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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 421 में से

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पृष्ठ 318

२६४ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. ५२½-
इष्टवेदिकायां पतितायां सत्यां स्थितस्थाने इष्टकासंख्यानयनस्य च पतितस्थाने इष्टका-
संख्यानयनस्य च सूत्रम्—
मुखतलशेषः पतितोत्सेधगुणः सकलवेधहृत्समुखः ।
मुखभूम्योर्भूमिमुखे पूर्वोक्तं करणमवशिष्टम् ॥ ५२½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादश दैर्घ्यं व्यासः पञ्चाध्वश्चोर्ध्वमेकमुत्सेधः ।
दश तस्मिन् पञ्च करा भग्नास्तत्रेष्टकाः कति स्युस्ताः ॥ ५३½ ॥
प्राकारे कर्णाकारेण भग्ने सति स्थितेष्टकानयनस्य च पतितेष्टकानयनस्य च सूत्रम्—
किसी पतित ( भग्न होकर गिरी हुई ) वेदी के संबंध में स्थित भाग में (शेष अपतित भाग में)
तथा पतित-भाग में ईंटों की संख्या अलग अलग निकालने के लिये नियम—
उपरी चौड़ाई और तली की चौड़ाई के अंतर को पतित भाग की ऊँचाई द्वारा गुणित करते हैं,
और पूर्ण ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल में उपरी चौड़ाई का मान जोड़ दिया
जाता है । यह पतित भाग के संबंध में आधारीय चौड़ाई का माप तथा अपतित भाग के संबंध में उपरी
चौड़ाई का माप उत्पन्न करता है । शेष क्रिया पहले वर्णित कर दी गई है ॥ ५२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वेदी के संबंध में लंबाई १२ हस्त है, तली में चौड़ाई ५ हस्त है; उपरी चौड़ाई १ हस्त है,
उपरी चौड़ाई १ हस्त है, और ऊँचाई सर्वत्र १० हस्त है । ५ हस्त ऊँचाई का भाग टूट कर गिर
जाता है । उस पतित और अपतित भाग में अलग-अलग कितनी ऐकिक इष्टकाएँ हैं ? ॥ ५३½ ॥
जब किले की दीवाल तिर्यक् रूप से टूटी हो, तब स्थित भाग में तथा पतित भाग में इष्टकाओं
की संख्या निकालने के लिये नियम—
शिखर और पार्श्व तल प्रवण ( ढालू ) हैं । ऊपरी अभिनत तल के उठे हुए अंत पर चौड़ाई २ हस्त है,
और दूसरे अंत पर चौड़ाई ४ हस्त है ( चित्र देखिये ) ।
(५२½) स्थित अपतित भाग की उपरी चौड़ाई
का माप जो वेदी के पतित भाग की नितल चौड़ाई के
समान है, बीजीय रूप से [(अ - ब) द / उ] + ब है, जहाँ तली
की चौड़ाई 'अ' और ऊपरी चौड़ाई 'ब' है, संपूर्ण ऊँचाई
'उ' है, और 'द' वेदी के पतित भाग की ऊँचाई है । यह सूत्र समरूप त्रिभुजों के गुणों द्वारा भी
सरलतापूर्वक शुद्ध सिद्ध किया जा सकता है । नियम में कथित क्रिया ऊपर गाथा ४ में पहिले ही
वर्णित की जा चुकी है ।