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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 668 में से

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होती है वाचिक अभिनय से ही । इसलिये वाचिक अभिनय सभी का मूल
भूत आधार बन जाने के कारण इसका क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है । इस वाचिक
अभिनय के अन्तर्गत शब्दविधान छन्द, लक्षण, अलङ्कार, गुण, दोष, भाषा
तथा सम्बोधन विधान जैसे विषय आते हैं जिनका तात्त्विक एवं उपयोगी
विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया है ।
शब्दविधान—नाट्य के आधारभूत तत्त्व वाचिकअभिनय का प्रस्तुती-
करण वाणी से ही होता है—यह बात पूर्व में कही गयी थी । वाणी की
उत्पत्ति नाद से होती है । जब शरीर में स्थित वायु क्रमशः हृदय, कण्ठ, शीर्ष
से होकर मुख द्वारा ध्वनि रूप में प्रकट हो तो वह ‘नाद’ कहलाता है । इस
नाद के तीन प्रभेद माने गये हैं—मन्द्र, मध्य तथा तार । हृदय से उत्पन्न
होनेवाला नाद ‘मन्द्र’, कण्ठ से उत्पन्न होने वाला ‘मध्य’ तथा शीर्ष से
होने वाला ‘तार’ कहलाता है । नाद से उद्भूत वाक्तत्त्व का जब शब्दमय
प्रयोग होता है तो यही वाचिक अभिनय हो जाता है, यह स्पष्ट है । इस
वाचिक के अन्तर्गत शब्द का विवरण देते हुए नाट्यशास्त्र में ‘अ’ से आरम्भ
होने वाले ( चौदह ) स्वर, ‘क’ से ‘ह’ तक के व्यञ्जन तथा इनके
उच्चारण स्थान, प्रयत्न, घोष तथा अघोष वर्ण के विवरण के साथ ही
शब्द या पद के नाम, आख्यात, उपसर्ग एवं निपात को दिखला कर पदों
के साथ संयुक्त होने वाले प्रत्यय, सन्धि, समास, तद्धित, कृदन्त जैसे व्याकरण-
शास्त्र के प्रमुख एवं अन्य आवश्यक विषयों का ( बड़े ही ) संक्षेप में तथा
सरलता से उपयोगी विवेचन किया गया है । ऐसे शब्दविधान के अनुसार की
गयी रचना ही ‘पदबन्ध’ है जो ‘काव्य’ कहलाती है तथा जिसका अभिनय के
द्वारा प्रस्तुतीकरण ‘नाट्य’ हो जाता है । यहाँ भरतमुनि ने जिस शब्दशास्त्र
का विवरण दिया है वह अपने स्वरूप में अतिप्राचीन परम्परा से मेल खाता
है जिसमें अपने पूर्ववर्ती तथा समकालीन वैयाकरणों की अनेक मान्यताओं का
विवरण है किन्तु है यह सभी अतिप्राचीन ही ।
पदबन्ध—वाचिक अभिनय के पाठ्य रूप के मुनि ने सर्व प्रथम दो भेद
करते हुए उसका संस्कृत तथा प्राकृत में विभाजन किया तथा शब्द स्वरूप के
विवरण के क्रम में पदबन्ध को काव्य का जनक बतलाया । यह पदबन्ध
विभक्त्यन्त शब्द से निर्मित होता है । इसके दो विभेद होते हैं—( १ )
निबद्ध तथा ( २ ) चूर्णपद । ‘निबद्ध’ ( प्रकार ) में गुरु लघु युक्त अक्षरों
या मात्राओं की संख्या नियत रहती है जिससे आगे चल कर पद्य की
अवतारणा होती है । ‘चूर्णपद’ में अर्थ की अपेक्षा से अक्षर युक्त पदों की