केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
पद-भाष्य
तस्मादवधारणार्थतैव प्रश्नप्रति- | प्रश्नका जो उत्तर है वह [ उपदेश-
वचनस्योपपद्यते । एतावत्येवेयम् | की समाप्तिका ] अवधारण करनेके
उपनिषदुकान्यनिरपेक्षा अमृत- | लिये है—ऐसा मानना ही ठीक है।
त्वाय् ॥ ७॥ | अर्थात् अमरत्व-प्राप्तिके लिये किसी
| अन्य साधनकी अपेक्षासे रहित इतनी
| ही उपनिषद् कही गयी है ॥ ७ ॥
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विद्याप्राप्तिके साधन
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि
सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
उस (ब्राह्मी उपनिषद्) की तप, दम, कर्म तथा वेद और सम्पूर्ण
वेदांग—ये प्रतिष्ठा हैं एवं सत्य आयतन है ॥ ८ ॥
पद-भाष्य
यामिमां ब्राह्मीमुपनिषदं तवा- | तुम्हारे सामने जिस ब्राह्मी
ग्रेस्रूमेति तस्यै तस्या उक्ताया | उपनिषद्का वर्णन किया है उस
उपनिषदः प्राप्त्युपायभूतानि | पूर्वकथित उपनिषद्की प्राप्तिके
तपआदीनि । तपः कायेन्द्रिय- | उपायभूत तप आदि हैं। शरीर,
मनसां समाधानम् । दमः उप- | इन्द्रिय और मनके समाधानका
| नाम तप है । दम उपशम
| (विषयोंसे निवृत्त होने) को कहते
वाक्य-भाष्य
तस्या वक्ष्यमाणाया उपनिषदः | उस आगे कही जानेवाली उपनिषद्-
तपो ब्रह्मचर्यादि दम उपशमः कर्म | की तप—ब्रह्मचर्यादि, दम—इन्द्रिय-
अग्निहोत्रादीत्येतानि प्रतिष्ठाश्रयः। | निग्रह तथा अग्निहोत्रादि कर्म—ये सब
एतेषु हि सत्सु ब्राह्मयुपनिषत् | प्रतिष्ठा—आश्रय हैं। इनके होनेपर
प्रतिष्ठिता भवति। वेदाश्चत्वारोऽ- | ही ब्राह्मी उपनिषद् प्रतिष्ठित हुआ
ङ्गानि च सर्वाणि । प्रतिष्ठेत्यनु- | करती है। चारों वेद तथा सम्पूर्ण
| वेदाङ्ग भी प्रतिष्ठा ही हैं। इस प्रकार
| [वेदाः सर्वाङ्गानि के आगे ] 'प्रतिष्ठा'
१३४ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
शमः । कर्म अग्निहोत्रादि । | हैं। और कर्म अग्निहोत्रादि हैं।
एतैर्हि संस्कृतस्य सत्त्वशुद्धिद्वारा | इनके द्वारा संस्कारयुक्त हुए पुरुषों-
| को ही चित्तशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानकी
तत्त्वज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । दृष्टा ह्यमृ- | उत्पत्ति होती देखी गयी है । जिनका
दितकल्मषस्योक्तेऽपि ब्रह्मण्य- | मनोमल निवृत्त नहीं हुआ है .उन
| पुरुषोंको तो उपदेश दिया जानेपर
प्रतिपत्तिर्विपरीतप्रतिपत्तिश्च, यथे- | भी ब्रह्मके विषयमें अज्ञान अथवा
न्द्रविरोचनप्रभृतीनाम् । | विपरीत ज्ञान होता देखा गया है,
| जैसे इन्द्र और विरोचन आदिको ।
तस्मादिह वातीतेषु वा बहुषु | अतः इस जन्ममें अथवा बीते
जन्मान्तरेषु तपआदिभिः कृत- | हुए अनेकों जन्मोंमें जिनका चित्त
सत्त्वशुद्धेर्ज्ञानं समुत्पद्यते यथा- | तप आदिसे शुद्ध हो गया है उन्हें
श्रुतम्; “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा | ही. श्रुत्युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है ।
देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता | “जिसकी भगवान्में अत्यन्त भक्ति
ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः” | है और जैसी भगवान्में है वैसी ही
( श्वे० उ० ६।२३ ) इति मन्त्र- | गुरुमें भी है उस महात्माको ही ये
वर्णात् । “ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | पूर्वोक्त विषय प्रकाशित होते हैं”
| इस मन्त्रवर्णसे तथा “पापकर्मोंके
वाक्य-भाष्य
वर्तते । ब्रह्माश्रया हि विद्या । | पदकी अनुवृत्ति की जाती है । क्योंकि
सत्यं यथाभूतवचनमपीडाकरम् | विद्या ब्रह्म (वेद) के ही आश्रय रहने-
| वाली है । सत्य अर्थात् दूसरेको पीडा
आयतनं निवासः सत्यवत्सु हि | न पहुँचानेवाला यथार्थ वचन
सर्वं यथोक्तमायतन इवावं- | आयतन—निवासस्थान है,.. क्योंकि
| सत्यवान् पुरुषोंमें ही उपर्युक्त साधन
स्थितम् ॥ ८ ॥ | आयतनके समान स्थित हैं ॥ ८ ॥