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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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गीति तथा उपगीति प्रभेद होते हैं जिनमें गीति के प्राकृत भाषा में उद्गाथा
आदि प्रभेद किये गये है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद का इस विषय में मत
है कि जातिवृत्तों के प्रस्तार भेद से पूर्वापर गण की गणना करने पर अनन्त
प्रभेद हो सकते हैं।
छन्दः प्रभेद—भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में अक्षरगणना के अनुसार पाद
वाले छन्दों के विभेद करते हुए एक अक्षर के पाद वाले वृत्त से लेकर विवरण
दिया है जिनके गणादि प्रभेद से विभिन्न वृत्त बनते हैं। इस क्रम में मुनि ने
'उक्ता' से अतिकृति तक के वृत्तों को दिखला कर मालावृत्त आदि का स्वरूप
भी बतलाया जिनके पाद छब्बीस अक्षर से अधिक संख्या के होते हैं।
इसके अतिरिक्त इनका अन्य प्रकार से भी वर्गीकरण मुनि ने दिया है।
यथा:—दिव्यगण, दिव्येतरगण तथा दिव्यमानुषगण। इनमें दिव्यगण के
अन्तर्गत गायत्री, अनुष्टुप्, बृहती आदि सात छन्दों के गण एवं प्रस्तार को
रखा गया है, दिव्येतरगण के अन्तर्गत अतिजगती, शक्करी, अष्टि, अत्यष्टि
आदि को तथा दिव्यमानुषगण में कृति, प्रकृति, आकृति आदि गण एवं
प्रस्तार आते हैं। भरतमुनि तथा उनके अभिनवगुप्तपाद ने इस प्रकार
प्रस्तार भेद से छन्दों के अनन्तप्रभेद की ओर भी संकेत किया। विभिन्न
छन्दों की परिगणना तथा स्वरूप आदि का विवरण नाट्यशास्त्र में सोदाहरण
दिया गया है। (अतः यहाँ प्रत्येक छन्दः की चर्चा नहीं की जा रही है, सभी
विवरण सम्बद्ध स्थान पर ही देखना चाहिए।)
नाट्यशास्त्रगत छन्दों के लक्षणादि देखने से एक बात स्पष्ट हो जाती है
कि भरतमुनि के समय तक छन्दःशास्त्र का जो विकास हो चुका था वह
उनके स्थितिकाल का भी थोड़ा बहुत संकेत दे सकता है। इस तथ्य की चर्चा
के समय हमने नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग में संकेत किया है परन्तु इस खण्ड
या भाग में इस पक्ष से भी इसके स्थितिकाल की विशेष चर्चा रखी गयी है।
इस प्रकार छन्दों के गायत्री से उत्कृति तक के विविध वृत्तों के स्वरूप के
अतिरिक्त मात्रिकवृत्तों के स्वरूपादि का विशद विवेचन नाट्यशास्त्र के
पञ्चदश तथा षोडशअध्याय में किया गया है।
छन्दों की रसानुगतता—यद्यपि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र छन्दःशास्त्र
या व्याकरणादि शास्त्र का न तो स्वतन्त्र और न ही प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें
तो शब्द के वाचिक अभिनय से सम्बद्ध सन्दर्भ में जो भी अपेक्षित विषय
नाट्यार्थ के उद्योतन में उपस्कारक थे उन सभी का अपेक्षित विस्तार से