केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और
ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि, आदिमें आत्मभाव करनेवाले
| असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म
मनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; | विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।*
वाक्य-भाष्य
आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः। स | अविषयरूपसे आत्मभावसे जाना है
सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है। जिसे विज्ञानकी
| प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म-
रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् | भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण
सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही
| सम्यग्दर्शी है। इससे विपरीत समझने-
मिथ्याज्ञानो भवति । कथम् ? मतं | वाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे ?
| [सो कहते हैं—] जिसका ऐसा
विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य | विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात
विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत
| विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि
विज्ञानो विदितान्यत्वाद्वह्मणो | ब्रह्म विदितेसे भिन्न है; इसलिये वह
न वेद स न विजानाति । | ब्रह्मको नहीं जानता—नहीं समझता ।
ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा- | इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका
नस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म-
तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है ।
कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नहीं; कपिल और कणाद
ब्रह्मविषयत्पादनवस्थिततर्कजन्य- | आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक,
त्वाद्द्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्या- | अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी
त्वमिति। स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही
बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | हैं। “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा
- इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि 'जिन्हें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है
वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं ।
और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके
साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है' ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
पद-भाष्य
न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न
नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी
अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो
| 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी
इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो
दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि
| उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं
पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके
| पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि
वाक्य-भाष्य
कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे
प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के-
स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस
इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और
र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम-
मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे
वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि
मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ
क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात
ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये
| 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे
अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही
अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है ।
तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म-
विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय
| न होनेसे अविज्ञात—अविदित है,
| इसलिये वही ज्ञान है । और जो
| अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि