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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

ॐ उपनिषदोंमें आत्मानुभव ॐ ७७३


है। अतः प्रस्तुत लेखमें इसी विषयका दिग्दर्शन कराया
जाता है।
गीतोपनिषद्मे आत्माको 'ज्योति' कहा गया है—
'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः' (गीता १३। १७)। 'ज्योति' शब्द-
का अर्थ है—अवभासक, प्रकाशक अथवा चैतन्य। आत्मा
सर्वत्र विद्यमान होनेपर भी मन तथा बुद्धिके द्वारा गम्य नहीं
है। उसे 'अस्ति' या 'नास्ति' भावसे बुद्धिका विषय नहीं
बनाया जा सकता। वह अप्रमेय है, बुद्धि उसे माप नहीं
सकती। लौकिक बुद्धिसे आत्माका रहना और न रहना—
दोनों समान जान पड़ते हैं, क्योंकि बुद्धिकी पहुँच वहाँतक
है ही नहीं। आत्मा सबका आश्रय है, किंतु वह आश्रय-
आश्रित-सम्बन्धसे लिप्त नहीं है। उसका आश्रय-भाव भी
कल्पित ही है। आत्मा एक सर्वविलक्षण वस्तु है। भेद-
अभेद, विभक्त अविभक्त किसी भी लक्षणद्वारा उसे यथार्थतः
व्यक्त नहीं किया जा सकता। श्रीगुरुके मुखसे आत्मतत्त्वका
इस प्रकार प्रतिपादन सुनकर शिष्य चकित हो उठता है
और पूछता है—'भगवन् ! यदि सर्वत्र विद्यमान होनेपर
भी आत्माकी उपलब्धि सम्भव नहीं है, तब तो वह परमाणु
आदिकी भाँति जडरूप ही हो जायगा ?' इस शङ्काका
समाधान करते हुए श्रीगुरुदेव कहते हैं—
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
(गीता १३। १७)
बुद्धि अथवा इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेसे ही
आत्माको 'जड़' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह उन बुद्धि
आदिकी पहुँचसे परे है। इन्द्रियोंद्वारा जिन रूप आदि
विषयोंका ग्रहण होता है, उन सबसे रहित होनेके कारण ही
आत्माकी उनके द्वारा उपलब्धि नहीं होती। अतः उसका
इन्द्रियाग्राह्यत्व उचित ही है। 'तत्' वह ज्ञेय ब्रह्म 'ज्योतिषामपि
ज्योतिः' प्रकाशकोंको भी प्रकाश देनेवाला है। सूर्य आदि
बाह्य ज्योति हैं और बुद्धि आदि आन्तरिक ज्योति हैं—इन
सबका वह प्रकाशक है। चैतन्य ज्योति ही जड़-ज्योतिकी
प्रकाशिका है—चैतन्यसे ही जड़का प्रकाश होता है। यदि
ऐसा न हो तो जड़ निःसाक्षिक होकर अप्रकाशित ही रह जाय।
'येन सूर्य्यस्तपति तेजमेद्ध' 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'
—इत्यादि श्रुतियोंमें तथा—


यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५। १२)
—इत्यादि भगवद्वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है।
यदि कहें, आत्मा स्वरूपतः चैतन्य होते हुए भी जड़में संसर्ग-
युक्त तो है ही, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह 'तमसः
परम्' है—अविद्याकल्पित जड़वर्गसे परे है। जड़ अविद्याका
कार्य होनेसे असत् है और आत्मा नित्य सत् है; अतः उसमें
उसका संसर्ग नहीं है। तात्त्विक दृष्टिसे सत् और असत्‌का
सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। सम्बन्धकी प्रतीति भी
अज्ञानके ही कारण होती है। 'उच्यते'—यह बात श्रुतियों
और स्मृतियोंद्वारा वर्णित है। यथा—
'अक्षरात् परतः परः' (मुण्डक० २। १। २)
निःसङ्गस्य ह्यसङ्गेन कूटस्थस्य विकारिणा ।
आत्मनोऽनात्मना योगो वास्तवो नोपपद्यते ॥३
'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३। ८)
अर्थात् आत्मा आदित्यवर्ण और तमसे परे है। यहाँ
'आदित्यवर्ण'का अर्थ है---आदित्य (सूर्य) जिस प्रकार अपने
प्रकाशके लिये अन्य किसीकी भी अपेक्षा नहीं करता, उसी
प्रकार ब्रह्म भी अपने प्रकाशके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं
रखता अर्थात् वह सर्वप्रकाशक तथा स्वयंप्रकाश है। वह
आत्मा 'स्वयंज्योतिः' अर्थात् जड़वर्गके साथ अस्पृष्ट होनेसे
'ज्ञानम्'—ज्ञानस्वरूप है । तात्पर्य यह कि प्रमाणजन्य जो
चित्तवृत्ति है अर्थात् वेदान्त श्रवणादि रूप शब्द प्रमाणजन्य जो
चित्तवृत्ति विशेष उत्पन्न होती है, उस अविद्या साच्छादित
चित्तवृत्तिमे जो संवित् (चेतना या ज्ञान) अभिव्यक्त होती है
वह आत्मा (ब्रह्म) की ही एक झलक है, वह आत्मा संवित्‌-
स्वरूप है और इसीलिये वह चेतन ही 'ज्ञेयम्'—ज्ञेय है, क्योंकि
वही अविद्यामें आवृत रहनेके कारण अज्ञात है। जड़ वस्तुकी
अज्ञातता न रहनेसे वह ज्ञेय नहीं कही जा सकती ।।

७९४ -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :-
अत्र प्रश्न होता है यदि वह ज्ञानके योग्य है तो सभी लोग
उसे क्यों नहीं जान सकते ? इसके उत्तरमें कहते हैं—
'ज्ञानगम्यम्'—वह ज्ञानगम्य है अर्थात् 'अमानित्व' से लेकर
'तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्' (गीता १३ । ७—११) पर्यन्त जिस
साधन-कलापको ज्ञानका हेतु कहा है, ज्ञानशब्दवाच्य उन
साधन-समूहोंसे ही आत्मा गम्य ( प्राप्य ) है; अन्यथा उसे
नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर प्रश्न होता है कि यदि आत्मा
साधनोंसे ही गम्य होता है तो क्या वह किसी दूर स्थानमे
मिलेगा ? इसका उत्तर है—नहीं 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्'—वह
सबके हृदयमें अर्थात् निखिल प्राणियोंकी बुद्धिरूप हृदय-गुहा-
मे ही स्थित है। सूर्यके प्रकाशके सर्वत्र सामान्यभावसे रहने-
पर भी जैसे वह दर्पण किंवा सूर्यकान्तमणि आदिमें विशेष
रूपसे अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार वह आत्मा भी सर्वत्र
सामान्यभावसे रहनेपर भी उस हृदयकन्दरारूप बुद्धि-गुहामे
विशेष रूपसे प्रकाशित होता है। वह वस्तुतः व्यवधानरहित
है. परन्तु भ्रान्ति ( अविद्या ) के कारण व्यवहित प्रतीत होता
है तथा सब प्रकारके भ्रमका कारण जो अज्ञान है, उसकी
निवृत्ति होनेपर प्राप्त हुआ-सा ज्ञात होता है। ज्ञानक्रियाका
कर्म, जो ज्ञेय वस्तुका जानना है, उस प्रकार ज्ञानके फलरूप-
से ज्ञेय न होनेपर भी वह आत्मा सबके हृदयमें अधिष्ठित
है तथा स्वयं साक्षात् ज्ञानस्वरूप है। अमानित्वादि साधनोंसे
प्रतिबन्ध दूर होकर इसका प्रकाश होनेके कारण इसे 'ज्ञेय'
कहा गया है। आत्मा स्वप्रकाशस्वरूप स्वयंसिद्ध है, अतएव
वह आवरण-भङ्गरूप वृत्तिव्याप्तिका ही विषय है, उसमें
फलव्याप्ति कैसे हो सकती ?
स्वप्रकाशस्वरूपत्वात् सिद्धत्वाच्च चिदात्मनः ।
वृत्तिव्याप्यत्वमेवास्तु फलव्याप्ति कथं भवेत् ॥
(सदाचार० ५)
अर्थात् उसमे फलव्याप्ति नहीं हो सकती। अस्तु,
जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एक अद्वितीय निर्मल ज्ञान
( सत्ता ) ही सदा भास रहा है, परंतु उस सर्वव्यापक
निरवधिक, केवल शुद्ध विज्ञानघनस्वरूपको मन्द भाग्यवाले
नहीं जान सकते—
ज्ञानमेक सदा भाति सर्वावस्थासु निर्मलम् ।
मन्दभाग्या न जानन्ति स्वरूप केवलं बृहत् ॥
(सदाचारानुसन्धानम् ३१)
जो सबका साक्षी ज्ञानस्वरूप है, जो सब चराचर
प्राणियोंका जीवनरूप है 'चेतनश्चेतनानाम्' है, वही आत्मा
है और वही 'मैं हूँ' इस प्रकार जो जानता है और अनुभव
करता है, वह मुक्त और कृतकृत्य है—इसमें कुछ भी सशय
नही। प्रमाता ( अन्तःकरणविशिष्ट जीवात्मा ); प्रमाण
( प्रत्यक्षादि ); प्रमेय ( घट-पट आदि ) तथा (वृत्तिक्शान )
प्रमा जिस चैतन्य-प्रकाशसे प्रतीत होते हैं, उस चैतन्य-ज्ञानके
लिये कौन प्रमाण चाहिये अर्थात् वह चैतन्य वस्तु स्वतः-
सिद्ध स्वयंप्रकाश है. प्रमाणान्तरसे उसका ज्ञान नहीं हो
सकता। क्योंकि वही तो प्रमाणोंका भी प्रमाण है अर्थात्
प्रमाण भी उस चैतन्यसे ही प्रकाशित होकर प्रमाणित होते हैं।
इसी आत्माको—
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवास साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥
( श्वेताश्वतर० ६ । ११ )
'समस्त प्राणियोंमे एक ही देव स्थित है। वह सर्वव्यापक,
समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों-
मे बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करने-
वाला, शुद्ध और निर्गुण है।' इस श्रुतिमे 'साक्षी' कहा गया
है। भगवद्गीतामें भी 'उपद्रष्टानुमन्ता च' (१३ । २२)
कहा गया है अर्थात् देह, चक्षु, मन और बुद्धिरूप दृश्य-
पदार्थोंमें रहकर भी उन देह, चक्षु, मन और बुद्धि आदिके समस्त
व्यापारोंको एवं दृश्योंको अविक्रियरूपसे वह देखता है।
इसलिये 'उपद्रष्टा' है और उन देह, इन्द्रिय प्रभृतिको अपने-
अपने व्यापारमें अपनी-अपनी इच्छानुसार प्रवृत्त होनेपर उन्हे
रोकता भी नहीं—वह केवल साक्षीरूपसे सब कुछ देखता
है—अतः आत्मा स्वभावसे ही साक्षी एवं द्रष्टा है। इसलिये
द्रष्टाभाव आत्माका स्वरूप है। इसकी गाढ अवस्थामें सविकल्प
समाधि लगती है। अतः सब कालमें विराजमान सच्चिदानन्द-
घन निर्गुण निर्विकार निराकार आत्माका द्रष्टाभाव रखना
ब्रह्माभ्यास ही है तथा यह उच्चकोटिकी साधना है।
चित्तगत काम, सकल्प प्रभृति वृत्तियाँ दृश्य हैं, आत्म-
चैतन्य उनका द्रष्टा है, इस भावसे आत्मचैतन्यका ध्यान
करना चाहिये अर्थात् उन काम-संकल्पादि वृत्तियोंमेसे प्रत्येक
वृत्तिको द्रष्टाका दृश्यरूप जानकर तथा जो चैतन्य उन
वृत्तियोंका साक्षी हुआ है, उस द्रष्टा साक्षीको ही अपना यथार्थ
स्वरूप जानना चाहिये। मैं असङ्ग, सच्चिदानन्द स्वयंप्रकाश
हूँ तथा सब प्रकारके काम-सकल्पादि द्वैतसे वर्जित हूँ, स्वगत,
सजातीय तथा विजातीय भेदसे शून्य अन्तरात्मस्वरूप साक्षी

ॱ निवेदन और क्षमा-प्रार्थना ॱ ७७५
हूँ—इस प्रकारका भाव सदा जागरित रखना चाहिये और मै
अन्तरात्मस्वरूप चैतन्य-मात्र, द्रष्टा, साक्षी हूँ—इस चिन्तन-
धाराको ऐसे प्रवाहित करना चाहिये कि तार न टूटने पावे ।
इस प्रकारका अभ्यास सहज होनेपर स्वरूपभूत ज्ञानानन्दका
आविर्भाव होकर आत्मास्थितिपूर्वक जीव कृतकृत्य हो
जाता है ।
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥
( श्वेताश्वतर० ६ । २३ )
‘जिसकी परमेश्वरमे अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमात्मा-
मे है वैसी ही श्रीगुरुदेवमें भी है, उसीके अन्तःकरणमे इन
तत्त्वोंका प्रकाश होता है ।’
निवेदन और क्षमा-प्रार्थना
मनुष्य-जीवनका चरम और परम उद्देश्य है—अखण्ड
पूर्ण आनन्द तथा सनातन शान्तिरूप भगवान्को प्राप्त करना ।
जीवनके अन्य सारे कार्य इसी एकमात्र चरम लक्ष्यकी सिद्धिके
लिये किये जाने चाहिये । हमारे उपनिषद् इसी परम लक्ष्यके
स्वरूप तथा उसकी प्राप्तिके विविध अनुभवपूर्ण साधनोंका
उपदेश करते है । हम भारतीय आज इस अपने घरके
दिव्य परसोज्ज्वल प्रकाशको छोड़कर अज्ञानान्धकारके नाशके
लिये दूसरोंकी टिमटिमाती चिरागपर मुग्ध हुए जा रहे है !
हमारा यह मोह दूर हो । हम उपनिषदोंका किसी अंशमें
यत्किञ्चित् परिचय प्राप्त कर सकें, इसी उद्देश्यसे ‘उपनिषद्-
अङ्क’के प्रकाशनका हमारा यह क्षुद्र प्रयास है ।
उपनिषदें ज्ञानकी खानें हैं । जीवनकी सभी दिशाओंमे
प्रकाश देनेवाली अखण्ड परम ज्योति हैं । परमात्माके पुनीत
मार्गकी पथप्रदर्शिका हैं और परमात्मा परमेश्वरके विभिन्न
रूपोंके निर्भ्रान्त और समन्वयात्मक स्वरूपका साक्षात्कार कराने-
वाली हैं । उपनिषदोंकी महिमा इसलिये नहीं है कि
दाराशिकोहने इनसे प्रकाश प्राप्त किया या शोपेनहर, मैक्समूलर
एव अन्यान्य पाश्चात्त्य विद्वानोंने इनकी प्रशसा की है । यह
उनका सौभाग्य है, जो उन्हें उपनिषदोंका कुछ आभास प्राप्त
हुआ । वे उपनिषदोंको न जान पाते, जानकर भी प्रशंसा न
करते या कोई इन्हें व्यर्थ बताकर निन्दा भी करता तो इससे
उपनिषदोंका महत्त्व तो अक्षुण्ण ही रहता । क्योंकि उनकी
महिमाका आधार उनका निर्मल मङ्गलमय प्रकाशमय स्वरूप ही है।
आजकल काल-निर्णयकी पद्धति चली है, और पाश्चात्त्य
विद्वानोंके मतोंका अनुकरण करके भारतीय विद्वान् भी उसी
पद्धतिके अनुसार चल रहे हैं । इसीसे उपनिषदोंका निर्माण-
काल ईसासे सात-आठ सौ वर्ष पूर्व बतलाते हैं । पर उन्हें
यह समझना चाहिये कि ब्रह्मसूत्रमे उपनिषदोंकी व्याख्या है
और ब्रह्मसूत्रका श्रीमद्भगवद्गीतामे उल्लेख है, इससे यह सिद्ध
है कि भगवद्गीतासे पूर्व उपनिषदोंका अस्तित्व था ।
श्रीमद्भगवद्गीताका प्रादुर्भाव ईसासे ३१०० वर्ष पूर्व महाभारत-
युद्धमें हुआ था—यह प्रायः निर्णीत हो चुका है । ऐसी अवस्था-
में दूसरोंके अन्धेरेमें काल टटोलनेकी यह पद्धति कहाँतक
समीचीन है, इसपर विद्वान् सज्जन विचार करें । वस्तुतः
उपनिषदोंकी महत्ता कालपर नहीं है, वह तो उनकी महान्
ज्ञानराशिको लेकर है, जो वेदोंके सारके रूपमें ऋषियो-
द्वारा श्रुत और संगृहीत है एव जो नित्य, सत्य और
सनातन है ।
उपनिषदोंमे तत्त्वज्ञान या ज्ञानके परम साध्य तत्त्वके
स्वरूपका साक्षात्कार ही नहीं है, वहाँतक पहुँचनेके विभिन्न
रुचिके अधिकारियोंके अनुकूल विविध साधनोंका भी वर्णन
है, और साथ ही मनुष्यको ऊँचे उठानेवाले उस सदाचारका
भी महत्त्वपूर्ण उल्लेख है, जिसे जानकर प्रत्येक मनुष्य अपनेको
ऊँचा उठानेका प्रयत्न कर सकता है । यह भारतीयोकी परम
निधि है और किसी दिन इन्हींके प्रकाशसे विश्वमे यथार्थ
सुख-शान्तिका प्रसार होगा ।
उपनिषद् सैकड़ों हैं । उनमे बारह प्रधान मानी जाती है ।
इन बारहमेंसे—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य,
ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर इन नौ उपनिषदोंको तो
मूल, पदच्छेद, अन्वय तथा व्याख्यासहित प्रकाशित किया
जा रहा है । समय-सङ्कोचसे शेष तीन—छान्दोग्य, बृहदारण्यक
और कौषीतकि-ब्राह्मणपर व्याख्या नही लिखी जा सकी ।

Regd. No. A. 175.
श्रीहरिः
भगवान् ही सब कुछ हैं
स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ।
स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥
स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् ।
ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
सम्पश्यन् ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना ॥
( कैवल्योपनिषद् ८–१० )
वे (परात्पर परब्रह्म परमेश्वर ही) चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, वे ही पञ्चमुख
शिव हैं, वे ही देवराज इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परमात्मा हैं, वे ही चतुर्भुज
विष्णु हैं, वे प्राण हैं, वे काल हैं, वे अग्नि हैं, वे चन्द्रमा हैं। जो कुछ
हो चुका और जो कुछ आगे होनेवाला है, सब वे ही हैं। उन सनातन
भगवान्‌को जानकर जीव मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त
मुक्तिका अन्य कोई उपाय नहीं है। जो इन परमात्माको सब चराचर भूत-
प्राणियोंमें देखता है और सब भूतप्राणियोंको परमात्मामें देखता है अर्थात्
सब प्रकारसे एक भगवान्‌को ही सदा सर्वत्र देखता है, वह उन पर-
ब्रह्मको प्राप्त करता है। दूसरे किसी उपायसे उनकी प्राप्ति नहीं होती।