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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पञ्चम अध्याय

ॐ
पञ्चम अध्याय
प्रथम खण्ड
प्राणकी सर्वश्रेष्ठता
जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो
जाता है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो कोई
वसिष्ठको जानता है, वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है, निश्चय
वाक् ही वसिष्ठ है । जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, वह इस
लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है, चक्षु ही प्रतिष्ठा है।
जो कोई समृद्धिको जानता है, उसे दैव और मानुष भोग सम्यक्
प्रकारसे प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही समृद्धि है। जो आयतनको
जानता है, वह स्वजातीयोंका आयतन—आश्रय होता है।
निश्चय मन ही आयतन है ॥ १-५ ॥
एक बार प्राण ( इन्द्रियाँ ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस
प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे । उन प्राणोंने
अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें
कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके
उत्क्रमण करनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे,
वही तुममें श्रेष्ठ है।' तब वाक्-इन्द्रियने उत्क्रमण किया ।
उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—
'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [उन्होंने कहा—] 'जिस
प्रकार गूँगेलोग बिना बोले प्राणसे प्राणनक्रिया करते, नेत्रसे
देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित
रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर वाक्-
इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया । फिर चक्षुने उत्क्रमण किया ।
उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—
'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ]
'जिस प्रकार अन्धेलोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे
बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित
रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर चक्षु-
ने प्रवेश किया । तदनन्तर श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक
वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना
तुम कैसे जीवित रह सके?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार
बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते,
नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं,
उसी प्रकार हम भी जीवित रहे ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें
प्रवेश किया । तत्पश्चात् मनने उत्क्रमण किया । उसने एक
वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे
जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार बच्चे,
जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया
करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए
जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' यह सुनकर
मनने भी प्रवेश किया। फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा
की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेके
कीलोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी
उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा—
'भगवन् ! आप [ हमारे स्वामी ] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ
हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ ६-१२ ॥
फिर उससे वाक्-इन्द्रियने कहा—'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो
तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो
प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो ।' फिर उससे श्रोत्रने कहा—
'मैं जो समृद्धि हूँ सो तुम्हीं समृद्धि हो ।' तत्पश्चात् उससे मन
बोला—'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं आयतन हो।' [ लोकमें
समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन
ही कहते हैं, परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण-
ही हैं ॥ १३-१५ ॥
द्वितीय खण्ड
महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थोपासना
उसने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' तब वागादिने
कहा—'कुत्तों और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोका यह जो कुछ
अन्न है [ सब तुम्हारा अन्न है ]'; सो यह सब अन ( प्राण )
का अन्न है । 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष नाम है । इस प्रकार
जाननेवालेके लिये भी कुछ अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होता है ।
उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले—
'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और
पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं। ऐसा करनेसे वह
वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ १-२ ॥
उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जावालने वैयाघ्रपद्य
गो-श्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे सूखे
ठूँठके प्रति कहे तो उसमे शाखा उत्पन्न हो जायगी और
पत्ते फूट आयेंगे' ॥ ३ ॥
अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे.

४३४ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ५


अमावस्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये। इसी प्रकार 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले, 'सपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले तथा 'आयत्नाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले। तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमे ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ—] 'हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [अपने प्राणभूत] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ।' फिर वह इस ऋचासेऽ पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्स॑वितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'व॒यं दे॒वस्य॑ भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है, 'श्रेष्ठ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है तथा 'तुरं॒ भग॑स्य धीमहि' ऐसा कहकर कस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर [अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे] अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो ऐसा समझे कि कर्म सफल हो गया। इस विषयमे यह श्लोक है— जिस समय काम्यकर्ममें स्वप्नमे स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ४-८ ॥


तृतीय खण्ड

श्वेतकेतु और प्रवाहणका संवाद; श्वेतकेतुके पिताका राजासे उपदेश माँगना

आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामे आया। उससे जीवकके पुत्र प्रवाहणने कहा—'कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है?' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥

'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे जानेपर प्रजा कहाँ जाती है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् !' [प्रवाहण—] 'देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंका पारस्परिक वियोगस्थान तुझे मालूम है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं भगवन् !' [प्रवाहण—] 'तुझे मालूम है, वह पितृलोक भरता क्यों नहीं है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप (सोमामृतादि रस) 'पुरुष' सज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् ! नहीं।' 'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों कहता था? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है। उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' पिताने कहा—'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हे क्यों न बतलाता?' ॥ २-५ ॥

तब वह गौतम गोत्रोत्पन्न ऋषि राजा (जैवलि) के स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [दूसरे दिन] प्रातःकाल होते ही राजाके सभामे पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। राजाने उससे कहा—'भगवन् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये। उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें, आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात प्रश्नरूपसे कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह सङ्कटमे पड़ गया। उसे 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—'गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला— ॥ ६-७ ॥


* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही उस देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'

खण्ड १० ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३५
चतुर्थ खण्ड
द्युलोककी अग्निके रूपमें उपासना
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है । उसका इस द्युलोकरूप अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस
आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ १-२ ॥
अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं । उस
पञ्चम खण्ड
पर्जन्यकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते
बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन हैं, उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ १-२ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है । उसका संवत्सर ही समिध् अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण
है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ १-२॥
सप्तम खण्ड
पुरुषकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पुरुष ही अग्नि है । उसकी वाक् ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते
प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गार है और श्रोत्र हैं । उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ १-२ ॥
अष्टम खण्ड
स्त्रीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! स्त्री ही अग्नि है । उसका उपस्थ ही समिध् है, जो सुख होता है, वह विस्फुलिङ्ग है । उस इस अग्निमें देवगण
पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता
तथा जो भीतरकी ओर करता है, वह अङ्गार है और उससे है ॥ १-२ ॥
नवम खण्ड
पाँचवीं आहुतिसे 'पुरुष' की उत्पत्ति
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' है । इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुःपर्यन्त जीवित रहता
शब्दवाची हो जाते हैं । वह जरायुसे आवृत्त हुआ गर्भ दस है । फिर मरनेपर कर्मफल भोगनेके लिये प्रस्थित हुए उस जीवको
या नौ महीने अथवा जबतक पूर्णायु नहीं होता तबतक माताकी अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और
कुक्षिके भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता जिससे उत्पन्न हुआ था ॥ १-२ ॥
दशम खण्ड
जीवोंकी त्रिविध गति
वे जो इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो वनमें श्रद्धा और अर्चि-अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं. अर्चि-अभिमानी
तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे