केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
पद-भाष्य
किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और
महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि
मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही
| जानता है' ऐसा कह रहे हैं ?
बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक
ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक
औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः
निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित,
"अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध-
रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार
उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों-
९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है ।
शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- |
षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका
ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका
तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी
येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही
तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः
चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका
तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य
वाक्य-भाष्य
अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध
मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो
मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें
सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही
मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके
विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि
| 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे
| जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार
| जाना हुआ रूप तो अल्प ही है।
केनो० ३—