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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 152 में से

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पृष्ठ 64

५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
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पद-भाष्य
न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति | द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना
यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । "नान्य- | जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह
दतोऽस्ति विज्ञातृ" (बृ० उ० | उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके ।
३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता | "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न
प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं | ज्ञाताका प्रतिषेध किया गया है । अतः 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता
ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव । तस्माद् | हूँ' यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे'
युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि । | इत्यादि ठीक ही कहा है ।
यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ
ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव
ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥
यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तो
निश्चय ही तू ब्रह्मका थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू
जानता है और इसका जो रूप देवताओंमें विदित है [ वह भी अल्प
ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [ तब शिष्यने एकान्त
देशमें विचार करनेके अनन्तर कहा— ] 'मैं ब्रह्मको जान गया—ऐसा
समझता हूँ' ॥ १ ॥
पद-भाष्य
यदि कदाचित् मन्यसे सु | यदि कदाचित् तू ऐसा मानता
वेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । | हो कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह
वाक्य-भाष्य
यदि मन्यसे सुवेद अहं | यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्मको
ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो | अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय
१ 'दभ्रमेव' ऐसा भी पाठ है ।