केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
पद-भाष्य
वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | हैं उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं
करणगुणवत्या—अनभ्युदितम् | वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे
अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । | जो अनभ्युदित—अप्रकाशित
| अर्थात् नहीं कहा गया है—
येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे | बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा
सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- | वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित
ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | अर्थमें बोली जाती अर्थात् अपने
इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित
“वदन्वाक्” (बृ० उ० १ । | यानी प्रयुक्त की जाती है, जो
४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | 'वाणीकी वाणी है' इस प्रकार
यति” (बृ० उ० ३ । ७ । १७) | बतलाया गया है [जिसके विषयमें]
इत्यादि च वाजसनेयके । “या | बृहदारण्यकोपनिषद्में “बोलनेके
वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | कारण वाणी है” “जो भीतरसे वाणी-
| का नियमन करताहै” इत्यादि कहा
| है, तथा “चेतन प्राणियोंमें जो वाणी
| (वाक्शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में
वाक्य-भाष्य
उक्तं च केनेषितां वाचमिमां | ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस
वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । | वाणीको बोलते हैं' इस प्रश्नके उत्तरमें
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन | 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा
ग्रहणं आत्मन्यवस्थापनार्थं | भी जा चुका है। 'तू उसीको ब्रह्म
आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं | जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय-
वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- | रूपसे बुद्धिमें बिठानेके लिये है ।
णोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां | 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि
| वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है'
| इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व
| सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको
| अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे