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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
वह उसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। तब वह उसके पाससे लौट
आया और बोला—'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान
सका' ॥१०॥
पद-भाष्य
अथ अनन्तरं वायुमब्रुवन् | तदनन्तर उन्होंने वायुसे कहा—
हे वायो एतद्विजानीहीत्यादि | 'हे वायो ! इसे जानो' इत्यादि सब अर्थ पहलेहीके समान है।
समानार्थं पूर्वेण। वानाद्गमना- | [ वायुको ] वान अर्थात् गमन या गन्धग्रहण करनेके कारण 'वायु'
द्वन्धनाद्वा वायुः। मातर्यन्त- | कहा जाता है। 'मातरि' अर्थात्
रिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा। इदं | अन्तरिक्षमें श्वयन (विचरण) करनेके कारण वह 'मातरिश्वा'
सर्वमपि आददीय गृह्णीयाम् | है। पृथिवीमें जो कुछ है मैं इस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ—
यदिदं पृथिव्यामित्यादिसमान- | इत्यादि शेष अर्थ पहलेहीके समान है ॥१०॥
मेव ॥१०॥
वाक्य-भाष्य
तद्विज्ञानायाग्निमब्रुवन्। तृण- | देवताओंने उसे जाननेके लिये अग्निसे कहा। अग्नि और वायुके
निधानेऽयमभिप्रायोऽत्यन्तसम्भा- | सामने तृण रखनेमें ब्रह्मका यह
वितयोरग्निमारुतयोस्तृणदहनादा- | अभिप्राय था कि एक तिनकेको जलाने और ग्रहण करनेमें असमर्थ होनेसे इन
नाशकत्यात्मसम्भावना शातिता | अत्यन्त प्रतिष्ठित अग्नि और वायुका आत्माभिमान क्षीण हो जाय ॥३-१०॥
भवेदिति ॥ ३-१० ॥