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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
पद-भाष्य
वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | हैं उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं
करणगुणवत्या—अनभ्युदितम् | वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे
अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । | जो अनभ्युदित—अप्रकाशित
| अर्थात् नहीं कहा गया है—
येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे | बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा
सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- | वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित
ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | अर्थमें बोली जाती अर्थात् अपने
इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित
“वदन्वाक्” (बृ० उ० १ । | यानी प्रयुक्त की जाती है, जो
४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | 'वाणीकी वाणी है' इस प्रकार
यति” (बृ० उ० ३ । ७ । १७) | बतलाया गया है [जिसके विषयमें]
इत्यादि च वाजसनेयके । “या | बृहदारण्यकोपनिषद्में “बोलनेके
वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | कारण वाणी है” “जो भीतरसे वाणी-
| का नियमन करताहै” इत्यादि कहा
| है, तथा “चेतन प्राणियोंमें जो वाणी
| (वाक्शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में
वाक्य-भाष्य
उक्तं च केनेषितां वाचमिमां | ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस
वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । | वाणीको बोलते हैं' इस प्रश्नके उत्तरमें
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन | 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा
ग्रहणं आत्मन्यवस्थापनार्थं | भी जा चुका है। 'तू उसीको ब्रह्म
आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं | जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय-
वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- | रूपसे बुद्धिमें बिठानेके लिये है ।
णोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां | 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि
| वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है'
| इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व
| सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको
| अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे

कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही

४८ केनोपनिषद् [ खण्ड १


पद-भाष्य

कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् | जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा-
"सा वाग्यया स्वप्ने भाषते" इति। | कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके
सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् | द्वारा जीव स्वप्नमें बोलता है वह
चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि | वाक् है" वक्ताकी वह नित्य वाचन-
वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते" | शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूप वाक्
(बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति | है जैसा कि "वक्ताकी वाचन-
श्रुतेः। | शक्तिका लोप कभी नहीं होता"
| इस श्रुतिसे सिद्ध होता है।
तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म | उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत्
निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा-
ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । | संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान। जिन वाक्
यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् | आदि उपाधियोंके कारण, वाणीका
चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो | वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र,
मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता | मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता,
नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- | नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म
मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः | विज्ञान और आनन्दस्वरूप है—
संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- | इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस
र्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, | अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट
| समस्वरूप ब्रह्ममें प्रवृत्त होते हैं,

वाक्य-भाष्य

निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपमें ही
| जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान'
आज्ञायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे
| उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद-
यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपा- | मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका
| उपास्यत्व निषेध करनेके कारण
स्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४॥ | [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त
| करता है] ॥ ४॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
पद-भाष्य
तान्युदस्य आत्मानमेव नि- | उन सब उपाधियोंका बाधकर अपने
र्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः। | निर्विशेष आत्माको ही ब्रह्म जान—
नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- | यही 'एव' शब्दका अर्थ है । जिस
विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते | इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि-
ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि | की उपासना—ध्यान करते हैं यह
इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है । 'उसीको तू ब्रह्म
| जान' इतना कह देनेपर भी
| [ अनात्मवस्तुमें ब्रह्मभावनाका
| निषेध हो ही जाता ] पुन: 'यह
नोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा
| जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन
अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं | किया है वह आत्मामें ही ब्रह्म-
| बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा
| अन्य उपास्य देवताओंमें ब्रह्म-बुद्धि-
वा ॥४॥ | की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया
हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इस [देश-कालावच्छिन्न
वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥

५० केनोपनिषद् [ खण्ड १

पद-भाष्य
यन्मनसा न मनुते; मन | जिसका मनके द्वारा मनन नहीं
इत्यन्तःकरणं बुद्धिमन्सोरेकत्वेन | किया जाता; मन और बुद्धिके
गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्व- | एकत्वरूपसे यहाँ मन शब्दसे अन्तः-
करणसाधारणम्, सर्वविषय- | करणका ग्रहण किया जाता है।
व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे
विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर- | मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियोंके
धृतिर्ह्रीर्धीरित्येतत्सर्वं मन एव” | विषयोंमें व्यापक होनेके कारण
(बृ० उ० १।५।३) इति | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है।
श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन | “काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा,
मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः | अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि
अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- | और भय—ये सब मन ही हैं” इस
यति नापि निश्चिनोति लोकः, | श्रुतिके अनुसार मन कामादि
मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृ- | वृत्तियोंवाला है । उस मनके द्वारा
त्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्य- | यह लोक जिस मनके प्रकाशक
गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- | चैतन्यज्योतिका मनन—संकल्प
करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- | अथवा निश्चय नहीं कर सकता,
ज्योतिषावभासितस्य मनसो | क्योंकि मनका प्रकाशक होनेके
मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं | कारण वह तो उसका नियामक
| है । आत्मा सब विषयोंके प्रति
| प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः
| उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता ।
| अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे
| प्रकाशित हुए मनमें ही मनन करनेका
| सामर्थ्य है। उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए
वाक्य-भाष्य
यन्मनसा इत्यादि समानम् । | ‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियोंका
मनो मतमितिःयेन ब्रह्मणा मनोऽपि | तात्पर्य समान ही है । ‘मन मनन
विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण | किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य
| विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
पद-भाष्य
मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके
व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- | द्वारा मत--विषयीकृत अर्थात् व्याप्त
विदः । तस्मात् तदेव मनस | बतलाते हैं; उस मनके प्रत्यक्चेतयिता
आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म | आत्माको ही तू ब्रह्म जान । 'नेदं••••'
विद्धि। नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ | इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत्
समझनी चाहिये ॥ ५ ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥
जिसे कोई नेत्रसे नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र
[ अपने विषयोंको ] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देश-
कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥
पद-भाष्य
यत् चक्षुषा न पश्यति न | लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति-
विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- | से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात्
संयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि | विषय नहीं करता किन्तु जिस
चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओं
अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- | अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंके
भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी
र्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोंको देखता—विषय करता
यानी व्याप्त करता है उसीको तू
ज्योतिषा विषयीकरोति व्या- | ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना
प्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥६॥ | चाहिये ॥६॥
वाक्य-भाष्य
इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, | किया जाता है। जो सब इन्द्रियोंका
तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि | अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे
नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया | अवभासित होनेके कारण जिससे वे

५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदंऽ श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७॥
जिसे कोई कानसे नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी
जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ]
की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥
पद-भाष्य
यत् श्रोत्रेण न शृणोति | लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त
दिग्देवताधिष्ठितेन आकाश- | आकाशके कार्यभूत तथा दिशा-
कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न | रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा
विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् | नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे
इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- | श्रोत्रसे विषय नहीं कर सकता,
ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव | बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा
इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ | यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय
| किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि
| पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥
जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जाता बल्कि
जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान ।
जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह
ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥
वाक्य-भाष्य
येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः । | सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और
“क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं | विषयोंके सहित अवभासित होती हैं—
| यह इन मन्त्रोंका तात्पर्य है । “तथा
प्रकाशयति” ( गीता १३ । ३३ ) | क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
पद-भाष्य
यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी
नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः- वृत्तियोंके सहित नासिकारन्ध्रमें स्थित
एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी
करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घ्राणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध-
प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओंको विषय नहीं करता,
बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योतिसे
येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विषयकी
त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही
ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले-
यते तदेवैत्यादि सर्वं समानम् ॥८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥१॥
वाक्य-भाष्य
इति स्मृतेः । "तस्य भासा" है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे
(मुं० उ० २।२।१०) इति [ यह सब प्रकाशित है]" इस आथर्वणी
चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
'येन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है
शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये- कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके
तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५-८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

द्वितीय खण्ड

ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता
पद-भाष्य
एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व- | इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत
मात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्यः | तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति
अहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति | कराया हुआ शिष्य यह न समझ
मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः | बैठे कि 'ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे
शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदि- | अच्छी तरह जानता हूँ' इस
त्यादि । | अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [ इस
निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये
आचार्यने 'यदि मन्यसे'इत्यादि कहा।
नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति | पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह
निश्चिता प्रतिपत्तिः । | जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान
तो इष्ट ही है ।
सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रति- | सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित
पत्तिः; न हि सु वेदा- | ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु
ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः | 'मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ'
हमिति । यद्धि वेद्यं | ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य
वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु | वस्तु वेत्ताकी विषय होती है वही
वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् | अच्छी तरह जानी जा सकती है;
अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । | जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि-
के दाहका विषय दाह्य पदार्थ ही
हो सकता है उसका स्वरूप नहीं
सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति | हो सकता । 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका
सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः। | आत्मा (अपना-आप) ही है' यह
समस्त वेदान्तोंका भलीभाँति निश्चय
इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
पद-भाष्य
प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों-
इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया
इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’
ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय
‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है
दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस
संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय-
जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है;
इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए
वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां
न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा
शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी
| तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी
| बुद्धिका निराकरण करना उचित
| ही है ।
| जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि-
| द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा
| सकता उसी प्रकार जाननेवालेके
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे
शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना
स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको
ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी
स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे
विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको
उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने
विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके
| प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त-
| कर अब उसकी बुद्धिको विचलित
| करते हैं ।

५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २

५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य
न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति | द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना
यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । "नान्य- | जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह
दतोऽस्ति विज्ञातृ" (बृ० उ० | उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके ।
३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता | "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न
प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं | ज्ञाताका प्रतिषेध किया गया है । अतः 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव । तस्माद् | हूँ' यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे'
युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि । | इत्यादि ठीक ही कहा है ।
यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ
ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव
ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥
यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तो
निश्चय ही तू ब्रह्मका थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू
जानता है और इसका जो रूप देवताओंमें विदित है [ वह भी अल्प
ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [ तब शिष्यने एकान्त
देशमें विचार करनेके अनन्तर कहा— ] 'मैं ब्रह्मको जान गया—ऐसा
समझता हूँ' ॥ १ ॥
पद-भाष्य
यदि कदाचित् मन्यसे सु | यदि कदाचित् तू ऐसा मानता
वेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । | हो कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद अहं | यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्मको
ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो | अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय
१ 'दभ्रमेव' ऐसा भी पाठ है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
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पद-भाष्य
कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि | जानता हूँ । जिसके दोष क्षीण हो
क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- | गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय
पद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह | विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस
यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- | आशयसे ही [गुरुने] 'यदि मन्यसे' इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है ।
क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | ऐसा देखा भी गया है कि “यह जो नेत्रोंके भीतर पुरुष दिखायी
होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” | देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही
(छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते | ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्माने] कहा” इस
प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- | प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति-की सन्तान और पण्डित होनेपर
विरोचनः स्वभावदोषवशादनुप- | भी असुरराज विरोचनने अपने स्वभावके दोषसे, किसी प्रकार सिद्ध
पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- | न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है,
मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो | ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक,
देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने
पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य | स्वभावका दोष क्षीण हो जानेके
वाक्य-भाष्य
रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं | ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु
मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- | आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर
चालना किमर्थेत्युच्यते-पूर्व- | कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमें
गृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै । | बुद्धिकी स्थिरताके लिये है ।

५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली
| ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त
प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु-
| से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो
गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई
पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा
| समझ बैठता है और कोई समझता
रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय
| आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो
वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके
| सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और
अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही
| समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान
मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर
| भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके
ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे
| सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन
प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य
इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान
| लिया है' ऐसा मानता है तो]
आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको
नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है ।
रूपम् । |
वाक्य-भाष्य
देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—]
| देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है
सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ
| वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको
वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म
त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
पद-भाष्य
किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और
महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि
मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही
| जानता है' ऐसा कह रहे हैं ?
बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक
ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक
औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः
निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित,
"अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध-
रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार
उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों-
९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है ।
शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- |
षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका
ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका
तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी
येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही
तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः
चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका
तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य
वाक्य-भाष्य
अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध
मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो
मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें
सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही
मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके
विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि
| 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे
| जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार
| जाना हुआ रूप तो अल्प ही है।
केनो० ३—

६० केनोपनिषद् [ खण्ड २

६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं
नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा
भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव
रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये
“विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया
३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है—
(बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है”
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य
२।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान
(ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी
ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया
गया है ।
सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि
करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय-
रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि
ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है,
कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच,
वाक्य-भाष्य
तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी
सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प
स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी
रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित
और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले
एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक
तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा
यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ;
र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

पद-भाष्य
च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । | उच्छेद और नाश आदिमें वह
स्वतस्तु "अविज्ञातं विजानतां | उनका अनुकरण करनेवाला है;
विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः
२।३) इति स्थितं भविष्यति । | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात
| है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात
| है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा ।
यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण | 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व-
सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मो- | वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध
| है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधिसे
पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही
रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- | अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि
| अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए
दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य | इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू
ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओंमें जानता है वह भी
| निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही
तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति | जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ ।
मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि | इसका जो अध्यात्मरूप है और जो
| देवताओंमें है वह भी उपाधि-
देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- | परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व
त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | ( अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु
वाक्य-भाष्य
मन्ये विदितमिति शिष्यस्य | 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी
| मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी
मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है—क्योंकि ऐसा माननेपर ही
| तीन प्रकारकी प्रतीतियोंकी सङ्गति
सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है । सम्यक् वस्तुके निश्चयके
| लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब
विचालितः शिष्य आचार्येण | आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी
मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते | ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने

६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् | जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणोंसे
अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं | रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय
| भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह
ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। | सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है—
| यह इसका अभिप्राय है।
यत एवम् अथ नु तस्मात् | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये
मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव | अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्मको
ते तव ब्रह्म। एवमाचार्योक्तः | विचारणीय ही समझता हूँ।
शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- | आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने
हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | एकान्तमें बैठकर समाहित हो
आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च | आचार्यके बतलाये हुए आगमको
निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, | अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा
आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच— | निश्चयकर आत्मानुभव करनेके
मन्येऽहमथेदानीं विदितं | अनन्तर आचार्यके समीप आकर
ब्रह्मेति ॥१॥ | कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब
| मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥
वाक्य-भाष्य
समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमें समाहित चित्तसे पूर्वोक्त
सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा- | प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर
र्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- | भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र,
| आचार्य और अपना अनुभव—इन
त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- | तीनों प्रतीतियोंकी एक ही विषयमें
निश्चिता विद्या सफला स्यान्न | संगति करनेके लिये कहा [ मैं ब्रह्मको
अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो | ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] । इससे यह
| न्याय दिखलाया गया है कि इस
भवति; मन्ये विदितमिति | प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही
परिनिश्चितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- | सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि
| 'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि-
हेतूकेः ॥ १ ॥ | निश्चित—निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके
| हेतुका ही प्रतिपादन किया गया है ॥१॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
पद-भाष्य
कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये—
अनुभूतिका उल्लेख
नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥
मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और
न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ
और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता-
विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥
पद-भाष्य
न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ—
| ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको
मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी
| मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब
विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं
| हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता
| है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात
नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद
| च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं
चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये ।
वाक्य-भाष्य
परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय
| समान ही है—यह दिखलानेके लिये
प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित
| किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा
तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'—
| ऐसा कहकर वह उसका हेतु
मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।


  • यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।

६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता'
सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ'
इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे
कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता
मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं
सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और
तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है
इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो
वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि
त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे
वाक्य-भाष्य
अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात
नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा
परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे
सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये
स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

पद-भाष्य
नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय
र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी
प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं ।
एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित
मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे
'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी
दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए
सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति
बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य
| विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म-
दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते
| हुए गर्जने लगा । किस प्रकार
वाक्य-भाष्य
यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा
स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा-
प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके
| विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह
मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं।
यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं
| जानता-ऐसा भी नहीं मानता
मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध
| किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस
ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी
| अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि
मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?'
| शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च'
| शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात्
चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-

६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य

कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं—
नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें
तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको
स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस
| ब्रह्मको जानता है।'
किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ?
| ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता
नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी
| नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात
यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य
अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है'
| इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु-
वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे

वाक्य-भाष्य

विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित
| और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है।
तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता
इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है।
अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह
| अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म-
ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता'
| —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता
चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई
| विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान
विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही
स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये
वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।