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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव

११८

कबीरकृष्णगीता ।

जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥
पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥
कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥
करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥
कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥
सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥

गरुडव्यासवचन ।

गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥
कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥
स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥
तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥
धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥
और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥

कबीरवचन ।

कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥
कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥
ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥
ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥
ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥
साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥
धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

११९

बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥
सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥
अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥
सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥
केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥
तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥
एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥
औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥
अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥
तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥
गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥
गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥

दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।

तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥

करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥
ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥
मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥
जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥
नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥
आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥

१२०

कबीरकृष्णगीता ।

सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥
रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥
पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥
बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥
आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे
सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥
कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥
कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥
जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥
क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥
जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥
विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥
सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥
गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥
वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥
एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई ।
यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥
दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय ।
एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥
आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट ।
सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥
माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।

कबीरकृष्णगीता ।

१२१

सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज ।
संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥
ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥
रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता ।
धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥
रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत ।
गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥
गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास ।
हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥
आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव ।
कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥

पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥
पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥
सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥
विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥
जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥
शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥
सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥
मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥
ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥
भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥
गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥

६

१२२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।

पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥

जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥

जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥

जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥

जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥

जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥

दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।

सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥

ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।

कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥

शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।

क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥

सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।

गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥

पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।

पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥

गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।

कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥

कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।

जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१२३

गुरुआज्ञाते जो रमे, रमतें तजे शरीर ।
ताके सुक्त हजूर हैं, सदुरु कहें कबीर ॥
गुरुके सन्मुख जो रहे, सहे कसौटी दुःख ।
कहें कबीर वा दुःख पर, वारों कोटिन सुख ॥
सदुरु अधम उधारन, दयासिंधु गुरु नाम ।
गुरु विन कोई न तर सके, क्या जप अल्लह राम ॥
गुरु सुक्तावे जीव कहें, चौरासी बंद छोर ।
सुक्त प्रवाना देहिं जो, यमसो तिनका तोड़ ॥
वेद पुराण साधु गुरु, सवन कहा निज बात ।
गुरुते अधिक न दूसर, क्या हरि क्या पितु मात ॥
ताते शब्द विवेक कर, कीजिये सो साज ॥
जोहि विध गुरुसो प्रीत रह, कजि सोई काज ॥
गुरुसो प्रीत निवाहिये, जेहि तत निवहे संत ।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रीत निकट गुरु कंथ ॥
सोइ नाचना नाचिये, जेहि निवहे गुरुप्रेम ।
कहें कबीर गुरु प्रेम विन, कितहु कुशलना क्षेम ॥
तन मन सीस निछावर, दजि सरबस प्राण ।
कहें कबीर दुख सुख हरे, सदा रहे गलतान ॥
तब जो गुरु प्रिय बैन कहि, शिष्यहि चितवे दीठ ।
तो रहिये गुरु सन्मुख, कबहुं न दजि पीठ ॥
गुरु मारे झटकारे, गुरु बोरे गुरु तात ।
गुरुसों प्रीत निवाहिये, गुरु भौ निधि काडिहार ॥