हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२३ ] धनकी प्रशंसा ५३
उक्तं च,—
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।
स्वभावेनैव तच्छास्त्रं स्त्रीबुद्धौ सुप्रतिष्ठितम् ॥ १२२ ॥
और कहा भी है कि—जो शास्त्र शुक्राचार्य जानते हैं और जो शास्त्र
बृहस्पतिजी जानते हैं वह शास्त्र स्त्रीकी बुद्धिमें स्वभावहीसे होता है ॥ १२२ ॥
तदालिङ्गनमवलोक्य समीपवर्तिनी कुट्टन्यचिन्तयत्—'अकस्मा-
दियमेनमुपगूढवती' इति ततस्तया कुटन्या तत्कारणं परिज्ञाय सा
लीलावती गुप्तेन दण्डिता; अतोऽहं ब्रवीमि—"अकस्माद्युवती
वृद्धम्” इत्यादि । मूषिकबलोपष्टम्मेन केनापि कारणेनात्र
भवितव्यम् ।'
बूढे पतिके साथ स्त्रीका आलिंगन देख कर पास बैठने वाली कुटनी चिंता
करने लगी कि, 'भला यह जवान औरत इस बूढेको क्यों लिपट गई ?' फिर उस
कुटनीने उसका कारण जान कर लीलावतीको अकेली देखकर डाटा; इसलिये मैं
कहता हूं "अचानक जवान स्त्रीने वृद्धको" इत्यादि ॥ चूहेको बलका अहंकार
यहां परभी किसी न किसी कारणसेही है ॥
क्षणं विचिन्त्य परिव्राजकेनोक्तम्—'कारणं चात्र धनबाहुल्यमेव
भविष्यति ।
थोड़ी देर विचार कर संन्यासीने कहा—'इसमें धनकी अधिकताका कारण
होगा,
यतः,—
धनवान् बलवाँल्लोके सर्वः सर्वत्र सर्वदा ।
प्रभुत्वं धनमूलं हि राज्ञामप्युपजायते' ॥ १२३ ॥
क्योंकि—सर्वत्र, संसारमें सब मनुष्य धनसेही सदा बलवान् होते हैं और
राजाओंकी प्रभुताकी जड़ धनही होता है ॥ १२३ ॥
ततः खनित्रमादाय तेन विवरं खनित्वा चिरसंचितं मम धनं
गृहीतम् । ततः प्रभृति निजशक्तिहीनः सत्त्वोत्साहरहितः स्वाहार-
मप्युत्पादयितुमक्षमः सत्रासं मन्दं मन्दमुपसर्पञ्चूडाकर्णेनावलो-
कितः ।