गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें२६६ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. ५७½-
प्राकारमध्यप्रदेशोत्सेधे तरवृद्ध्यानयनस्य प्राकारस्य उभयपार्श्वयोः तरहानेरानयनस्य
च सूत्रम्—
इष्टेष्टकोदयहृतो वेधश्च तरप्रमाणमेकोनम् ।
मुखतलशेषेण हृतं फलमेव हि भवति तरहानिः ॥ ५७½ ॥
अत्रोद्देशकः
प्राकारस्य व्यासः सप्त तले विंशतिस्तदुत्सेधः ।
एकेनाग्रे घटितस्तरवृद्ध्यूने करोदयेष्टकया ॥ ५८½ ॥
समवृत्तायां वाप्यां व्यासचतुष्केऽर्धयुक्तकरभूमिः ।
घटितेष्टकाभिरभितस्तस्या वेधस्त्रयः काः स्युः ।
घटितेष्टकाः सखे मे विगणय्य ब्रूहि यदि वेत्सि ॥ ६० ॥
इष्टकाघटितस्थले अधस्तलव्यासे सति ऊर्ध्वतलव्यासे सति च गणितन्यायसूत्रम्—
द्विगुणनिवेशो व्यासायामयुतो द्विगुणितस्तदायामः ।
आयतचतुरश्रे स्यादुत्सेधव्याससंगुणितः ॥ ६१ ॥
किले की दीवाल की केन्द्रीय ऊँचाई के संबंध में ( ईंटों के ) तलों की बढ़ती हुई संख्या को
निकालने के लिए नियम, और नीचे से ऊपर की ओर जाते समय दीवाल की दोनों पाश्र्वों की चौड़ाई
में कमी होने से तलों की घटती ( की दर ) निकालने के लिए नियम--
केन्द्रीय छेद की ऊँचाई, दी गई इष्टका ( ईंट ) की ऊँचाई द्वारा भाजित होकर, इष्टकाओं की
तली का इष्ट माप उत्पन्न करती है । यह संख्या, एक द्वारा हासित होकर और तब ऊपरी चौड़ाई तथा
नीचे की चौड़ाई के अंतर द्वारा भाजित होकर, तलों के मान में ( in terms of layers ) मापी
गई चौड़ाई की घटती की दर ( rate ) के मान को उत्पन्न करती है ॥ ५७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी ऊँची किले की दीवाल की तली में चौड़ाई ७ हस्त है । उसकी ऊँचाई २० हस्त है ।
वह इस तरह से बनी हुई है कि ऊपर चौड़ाई १ हस्त रहे । १ हस्त ऊँची इष्टकाओं की सहायता से
केन्द्रीय ( तलों ) की वृद्धि तथा चौड़ाई की घटती ( की दर ) का माप बतलाओ ॥ ५८½ ॥
किसी समवृत्ताकार ४ हस्त व्यास वाली वापिका के चारों ओर १½ हस्त मोटी दीवाल
पूर्वोक्त ईंटों द्वारा बनाई जाती है । वापिका की गहराई ३ हस्त है । यदि तुम जानते हो, तो हे
मित्र, बतलाओ कि बनाने में कितनी ईंटें लगेंगी ? ॥ ५९½-६० ॥
किसी स्थान के चारों ओर बनी हुई संरचना की घनाकार समाई का मान निकालने के लिए
नियम, जब कि संरचना का अधस्तल व्यास और ऊर्ध्वतल व्यास दिया गया हो—
संरचना की औसत मुटाई की दुगनी राशि में दत्त व्यासायाम ( लंबाई एवं चौड़ाई ) का माप
जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग दुगना किया जाता है । परिणामी राशि संरचना की कुल
लंबाई होती है, जबकि वह आयताकार रूप में होती है । यह परिणामी राशि, दी गई ऊँचाई और
पूर्वोक्त औसत मुटाई से गुणित होकर, इष्ट घनफल का माप उत्पन्न करती है ॥ ६१ ॥
( ५९½-६० ) यहाँ पूर्वोक्त श्लोक ४३½ में कथित एकक इष्टका मानी गई है । यह प्रश्न श्लोक
५७½ में दिये गये नियम को निर्देशित नहीं करता है । उसे इस अध्याय के १९½-२०½ और ४४½ वें
श्लोकों के नियमानुसार साधित किया जाता है ।