केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
पद-भाष्य
सोऽयमादेश इत्युच्यते । किं | 'आदेश' कहा जाता है । वह
तत् ? यदेतत् प्रसिद्धं लोके विद्युतो | आदेश क्या है ? यह जो लोकमें
| प्रसिद्ध बिजलीका चमकना है ।
व्यद्युतद् विद्योतनं कृतवदित्ये- | यहाँ 'व्यद्युतत्' शब्दका 'प्रकाश
| किया' ऐसा अर्थ अनुपपन्न होनेके
तदनुपपन्नमिति विद्युतो विद्योत- | कारण 'विद्युतो विद्योतनम्—विद्युत्-
| का चमकना' ऐसा अर्थ माना
नमिति कल्प्यते । आ३ इत्युप- | जाता है । 'आ' यह अव्यय
मार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवे- | उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली
| चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] ।
त्यर्थः, “यथा सकृद्विद्युतम्” इति | जैसा कि “यथा सकृद्विद्युतम्” इस
| अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है,
श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् । विद्यु- | क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही
दिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा | अपनेको एक बार प्रकाशित करके
| देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो
तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः । | गया था ।
अथवा विद्युतः 'तेजः' इत्य- | अथवा 'विद्युतः' इस पदके
| आगे 'तेजः' पदका अध्याहार
ध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतित- | करना चाहिये । 'व्यद्युतत्' का अर्थ
वाक्य-भाष्य..
विद्युदिव सहसैव प्रादुर्भूतं ब्रह्म | के समान सहसा ( अकस्मात् ) ही
| प्रकट हो गया था, इसलिये जो यह
द्युतिमत्तत्त्वाद्विद्युतो विद्योतनं यथा | ब्रह्म प्रकाशमय है यह विद्युत्के प्रकाश-
| के समान प्रकाशित हुआ । 'आ' का
यदेतद्ब्रह्म व्यद्युतद्विद्योतितवत् । | अर्थ 'इव' है; यह 'आ' शब्द उपमाके
आ इवेत्युपमार्थ आशब्दः । यथा | लिये है । जिस प्रकार बिजली सघन्
१२२ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
वत् आ३ इव । विद्युतस्तेजः | है 'प्रकाशित हुआ' तथा 'आ' का अर्थ
सकृद्विद्योतितवदित्येत्यभिप्रायः । | 'समान' है । अतः इसका अभिप्राय
इतिशब्द आदेशप्रतिनिर्देशार्थः- | यह हुआ कि 'जो बिजलीकी तेजके
इत्ययमादेश इति । इच्छब्दः | समान एक बार प्रकाशित हुआ ।'
समुच्चयार्थः । | 'इति' शब्द आदेशका सङ्केत
अयं चापरस्तस्यादेशः । | करनेके लिये है अर्थात् 'यह आदेश
कोऽसौ ? न्यमीमिषद् यथा चक्षुः | है' ऐसा बतलानेके लिये है, और
न्यमीमिषद् निमेषं कृतवत् । | 'इत्' शब्द समुच्चयार्थक है ।
| इसके सिवा एक दूसरा आदेश यह
| भी है । वह क्या है ? [ सुनो—]
| जिस प्रकार नेत्र निमेष करता है,
| उसी प्रकार उसने भी निमेष किया ।
वाक्य-भाष्य
घनान्धकारं विदार्य विद्युत्सर्वतः | अन्धकारको विदीर्ण करके सब ओर
प्रकाशत एवं तद्ब्रह्म देवानां पुरतः | प्रकाशित होती है उसी प्रकार वह ब्रह्म
सर्वतः प्रकाशवद्व्यक्तीभूतमतो | देवताओंके सामने सब ओर प्रकाशयुक्त
व्यद्युतद्वित्येत्युपास्यम् । यथा | होकर व्यक्त हुआ; इसलिये 'वह
सकृद्विद्युतमिति च वाजसनेयके । | बिजलीकी चमकके समान है'
यस्माच्चेन्द्रोपसर्पणकाले न्यमी- | इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है ।
मिषत् । यथा कश्चिच्चक्षुर्निमेषणं | जैसा कि वाजसनेयक श्रुतिमें भी
कृतवानिति । इतीदित्यनर्थकौ | 'यथा सकृद्विद्युतम्' ऐसा कहा है ।
निपातौ । निमिषितवदिव तिरो- | क्योंकि इन्द्रके समीप जानेके समय
भूतम् । इति एवमधिदैवतं देव- | ब्रह्म इसप्रकार संकुचित हो गया था,
ताया अधि यद्दर्शनमधिदैवतं | मानो किसीने नेत्र मूँद लिये हों; अतः
तत् ॥ ४ ॥ | वह नेत्र मूँदनेके समान तिरोहित
| हुआ । इस प्रकार यह अधिदैवत
| ब्रह्मदर्शन है। जो दर्शन देवतासम्बन्धी
| होता है वह अधिदैवत कहलाता है।
| 'इति' और 'इत्' इन दोनों निपातोंका
| यहाँ कुछ अर्थ नहीं है ॥ ४ ॥