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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 302 में से

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पृष्ठ 69

-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९

परिव्राजकः समायातः। तेन सह कथाप्रसङ्गावस्थितो मम त्रासार्थं
जर्जरवंशखण्डेन चूडाकर्णो भूमिमताडयत्। वीणाकर्ण उवाच—
‘सखे ! किमिति मम कथाविरक्तोऽन्यासक्तो भवान् ?’ चूडाकर्णे-
नोक्तम्—‘मित्र ! नाहं विरक्तः। किंतु पश्यायं मूषिको ममापकारी
सदा पात्रस्थं भिक्षान्नमुत्प्लुत्य भक्षयति।’ वीणाकर्णो नागदन्तकं
विलोक्याह—‘कथं मूषिकः स्वल्पबलोऽप्येतावद्दूरमुत्पतति ? तदत्र
केनापि कारणेन भवितव्यम् ।
चम्पका नाम नगरीमें संन्यासियोंकी एक वस्ती है । वहां चूडाकर्ण नाम
संन्यासी रहता था। और वह भोजनसे बचेखुचे भिक्षाके अन्नसहित भिक्षा-
पात्रको खूंटीपर टांग कर सोजांया करता था। और मैं उस भोजनके पदार्थको
उछल उछल कर नित्य खाया करता था । उसके उपरान्त उसका प्रिय
मित्र वीणाकर्ण नाम संन्यासी आया । चूडाकर्णने उसके साथ नानाभांतिकी
कथाके प्रसंगमें लग कर मुझको डरानेके लिये एक पुराने बाँसके टुकड़ेसे पृथिवी
खटखटायी. वीणाकर्ण बोला—‘मित्र ! यह क्या बात है ? कि (तुम) मेरी
कथामें विरक्त और दूसरीमें लगे हो’॥ चूडाकर्णने कहा कि ‘मित्र ! मैं विरक्त
नहीं हूं। परन्तु देखो—यह चूहा मेरा अपकारी है, पात्रमें धरे हुए भिक्षाके
अन्नको सदा उछल उछल कर खा जाता है.’ वीणाकर्णने खूंटीकी ओर देख कर
कहा—‘यह दुबला पतला-सा भी चूहा कैसे इतना ऊपर उछलता है ? इसलिये
इसमें कुछ न कुछ कारण होना चाहिए ।
तथा चोक्तम्—
अकस्माद्युवती वृद्धं केशेष्वाकृष्य चुम्बति ।
पतिं निर्दयमालिङ्ग्य हेतुरत्र भविष्यति’ ॥ १०९ ॥
जैसा कहा है कि—यकायक एक जवान स्त्रीने केश पकड़ कर और प्रेमसे
आलिंगन करके अपने बूढ़े पतिका मुख चुम्बन किया (वैसाही) इसमें कोई कारण
होगा’ ॥ १०९ ॥
चूडाकर्णः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’ । वीणाकर्णः कथयति—
चूडाकर्ण पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है?’ वीणाकर्ण कहने लगा—
कथा ५
[ बूढा बनिया और उसकी व्यभिचारिणी स्त्रीकी कहानी ५ ]
अस्ति गौडीये कौशाम्बी नाम नगरी । तस्यां चन्दनदासनामा
वणिङ्महाधनो निवसति । तेन पश्चिमे वयसि वर्तमानेन कामाधि-
हि० ४