केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
पद-भाष्य
यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी
नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः- वृत्तियोंके सहित नासिकारन्ध्रमें स्थित
एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी
करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घ्राणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध-
प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओंको विषय नहीं करता,
बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योतिसे
येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विषयकी
त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही
ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले-
यते तदेवैत्यादि सर्वं समानम् ॥८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥१॥
वाक्य-भाष्य
इति स्मृतेः । "तस्य भासा" है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे
(मुं० उ० २।२।१०) इति [ यह सब प्रकाशित है]" इस आथर्वणी
चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
'येन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है
शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये- कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके
तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५-८ ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥