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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 152 में से

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पृष्ठ 72

६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता'
सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ'
इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे
कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता
मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं
सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और
तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है
इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो
वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि
त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे
वाक्य-भाष्य
अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात
नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा
परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे
सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये
स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,