित ) ( ३ ) अप्रमेय ( भुजङ्गप्रयात ), ( ४ ) प्रहर्षिणी,
१. द्रष्टव्य—अभि० भा० Vol. II पृष्ठ. ३४५—“अतएव भयानके
शान्ते हास्ये वा यथायोगं संवेदनस्पन्दतां चर्व्यमाण स्वाद्यताश्चर्यकृतो विभागो
वृत्तानां मन्तव्यः ।”
२. द्रष्ट०—ना० शा० १६।११३—१२० ।

( ५२ )

( ५ ) शार्दूलविक्रीडित, ( ६ ) आर्या, ( ७ ) अपरवक्त्र तथा
( ८ ) मात्रा समक (वैश्वदेवी) छन्द मिलते हैं। इन सभी छन्दों का
उल्लेख नाट्यशास्त्र में मिलता है ।
अब यदि इसी क्रम में हम भास तथा अश्वघोष कवि की रचनाओं को
(जो नाट्यशास्त्र की परवर्ती रचनाएँ हैं) देखें तो भास के नाटकों में
नाट्यशास्त्र में वर्णित इक्कीस छन्द तथा अश्वघोष के द्वारा नाट्यशास्त्र में
वर्णित बीस छन्दों का प्रयोग मिलता है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में विद्यमान छन्दों
में तथा महाभारत में प्राप्त छन्दों में ऐसा कोई छन्द नहीं जिसे कि नाट्य-
शास्त्र में परिभाषित न किया हो । अतः यह स्पष्ट है कि रामायण तथा
महाभारत की अपेक्षा नाट्यशास्त्र की उत्तरभाविता स्पष्ट है। परन्तु यदि
इसी प्रकाश में भास एवं अश्वघोष की रचनाओं में प्रयुक्त ऐसे छन्द को देखें
(जो क्रमशः २ तथा ५ होते हैं) तो यह स्पष्ट होगा कि भास तथा
अश्वघोष कवि भरत प्रणीत नाट्यशास्त्र के उत्तर भावी हैं यह स्पष्ट है।
इसी क्रम में पतञ्जलि प्रणीत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ व्याकरण महाभाष्य में उद्धृत
छन्दों को भी परीक्षा हेतु रखा जाए तो स्पष्टतः उसमें इन छन्दों का प्रयोग
है:—( १ ) अनुष्टुप्, ( २ ) विद्युल्लेखा, ( ३ ) दोधक, ( ४ ) इन्द्रवज्रा,
( ५ ) उपेन्द्रवज्रा, ( ६ ) शालिनी, ( ७ ) तोटक, ( ८ ) वंशस्थ (वंशस्थ
विल—पिङ्गल), ( ९ ) प्रमिताक्षरा, ( १० ) प्रहर्षिणी, ( ११ ) वसन्त-
तिलका, ( १२ ) आर्या तथा ( १३ ) वक्त्र। इन सभी छन्दों का नाट्यशास्त्र
में स्वरूप प्राप्त होता है। [ पतञ्जलि ने महाभाष्य में जिन ३०० पद्यों को
उद्धृत किया है उनसे यह छन्दों का प्रयोग विवरण निकाला गया है] इससे
यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पतञ्जलि मुनि ने जिन स्रोत ग्रन्थों से
इन पद्यमय उद्धरणों को चुना था उनमें छन्दों के प्रयोग उसी रूप में हुए हैं जो
नाट्यशास्त्र में वर्णित हैं। अतः स्पष्ट है कि पतञ्जलि के ये उद्धरण जिन स्रोतों
से संकलित हुए वे ग्रन्थ ईसा पूर्व २०० वर्ष से पूर्ववर्ती अवश्य थे। अतः नाट्य-
शास्त्र सहज रूप में ईसा पूर्व २०० से बाद में नहीं रखा जा सकता है। इस
प्रकार छन्दो-विवरण से भी नाट्यशास्त्र के प्रथमभाग में चर्चित स्थितिकाल में
ईसा पूर्व की स्थिति की पुष्टि ही होती है। इसके अतिरिक्त छन्दोगत तथ्यों
के आधार पर निष्कर्ष के लिये नाट्यशास्त्र के प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्द के रूपों
का परीक्षण भी उपयोगी होगा। इनमें एक तो अन्तर्वर्ती यति के स्थान पर

( ५३ )
सन्धि का न होना तथा दूसरे एक दूसरे की अनुवर्ती घटना में विच्छेद का
अभाव होना पाया जाता है । कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :-
( १ ) पुण्ड्राक्षं पुण्ड्रनासञ्च असितं सितमेव च । ( ना० शा० १।३६ )
( २ ) ततश्च करमावृत्य ऊरुपृष्ठे निपातयेत् । ( ना० शा० ४।१६६ )
( ३ ) आङ्गिको वाचिकश्चैव आहार्यः सात्विकस्तथा । ( ना० शा० ६।२३ )
( ४ ) अंगुल्यो यस्य हस्तस्य अन्योन्यान्तरनिस्सृताः । ( ना० शा० ६।१३२ )
( ५ ) पर्यायतश्च क्रियते एलकाक्रीडिता तु सा । ( ना० शा० ११।२० )
( ६ ) अत्यायतपदत्वाच्च अङ्गहास्यो भवेत् स तु । ( ना० शा० १३।१४० )
अनुष्टुप् छन्द के ये उपर्युक्त नमूने स्पष्टतः ही वैदिक छन्दों की परम्परा
का अनुगमन है तथा रामायण एवं महाभारत में होने वाले आर्षप्रयोगों की
तरह भी हैं । इस सन्दर्भ में हम केवल ऋग्वेद से संकलित एक दो उदाहरण
प्रस्तुत करना चाहेंगे :-
( १ ) हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन् । ( ऋ० सं १।३५।२ )
( २ ) तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ
एका यमस्य भुवने विराषाट् ॥ ( ऋ० सं० १।३५।६ ।
यद्यपि संहितापाठ के दृष्टा ने उपर्युक्त ऋक् १ में आ में सन्धि रखी है
जो यति को हटाने के उद्देश्य से है । जब कि ऐसा कहीं-कहीं ही करने की
छूट रही तथा वह भी तब जब किसी यज्ञादि में वैदिक ऋक् का पाठ किया
जाता हो । क्योंकि इसमें एक अक्षर की कमी हो जाती है तथा छन्द भी
इससे न्यूनतादोष ग्रस्त हो जाता है । इस प्रकार उपर्युक्त विचार से
यह स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यशास्त्र के पाठ में भी कुछ पद्यों में यति या
सन्धि का छेद होना या न करना इस बात की सूचना दे रहा है कि नाट्य-
शास्त्र की रचना अतिप्राचीन काल में तब हुई जब वैदिकच्छन्दों की नियमादि
परम्परा का पालन हो रहा था तथा यह स्थिति भी नाट्यशास्त्र के स्थिति-
काल को ईसा पूर्व ५०० वर्ष के समय में ही ले जाती है जो हमने प्रथमभाग
में निश्चित किया है ।
प्रक्षिप्त अंश—अब यदि नाट्यशास्त्र में आये हुए प्रक्षिप्त अंशों पर
विचार करें तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इसके पन्द्रहवें तथा
सोलहवें अध्याय में जो पाठान्तर युक्त अंश अधिक रूप में प्राप्त हैं वे सभी
अंश निश्चित रूप से बाद में जोड़ दिये गये होंगे । यह जोड़ने की कल्पना भी

( २४ )
किन्हीं उत्तरभावी अध्येताओं आदि ने वैदुष्यपूर्ण संशोधन की भावना से
स्वबुद्धि से लगा दिये होंगे जो नाट्यशास्त्र के मूलपाठ की सुरक्षा में सब से
बड़ी बाधा हो गये । परन्तु इन्हें देखकर दूसरी ओर यह भी विचार आता है
कि प्रक्षेपकर्ता ने ऐसे अंशों को जोड़ने के द्वारा केवल अपने गणितशास्त्र के
ज्ञान की ही कवायद दर्शायी है जिसमें प्रायः साधारण विचार या दृष्टि ही
आ पायी है। उसे इसके लिये और अधिक कारण रखना चाहिए था परन्तु
बिना किसी विशेष प्राप्ति के ही उसने ऐसा कार्य कर डाला—यही प्रतीत
होता है । यह क्या बात होगी ? यदि हम इस प्रश्न को उठाएँ तो यहाँ हमें
एक ही विचार आता है । वह इस प्रकार कि प्रक्षेपकर्त्ता के समय ऐसे छन्द भी
प्रचलन में आ गये थे जिनका लक्षण नाट्यशास्त्र के मूल में नहीं मिलता था ।
तब उसने यहाँ उन छन्दों को भी अपने गणितीय ज्ञान के तथा प्रस्तारादि
के साथ यहाँ जोड़ दिया जिसका उद्देश्य यही दिखलाना था कि सभी छन्दों
की पूर्णता के साथ उपलब्धि इस एक प्राचीन आकर ग्रन्थ में प्राप्य है। यह
प्रवृत्ति एक ही प्राचीन रचना से सभी की गतार्थता दर्शाना है जो प्रायः
प्राचीन ग्रन्थों के साथ ऐसे ही उत्तरभावी अज्ञात पण्डितों के द्वारा किया
जाता रहा है । इसके विषय में खोजबीन करना कल्पना से परे ही होगा कि
यह कार्य नाट्यशास्त्र के बाद कब से आरम्भ हुआ परन्तु ऐसा कार्य
झक्कीपन की तुष्टि से अधिक प्रक्षेपकर्त्ता के लिए कुछ भी महत्व नहीं लाता
न ही इससे मूल ग्रन्थ का महत्व बढ़ता ही है ।
नाट्यशास्त्र में जब यह छन्दोविधान निरूपित हुआ होगा वह नाट्यकला
के चरम विकास एवं गौरव का युग था, जिसका प्रभावी नाट्य, काव्य तथा
छन्दः शास्त्र के रचनाकारों पर अक्षुण्ण प्रभाव बना रहा । यद्यपि भरत
निरूपित छन्दों के पश्चात् इस शास्त्र का पर्याप्त विकास स्वतन्त्ररूप में
हुआ परन्तु इसका काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में जो महत्व धारावाहिक रूप
में आता रहा वह अविस्मरणीय है । इसी कारण पुनरुद्धार एवं चतुरस्र
पर्यालोचना के वर्तमान युग में भी नव छन्दों की सम्भावनाएँ गति पर आरूढ़
हैं और आशावाद के महान् संकल्प को संजोकर बढ़ती चली जा रही है ।
लक्षणादि विधान—नाट्यशास्त्र का "सत्रहवाँ अध्याय" काव्य-
लक्षणादि विधानाध्याय कहलाता है । इसमें काव्यरचना के अंग लक्षण,
अलङ्कार, दोष तथा गुण का लक्षणादि विधान है। इसमें सर्वप्रथम मुनि ने
छत्तीस लक्षणों को काव्य की सहज सुन्दरता के रूप में मान्य कर उनका

( ५५ )
स्वरूप दिया है। नाट्य एवं काव्य के महत्वपूर्ण अङ्गों के रूप में मुनि ने यहाँ
लक्षणों का विवेचन किया है क्योंकि 'लक्षण' काव्य के सर्वाधिक विधायक
तत्त्वों में होते हैं । लक्षणों के कारण ही रसात्मक काव्य की इतर काव्य से
भिन्नता संभव होती है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद के अनुसार 'लक्षण की
लोकप्रचलित अर्थ में भी समानता देखी जा सकती है। जैसे किसी महापुरुष
के शरीर में अङ्कित पद्म आदि शुभ चिह्नों से उसके सौभाग्य का सङ्केत
मिलता है इसी प्रकार लक्षणों से काव्य का सहज सौन्दर्य ।
नाट्यशास्त्र के विभिन्न संस्करणों में लक्षण के दो पाठ उपलब्ध होते
हैं। इनमें काशी संस्करण में ( तथा घोष के संस्करण में भी ) दीर्घपाठ
परम्परा के अनुसार अनुष्टुप् वृत्त से लक्षण निरूपण आरम्भ होता है तो
काव्यमाला बम्बई तथा बडौदा संस्करण में उपजाति वृत्त से । इन दोनों में
पर्याप्त पार्थक्य है। दोनों पाठों के मिलान करने पर इनमें अठारह लक्षण
समान मिलते हैं तथा शेष भिन्न । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने दोनों पाठों पर
व्याख्या की किन्तु अपने उपाध्याय भट्ट तोत की परम्परा में चलने वाले
नाट्यशास्त्र के उपजातिवृत्त वाले पाठ को प्राथमिकता दी । इसी पाठ
परम्परा का अनुगमन धनञ्जय, कीर्तिधर आदि आचार्यों के द्वारा भी हुआ
था । इसके विपरीत सिंहभूपाल तथा विश्वनाथ कविराज ( आदि ) ने दीर्घ-
पाठ परम्परा का अनुसरण किया था । वृत्तिकार भी अभिनवगुप्त की तोत
परम्परा के पाठों को ही लेता था परन्तु धाराधिप श्री भोजदेव ने दोनों
परम्परा के पाठों के अनुसार लक्षणों को लेकर तथा बारह नवीन भेद
सङ्कलित कर लक्षणों के चौसठ प्रभेदों का विवरण दिया । ऐसा प्रतीत होता
है कि लक्षणों की परम्परा में भिन्न पाठ का प्रवर्तन भरतपुत्र नाट्याचार्य
कोहल द्वारा आरम्भ हुआ होगा तथा इसी कारण इस पाठ की परम्परा-
धारा चलती रही । जयदेव ने अपने चन्द्रालोक में लक्षणों की संख्या केवल
ग्यारह ही मानी तथा दोनों पाठ-भेद परम्पराओं से लक्षणों की पाँच-पाँच
संख्या ले ली । शारदातनय तथा विश्वनाथ कविराज ने भी लक्षणों के भिन्न
स्वरूपादि माने जिनका उल्लेख आगे यथास्थान किया जा रहा है ।
नाट्यशास्त्र में वर्णित लक्षण तथा उनका क्रम—नाट्यशास्त्र के
पाठों में दीर्घपाठ परम्परा में लक्षणों का जो क्रम है वही इस संस्करण में भी
लिया गया है। तदनुसार क्रम इस प्रकार है :—(१) भूषण, (२) अक्षर-

, anyone looking at (२८)... (२६)... (३०)will instantly know the book has a typo/misprint(२६)for 29! Wait, in scholarly editing, when you transcribe a text verbatim, you transcribe the text as it appears. Wait, let's look at(३४) गुणकीर्तनin line 7: Wait, in line 7, look at(३४) गुणकीर्तन: (३१) मनोरथ, (३२) लेश, (३३) सङ्क्षेप, (३४) गुणकीर्तन,-> wait, look at 'गुणकीर्तन': Wait, is thatगुणकीर्तनorगुणकीर्तन,? Wait, look at the vowel on 'क': Is it गुणकीर्तनorगुणकीर्त्तन? In line 7: (३४) गुणकीर्तन,-> wait, look above 'त': there is a repha? Wait! In line 7:गुणकीर्तन-> look at the 'क': it has an 'ी' and... wait! Look at the top of 'क': there is an 'ी' and a repha? No, look atगुणकीर्तन: it has 'क', but under the matra, wait, is that गुणकीर्तनorगुणकीर्तन? Wait! Look closely at line 7: (३४) गुणकीर्तन

( ५७ )
इस प्रकार इन नामावलियों के पार्थक्य से लक्षणों के अनेक प्रभेद होना
इस काव्याङ्ग की व्यापकता का सङ्केत देता है। भरतमुनि ने लक्षणों की
छत्तीस संख्या की सूची में उन्हीं लक्षणों को लिया जिनका साहित्य में
सामान्यतः अधिक उपयोग हो सके किन्तु उन्हें इसके तथ्य के विषय में भी
स्पष्टतः विदित था कि लक्षण के प्रभेदों की सीमा स्थिर नहीं हो सकती है।
इतना अवश्य था कि तत्कालीन काव्याङ्गों में इन लक्षणों का महत्व भी
था। इसी कारण उत्तरभावी कोहल आदि आचार्यों के द्वारा लक्षणों के अन्य
स्वरूप भी उद्भावित किये गये तथा इसी कारण आगे भी भोजराज,
शारदातनय जैसे नाट्यविद्या के आचार्यों ने लक्षणों के जो प्रभेद दिखलाये
ये सभी लक्षणों की विशिष्टता को तथा महत्व को दिखलाने के लिये
पर्याप्त आधार रहे हैं।
भरतमुनि की परम्परा में लक्षणों के जो जो स्वरूप उद्भावित एवं
व्याख्यात हुए उनसे भी उपर्युक्त विचारों की ही पुष्टि होती है। इसी कारण
आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने लक्षणों के विषय में अनेक परम्परागत मत
मतान्तर दिखलाये तथा परम्परा प्राप्त दोनों पाठों की सोदाहरण व्याख्या
भी की। 'लक्षण' का स्वरूप बतलाते हुए आचार्य भरत ने उन्हें काव्य का
शरीर माना तथा कथाशरीर में लक्षणों से ही वैचित्र्य की उद्भावना को
मान्यता दी। काव्यगत अपृथक् सौन्दर्य का आधायक लक्षण होता है तथा
पृथक् सिद्ध सौन्दर्य का आधायक अलङ्कार कहलाता है। इस प्रकार लक्षण
तथा अलंकार दोनों निरपेक्ष तत्त्व है तथा सौन्दर्य के आधायक भी तथा इसी
कारण अलङ्कार का द्विविध व्यक्तित्व है। एक ओर वे नाटकीय इतिवृत्त के
सन्ध्यङ्ग जैसे अंश के रूप में हैं क्योंकि नाटकादि के इतिवृत्त से इनका सम्बन्ध
है, काव्यमात्र से नहीं। दूसरी ओर वे अलङ्कार के अनुगत धर्म भी थे। इस
प्रकार काव्यगत अपृथक् सिद्ध सौन्दर्य के आधायक तथा शोभा धायक अंग
के रूप में लक्षणों की पर्याप्त प्रतिष्ठा थी, यह स्पष्ट ही है।
यदि इसके स्वरूपगततत्त्व पर विचार किया जाए तो उपर्युक्त तथ्य
स्पष्ट हो जाएगा। लक्षण का पाठ उपजाति छन्द से आरम्भ होता है वे
नाटकीय सन्ध्यङ्गों के सर्वथा अनुरूप थे, यह बात उनके अभिनवभारती
व्याख्यान से स्पष्ट है जब कि दूसरा पाठ इस तथ्य का अनुगमन कम ही
करता है। इसके अतिरिक्त दूसरा तथ्य यह भी है कि अनेक लक्षण अलङ्कारों
के अनुगत है तथा इन्हीं का आगे चल कर परिवर्तन तथा परिष्कार होकर
अलङ्कारों के रूप में विकास ( भी ) हुआ था। इस तथ्य पर भी अभिनव-

( ५८ )
गुप्तपाद ने भट्ट तोत का मत उद्धृत करते हुए बतलाया कि—"लक्षणों के
सामर्थ्य से ही अलङ्कारों में वैचित्र्य है तथा अलंकारों के वैचित्र्य का मूल
लक्षण में ही विद्यमान है। जैसे गुणानुवाद नामक लक्षण से प्रशंसोपमा
अलङ्कार का, अतिशय से अतिशयोक्ति का, मनोरथ से अप्रस्तुतप्रशंसा का,
मिथ्याध्यवसाय से अपह्नुति का, सिद्धि से तुल्योगिता का उद्भावन किया जा
सकता है। इसी प्रकार लक्षणों के परस्पर मिश्रण से उद्भूत वैचित्र्य से भी
कुछ अलङ्कारों की उद्भावना हो सकती है। जैसे प्रतिषेध तथा मनोरथ के
मिश्रण से आक्षेप अलङ्कार की उद्भावना। इसके अतिरिक्त कुछ लक्षण उक्ति
वैचित्र्य रूप हैं जो अलङ्कारों के अनुग्राहक हो सकते हैं। इस प्रकार लक्षणों
का द्विविध व्यक्तित्व है, यह स्पष्ट है।
उपर्युक्त विवरण से लक्षणों का महत्व तथा उसकी काव्याङ्गों में अतिशय
मौलिकता को दिखलाया गया है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने तो—
'अलङ्कार तथा गुण की अपेक्षा न रखते हुए जिस निसर्ग सौन्दर्य की उत्पत्ति
काव्य (या नाट्य) में होती है उसका हेतुरूप धर्म लक्षण ही है''२ कहा भी।
इसका आशय यही है कि लक्षण गुण और अलङ्कारों के बिना भी अपने सहज
सौन्दर्य से प्रतिभासित हो सकता है तथा जैसे लक्षण रहित मनुष्य सुन्दर नहीं
कहलाता उसी प्रकार लक्षण रहित इतिवृत्त का शरीर भी काव्य (या
नाट्य) की अपेक्षित गरिमा को प्राप्त नहीं कर सकता। आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद की उपर्युक्त लक्षण व्याख्या तथा उनके उपाध्याय भट्ट तोत के
समीक्षात्मक विवरण से यही तथ्य सामने आता है कि काव्याङ्गों में लक्षण
अपना विशेष महत्व रखते थे तथा कथा एवं काव्यशरीर के वे अपृथक् अङ्ग
तो थे ही, गुण तथा अलङ्कारों के आधार एवं उद्भावक भी थे। इसी कारण
काव्य एवं नाट्य के क्षेत्र में लक्षणों का व्यापक प्रभाव रहा भी।
इस प्रकार भरतमुनि के युग से लेकर अनेक शतकों तक लक्षणों का
१. उपाध्यायमतं तु—लक्षण-बलादलङ्काराणां वैचित्र्यमागच्छति।
तथाहि—गुणानुवादनाम्ना लक्षणेन योगात् प्रशंसोपमा, अतिशयनाम्नाऽति-
शयोक्तिः, मनोरथाख्येनाप्रस्तुतप्रशंसा, मिथ्याध्यवसायेनापह्नुतिः, सिद्ध्या
तुल्ययोगितेति। एवमन्यदुत्प्रेक्ष्यम्। लक्षणानाञ्च परस्परवैचित्र्यादनन्तो
विचित्रभावः। यथा प्रतिषेधमनोरथयोः सम्मेलनादाक्षेप" इति। (अभि०
भा० Vol. II पृ० ३२१ ।
२. "काव्येऽप्यस्ति यथा कश्चित् स्निग्धः शब्दोऽर्थशब्दयोः। य श्लेषादि
गुणव्यक्तिदक्षः स्याल्लक्षणस्थितः।।" इति (अभि० भा० Vol. II पृ० २६६)

यद्यपि काव्याङ्गों के रूप में महत्व बना रहा किन्तु आगे चलकर काव्यशास्त्र
के विकास में अलङ्कारों की परम्परा ने धीरे-धीरे अधिक प्रसार एवं महत्व
प्राप्त किया जिससे लक्षणों की आभा धूमिल पड़ती गयी तथा उनका क्षेत्र भी
कम पड़ने लग गया। जहाँ एक ओर महाराज भोज ने लक्षणों की संख्या वृद्धि
की तथा अन्य आचार्यों ने भी यथाशक्य इसी क्रम में कहीं लक्षणों के नाम तथा
कहीं उनके स्वरूप को भिन्न बतला कर लक्षणों के विवेचन-विवरण के विसर्जन
क्रम को बनाए रखा था तो दूसरी ओर विश्वनाथ कविराज तथा सागरनन्दी
आदि आचार्यों ने इन लक्षणों को नाट्य-लक्षण कहकर छत्तीस प्रभेद
दिखला कर इन्हीं के साथ साथ 'नाटचालङ्कारों' को भी प्रतिपादित किया।
ये नाटचालङ्कार या तो भोज आदि से नवीन उद्भावित 'लक्षण' थे या
नाट्यशास्त्र की पाठ भेद परम्परा से प्राप्त ऐसे 'लक्षण' थे जो छत्तीस लक्षणों
में समायोजित नहीं हो पाए थे अतः इनके सोदाहरण विवरण इन ग्रन्थों
में लगाये गये। इसके अतिरिक्त धनञ्जय आदि ने इन लक्षणों का अन्तर्भाव
अलङ्कार, गुण, सन्धि तथा भाव में हो जाने से काव्याङ्गों में उनके विवरण
को देना ही अनावश्यक मान लिया था। १ इसका परिणाम यह हुआ कि
नाट्य-लक्षणों या नाटचालङ्कारों का विवरण देना एक परम्परा-निर्वाह
मात्र हो गया तथा कालान्तर में यह लक्षण-विवेचन का क्रम मन्दतर होने
लगा। काव्यशास्त्र के उत्तरोत्तर विकास के साथ गतिमान् होकर ये लक्षण
नहीं चल पाये तथा उनकी ह्रासोन्मुखी स्थिति ने धीरे-धीरे न केवल उनकी
महत्वपूर्ण स्थिति ही रहने दी परन्तु उनकी अनुपयोगिता को भी बतलाना
आरम्भ कर दिया था जिसका सङ्केत धनञ्जय के इस विवरण से मिलता है।
परिणाम स्वरूप लक्षण पद्धति का स्थान साहित्यशास्त्र में 'अलङ्कारों ने ले
लिया जो नाट्यशास्त्र के रचनाकाल के समय अतिशय अल्पावस्था में
अवस्थित थे।
अलङ्कार—नाट्यशास्त्र में लक्षणों के विवरण के पश्चात् अलङ्कारों का
विवेचन दिया गया है। इसमें जहाँ लक्षणों की संख्या छत्तीस थी वहाँ
अलङ्कारों की संख्या चार ( ही ) है तथा नाट्यशास्त्र के इस भाग पर कोई
भिन्न पाठ तथा प्रक्षिप्त अंश भी उपलब्ध नहीं है। इससे स्पष्ट है कि नाट्य-
शास्त्र के लेखन के समय से लेकर अनेक शताब्दियों बाद तक अलंकार-पद्धति
अपनी स्थिति आरम्भक-बिन्दुओं से अधिक विस्तीर्ण नहीं बना सकी थी।
१. “लक्षणसन्ध्यङ्गकाव्यानि सालङ्कारेषु तेषु हर्षोत्साहेषु अन्तर्भावान्न-
कीर्तिता” ।—दश० रू० ४ ।

( ६० )
भरत के उत्तरभावी साहित्य के आचार्यों ने इसी अलङ्कारपद्धति को धीरे-धीरे
विकसित, व्यवस्थित एवं व्यापक बनाकर उसे शास्त्रीय गौरव की इतनी
ऊँचाई तक पहुँचा दिया कि फिर उनके सम्मुख 'लक्षण' नीची स्थिति में
दिखाई देने लगे तथा इसी कारण उनकी स्थिति गौण बनती चली गयी ।
इतना होने पर भी काव्यशास्त्र के (तथा काव्य के) अङ्ग के रूप में अलङ्कार
के निरूपक आचार्यों में भरत ही सर्वप्रथम आचार्य रहे थे । अतः यह
ऐतिहासिक गौरव भी केवल भरतमुनि को ही प्राप्त है, यह निर्विवाद है ।
लक्षण तथा अलङ्कारगत विभेद—भरत प्रतिपादित लक्षणों तथा
अलङ्कारों के सन्दर्भ में विचार की स्थिति में सर्वप्रथम इनके विभेद पर भी
ध्यान जाता है। भरतमुनि ने लक्षणों तथा अलङ्कारों के जो विवरण दिये
उनके अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि लक्षण की महिमा से ही
अलङ्कारों के द्वारा काव्य में शोभा का आधान होता है। आचार्य अभिनव-
गुप्तपाद ने अलङ्कारों के इस आधारभूत तथ्य को काव्यरचना की प्रासाद-
रचना से तुलना करते हुए समझाया कि लक्षण तो काव्यरचना में भित्ति
स्थानीय होते है तथा उन पर चित्ररचना के कार्य के समान अलङ्कारों का
प्रयोग माना गया है । काव्य में अलङ्कार उस रत्नमाला के समान है जो
अलङ्कार्य या शरीर से भिन्न हो जब कि लक्षण शारीरिक ( एवं ) सहज
सौन्दर्य है जो बिना अङ्कारों के भी सुन्दर होता है ।१
नाट्यशास्त्र में निरूपित अलङ्कार—काव्य के प्रसंग में भरतमुनि ने
केवल चार अलङ्कारों का निरूपण किया है जिनमें उपमा, रूपक तथा दीपक
अलङ्कारों को उत्तरभावी आचार्यों ने अर्थालङ्कार तथा यमक को शब्दालङ्कार
माना । अलङ्कारों के सन्दर्भ में उनका शब्द तथा अर्थगत विभेद भरत के
समय तक उद्भावित नहीं हुआ था जिससे एक परम्परा प्रवर्तित हो, परन्तु
भरतमुनि अलङ्कारों के व्यापक सामर्थ्य से परिचित प्रतीत होते हैं, यह उनके
ग्रन्थ के अनुशीलन से समझा जा सकता है । इसी कारण उनके ग्रन्थ में
बीजरूप में अलङ्कारों का ( काव्य के उपकरणों के सन्दर्भ में ) निरूपण करने
के पश्चात् अन्त में यह भी कहा गया कि अर्थक्रियापेक्षी लक्षणों तथा अलङ्कारों
के द्वारा काव्य की रचना की जाए । यहाँ अर्थक्रिया से उनका आशय यही
है कि काव्य में रस की अपेक्षा अवश्य रहनी चाहिए, क्योंकि सौन्दर्याधायक
तत्व—चाहे वे फिर एतादृश अलङ्कार ही क्यों न हों—समवाय सम्बन्ध से
रस के उपकारक होंगे । उसी प्रकार जैसे कटक केयूर शरीर के शोभाधायक
१. द्रष्ट०—अभिनवभारती Vol. II पृ० २६२-२६७ ।