हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-१३२ ] बुद्धिमान् पुरुषके लिये शिक्षा ५५
और भी—दरिद्रता और मरना इन दोनोंमेंसे दरिद्रता बुरी कही है, क्योंकि
मरना तो थोड़े क्लेशसे होता है और दरिद्रता हमेशा दुःख देती है ॥ १२८ ॥
अपरं च,—
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम
सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव ।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव
अन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्' ॥ १२९ ॥
और दूसरे—वे ही विकारसे रहित इन्द्रियां हैं, वही नाम है, वही निर्मल
बुद्धि है, वही वाणी है, परन्तु धनकी उष्णतासे रहित वो ही मनुष्य क्षणभरमें
कुछका कुछ हो जाता है; ॥ १२९ ॥
एतत्सर्वमाकर्ण्य मयालोचितम्-‘ममात्रावस्थानमयुक्तमिदानीम्।
यच्चान्यस्मै एतद्वृत्तान्तकथनं तदप्यनुचितम् ।
यह सब सुन कर मैंने सोचा—‘मेरा अब यहां रहना ठीक नहीं है । और
जो दूसरेसे यह समाचार कहना भी उचित नहीं है,
यतः,—
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥ १३० ॥
क्योंकि--बुद्धिमान् पुरुषको अपने धनका नाश, मनका संताप, घरका दुराचार,
ठगा जाना, और अपमान, ये प्रकट न करने चाहिये ॥ १३० ॥
अपि च,—
आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ।
तपो दानापमानं च नव गोप्यानि यत्नतः ॥ १३१ ॥
औरभी—आयु, धन, घरका भेद ( रहस्य ), गुप्त बात, मैथुन, औषधि,
तप, दान और अपमान, इन नौ बातोंको यत्नसे गुप्त रखना चाहिये ॥ १३१ ॥
तथा चोक्तम्,—
अत्यन्तविमुखे दैवे व्यर्थे यत्ने च पौरुषे ।
मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ? ॥ १३२ ॥