कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 829, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ उपनिषदोंमें आत्मानुभव ॐ ७७३
है। अतः प्रस्तुत लेखमें इसी विषयका दिग्दर्शन कराया
जाता है।
गीतोपनिषद्मे आत्माको 'ज्योति' कहा गया है—
'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः' (गीता १३। १७)। 'ज्योति' शब्द-
का अर्थ है—अवभासक, प्रकाशक अथवा चैतन्य। आत्मा
सर्वत्र विद्यमान होनेपर भी मन तथा बुद्धिके द्वारा गम्य नहीं
है। उसे 'अस्ति' या 'नास्ति' भावसे बुद्धिका विषय नहीं
बनाया जा सकता। वह अप्रमेय है, बुद्धि उसे माप नहीं
सकती। लौकिक बुद्धिसे आत्माका रहना और न रहना—
दोनों समान जान पड़ते हैं, क्योंकि बुद्धिकी पहुँच वहाँतक
है ही नहीं। आत्मा सबका आश्रय है, किंतु वह आश्रय-
आश्रित-सम्बन्धसे लिप्त नहीं है। उसका आश्रय-भाव भी
कल्पित ही है। आत्मा एक सर्वविलक्षण वस्तु है। भेद-
अभेद, विभक्त अविभक्त किसी भी लक्षणद्वारा उसे यथार्थतः
व्यक्त नहीं किया जा सकता। श्रीगुरुके मुखसे आत्मतत्त्वका
इस प्रकार प्रतिपादन सुनकर शिष्य चकित हो उठता है
और पूछता है—'भगवन् ! यदि सर्वत्र विद्यमान होनेपर
भी आत्माकी उपलब्धि सम्भव नहीं है, तब तो वह परमाणु
आदिकी भाँति जडरूप ही हो जायगा ?' इस शङ्काका
समाधान करते हुए श्रीगुरुदेव कहते हैं—
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
(गीता १३। १७)
बुद्धि अथवा इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेसे ही
आत्माको 'जड़' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह उन बुद्धि
आदिकी पहुँचसे परे है। इन्द्रियोंद्वारा जिन रूप आदि
विषयोंका ग्रहण होता है, उन सबसे रहित होनेके कारण ही
आत्माकी उनके द्वारा उपलब्धि नहीं होती। अतः उसका
इन्द्रियाग्राह्यत्व उचित ही है। 'तत्' वह ज्ञेय ब्रह्म 'ज्योतिषामपि
ज्योतिः' प्रकाशकोंको भी प्रकाश देनेवाला है। सूर्य आदि
बाह्य ज्योति हैं और बुद्धि आदि आन्तरिक ज्योति हैं—इन
सबका वह प्रकाशक है। चैतन्य ज्योति ही जड़-ज्योतिकी
प्रकाशिका है—चैतन्यसे ही जड़का प्रकाश होता है। यदि
ऐसा न हो तो जड़ निःसाक्षिक होकर अप्रकाशित ही रह जाय।
'येन सूर्य्यस्तपति तेजमेद्ध' 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'
—इत्यादि श्रुतियोंमें तथा—
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५। १२)
—इत्यादि भगवद्वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है।
यदि कहें, आत्मा स्वरूपतः चैतन्य होते हुए भी जड़में संसर्ग-
युक्त तो है ही, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह 'तमसः
परम्' है—अविद्याकल्पित जड़वर्गसे परे है। जड़ अविद्याका
कार्य होनेसे असत् है और आत्मा नित्य सत् है; अतः उसमें
उसका संसर्ग नहीं है। तात्त्विक दृष्टिसे सत् और असत्का
सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। सम्बन्धकी प्रतीति भी
अज्ञानके ही कारण होती है। 'उच्यते'—यह बात श्रुतियों
और स्मृतियोंद्वारा वर्णित है। यथा—
'अक्षरात् परतः परः' (मुण्डक० २। १। २)
निःसङ्गस्य ह्यसङ्गेन कूटस्थस्य विकारिणा ।
आत्मनोऽनात्मना योगो वास्तवो नोपपद्यते ॥३
'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३। ८)
अर्थात् आत्मा आदित्यवर्ण और तमसे परे है। यहाँ
'आदित्यवर्ण'का अर्थ है---आदित्य (सूर्य) जिस प्रकार अपने
प्रकाशके लिये अन्य किसीकी भी अपेक्षा नहीं करता, उसी
प्रकार ब्रह्म भी अपने प्रकाशके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं
रखता अर्थात् वह सर्वप्रकाशक तथा स्वयंप्रकाश है। वह
आत्मा 'स्वयंज्योतिः' अर्थात् जड़वर्गके साथ अस्पृष्ट होनेसे
'ज्ञानम्'—ज्ञानस्वरूप है । तात्पर्य यह कि प्रमाणजन्य जो
चित्तवृत्ति है अर्थात् वेदान्त श्रवणादि रूप शब्द प्रमाणजन्य जो
चित्तवृत्ति विशेष उत्पन्न होती है, उस अविद्या साच्छादित
चित्तवृत्तिमे जो संवित् (चेतना या ज्ञान) अभिव्यक्त होती है
वह आत्मा (ब्रह्म) की ही एक झलक है, वह आत्मा संवित्-
स्वरूप है और इसीलिये वह चेतन ही 'ज्ञेयम्'—ज्ञेय है, क्योंकि
वही अविद्यामें आवृत रहनेके कारण अज्ञात है। जड़ वस्तुकी
अज्ञातता न रहनेसे वह ज्ञेय नहीं कही जा सकती ।।