केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
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पद-भाष्य
कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि | जानता हूँ । जिसके दोष क्षीण हो
क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- | गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय
पद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह | विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस
यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- | आशयसे ही [गुरुने] 'यदि मन्यसे' इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है ।
क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | ऐसा देखा भी गया है कि “यह जो नेत्रोंके भीतर पुरुष दिखायी
होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” | देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही
(छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते | ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्माने] कहा” इस
प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- | प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति-की सन्तान और पण्डित होनेपर
विरोचनः स्वभावदोषवशादनुप- | भी असुरराज विरोचनने अपने स्वभावके दोषसे, किसी प्रकार सिद्ध
पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- | न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है,
मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो | ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक,
देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने
पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य | स्वभावका दोष क्षीण हो जानेके
वाक्य-भाष्य
रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं | ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु
मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- | आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर
चालना किमर्थेत्युच्यते-पूर्व- | कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमें
गृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै । | बुद्धिकी स्थिरताके लिये है ।
५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली
| ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त
प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु-
| से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो
गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई
पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा
| समझ बैठता है और कोई समझता
रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय
| आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो
वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके
| सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और
अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही
| समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान
मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर
| भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके
ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे
| सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन
प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य
इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान
| लिया है' ऐसा मानता है तो]
आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको
नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है ।
रूपम् । |
वाक्य-भाष्य
देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—]
| देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है
सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ
| वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको
वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म
त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।