सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 60

योजना रखी जाती है । इसका प्रयोग अनियत स्वरूप वाले संवादों में होता
है । इसी के द्वारा 'गद्य' की अवतारणा होती है । रूपकादि नाट्य रचनाओं
के संवाद गद्य में प्रायः रहते ही हैं, किन्तु पात्रों के मनोभावों एवं संवेदनाओं
के अतिरिक्त उनके स्थान, वातावरण आदि को व्यक्त करने के लिये उनमें
'पद्य' की भी योजना ( संवादों में ) रखी जाती है जो गति एवं लय की
चारुता से सम्पन्न रहती है । इसमें चार पादों के रहने से इसकी पद्य-संज्ञा
अन्वर्थ है । इस प्रकार स्पष्ट है कि गद्य तथा पद्य का सम्मिलित रूप
'पदबन्ध' है जो नाट्य का प्रयोजक तत्त्व है । इसी पद्य की एक अन्य संज्ञा
'छन्द' होती है ।
पद्य तथा उसके प्रकार—आरम्भ में पद्य या छन्द के दो प्रभेद किये
गये—( १ ) जाति तथा वृत्त । इनमें अक्षरों की संख्या पर आधारित पाद
वाले 'छन्द' को 'जाति' तथा अक्षरों की गणना पर आधारित पाद वाले छन्द
को 'वृत्त' या वर्णिक वृत्त कहा जाता है । इसका ( जाति छन्दों की मात्रा
गणना के विपरीत ) अक्षरों की संख्या को नियत क्रम तथा त्रिकों या गणों
के आधार पर विधान किया गया है । प्रत्येक त्रिक या गण में गुरु, लघु वर्ण
नियत रहते हैं तथा प्रत्येक छन्द में गण से युक्त या नियत 'पाद' रखे जाते
हैं । भरतमुनि ने भी ( शास्त्र की परम्परानुसार ) इन गणादि का विवरण
दिया है । यथा :—
आदि गुरु भगण ( ऽ।। ), सर्वगुरु मगण ( ऽऽऽ ), मध्यगुरु जगण ( ।ऽ। )
अन्त गुरु सगण ( ।।ऽ ), मध्य लघु रगण ( ऽ।ऽ ), अन्त लघु तगण ( ऽऽ। ),
आदि लघु यगण ( ।ऽऽ ) तथा सर्व लघु नगण ( ।।। ) ।
इनमें गुरु अक्षर का संकेत 'ग' ( या ऽ तथा ◡ ) तथा लघु का संकेत 'ल'
अक्षर ( या । तथा - ) किया गया है । छन्दों में त्रिकों के स्वरों के ह्रस्व,
दीर्घ तथा प्लुत रूप के तथा ध्वनि के तार, मन्द्र और मध्य भेद की परिगणना
के भेद या दृष्टि से छन्दों के पादों को लेकर सम, विषम तथा अर्धसम वृत्त
के भेद बन जाते हैं । ये तीनों प्रभेद वर्णिक वृत्त के होते हैं, जिनका स्वरूप
विवरण तथा उदाहरणादि नाट्यशास्त्र में दिये गये हैं ।
इसी प्रकार अक्षरगत मात्राओं की संख्या पर आधारित पादों के भी
सम, विषम पाद गत भेद होते हैं । यहाँ लघु अक्षर की एक मात्रा तथा गुरु
अक्षर की दो मात्रायें परिगणित की जाती हैं । जाति छन्दों के अन्तर्गत मुनि
ने आर्या तथा उसके पाँच प्रभेदों के सोदाहरण स्वरूप के अतिरिक्त अन्य
छन्दों का स्वरूप विधान भी दिखलाया है । मात्राओं के भेद से जाति छन्द के
४ ना० द्वि० भू०