केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली
| ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त
प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु-
| से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो
गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई
पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा
| समझ बैठता है और कोई समझता
रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय
| आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो
वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके
| सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और
अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही
| समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान
मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर
| भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके
ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे
| सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन
प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य
इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान
| लिया है' ऐसा मानता है तो]
आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको
नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है ।
रूपम् । |
वाक्य-भाष्य
देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—]
| देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है
सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ
| वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको
वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म
त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।