गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
-८. ५१½ ] खातव्यवहारः २६३
अत्रोद्देशकः
वेदिः समचतुरश्रा साष्टभुजा हस्तनवकमूत्सेधः ।
घटिता तदिष्टकाभिः कतीष्टकाः कथय गणितज्ञ ॥ ४५½ ॥
अष्टकरसमत्रिकोणनवहस्तोत्सेधवेदिका रचिता ।
पूर्वेष्टकाभिरस्यां कतीष्टकाः कथय विगणय्य ॥ ४६½ ॥
समवृत्ताकृतिवेदिर्नवहस्तोर्ध्वा कराष्टकव्यासा
घटितेष्टकाभिरस्यां कतीष्टकाः कथय गणितज्ञ ॥ ४७½ ॥
आयतचतुरश्रस्य त्वायामः षष्टिरेव विस्तारः ।
पञ्चकृतिः षड् वेधस्तदिष्टकाचितिमिहाचक्ष्व ॥ ४८½ ॥
प्राकारस्य व्यासः सप्त चतुर्विंशतिस्तदायामः ।
घटितेष्टकाः कति स्युरुच्छ्रायो विंशतिस्तस्य ॥ ४९½ ॥
व्यासः प्राकारस्योर्ध्वे षडधोऽष्टाष्ट तीर्थका दीर्घः ।
घटितेष्टकाः कति स्युरुच्छ्रायो विंशतिस्तस्य ॥ ५०½ ॥
द्वादश षोडश विंशतिरुत्सेधाः सप्त षट् च पञ्चाधः ।
व्यासा मुखे चतुस्त्रिद्विकाश्चतुर्विंशतिर्दीर्घः ॥ ५१½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समचतुरश्र छेदवाली एक उठी हुई वेदी है, जिसकी भुजा का माप ८ हस्त और ऊँचाई ९ हस्त
है । वह वेदी ईंटों की बनी हुई है । हे गणितज्ञ, बतलाओ कि उसमें कितनी इष्टकाएँ हैं ? ॥ ४५½ ॥
समभुज त्रिभुज छेदवाली किसी वेदी की भुजा का माप ८ हस्त और ऊँचाई ९ हस्त है । यह
उपयुक्त ईंटों द्वारा बनाई गई है । गणनाकर बतलाओ कि इस संरचना में कितनी इष्टकाएँ हैं ? ॥४६½॥
वृत्ताकार छेदवाली एक वेदी जिसका व्यास ८ हस्त और ऊँचाई ९ हस्त है, उन्हीं ईंटों की
बनी है । हे गणितज्ञ, बतलाओ कि उसमें कितनी ईंटें हैं ? ॥ ४७½ ॥
आयताकार छेदवाली किसी वेदी के संदर्भ में लंबाई ६० हस्त, चौड़ाई २५ हस्त और ऊँचाई
६ हस्त है । उस ईंट के ढेर का माप बतलाओ ॥ ४८½ ॥
एक सीमारूप दीवाल मोटाई (व्यास) में ७ हस्त, लंबाई (आयाम) में २४ हस्त, ऊँचाई
(उच्छ्राय) में २० हस्त है । उसे बनाने में कितनी इष्टकाओं की आवश्यकता होगी ? ॥ ४९½ ॥
किसी सीमारूप दीवाल की मुटाई शिखर पर ६ हस्त और तली में ८ हस्त है । उसकी लंबाई
२४ हस्त और ऊँचाई २० हस्त है । उसे बनाने में कितनी इष्टकाओं की आवश्यकता होगी ? ॥ ५०½ ॥
किसी प्रवण (उतारवाली) वेदी के संबंध में ऊँचाइयाँ तीन स्थानों में क्रमशः १२, १६
और २० हस्त हैं; तली में चौड़ाई के माप क्रमशः ७, ६ और ५ तथा ऊपर ४, ३ और २ हस्त है;
लंबाई २४ हस्त है । ढेर में इष्टकाओं की संख्या बतलाओ ॥५१½॥
(५०½-५१½) दीवाल की घनाकार समाई प्राप्त करने के लिये उपर्युक्त ४ थे श्लोक के उत्तरार्द्ध में
दिये गये चित्रानुसार परिगणित औसत चौड़ाई को उपयोग में लाते हैं, इसलिये यहाँ कर्मान्तिक फल का
मान विचाराधीन हो जाता है ।
(५१½) यह प्रवण वेदी दो अंतों ( ends ) में दो ऊर्ध्वाधर (लंबरूप) समतलों द्वारा सीमित है ।
२६४ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. ५२½-
इष्टवेदिकायां पतितायां सत्यां स्थितस्थाने इष्टकासंख्यानयनस्य च पतितस्थाने इष्टका-
संख्यानयनस्य च सूत्रम्—
मुखतलशेषः पतितोत्सेधगुणः सकलवेधहृत्समुखः ।
मुखभूम्योर्भूमिमुखे पूर्वोक्तं करणमवशिष्टम् ॥ ५२½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादश दैर्घ्यं व्यासः पञ्चाध्वश्चोर्ध्वमेकमुत्सेधः ।
दश तस्मिन् पञ्च करा भग्नास्तत्रेष्टकाः कति स्युस्ताः ॥ ५३½ ॥
प्राकारे कर्णाकारेण भग्ने सति स्थितेष्टकानयनस्य च पतितेष्टकानयनस्य च सूत्रम्—
किसी पतित ( भग्न होकर गिरी हुई ) वेदी के संबंध में स्थित भाग में (शेष अपतित भाग में)
तथा पतित-भाग में ईंटों की संख्या अलग अलग निकालने के लिये नियम—
उपरी चौड़ाई और तली की चौड़ाई के अंतर को पतित भाग की ऊँचाई द्वारा गुणित करते हैं,
और पूर्ण ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल में उपरी चौड़ाई का मान जोड़ दिया
जाता है । यह पतित भाग के संबंध में आधारीय चौड़ाई का माप तथा अपतित भाग के संबंध में उपरी
चौड़ाई का माप उत्पन्न करता है । शेष क्रिया पहले वर्णित कर दी गई है ॥ ५२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वेदी के संबंध में लंबाई १२ हस्त है, तली में चौड़ाई ५ हस्त है; उपरी चौड़ाई १ हस्त है,
उपरी चौड़ाई १ हस्त है, और ऊँचाई सर्वत्र १० हस्त है । ५ हस्त ऊँचाई का भाग टूट कर गिर
जाता है । उस पतित और अपतित भाग में अलग-अलग कितनी ऐकिक इष्टकाएँ हैं ? ॥ ५३½ ॥
जब किले की दीवाल तिर्यक् रूप से टूटी हो, तब स्थित भाग में तथा पतित भाग में इष्टकाओं
की संख्या निकालने के लिये नियम—
शिखर और पार्श्व तल प्रवण ( ढालू ) हैं । ऊपरी अभिनत तल के उठे हुए अंत पर चौड़ाई २ हस्त है,
और दूसरे अंत पर चौड़ाई ४ हस्त है ( चित्र देखिये ) ।
(५२½) स्थित अपतित भाग की उपरी चौड़ाई
का माप जो वेदी के पतित भाग की नितल चौड़ाई के
समान है, बीजीय रूप से [(अ - ब) द / उ] + ब है, जहाँ तली
की चौड़ाई 'अ' और ऊपरी चौड़ाई 'ब' है, संपूर्ण ऊँचाई
'उ' है, और 'द' वेदी के पतित भाग की ऊँचाई है । यह सूत्र समरूप त्रिभुजों के गुणों द्वारा भी
सरलतापूर्वक शुद्ध सिद्ध किया जा सकता है । नियम में कथित क्रिया ऊपर गाथा ४ में पहिले ही
वर्णित की जा चुकी है ।
-८. ५६½ ] खातव्यवहारः २६५
भूमिमुखे द्विगुणे मुखभूमियुतेऽभग्नभूदययुतोने ।
दैर्घ्योदयषष्ठांशघ्ने स्थितपतितेष्टकाः क्रमेण स्युः ॥ ५४½ ॥
अत्रोद्देशकः
प्राकारोऽयं मूलान्मध्यावर्तेन चैकहस्तं गत्वा ।
कर्णीकृत्या भग्नः कतीष्टकाः स्युः स्थिताश्च पतिताः काः ॥ ५६½ ॥
तली की चौड़ाई और ऊपरी चौड़ाई में से प्रत्येक को दुगना किया जाता है । इनमें क्रमशः ऊपर
की चौड़ाई और तली की चौड़ाई जोड़ी जाती है । परिणामी राशियाँ, क्रमशः, अपतित भाग की दीवाल
की जमीन से ऊपर की ऊँचाई द्वारा बढ़ाई व घटाई जाती है; और इस प्रकार प्राप्त राशियाँ लंबाई द्वारा
तथा संपूर्ण ऊँचाई के १/६ भाग द्वारा गुणित की जाती हैं । इस प्रकार शेष अपतित भाग तथा पतित भाग
में क्रम से ईंटों की संख्याएँ प्राप्त होती हैं ॥ ५४½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पूर्वोक्त माप वाली यह किले की दीवाल चक्रवात वायु से टकराई जाकर तली से तिर्यक् रूप
से विकर्ण छेद पर टूट जाती है । इसके संबंध में, स्थित और पतित भाग की ईंटों की संख्याएँ क्या-
क्या हैं ? ॥ ५५½ ॥ वही ऊंची दीवाल चक्रवात वायु द्वारा तली से एक हस्त ऊपर से तिर्यक् रूप से
टूटी है । स्थित और पतित भाग की ईंटों की संख्याएं कौन-कौन हैं ॥ ५६½ ॥
(५४½) यदि तली की चौड़ाई 'अ' हो, ऊपर की चौड़ाई 'ब' हो, 'ऊ' कुल ऊँचाई हो और
दीवाल की लंबाई 'ल' हो, तथा 'द' जमीन से नापी गई अपतित दीवाल की ऊँचाई हो; तो
(ल ऊ / ६) ( २अ + ब + द ) और (ल ऊ / ६) ( २ब + अ - द ) राशियाँ स्थित भाग और पतित भाग
में ईंटों की संख्याओं का निरूपण करती हैं । इस सूत्र से मिलता जुलता प्रतिपादन चीनी ग्रंथ
च्यु-चांग सुआन-चु में हैं, जिसके विषय में कूलिज की अभ्युक्ति है, "यह विचित्र रूप से वर्णित ठोस
(solid) त्रिभुजाकार लंब समपार्श्व ( traingular
right prism ) का समच्छिन्नक है, और हमें यह
सूत्र प्राप्त होता है कि यह घनफल समपार्श्व के आधार
पर स्थित उन स्तूपों के योग के तुल्य होता है, जिनके
शिखर सम्मुख फलक ( face ) में होते हैं । यह
सबसे अधिक हृदय भंजक साध्यों में से एक है, जिन्हें
हम प्रारम्भिक ठोस ज्यामिति में पढ़ाते हैं । इसके
आविष्कार का श्रेय लेजान्ड्र ( Legendre ) को
दिया गया है"—J. L. Coolidge, A History of Geometrical Methods, p. 22,
Oxford, ( 1940 ). दी गई आकृति गाथा ( श्लोक ) ५६½ में कथित दीवाल को दर्शाती है;-और
क ख ग घ वह समतल है जिस पर से दीवाल टूटते समय भग्न होती है ।
ग० सा० सं०-३४
२६६ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. ५७½-
प्राकारमध्यप्रदेशोत्सेधे तरवृद्ध्यानयनस्य प्राकारस्य उभयपार्श्वयोः तरहानेरानयनस्य
च सूत्रम्—
इष्टेष्टकोदयहृतो वेधश्च तरप्रमाणमेकोनम् ।
मुखतलशेषेण हृतं फलमेव हि भवति तरहानिः ॥ ५७½ ॥
अत्रोद्देशकः
प्राकारस्य व्यासः सप्त तले विंशतिस्तदुत्सेधः ।
एकेनाग्रे घटितस्तरवृद्ध्यूने करोदयेष्टकया ॥ ५८½ ॥
समवृत्तायां वाप्यां व्यासचतुष्केऽर्धयुक्तकरभूमिः ।
घटितेष्टकाभिरभितस्तस्या वेधस्त्रयः काः स्युः ।
घटितेष्टकाः सखे मे विगणय्य ब्रूहि यदि वेत्सि ॥ ६० ॥
इष्टकाघटितस्थले अधस्तलव्यासे सति ऊर्ध्वतलव्यासे सति च गणितन्यायसूत्रम्—
द्विगुणनिवेशो व्यासायामयुतो द्विगुणितस्तदायामः ।
आयतचतुरश्रे स्यादुत्सेधव्याससंगुणितः ॥ ६१ ॥
किले की दीवाल की केन्द्रीय ऊँचाई के संबंध में ( ईंटों के ) तलों की बढ़ती हुई संख्या को
निकालने के लिए नियम, और नीचे से ऊपर की ओर जाते समय दीवाल की दोनों पाश्र्वों की चौड़ाई
में कमी होने से तलों की घटती ( की दर ) निकालने के लिए नियम--
केन्द्रीय छेद की ऊँचाई, दी गई इष्टका ( ईंट ) की ऊँचाई द्वारा भाजित होकर, इष्टकाओं की
तली का इष्ट माप उत्पन्न करती है । यह संख्या, एक द्वारा हासित होकर और तब ऊपरी चौड़ाई तथा
नीचे की चौड़ाई के अंतर द्वारा भाजित होकर, तलों के मान में ( in terms of layers ) मापी
गई चौड़ाई की घटती की दर ( rate ) के मान को उत्पन्न करती है ॥ ५७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी ऊँची किले की दीवाल की तली में चौड़ाई ७ हस्त है । उसकी ऊँचाई २० हस्त है ।
वह इस तरह से बनी हुई है कि ऊपर चौड़ाई १ हस्त रहे । १ हस्त ऊँची इष्टकाओं की सहायता से
केन्द्रीय ( तलों ) की वृद्धि तथा चौड़ाई की घटती ( की दर ) का माप बतलाओ ॥ ५८½ ॥
किसी समवृत्ताकार ४ हस्त व्यास वाली वापिका के चारों ओर १½ हस्त मोटी दीवाल
पूर्वोक्त ईंटों द्वारा बनाई जाती है । वापिका की गहराई ३ हस्त है । यदि तुम जानते हो, तो हे
मित्र, बतलाओ कि बनाने में कितनी ईंटें लगेंगी ? ॥ ५९½-६० ॥
किसी स्थान के चारों ओर बनी हुई संरचना की घनाकार समाई का मान निकालने के लिए
नियम, जब कि संरचना का अधस्तल व्यास और ऊर्ध्वतल व्यास दिया गया हो—
संरचना की औसत मुटाई की दुगनी राशि में दत्त व्यासायाम ( लंबाई एवं चौड़ाई ) का माप
जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग दुगना किया जाता है । परिणामी राशि संरचना की कुल
लंबाई होती है, जबकि वह आयताकार रूप में होती है । यह परिणामी राशि, दी गई ऊँचाई और
पूर्वोक्त औसत मुटाई से गुणित होकर, इष्ट घनफल का माप उत्पन्न करती है ॥ ६१ ॥
( ५९½-६० ) यहाँ पूर्वोक्त श्लोक ४३½ में कथित एकक इष्टका मानी गई है । यह प्रश्न श्लोक
५७½ में दिये गये नियम को निर्देशित नहीं करता है । उसे इस अध्याय के १९½-२०½ और ४४½ वें
श्लोकों के नियमानुसार साधित किया जाता है ।
खात-व्यवहार, चिति, क्रकच एवं छाया-व्यवहार उपसंहार
-८. ६४ ] खातव्यवहारः [ २६७
अत्रोद्देशकः
विद्याधरनगरस्य व्यासोऽष्टौ द्वादशैव चायामः ।
पञ्च प्राकारतले मुखे तदेकं दशोत्सेधः ॥ ६२ ॥
इति खातव्यवहारे चितिगणितं समाप्तम् ।
क्रकचिकव्यवहारः
इतः परं क्रकचिकाव्यवहारमुदाहरिष्यामः । तत्र परिभाषा—
हस्तद्वयं षडङ्गुलहीनं किष्काह्वयं भवति ।
इष्टायन्तच्छेदनसंख्यैव हि मार्गसंज्ञा स्यात् ॥ ६३ ॥
अथ शाकाख्यादिद्रुम समुदायेषु वक्ष्यमाणेषु ।
व्यासोदयमार्गाणामङ्गुलसंख्या परस्परघ्नाप्ता ॥ ६४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
विद्याधर नगर के नाम से ज्ञात स्थान के संबंध में चौड़ाई ८ है, और लंबाई १२ है । प्राकार
दीवाल की तली की मुटाई ५ और मुख में ( ऊपर की ) मुटाई १ है । उसकी ऊँचाई १० है । इस
दीवाल का घनफल क्या है ? ॥ ६२ ॥
इस प्रकार खात व्यवहार में चिति गणित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
क्रकचिका व्यवहार
इसके पश्चात् हम क्रकचिका 'व्यवहार ( लकड़ी चीरने वाले आरे से किए गये कर्म संबंधी
क्रियाओं ) का वर्णन करेंगे । पारिभाषिक शब्दों की परिभाषाः—
६ अंगुल से हीन दो हस्त, किष्कु कहलाता है । किसी दी गई लकड़ी को आरम्भ से लेकर
अंत तक छेदन ( काटने के रास्तों के माप ) की संख्या को मार्ग संज्ञा दी गई है ॥ ६३ ॥
तब कम से कम दो प्रकार की शाक ( teak ) आदि ( प्रकारों वाली ) लकड़ियों के ढेर के
संबंध में चौड़ाई नापने वाली अंगुलों की संख्या और लंबाई नापने वाली संख्या, तथा मार्गों को नापने
वाली संख्या, इन तीनों को आपस में गुणित किया जाता है । परिणामी गुणनफल हस्त अंगुलों की
संख्या के वर्ग द्वारा भाजित किया जाता है । क्रकचिका व्यवहार में यह पट्टिका नामक कार्य के माप
को उत्पन्न करता है । शाक ( teak-wood ) आदि ( प्रकारवाली ) लकड़ियों के संबंध में चौड़ाई
तथा लंबाई नापनेवाली हस्तो की संख्याएँ आपस में गुणित की जाती हैं । परिणामी गुणनफल
राशि मार्गों की संख्या द्वारा गुणित की जाती है, और तब ऊपर निकाली गई पट्टिकाओं की संख्या द्वारा
भाजित की जाती है । यह आरे के द्वारा किये गये कर्म का संख्यात्मक माप होता है ॥ ६४-६६ ॥
( ६३-६७ १/२ ) १ किष्कु = १ ३/४ हस्त । किसी लकड़ी के टुकड़े को चीरने में किसी इष्ट रास्ते
अथवा रेखा का नाम मार्ग दिया गया है । किसी लकड़ी के टुकड़े में काटे गये तल का विस्तार,
सामान्यतः उसे चीरने में किये गये काम का माप होता है, जब कि किसी विशिष्ट कठोरतावाली ( जिसे
कठोरता का एकक मान लिया हो ऐसी ) लकड़ी दी गई हो । काटे गये तल का यह विस्तार क्षेत्रफल के
२६८ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. ६५-
हस्ताङ्गुलवर्गेण क्राकचिके पट्टिकाप्रमाण स्यात् ।
शाकाह्वयद्रुमादिद्रुमेषु परिणाहदैर्घ्यहस्तानाम् ॥ ६५ ॥
संख्या परस्परघ्ना मार्गाणां संख्यया गुणिता ।
तत्पट्टिकासमाप्ता क्रकचकृता कर्मसंख्या स्यात् ॥ ६६ ॥
शाकार्जुनाम्लवेतससरलासितसर्जडुण्डुकाख्येषु ।
श्रीपर्णीप्लक्षाख्यद्रुमेष्वमीष्वेकमार्गस्य ।
षण्णवतिरङ्गुलानामायामः किष्कुरेव विस्तारः ॥ ६७ १/२ ॥
अत्रोद्देशकः
शाकाख्यतरौ दीर्घः षोडश हस्ताश्च विस्तारः ।
सार्धत्रयश्च मार्गाश्चाष्टौ कान्यत्र कर्माणि ॥ ६८ १/२ ॥
इति खातव्यवहारे क्रकचिकाव्यवहारः समाप्तः ।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ सप्तमः खातव्यवहारः समाप्तः ॥
पट्टिका के माप को प्राप्त करने के लिए, निम्नलिखित नाम वाले वृक्षों से प्राप्त लकड़ियों के संबंध
में प्रत्येक दशा में मार्ग १ होता है, लंबाई ९६ अंगुल होती है, और चौड़ाई १ किष्कु होती है; उन
वृक्षों के नाम ये हैं—शाक, अर्जुन, अम्लवेतस, सरल, असित, सर्ज और डुण्डुको, तथा श्रीपर्णी
और प्लक्ष ॥ ६७-६७ १/२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शाक लकड़ी के टुकड़े के संबंध में लंबाई १६ हस्त है, चौड़ाई ३ १/२ हस्त है और मार्ग
(अर्थात् चीरने वाले आरे के रास्तों की) संख्या ८ है । यहाँ आरे के काम के कितने एकक
(इकाइयाँ) कर्म (कार्य) पूर्ण हुआ है ? ॥ ६८ १/२ ॥
इस प्रकार खात व्यवहार में क्रकचिका व्यवहार नामक प्रकरण समाप्त हुआ । इस प्रकार महा-
वीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणितशास्त्र में खातव्यवहार नामक सप्तम व्यवहार समाप्त हुआ ।
विशेष एकक (इकाई) द्वारा मापा जाता है । यह एकक पट्टिका कहलाता है । पट्टिका लंबाई में ९६
अंगुल और चौड़ाई में १ किष्कु अथवा ४२ अंगुल होती है । यह सरलता पूर्वक देखा जा सकता है
कि इस प्रकार पट्टिका ७ वर्ग हाथ के बराबर होती है ।
९. छायाव्यवहारः
शान्तिर्जिनः शान्तिकरः प्रजानां जगत्प्रभुर्जातसमस्तभावः¹ ।
यः प्रातिहार्याष्टविवर्धमानो नमामि तं निर्जितशत्रुसंघम् ॥ १ ॥
आदौ प्राच्याद्यष्टदिक्साधनं प्रवक्ष्यामः—
सलिलोपरितलवत्स्थितसमभूतले लिखेद् वृत्तम् ।
बिम्बं स्वेच्छाशङ्कोर्द्विगुणितपरिणाहसूत्रेण ॥ २ ॥
तद्वृत्तमध्यस्थतदिष्टशङ्कोश्छाया दिनादौ च दिनान्तकाले ।
तद्वृत्तरेखां स्पृशति क्रमेण पश्चात्पुरस्ताच्च ककुप् प्रदिष्टा ॥ ३ ॥
तद्दिग्द्वयान्तर्गततन्तुना लिखेन्मत्स्याकृतिं याम्यकुबेरदिक्स्थाम् ।
तत्कोणमध्ये विदिशः प्रसाध्याश्छायैव याम्योत्तरदिग्दशार्धजाः ॥ ४ ॥
- M में तत्वः पाठ है ।
९. छाया व्यवहार ( छाया संबंधी गणित )
जो प्रजा को शांति कारक हैं ( शांति देने वाले हैं ), जगत्प्रभु हैं, समस्त पदार्थों को जाननेवाले
हैं, और अपने आठ प्रातिहार्यों द्वारा ( सदा ) वर्धमान ( महनीय ) अवस्था को प्राप्त हैं—ऐसे
( कर्म ) शत्रु संघ के विजेता श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
आदि में, हम प्राची ( पूर्व ) दिशा को आदि लेकर, आठ दिशाओं के साधन करने के लिए
उपाय बतलाते हैं—
पानी के ऊपरी सतह की भाँति, क्षैतिज समतल वाली समतल भूमि पर केन्द्र में स्थित स्वेच्छा
से चुनी हुई लंबाई वाली शंकु लेकर, उसकी लंबाई की द्विगुणित राशि की लंबाई वाले धागे के फन्दे
( loop ) की सहायता से एक वृत्त खींचना चाहिये ॥ २ ॥
इस केन्द्र में स्थित हुए शंकु की छाया दिन के आदि में तथा दिन के अन्त समय में उस वृत्त
की परिधि को स्पर्श करती है । इसके द्वारा, क्रम से, पश्चिम दिशा और पूर्व दिशा सूचित होती है ॥३॥
इन दो निश्चित की गई दिशाओं की रेखा में धागे को रखकर, उसके द्वारा उत्तर से दक्षिण
तक विस्तृत मत्स्याकार ( संतरे की कली के समान ) आकृति खींचना चाहिए । इस मत्स्याकृति
के कोणों के मध्य से जाने वाली सरल रेखा उत्तर और दक्षिण दिशाओं को सूचित करती है । इन
दिशाओं के मध्य में ( स्थित जगह में ) विदिशायें प्रसाधित की जाती हैं ॥ ४ ॥
( ४ ) वह धागा जिसकी सहायता से मत्स्याकार आकृति खींची जाती है, गाथा २ में दिये
२७० गणितसारसंग्रहः [ ९. ४½-
अजघटरविसंक्रमणद्युदलभैक्यार्धमेव विषुवद्भा ॥ ४½ ॥
लङ्कायां यवकोट्यां सिद्धपुरीरोमकापुर्योः ।
विषुवद्भा नास्त्येव त्रिंशद्घटिकं दिनं भवेत्तस्मात् ॥ ५½ ॥
देशेष्वितरेषु दिनं त्रिंशन्नाड्याधिकोनं स्यात् ।
मेषघटायनदिनयोस्त्रिंशद्घटिकं दिनं हि सर्वत्र ॥ ६½ ॥
दिनमानं दिनदलभां ज्योतिषशास्त्रोक्तमार्गेण ।
ज्ञात्वा छायागणितं विद्यादिह वक्ष्यमाणसूत्रौघैः ॥ ७½ ॥
विषुवच्छाया यत्रयत्र देशे नास्ति तत्रतत्र देशे इष्टशङ्कोरिष्टकालच्छायां ज्ञात्वा तत्काला-
नयनसूत्रम्—
छाया सैका द्विगुणा तया हृतं दिनमितं च पूर्वाह्ने ।
अपराह्वे तच्छेषं विज्ञेयं सारसंग्रहे गणिते ॥ ८½ ॥
विषुवद्भा ( अर्थात् जब दिन और रात दोनों बराबर होते हैं, उस समय पड़ने वाली छाया )
वास्तव में उन दिनों के मध्याह्न ( दोपहर ) समय प्राप्त छाया के मापों के योग की आधी होती है,
जब कि सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तथा जब वह तुला राशि में भी प्रवेश करता है ॥ ४½ ॥
लंका, यवकोटि, सिद्धपुरी और रोमकपुरी में ऐसी विषुवद्भा ( equinoctial shadow )
बिलकुल होती ही नहीं है; और इसलिए दिन ३० घटी का होता है ॥ ५½ ॥
अन्य प्रदेशों में दिन मान ३० घटी से अधिक या कम रहता है। जब सूर्य मेष राशि और
तुला ( घटायन ) राशि में प्रवेश करता है, तब सभी जगह दिन मान ३० घटी का होता है ॥ ६½ ॥
ज्योतिष शास्त्र में वर्णित विधि के अनुसार दिन का माप तथा दिन की मध्याह्न छाया का माप
समझ लेने के पश्चात्, छाया संबंधी गणित निम्नलिखित नियमों द्वारा सीखना चाहिए ॥ ७½ ॥
ऐसे स्थान के संबंध में दिन का वह समय निकालने के लिए नियम, जहाँ विषुवच्छाया नहीं
होती हो, तथा किसी दिये गये समय पर ( दोपहर के पहिले अथवा पश्चात् ) किसी दिये गये शंकु की
छाया का माप ज्ञात हो—
किसी वस्तु ( शंकु ) की ऊँचाई के पदों में व्यक्त छाया के माप में एक जोड़ा जाता है, और इस
प्रकार परिणामी योग दुगुना किया जाता है। परिणामी राशि द्वारा पूर्ण दिनमान भाजित किया जाता
है। यह समझना चाहिये कि सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र के अनुसार, यह प्राप्त फल पूर्वाह्न
और अपराह्न के शेष भागों ( अथवा दोपहर के पहिले दिन के बीते हुए भाग और दोपहर के
पश्चात् दिन के शेष रहने वाले भाग ) को उत्पन्न करता है ॥ ८½ ॥
गये त्रिज्या की माप में कुछ अधिक लंबाई वाला होना चाहिये । यदि 'क पू'
और 'क प' पार्श्व आकृति में क्रमशः पूर्व और पश्चिम दिशा निरूपित
करते हों, तो आकृति उ ख द ग, क्रमशः पू और प को केन्द्र मान कर
और पू ग, तथा प ख त्रिज्याएं लेकर चाप खींचने से प्राप्त होती हैं,
जब कि पू ग और प ख आपस में बराबर हों । भुजा उद जो पूर्वोक्त आकृति
के कोण का अर्धन करती है, क्रमशः उत्तर और दक्षिण दिशा का निरूपण
करती है ।
( ८½ ) यदि वस्तु की ऊँचाई उ है, और उसकी छाया की लंबाई छ है, तो दिन का बीता हुआ
—९. १२½ ] छायाव्यवहारः २७१
अत्रोद्देशकः
पूर्वाह्ने पौरुषी छाया त्रिगुणा वद किं गतम् ।
अपराह्णेऽवशेषं च दिनस्यांशं वद प्रिय ॥ ९½ ॥
दिनांशे जाते सति घटिकानयनसूत्रम्—
अंशहृतं दिनमानं छेदविभक्तं दिनांशके जाते ।
पूर्वाह्ने गतनाड्यस्त्वपराह्ने शेषनाड्यस्तु ॥ १०½ ॥
अत्रोद्देशकः
विषुवच्छायाविरहितदेशेऽष्टांशो दिनस्य गतः ।
शेषश्चाष्टांशः का घटिकाः स्युः खाग्निनाड्योऽहः ॥ ११½ ॥
मल्लयुद्धकालानयनसूत्रम्—
कालानयनाद्दिनगतशेषसमासोनितः कालः ।
स्तम्भच्छाया स्तम्भप्रमाणभक्तैव पौरुषी छाया ॥ १२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य की छाया उसकी ऊँचाई से ३ गुनी है । हे प्रिय मित्र, बतलाओ कि पूर्वाह्न में
बीते हुए दिन का भाग एवं अपराह्न में शेष रहने वाला दिन का भाग क्या है ? ॥ ९½ ॥
दिन का भाग ( जो बीत चुका है, या बीतने वाला है ) प्राप्त हो चुकने पर घटिकाओं की
संवादी संख्या को निकालने के लिये नियम—
दिन मान के ज्ञात माप को, ( पहिले ही प्राप्त ) दिन के बीते हुए अथवा बीतने वाले भाग
का निरूपण करने वाले भिन्न के अंश द्वारा गुणित करने और हर द्वारा भाजित करने से, पूर्वाह्न के
संबंध में बीती हुईं घटिकाएँ और अपराह्न के संबंध में बीतने वाली घटिकाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ १०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ऐसे प्रदेश में जहाँ विषुवच्छाया नहीं होती, दिन १/८ भाग बीत गया है, अथवा अपराह्न के संबंध
में शेष रहने वाला दिन का भाग १/८ है । इस १/८ भाग की संवादी घटिकाएँ क्या हैं ? दिन में ३०
घटिकाएं मान ली गई हैं ॥ ११½ ॥
मल्लयुद्ध काल निकालने के लिए नियम—
जब दिन के बीते हुए भाग तथा बीतने वाले भाग के योग द्वारा दिन की अवधि हासित कर,
उसे घटिकाओं में परिवर्तित किया जाता है, तब इष्ट समय उत्पन्न होता है ।
अथवा बीतनेवाला समय ( नियमानुसार ) यह है—
१ १
───────────── अथवा ────────────────── ,
/ छ \ २ ( कोस्पआ + १ )
२ ( ─ + २ )
\ उ /
[चित्र: समकोण त्रिभुज — शीर्ष 'सा', समकोण '० बा', न्यूनकोण 'आ', लम्ब 'उ', आधार 'छ']
जहाँ कोण आ उस समय पर सूर्य का ऊँचाई निरूपक कोण है । यह
सूत्र केवल आ = ४५°, छोड़कर आ के शेष मानों के लिये सन्निकट दिन
का समय देता है । जब यह कोण ९०° के निकटतर पहुँचता है, तब सन्निकट
दिन का समय और भी गलत होता जाता है । यह सूत्र इस तथ्य पर आधारित
है कि किसी समकोण त्रिभुज में छोटे मानों के लिए कोण सन्निकटतः सम्मुख भुजाओं के समानुपाती होते हैं ।
२७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. १३½-
अत्रोद्देशकः
पूर्वाह्णे शङ्कुसमच्छायायां मल्लयुद्धमारब्धम् ।
अपराह्णे द्विगुणायां समाप्तिरासीच्च युद्धकालः कः ॥ १३½ ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
द्वादशहस्तस्तम्भच्छाया चतुरुत्तरैव विंशतिका ।
तत्काले पौरुषिकच्छाया कियती भवेद्गणक ॥ १४½ ॥
विषुवच्छायायुक्ते देशे इष्टच्छायां ज्ञात्वा कालानयनस्य सूत्रम्¹—
शङ्कुयुतेष्टच्छाया मध्यच्छायोनिता द्विगुणा ।
तदवाप्ता शङ्कुमितिः पूर्वापरयोर्दिनांशः स्यात् ॥ १५½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्द्युदलच्छायाङ्गुलद्वयी ।
इष्टच्छायाष्टाङ्गुलिका दिनांशः को गतः स्थितः ।
त्र्यंशो दिनांशो घटिकाः कास्त्रिशन्नाडिकं दिनम् ॥ १७ ॥
- किसी भी हस्तलिपि में प्राप्य नहीं है ।
किसी स्तम्भ की छाया के माप को स्तंभ की ऊँचाई द्वारा भाजित करने पर पौरुषी छाया माप
( उस मनुष्य की छाया का माप उसकी निज की ऊँचाई के पदों में ) प्राप्त होता है ॥ १२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई मल्लयुद्ध पूर्वाह्न में आरम्भ हुआ, जब कि किसी शंकु की छाया उसी शंकु के माप के तुल्य
थी । उस युद्ध का निर्णय अपराह्न में हुआ, जबकि उसी शंकु की छाया का माप शंकु के माप से दुगुना
था । बतलाओ कि यह युद्ध कितने समय तक चला ? ॥ १३½ ॥
श्लोक के उत्तरार्ध नियम के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी १२ हस्त ऊँचाई वाले स्तंभ की छाया माप में २४ हस्त है । उस समय, हे अंकगणि-
तज्ञ, मनुष्य की छाया का माप क्या होगा ? ॥ १४½ ॥
जब किसी भी समय पर छाया का माप ज्ञात हो, तब विषुवच्छाया वाले स्थानों में बीते हुए
अथवा बीतने वाले दिन के भाग को प्राप्त करने के लिये नियम —
शंकु की ज्ञात छाया के माप में शंकु का माप जोड़ा जाता है । यह योग विषुवच्छाया के माप
द्वारा ह्रासित किया जाता है, और परिणामी अंतर को दुगुना कर दिया जाता है । जब शंकु का माप
इस परिणामी राशि द्वारा भाजित किया जाता है, तब दशानुसार पूर्वाह्न में दिन में बीते हुए अथवा
अपराह्न में दिन में बीतने वाले दिनांश का मान उत्पन्न होता है ॥ १५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१२ अंगुल के शंकु के संबंध में विषुवच्छाया दोपहर के समय ( दिन के मध्याह्न में ) २
अंगुल है, और अवलोकन के समय इष्ट ( ज्ञात ) छाया ८ अंगुल है । दिन का कौनसा भाग बीत गया
है, और कौनसा भाग शेष रहा है ? यदि दिन का बीता हुआ भाग अथवा बीतने वाला भाग १/३ है,
तो उसकी संवादी घटिकाएँ क्या हैं, जबकि दिन ३० घटियों का होता है ॥ १६½-१७ ॥
( १५½ ) यहाँ दिन के समय के माप के लिये दिया गया सूत्र बीजीय रूप से, उ / [ २ (छ + उ - व) ]
-९. २० ] छायाव्यवहारः [ २७३
इष्टनाडिकानां छायानयनसूत्रम्—
द्विगुणितदिनभागहृता शङ्कुमितिः शङ्कुमानोना ।
यद्दलच्छ्छायायुक्ता छाया तत्स्वेष्टकालिका भवति ॥ १८ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्यद्दलच्छायाऽङ्गुलद्वयी ।
दशानां घटिकानां भा का छिन्नादिकं दिनम् ॥ १९ ॥ '
पादच्छायालक्षणे पुरुषस्य पादप्रमाणस्य परिभाषासूत्रम्—
पुरुषोन्नतिसप्तांशस्तत्पुरुषाङ्घ्रेस्तु दैर्घ्यं स्यात् ।
यद्येवं चेत्पुरुषः स भाग्यवानङ्घ्रिभा स्पष्टा ॥ २० ॥
आरूढच्छायायाः संख्यानयनसूत्रम्—
घटियों में दिए गये दिन के समय की संवादी छाया का माप निकालने के नियम—
शंकु ( style ) का माप दिन के दिये गये भाग के माप की दुगुनी राशि द्वारा भाजित किया
जाता है । परिणामी भजनफल में से शंकु का माप घटाया जाता है, और उसमें विषुवच्छाया ( दोपहर
के समय की ऐसे स्थान की छाया, जहाँ दिन रात तुल्य होते हैं ) का माप जोड़ दिया जाता है । यह
दिन के इष्ट समय पर छाया का माप उत्पन्न करता है ॥ १८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि, किसी १२ अंगुल वाले शंकु के संबंध में, द्युदलच्छाया ( विषुवच्छाया ) २ अंगुल हो, तो
जब १० घटी दिन बीत चुका हो अथवा बीतने वाला हो उस समय शंकु की छाया का माप क्या है ?
दिन का मान ३० घटियाँ होता है ॥ १९ ॥
छाया के पाद प्रमाण माप के द्वारा लिए गये मापों संबंधी मनुष्य के पाद माप की परिभाषा—
किसी मनुष्य की ऊँचाई के १/७ भाग के तुल्य उसके पाद की लंबाई होती है । यदि ऐसा
हो, तो वह मनुष्य भाग्यशाली होगा । इस प्रकार पाद प्रमाण से नापी गई छाया का माप
स्पष्ट है ॥ २० ॥
ऊर्ध्वाधर दीवाल पर आरूढ़ छाया का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—
है, जहाँ 'व' शंकु की विषुवच्छाया की लंबाई है । यह सूत्र ऊपर की गाथा ८½ में दिये गये सूत्र की पाद
टिप्पणी पर आधारित है ।
( १८ ) बीजीय रूप से,
छ = उ / २घ - उ + व, जहाँ घ, दिन के समय का माप घटी में दिया गया है । यह सूत्र श्लोक°
१५½ वें की पाद टिप्पणी में दिये गये सूत्र से प्राप्त होता है ।
ग० सा० सं०-३५
२७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २१-
नृच्छायाहतशङ्कुर्भित्तिस्तम्भान्तरोनितो भक्तः ।
नृच्छाययैव लब्धं शङ्कोर्भित्त्याश्रितच्छाया ॥ २१ ॥
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भो भित्तिस्तम्भान्तरं करा अष्टौ ।
पुरुषच्छाया द्विघ्ना भित्तिगता स्तम्भभा किं स्यात् ॥ २२ ॥
स्तम्भप्रमाणं च भित्त्यारूढस्तम्भच्छायासंख्यां च ज्ञात्वा भित्तिस्तम्भान्तरसंख्यानयन-
सूत्रम्—
पुरुषच्छायानिघ्नं स्तम्भारूढान्तरं तयोर्मध्यम् ।
स्तम्भारूढान्तरहृततदन्तरं पौरुषी छाया ॥ २३ ॥
शंकु की ऊँचाई ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मनुष्य की छाया द्वारा गुणित की
जाती है । परिणामी गुणनफल दीवाल और शंकु के बीच की दूरी के माप द्वारा हासित किया जाता
है । इस प्रकार प्राप्त अंतर मनुष्य की उपर्युक्त छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार
प्राप्त भजनफल शंकु की छाया के उस भाग का माप होता है जो दीवाल पर आरूढ़ है ॥ २१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ २० हस्त ऊँचा है । इस स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी ( जो छाया रेखानुसार
नापी जाती है ) ८ हस्त है । उस समय मनुष्य की छाया मनुष्य की ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की
छाया का वह कौन-सा भाग है जो दीवाल पर आरूढ़ है ? ॥ २२ ॥
जब दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया का संख्यात्मक मान तथा स्तंभ की ऊँचाई, दोनों
ज्ञात हों, तब दीवाल और स्तंभ के अंतर ( बीच की दूरी ) के माप के संख्यात्मक मान को निकालने
के लिये नियम—
स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया के माप का अंतर ( मनुष्य की
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) पुरुष की छाया के माप द्वारा गुणित होकर, उक्त स्तंभ और दीवाल के अंतर
की माप को उत्पन्न करता है । इस अंतर का मान, स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ (पड़ी हुई)
छायांश माप के अंतर द्वारा भाजित किया जाने पर, ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया
का माप उत्पन्न करता है ॥ २३ ॥
( २१ ) बीजीय रूप से,
अ = (उ × ब - स) / ब , जहाँ उ शंकु की ऊँचाई है,
अ दीवाल पर आरूढ़ छाया की ऊँचाई के पदों में व्यक्त
मनुष्य की छाया का माप है, और स स्तंभ ( शंकु ) और
दीवाल के बीच की दूरी है । नियम का स्पष्टीकरण पार्श्व में
दिये गये चित्र द्वारा हो जाता है । यह बात ध्यान में रखने
- योग्य है कि यहाँ स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी छाया रेखा पर ही नापी जाना चाहिए ।
( २३ और २६ ) इस नियम तथा २६ वीं गाथा के नियम में २१ वीं गाथा में दिये गये उदाहरणों
की विलोम दशा का उल्लेख है ।
-९. २७ ] छायाव्यवहारः २७५
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
द्विगुणा पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं किं स्यात् ॥ २४ ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
कियती पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २५ ॥
आरूढच्छायायाः संख्यां च भित्तिस्तम्भान्तरभूमिसंख्यां च पुरुषच्छायायाः संख्यां
च ज्ञात्वा स्तम्भप्रमाणसंख्यानयनसूत्रम्—
नृच्छायाघ्नारूढा भित्तिस्तम्भान्तरेण संयुक्ता ।
पौरुषभाहृतलब्धं विदुः प्रमाणं बुधाः स्तम्भे ॥ २६ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडश भित्त्यारूढच्छाया द्विगुणैव पौरुषी छाया ।
स्तम्भोत्सेधः कः स्याद्भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक स्तंभ २० हस्त ऊँचा है, और दीवाल पर पड़ने वाली छाया के अंश का माप (ऊँचाई)
१६ हस्त है। उस समय पुरुष की छाया पौरुषी ऊँचाई से दुगुनी है। स्तंभ और दीवाल के अंतर
का माप क्या हो सकता है ? ॥ २४ ॥
नियम के उत्तरार्द्ध भाग के लिए उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ ऊँचाई में २० हस्त है, और दीवाल पर पड़ने वाली उसकी छाया की ऊँचाई १६
है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है । पौरुषी ऊँचाई के प्रमाण द्वारा व्यक्त मानवी छाया का
माप क्या है ? ॥ २५ ॥
जब दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग की ऊँचाई का संख्यात्मक मान, उस स्तंभ तथा
दीवाल का अंतर, और मानुषी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानुषी छाया का माप भी ज्ञात हो, तब स्तंभ
की ऊँचाई का संख्यात्मक मान निकालने के लिये नियम—
दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग का माप, मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया
के माप द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल में स्तंभ और दीवाल के अंतर (बीच की दूरी)
का माप जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग को मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया के
माप द्वारा भाजित करने से जो भजनफल प्राप्त होता है वह बुद्धिमानों के द्वारा स्तंभ की ऊँचाई का
माप कहा जाता है ॥ २६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दीवाल पर स्तंभ की छाया पड़ने वाला भाग १६ हस्त है । उस समय मानवी छाया का मान
मानवी ऊँचाई से दुगुना है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है। स्तंभ की ऊँचाई क्या है ? ॥२७॥
२७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २८-
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु सैकपौरुष्या ।
भक्तं शङ्कुमितिः स्याच्छङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं हि ॥ २८ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु पञ्चाशत् ।
शङ्कूतसेधः कः स्याच्चतुर्गुणा पौरुषी छाया ॥ २९ ॥
शङ्कुच्छायापुरुषच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुन्नरच्छायायुतिर्विभाजिता शङ्कुसैकमानेन ।
लब्धं पुरुषच्छाया शङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं स्यात् ॥ ३० ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कोरूत्सेधो दश नृच्छायाशङ्कुभामिश्रम् ।
पञ्चोत्तरपञ्चाशन्नृच्छाया भवति कियती च ॥ ३१ ॥
शंकु की ऊँचाई तथा शंकु की छाया की लंबाई के मापों के दत्त मिश्रित योग में से उन्हें
अलग-अलग निकालने के लिए नियम—
शंकु के माप और उसकी छाया के माप के मिश्रित योग को जब १ द्वारा बढ़ाये गये ( मानवी
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के माप द्वारा भाजित करते हैं, तब शंकु की ऊँचाई का माप
प्राप्त होता है । दिये गये योग को शंकु के इस माप द्वारा हासित करने पर शंकु की छाया का माप
प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु के ऊँचाई माप और उसकी छाया के लंबाई माप का योग ५० है । शंकु की ऊँचाई क्या
होगी, जबकि मानवी छाया उस समय मानवी ऊँचाई की चौगुनी है ? ॥ २९ ॥
शंकु की छाया की लम्बाई के माप और ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के
मापके मिश्रित योग में से उन्हें अलग-अलग प्राप्त करने के लिए नियम—
शंकु की छाया तथा मनुष्य की छाया के मापों के मिश्रित योग को एक द्वारा बढ़ाई गई शंकु
की ज्ञात ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । इस प्रकार प्राप्त भजनफल ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त )
मानवी छाया का माप होता है । उपर्युक्त मिश्रित योग जब मानवी छाया के इस माप द्वारा हासित
किया जाता है, तब शंकु की छाया की लंबाई का माप उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु की ऊँचाई १० है । ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया और शंकु
की छाया के मापों का योग ५५ है । मानवी छाया तथा शंकु की छाया की लंबाई क्या-क्या हैं ? ॥ ३१॥
(२८ और ३०) यहाँ दिये गये नियम गाथा १२½ के उत्तरार्द्ध में कथित नियम पर आधारित हैं ।
- ९. ३४ ] छायाव्यवहारः [ २७७
स्तम्भस्य अवनतिसंख्यानयनसूत्रम्—
छायावर्गोच्छोध्या नरभाकृतिगुणितशङ्कुकृतिः ।
सैकनरच्छायाकृतिगुणिता छायाकृतेः शोध्या ॥ ३२ ॥
तन्मूलं छायायां शोध्यं नरभानवर्गरूपेण¹ ।
भागं हृत्वा लब्धं स्तम्भस्यावनतिरेव स्यात् ॥ ३३ ॥
अत्रोद्देशकः
द्विगुणा पुरुषच्छाया त्र्युत्तरदशहस्तशङ्कोर्भा ।
एकोनत्रिंशत्सा स्तम्भावनतिश्च का तत्र ॥ ३४ ॥
१. हस्तलिपि में नरभान के लिए नृभावर्ग पाठ है; परन्तु वह छंद की दृष्टि से अशुद्ध है ।
किसी स्तंभ अथवा ऊर्ध्वाधर शंकु की अवनति (झुकाव) के माप को निकालने के लिए नियम—
मानवी छाया के वर्ग और शंकु की ऊँचाई के वर्ग के गुणनफल को दी गई छाया के वर्ग में
घटाया जाता है । यह शेष, मानवी छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा गुणित
किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि दी गई छाया के वर्ग में से घटायी जाती है । परिणामी शेष
के वर्गमूल को छाया के दिये गये माप में से घटाया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को जब मानवी
छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा भाजित किया जाता है, तब स्तंभ की शुद्ध
अवनति ( झुकाव ) का माप प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की छाया २९ हस्त है, और
स्तंभ की ऊँचाई १३ हस्त है । यहाँ स्तंभ की अवनति का माप क्या है ? ॥ ३४ ॥ प्रासाद के भीतर
( ३२-३३ ) मानलो अवनत ( झुके हुए ) स्तंभ की
स्थिति अ ब द्वारा निरूपित है । मानलो वही स्तंभ ऊर्ध्वाधर ( लंब-
रूप ) स्थिति में अ द द्वारा निरूपित है । क्रमशः अ स तथा अ इ
उनकी छाया हैं । तब उस समय मानव की छाया और उसकी
ऊँचाई का अनुपात अ इ / अ द होगी । मानलो यह अनुपात र के बराबर
है । ब से अद पर गिराया गया लंब ब ग अवनत स्तंभ अ ब की
अवनति निरूपित करता है । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि
√( (अ ब)² - (ब ग)² ) / (अ स - ब ग) = अ द / अ इ = १ / र । इससे यह देखा जा सकता है कि
ब ग = [ अ स - √( (अ स)² - { (अ स)² - (अ ब)² × र² } ( र² + १ ) ) ] / ( र² + १ ) ।
यहाँ दिया गया नियम इसी सूत्र के रूप में प्ररूपित होता है ।
२७८ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ३५-
कश्चिद्राजकुमारः प्रासादाभ्यन्तरस्थःसन् ।
पूर्वाह्ने जिज्ञासुर्दिनगतकालं नरच्छायाम् ॥ ३५ ॥
द्वात्रिंशद्धस्तोर्ध्वे जाले प्राग्भित्तिमध्य आयाता ।
रविभा पश्चाद्भित्तौ व्यकत्रिंशत्करोर्ध्वदेशस्था ॥ ३६ ॥
तद्भित्तिद्वयमध्यं चतुरुत्तरविंशतिः करास्तस्मिन् ।
काले दिनगतकालं नृच्छायां गणक विगणय्य ।
कथयच्छायागणिते यद्यस्ति परिश्रमस्तव चेत् ॥ ३७½ ॥
समचतुरश्रायां दशहस्तघनायां नरच्छाया ।
पुरुषोत्सेधद्विगुणा पूर्वाह्ने प्राक्तटच्छाया ॥ ३८½ ॥
तस्मिन् काले पश्चात्तटाश्रिता का भवेद्गणक ।
आरूढच्छायाया आनयनं वेत्सि चेत्कथय ॥ ३९½ ॥
शङ्कोर्दीपच्छायानयनसूत्रम्—
शङ्कूनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहृतं शङ्कोः प्रदीपशङ्क्वन्तरं छाया ॥ ४०½ ॥
ठहरा हुआ कोई राजकुमार पूर्वाह्न दिन में बीते हुए समय को ज्ञात करने का, तथा (मानवी ऊँचाई के
पदों में व्यक्त) मानवी छाया के माप को ज्ञात करने का इच्छुक था । तब सूर्य की रश्मि पूर्व की
ओर की दीवाल के मध्य में ३२ हस्त ऊँचाई पर स्थित खिड़की में से आकर, पश्चिम ओर की दीवाल
पर २९ हस्त की ऊँचाई तक पड़ी । उन दो दीवालों का अंतर २४ हस्त है । हे छाया प्रश्नों से भिज्ञ
गणितज्ञ, यदि तुमने छाया-प्रश्नों (से परिचित होने) में परिश्रम किया हो, तो (उस दिन) बीते
हुए दिन के समय का माप और उस समय (मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया का
माप बतलाओ ॥ ३५-३७½ ॥
पूर्वाह्न समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । प्रत्येक विमिति में (dimension)
१० हस्त वाले वर्गाकार छेद के ऊर्ध्वाधर खात के संबंध में पूर्वी दीवाल से उत्पन्न, पश्चिमी दीवाल
पर पड़ने वाली की ऊँचाई क्या होगी ? हे गणितज्ञ, यदि जानते हो, तो बतलाओ की लंबरूप दीवाल
पर आरूढ छाया छाया का माप कितना होगा ? ॥ ३८½-३९½ ॥
किसी दीवाल के प्रकाश के कारण उत्पन्न होनेवाली शंकु की छाया को निकालने के लिये नियम:—
शंकु की ऊँचाई द्वारा हासित दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करना
चाहिये । यदि इस प्रकार प्राप्त भजनफल के द्वारा दीपक और शंकु के बीच की क्षैतिज दूरी को भाजित
किया जाय तो शंकु की छाया का माप उत्पन्न होता है ॥ ४०½ ॥
(३५-३७½) यह प्रश्न श्लोकों ८½ और २३ में दिये गये नियमों के विषय में है ।
(३८½-३९½) यह प्रश्न श्लोक २१ में दिये गये नियमानुसार हल किया जाता है ।
(४०½) बीजीय रूप से कथित नियम यह है:—छ = स ÷ (ब - अ)/अ , जहाँ 'छ' शंकु की छाया का
-९. ४४ ] छायाव्यवहारः [ २७९
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रदीपयोर्मध्यं षण्णवत्यङ्गुलानि हि ।
द्वादशाङ्गुलशङ्कोस्तु दीपच्छायां वदाशु मे षष्टिर्दीपशिखोत्सेधो गणितार्णवपारग ॥ ४२ ॥
दीपशङ्क्वन्तरानयनसूत्रम्—
शङ्कुनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहता शङ्कुच्छाया शङ्कुप्रदीपमध्यं स्यात् ॥ ४३ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छायाङ्गुलान्यष्टौ षष्टिर्दीपशिखोदयः ।
शङ्कुदीपान्तरं ब्रूहि गणितार्णवपारग ॥ ४४ ॥
दीपोन्नतिसंख्यानयनसूत्रम्—
————————————————————————————————————————————————
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु और दीपक की क्षैतिज दूरी वास्तव में ९६ अंगुल है । दीपक की लौ की ऊँचाई
जमीन से ६० अंगुल है । हे गणितार्णव (गणित समुद्र) के पारगामी, मुझे शीघ्र ही १२ अंगुल
ऊँचे शंकु के संबंध में दीपक की लौ के कारण उत्पन्न होने वाली छाया का माप बतलाओ ॥ ४१½-४२ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर को प्राप्त करने के लिए नियम—
(जमीन से) दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा ह्रासित किया जाता है । परिणामी
राशि को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । शंकु की छाया के माप को, इस प्रकार प्राप्त भजनफल
द्वारा गुणित करने पर, दीपक और शंकु का क्षैतिज अंतर प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई ८ अंगुल है । दीप शिखा (दीपक की लौ) की (जमीन से)
ऊँचाई ६० अंगुल है । हे गणितार्णव के पारगामी, दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को
बतलाओ ॥ ४४ ॥
दीपक की (जमीन से ऊपर की) ऊँचाई के संख्यात्मक माप को प्राप्त करने के लिये नियम--
————————————————————————————————————————————————
माप है, 'अ' शंकु की ऊँचाई का माप है, ब' दीपक की ऊँचाई का माप है,
और 'स' दीपक तथा शंकु के बीच का क्षैतिज अंतर है ।
यह सूत्र पार्श्व में दी गई आकृति से स्पष्ट रूप से सिद्ध किया जा
सकता है ।
(४३) पिछली टिप्पणी में उपयोग में लाये गये प्रतीकों को ही उप-
योग में लाकर, इस नियमानुसार स = छ × (ब - अ) / अ होता है ।
(४४) अगले ४६-४७ वें श्लोकों के अनुसार शंकु की ऊँचाई का दिया गया माप १२
अंगुल है ।
२८० ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ४५-
शङ्कुच्छायाभक्तं प्रदीपशङ्क्वन्तरं सैकम् ।
शङ्कुप्रमाणगुणितं लब्धं दीपोन्नतिर्भवति ॥ ४५ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छाया द्विनिघ्नैव द्विशतं शङ्कुदीपयोः ।
अन्तरं ह्यङ्गुलान्यत्र का दीपस्य समुन्नतिः ॥ ४६ ॥
शंकुप्रमाणमत्रापि द्वादशाङ्गुलकं गते ।
ज्ञात्वोदाहरणे सम्यग्विद्यात्सूत्रार्थपद्धतिम् ॥ ४७ ॥
पुरुषस्य पादच्छायां च तत्पादप्रमाणेन वृक्षच्छायां च ज्ञात्वा वृक्षोन्नतेः संख्यानयनस्य
च, वृक्षोन्नतिसंख्यां च पुरुषस्य पादच्छायायाः सङ्ख्यानयनस्य च सूत्रम्—
स्वच्छायया भक्तनिजेष्टवृक्षच्छाया पुनस्सप्तभिराहता सा ।
वृक्षोन्नतिः साद्रिहृता स्वपादच्छायाहता स्याद्द्रुमभैव नूनम् ॥ ४८ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को, शंकु की छाया द्वारा भाजित किया जाता है ।
तब इस परिणामी भजनफल में एक जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि जब शंकु की ऊँचाई के
माप द्वारा गुणित की जाती है, तब दीपक की ( जमीन से ऊपर की ) ऊँचाई का माप उत्पन्न
होता है ॥ ४५ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई उसकी ऊँचाई से दुगुनी है । दीपक और शंकु की क्षैतिज दूरी का
माप २०० अंगुल है । इस दशा में दीपक की जमीन से ऊँचाई कितनी है ? इसी तथा गत प्रश्न में
शंकु की ऊँचाई १२ अंगुल लेकर नियम के साधन का अर्थ भलीभाँति सीख लेना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥
जब मनुष्य की ( पाद प्रमाण में दी गई ) छाया की लंबाई का माप तथा ( उसी पाद प्रमाण
में दी गई ) वृक्ष की छाया की लंबाई का माप ज्ञात हों, तब उस वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप निकालने के लिए नियम; साथ ही जब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप तथा मनुष्य की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप ज्ञात हो, तब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष
की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—
किसी व्यक्ति द्वारा चुने गये वृक्ष की छाया की लंबाई के माप को निज पाद प्रमाण में नापी
गई उसकी निज की छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इससे वृक्ष की ऊँचाई प्राप्त होती है ।
यह वृक्ष की ऊँचाई ७ द्वारा भाजित होकर और निज पाद प्रमाण में नापी गई निज की छाया द्वारा
गुणित होकर, निःसन्देह, वृक्ष की छाया की शुद्ध लंबाई के माप को उत्पन्न करती है ॥ ४८ ॥
( ४५ ) इसी प्रकार, ब = ( स/छ + १ ) अ
( ४८ ) यह नियम उपर्युक्त १२½ वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में दिये गये नियम की विलोम दशा है ।
यहाँ दिये गये नियम में मनुष्य की ऊँचाई और उसके पाद माप के बीच का संबंध उपयोग में लाया
गया है ।
-९. ५२ ½ ] छायाव्यवहारः [ २८१
अत्रोद्देशकः
आत्मच्छाया चतुःपादा वृक्षच्छाया शतं पदाम् ।
वृक्षोच्छ्रायः को भवेत्स्वपादमानेन तं वद ॥ ४९ ॥
वृक्षच्छायायाः संख्यानयनोदाहरणम्—
आत्मच्छाया चतुःपादा पञ्चसप्ततिभिर्युतम् ।
शतं वृक्षोन्नतिर्वृक्षच्छाया स्यात्कियती तदा ॥ ५० ॥
पुरतो योजनान्यष्टौ गत्वा शैलो दशोदयः ।
स्थितः पुरे च गत्वान्यो योजनाशीतितस्ततः ॥ ५१ ॥
तदग्रस्थाः प्रदृश्यन्ते दीपा रात्रौ पुरे स्थितैः ।
पुरमध्यस्थशैलस्यच्छाया पूर्वांगमूलयुक् ।
अस्य शैलस्य वेधः को गणकाशु प्रकथ्यताम् ॥ ५२ ½ ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ छायाव्यवहारो नाम अष्टमः समाप्तः ॥
॥ समाप्तोऽयं सारसंग्रहः ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
पाद माप में निज की छाया की लम्बाई ४ है । ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की छाया की
लम्बाई १०० है । बतलाओ कि ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की ऊँचाई क्या है ? ॥ ४९ ॥
किसी वृक्ष की छाया के संख्यात्मक माप को निकालने के संबंध में उदाहरण—
किसी समय निज की छाया की लम्बाई का माप निज के पाद से चौगुना है । किसी वृक्ष की
ऊँचाई ( ऐसे पाद-माप में ) १७५ है । उस वृक्ष की छाया का माप क्या है ? ॥ ५० ॥ किसी नगर के पूर्व
की ओर ८ योजन (दूरी) चल चुकने के पश्चाव, १० योजन ऊँचा शैल (पर्वत) मिलता है । नगर में भी
१० योजन ऊँचाई का पर्वत है । पूर्वी पर्वत से पश्चिम की ओर ८० योजन चल चुकने के पश्चात् , एक
और दूसरा पर्वत मिलता है । इस अंतिम पर्वत के शिखर पर रखे हुए दीप नगर निवासियों को दिखाई
देते हैं । नगर के मध्य में स्थित पर्वत की छाया पूर्वी पर्वत के मूल को स्पर्श करती है । हे गणक, इस
( पश्चिमी ) पर्वत की ऊँचाई क्या है ? शीघ्र बतलाओ ॥ ५१-५२ ½ ॥
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सार संग्रहनामक गणित शास्त्र में छाया नामक अष्टम व्यवहार
समाप्त हुआ ।
इस प्रकार यह सारसंग्रह समाप्त हुआ ।
( ५१-५२ ½ ) यह उदाहरण उपर्युक्त ४५ वें श्लोक में दिये गये नियम को निर्देशित करने
के लिये है ।
परिशिष्ट १
संख्याओं का अभिधान करनेवाले सामान्य और संख्यात्मक अर्थबोधक संस्कृत शब्द
| शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम |
|---|---|---|---|
| अक्षि | आँख The eye | २ | मनुष्य की दो आँखें होती हैं । |
| अग्नि | आग Fire | ३ | होमाग्नियों की संख्या ३ है, अर्थात् , गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण । |
| अङ्क | संख्या Number | ९ | शून्य को छोड़कर केवल ९ अङ्क होते हैं । |
| अङ्ग | विज्ञान का एक विभाग<br>An auxiliary division or department of science | ६ | वेदों के अध्ययन के संबंध में ६ विभाग होते हैं, अर्थात् , शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दस्, ज्योतिष । |
| अचल | पर्वत A mountain | ७ | पौराणिक भूगोल में माने गये ७ मुख्य पर्वत जो कुलाचल कहलाते हैं; अर्थात् , महेन्द्र, मलय, सह्य, शक्तिमत्, ऋक्ष, विंध्य, पारियात्र । |
| अद्रि | पर्वत A mountain | ७ | अचल देखिए । |
| अनन्त | आकाश The sky | ० | आकाश को शून्य समझा जाता है । |
| अनल | आग Fire | ३ | अग्नि देखिए । |
| अनीक | सेना An army | ८ | संस्कृत में ८ प्रकार की सेनाओं का उल्लेख है, अर्थात् पत्ति, सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू, अनीकिनी । ( जिनागम में गण की जगह अक्षौहिणी का उल्लेख है ।) |
| अन्तरिक्ष | आकाश The sky | ० | अनन्त देखिए । |
| अब्धि | महासागर The ocean | ४ | चार महासागर माने जाते हैं, अर्थात्, पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी । |
| अम्बक | आंख The eye | २ | अक्षि देखिए । |
| अम्बर | आकाश The sky | ० | अनन्त देखिए । |