केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें५० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
यन्मनसा न मनुते; मन | जिसका मनके द्वारा मनन नहीं
इत्यन्तःकरणं बुद्धिमन्सोरेकत्वेन | किया जाता; मन और बुद्धिके
गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्व- | एकत्वरूपसे यहाँ मन शब्दसे अन्तः-
करणसाधारणम्, सर्वविषय- | करणका ग्रहण किया जाता है।
व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे
विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर- | मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियोंके
धृतिर्ह्रीर्धीरित्येतत्सर्वं मन एव” | विषयोंमें व्यापक होनेके कारण
(बृ० उ० १।५।३) इति | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है।
श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन | “काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा,
मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः | अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि
अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- | और भय—ये सब मन ही हैं” इस
यति नापि निश्चिनोति लोकः, | श्रुतिके अनुसार मन कामादि
मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृ- | वृत्तियोंवाला है । उस मनके द्वारा
त्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्य- | यह लोक जिस मनके प्रकाशक
गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- | चैतन्यज्योतिका मनन—संकल्प
करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- | अथवा निश्चय नहीं कर सकता,
ज्योतिषावभासितस्य मनसो | क्योंकि मनका प्रकाशक होनेके
मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं | कारण वह तो उसका नियामक
| है । आत्मा सब विषयोंके प्रति
| प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः
| उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता ।
| अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे
| प्रकाशित हुए मनमें ही मनन करनेका
| सामर्थ्य है। उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए
वाक्य-भाष्य
यन्मनसा इत्यादि समानम् । | ‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियोंका
मनो मतमितिःयेन ब्रह्मणा मनोऽपि | तात्पर्य समान ही है । ‘मन मनन
विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण | किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य
| विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय