गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
१०० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ४३-
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्त्रिंशद्विंशतिपञ्चाशदत्र मूलानि ।
दशाष्टत्रिषञ्चदश फलमष्टादश कालमिश्रधनराशिः ॥ ४३ ॥
प्रमाणराशौ फलेन तुल्यमिच्छाराशिमूलं च तदिच्छाराशौ वृद्धिं च संपीड्य तन्मिश्रराशौ
प्रमाणराशेर्वृद्धिविभागानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं परकालहृतं तदेकगुणमिश्रधनात् ।
इतरार्धकृतियुतान् पद्ममितरार्धोनं प्रमाणफलम् ॥ ४४ ॥
अत्रोद्देशकः
मासचतुष्कशतस्य प्रनष्टवृद्धिः प्रयोगमूलं तत् ।
स्वफलेन युतं द्वादश पञ्चकृतिस्तस्य कालोऽपि ॥ ४५ ॥
मासत्रितयाशीत्याः प्रनष्टवृद्धिः स्वमूलफलराशेः । पञ्चमभागेनोनाश्वाष्टौ वर्षेण मूलवृद्धी के ॥४६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, दिये गये मूलधन ४०, ३०, २० और ५० हैं तथा संवादी ब्याज राशियाँ क्रमशः
१०, ६, ३ और १५ हैं । विभिन्न अवधियों का मिश्रयोग १८ है । बतलाओ कि अवधियाँ क्या-
क्या हैं ? ॥४३॥
ब्याजदर के बराबर दिया गया मूलधन और इस उधार दिये गये मूलधन के ब्याज, इन दोनों
के मिश्रयोग को निरूपित करनेवाली राशि में से मूलधनदर एवं ब्याजदर अलग-अलग निकालने
के लिये नियम —
मूलधनदर को अवधिदर द्वारा गुणित कर उसे जिस समय तक ब्याज लगाया गया है उस
समय द्वारा विभाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल को दिये गये मिश्रयोग द्वारा एक बार गुणित
करते हैं, और तब, उसमें उपर्युक्त भजनफल की आधी राशि के वर्ग को जोड़ते हैं । इस तरह प्राप्त राशि
का वर्गमूल निकालते हैं । प्राप्त फल को उसी भजनफल की अर्द्धराशि द्वारा ह्रासित करते हैं तो मूलधन
के बराबर इष्ट ब्याजदर प्राप्त होती है ॥४४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याजदर प्रतिशत प्रति ४ माह अज्ञात है । वही अज्ञात राशि उधार दिया गया मूलधन भी
है । यह खुद के ब्याज से जोड़ी जाने पर १२ हो जाती है । २५ माह अवधि है जिसमें कि वह ब्याज
उपार्जित हुआ है । ब्याजदर को निकालो जो मूलधन के तुल्य है ॥४५॥ ब्याजदर प्रति ८० प्रति ३ माह
अज्ञात है । एक साल के ब्याज तथा उस अज्ञात राशि के तुल्य मूलधन का मिश्रयोग ७६ ४/५ है । बतलाओ
कि मूलधन और ब्याजदर क्या क्या हैं ? ॥४६॥
(४४) प्रतीक रूप से, √[ (घा आ / अ) × म + (घा आ / २अ)² ] - (घा आ / २अ) = बा जो ध के तुल्य है ।
-६. ५२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०१
समानमूलवृद्धिमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यकालविनिहतमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
कालविशेषेण हृते तेषां मूलं विजानीयात् ॥ ४७ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चाशदष्टपञ्चाशन्मिश्रं षट्षष्टिरेव च । पञ्च सप्तैव नव हि मासाः किं फलमानय ॥ ४८ ॥
त्रिंशच्चैकत्रिंशद् द्वित्र्यंशाः स्युः पुनस्त्रयस्त्रिंशत् । सत्र्यंशा मिश्रधनं पञ्चत्रिंशच्च गणकादात् ॥४९॥
कश्चिन्नरश्चतुर्णां त्रिभिश्चतुर्भिश्च पञ्चभिः षड्भिः । मासैर्लब्धं किं स्यान्मूलं शीघ्रं ममाचक्ष्व ॥५०॥
समानमूलकालमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यवृद्धिसंगुणमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
वृद्धिविशेषेण हृते लब्धं मूलं बुधाः प्राहुः ॥ ५१ ॥
अत्रोद्देशकः
एकत्रिपञ्चमिश्रितविंशतिरिह कालमूलयोर्मिश्रम् ।
षड् दश चतुर्दश स्युर्लाभाः किं मूलमत्र साम्यं स्यात् ॥ ५२ ॥
मूलधन जो सब दशाओं में एकसा रहता है, और ( विभिन्न अवधियों के ) ब्याजों को, उनके
मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो दिये गये मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज की अवधियों द्वारा गुणित
करने से प्राप्त राशियों के अंतर द्वारा विभाजित करने पर जो भजनफल प्राप्त होता है वह उन दिये गये
मिश्रयोगों सम्बन्धी इष्ट मूलधन है ॥४७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मिश्रयोग ५०, ५८ और ६६ है और अवधियाँ जिनमें कि ब्याज उपार्जित हुए हैं, क्रमशः ५,७
और ८ माह हैं । प्रत्येक दशा में ब्याज बतलाओ ॥४८॥ हे गणितज्ञ ! किसी मनुष्य ने ४ व्यक्तियों
को क्रमशः ३, ४, ५ और ६ मास के अन्त में उसो मूलधन और ब्याज के मिश्रयोग ३०, ३१ २/३,
३३ १/३ और ३५ दिये । मुझे शीघ्र बतलाओ कि यहाँ मूलधन क्या है ? ॥ ४९-५० ॥
मूलधन ( जो प्रत्येक दशा में वही रहता हो ) और अवधि ( जितने समय में ब्याज उपार्जित
किया गया हो ) को उन्हीं के मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज द्वारा गुणित कर, प्राप्त राशियों के अन्तर
को दो चुने हुए ब्याजों के अन्तर द्वारा विभाजित करने पर भजनफल के रूप में इष्ट मूलधन प्राप्त होता
है, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥५१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मूलधन और अवधियों के मिश्रयोग २१, २३ और २५ हैं । यहाँ ब्याज ६, १० और १४ हैं ।
बतलाओ कि समान अर्हो वाला मूलधन क्या है ? ॥५२॥ दिये गये मिश्रयोग ३५, ३७ और ३९ हैं;
( ४७ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ अ₂ ~ म₂ अ₁ ) / ( अ₁ ~ अ₂ ) = ध
( ५१ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ ब₂ ~ म₂ ब₁ ) / ( ब₁ ~ ब₂ ) = ध, जहाँ म₁, म₂, आदि, विभिन्न मिश्रयोग हैं ।
१०२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ५३-
पञ्चत्रिंशन्मिश्रं सप्तत्रिंशच्च नवयुतत्रिंशत् । विंशतिरष्टाविंशतिरथ षट्त्रिंशच्च वृद्धिधनम् ॥ ५३ ॥
उभयप्रयोगमूलानयनसूत्रम्—
रूपस्येच्छाकालादुभयफले ये तयोर्विशेषेण । लब्धं विभजेन्मूलं स्वपूर्वसंकल्पितं भवति¹ ॥ ५४ ॥
अत्रोद्देशकः
उद्द्वृत्त्या षट्कशते प्रयोजितोऽसौ पुनश्च नवकशते ।
मासैस्त्रिभिर्मिश्रं लभते सैकाशीतिं क्रमेण मूलं किम् ॥ ५५ ॥
त्रिवृद्धयैव शते मासे प्रयुक्तश्चाष्टभिःशते । लाभोऽशीतिः कियन्मूलं भवेत्तन्मासयोर्द्वयोः ॥ ५६ ॥
वृद्धिमूलविमोचनकालानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं फलगुणितं तत्प्रमाणकालाभ्याम् ।
भक्तं स्कन्धस्य फलं मूलं कालं फलात्प्राग्वत् ॥ ५७ ॥
१ इसी नियम को कुछ अशुद्ध रूप में परिवर्तित पाठ में इस प्रकार उल्लिखित किया गया है—
पुनरप्युभयप्रयोगमूलानयनसूत्रम्—
इच्छाकालादुभयप्रयोगवृद्धिं समानीय । तद्वृद्ध्यन्तरभक्तं लब्धं मूलं विजानीयात् ॥
ब्याज २०, २८ और ३६ हैं । समान अर्घ वाला मूलधन क्या है ? ॥५३॥
दो भिन्न ब्याजदरों पर लगाया हुआ मूलधन प्राप्त करने के लिये नियम—
दो ब्याज राशियों के अंतर को उन दो राशियों के अंतर द्वारा विभाजित करो जो दी हुई
अवधियों में १ पर ब्याज होती हैं । यह भजनफल स्वपूर्व संकल्पित मूलधन होता है ॥५४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६ प्रतिशत की दर पर उधार लेकर, और तब ९ प्रतिशत की दर पर उधार देकर कोई व्यक्ति
चलन ( differential ) लाभ के द्वारा ठीक ३ माह के पश्चात् ८१ प्राप्त करता है । मूलधन
क्या है ? ॥५५॥ ३ प्रतिशत प्रतिमास के अर्घ से कोई रकम उधार ली जाकर ८ प्रतिशत प्रतिमाह के
अर्घ से ब्याज परदी जाती है । चलन लाभ, २ माह के अन्त में ८० होता है । बतलाओ वह रकम
क्या है ? ॥५६॥
जब मूलधन और ब्याज दोनों (किश्तों द्वारा) चुकाये जाते हों तब समय निकालने के नियम—
उधार दिया गया मूलधन किश्त के समय द्वारा गुणित किया जाता है और फिर ब्याज दर
द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल को मूलधनदर द्वारा और अवधिदर द्वारा विभाजित
करने पर उस किश्त सम्बन्धी ब्याज प्राप्त होता है । इस ब्याज से, किश्त का मूलधन और ऋण को
चुकाने का समय, दोनों को प्राप्त किया जाता है ॥५७॥
ब₁ ~ ब₂
( ५४ ) प्रतीक रूप से, ----------------------------------------- = ध
१ × अ₁ × बा₁ १ × अ₂ × बा₂
आ₁ × घा₁ आ₂ × घा₂
ध × प × बा
( ५७ ) प्रतीक रूप से, ------------ = किश्त सम्बन्धी ब्याज, जहाँ प प्रत्येक किश्त की अवधि है ।
घा × आ
-६. ६२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०३
अत्रोद्देशकः
मासे हि पञ्चैव च सप्ततीनां मासद्वयेऽष्टादशकं प्रदेयम् ।
स्कन्धं चतुर्भिः सहिता त्वशीतिः मूलं भवेत्को नु विमुक्तिकालः ॥ ५८ ॥
षष्ट्या मासिकवृद्धिः पञ्चैव हि मूलमपि च षट्त्रिंशत् ।
मासत्रितये स्कन्धं त्रिपञ्चकं तस्य कः कालः ॥ ५९ ॥
समानवृद्धिमूलमिश्रविभागसूत्रम्—
मूलैः स्वकालगुणितैर्वृद्धिविभक्तैः समासकैर्विभजेत् ।
मिश्रं स्वकालनिघ्नं वृद्धिमूलानि च प्राग्वत् ॥ ६० ॥
अत्रोद्देशकः
द्विकषट्कचतुः शतके चतुः सहस्रं चतुः शतं मिश्रम् ।
मासद्वयेन वृद्ध्या समानि कान्यत्र मूलानि ॥ ६१ ॥
त्रिकशतपञ्चकसप्रतिपादोनचतुष्कषष्टियोगेषु । नवशतसहस्रसंख्या मासत्रितये समा युक्ता ॥६२॥
────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याजदर ५ प्रति ७० प्रतिमास है; प्रत्येक २ माह में चुकाई जाने वाली किश्त १८ है एवं
उधार दिया गया मूलधन ८४ है । विमुक्ति काल (कर्ज चुकाने का समय ) बतलाओ ॥५८॥ ६० पर
प्रतिमास ब्याज ५ होता है । उधार दिया गया मूलधन ३६ है । ३ माह में चुकाई जाने वाली प्रत्येक
किश्त १५ है । उस कर्ज के चुकने का समय बतलाओ ॥५९॥
जिन पर समान ब्याज उपार्जित हुआ है ऐसे विभिन्न मूलधनों को मिश्रयोग से अलग-अलग
करने के लिये नियम—
मिश्रयोग को अवधि द्वारा गुणित कर, उन राशियों के योग से विभाजित करो जो (राशियाँ)
विभिन्न मूलधनदरों को उनकी संवादी अवधिदरों द्वारा गुणित करने तथा संवादी ब्याजदरों द्वारा
विभाजित करने पर प्राप्त होती हैं । इस प्रकार ब्याज प्राप्त होता है और उससे मूलधन प्राप्त किये
जाते हैं ॥६०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२, ६ और ४ प्रतिशत प्रतिमास की दर से दिये गये मूलधनों का मिश्रयोग ४,४०० है । इन
समस्त मूलधनों की २ माह की ब्याज राशियाँ बराबर होती हैं । बतलाओ कि वह ब्याजराशि क्या है
और विभिन्न मूलधन क्या-क्या हैं ? ॥६१॥ कुल रकम १,९००; ३ प्रतिशत, ५ प्रति ७० और ३ ३/८ प्रति
६० प्रतिमाह की दर से विभिन्न मूलधनों में ब्याज पर वितरित कर दी गईं । प्रत्येक दशा में ३ माह
में ब्याज बराबर-बराबर उपार्जित हुआ । उस समान ब्याजराशि को तथा विभिन्न मूलधनों को अलग-
अलग प्राप्त करो ॥६२॥
म × अ
( ६० ) प्रतीक रूप से, ─────────────────────────────────── = ब; इसके द्वारा मूलधनों
धा₁ × आ₁ धा₂ × आ₂
───────── + ───────── + ...इत्यादि
बा₁ बा₂
को अध्याय ६ की १० वीं गाथा के नियम द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।
१०४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ६३-
विमुक्तकालस्य मूलानयनसूत्रम्—
स्कन्धं स्वकालभक्तं विमुक्तकालेन ताडितं विभजेत् ।
निर्मुक्तकालवृद्ध्या रूपस्य हि सैकया मूलम् ॥ ६३ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतमयोगे मासौ द्वौ स्कन्धमष्टकं दत्त्वा । मासैः षष्टिभिरिह वै निर्मुक्तः किं भवेन्मूलम् ॥६४॥
द्वौ सत्रिपञ्चभागौ स्कन्धं द्वादशदिनैर्द्ददात्येकः । त्रिकशतयोगे दशभिर्मासैर्मुक्तं हि मूलं किम् ॥६५॥
वृद्धियुक्तहीन समानमूलमिश्रविभागसूत्रम्—
कालस्वफलोनाधिकरूपोद्धृतरूपयोगहृतमिश्रे१।
१ "मिश्रः" पाठ हस्तलिपियों में है; यहाँ व्याकरण की दृष्टि से मिश्रे शब्द अधिक संतोषजनक है ।
ज्ञात अवधि में चुकाई जाने वाली किश्तों सम्बन्धी उधार दिये गये मूलधन को निकालने का नियम—
किश्त की रकम को उसकी अवधि द्वारा विभाजित करते हैं और कर्ज चुकाने के समय ( विमुक्ति
काल ) द्वारा गुणित करते हैं । अब प्राप्त राशि को उस राशि द्वारा विभाजित करते हैं जो १ में १ पर
कर्ज निर्मुक्ति समय के लिये लगाये हुए ब्याज को जोड़ने पर प्राप्त होती है । इस प्रकार मूलधन प्राप्त होता है ॥६३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ प्रतिशत प्रतिमास की दर से जब प्रत्येक किश्त की अवधि २ मास रही, और प्रत्येक बार में
८ किश्त रूप में चुकाया गया तब एक मनुष्य ६० माह में ऋणमुक्त हुआ । बतलाओ उसने कितना
धन उधार लिया था ? ॥६४॥
कोई व्यक्ति १२ दिनों में एक बार २ ३/५ किश्तरूप में देता है । यदि ब्याज दर ३ प्रतिशत प्रति-
मास हो तो १० माह में चुकने वाले ऋण के परिमाण को बतलाओ ? ॥६५॥
ऐसे विभिन्न मूलधनों को अलग-अलग निकालने के लिये नियम जो उनके मिश्रयोग में जब
उन्हीं के ब्याजों द्वारा मिलाये जाने पर अथवा उसमें से हासित किये जाने पर एक दूसरे के तुल्य हो
जाते हैं ( सभी दत्त दशाओं में मूलधनों में ब्याज राशियाँ जोड़ी जाती हैं अथवा उनमें से घटायी जाती हैं )—
क्रमशः दी गई ब्याज दर के अनुसार, प्रत्येक दशा में, एक में उपार्जित व्याज या तो मिलाया
जाता है अथवा एक में से हासित किया जाता है । तब, प्रत्येक दशा में, इन राशियों द्वारा एक को
विभाजित किया जाता है । इसके पश्चात् , विभिन्न उधार दिये गये धनों के मिश्रयोग को इन परिणामी
भजनफलों के योग द्वारा विभाजित किया जाता है । और मिश्र योग सम्बन्धी इस तरह बर्ते गये उन
उपर्युक्त भजनफलों के योग के संवादी समानुपाती भाग द्वारा अलग-अलग प्रत्येक दशा में उसे गुणित
( ६३ ) प्रतीक रूप से,
स ⎧ स = किश्त ( स्कंध ) है
── · अ ⎪ प = किश्त का समय है
प ⎪ और
─────────────── = ध; जहाँ ⎨
१ × अ × बा ⎪ अ = ऋण के चुकने की अवधि है ।
१ + ────────── ⎩
आ × धा
-६. ६९ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०५
प्रक्षेपो गुणकारः स्वफलोनाधिकसमानमूलानि ॥ ६६ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकाष्टकशतैः प्रयोगतोऽष्टासहस्रपञ्चशतम् ।
विंशतिसहितं वृद्धिभिरुद्धृत्य समानि पञ्चभिर्मासैः ॥ ६७ ॥
त्रिकषट्काष्टकषष्ट्या मासद्वितये चतुस्सहस्राणि ।
पञ्चाशद्द्विशतयुतान्यतोऽष्टमासकफलाद्धृते सदृशानि ॥ ६८ ॥
द्विकपञ्चकनवकशते मासचतुष्के त्रयोदशसहस्रम् ।
सप्तशतेन च मिश्रा चत्वारिंशत्सवृद्धिसममूलानि ॥ ६९ ॥
किया जाता है । इससे उधार दी गई रकमें उत्पन्न होती हैं जो उनके ब्याजों द्वारा मिलाई जाने पर
अथवा ह्रासित किये जाने पर समान हो जाती हैं ॥ ६६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
८,५२० रुपये क्रमशः ३, ५ और ८ प्रतिशत प्रतिमास की दर से (भागों में) ब्याज पर दिये
जाते हैं । ५ माह में उपार्जित ब्याजों द्वारा ह्रासित करने पर वे दत्त रकमें बराबर हो जाती हैं । इस
तरह ब्याज पर लगाये हुए धनों को बतलाओ ॥ ६७ ॥ ४,२५० द्वारा निरूपित कुल धन को (भागों
में) क्रमशः ३, ६ और ८ प्रति ६० की दर से २ माह के लिये ब्याज पर लगाया गया है । ८ माह
में होने वाले ब्याजों को धनों में से घटाने पर जो धन प्राप्त होते हैं वे तुल्य देखे जाते हैं । इस
प्रकार विनियोजित विभिन्न धनों को बतलाओ ॥ ६८ ॥ १३,७४० रुपये, (भागों में) २, ५ और ९
प्रतिशत प्रतिमाह के अर्ध से ब्याज पर लगाये जाते हैं । ४ माह के लिये उधार दिये गये धनों में
ब्याजों को जोड़ने पर वे बराबर हो जाते हैं । उन धनों को बतलाओ ॥ ६९ ॥ ३,६४३ रुपये (भागों
में) क्रमशः १रे, ५रे और ६ प्रति ८० प्रतिमाह की दर से ब्याज पर लगाये जाते हैं । ८ माह में
(६६) प्रतीक रूप से,
म
१ १
------------------------------------ + ------------------------------------ + इत्यादि
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞ ⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟ १ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠ ⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
१
× ------------------------------------ = ध₁
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠
इसी प्रकार,
म
१ १
------------------------------------ + ------------------------------------ + इत्यादि
⎛ १ × अ × बा₁ ⎞ ⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟ १ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₁ × घा₁ ⎠ ⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
१
× ------------------------------------ = ध₂ ; इसी तरह
⎛ १ × अ × बा₂ ⎞
१ ± ⎜ ---------------- ⎟
⎝ आ₂ × घा₂ ⎠
ध₃, ध₄ आदि के लिये ।
ग० सा० सं०–१४
१०६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७०-
सैकार्धकपञ्चार्धकषडर्धकाशीतियोगयुक्तास्तु ।
मासाष्टके षडधिका चत्वारिंशच्च षट्कृतिशतानि ॥ ७० ॥
संकलितस्कन्धमूलस्य मूलवृद्धिविमुक्तिकालानयनसूत्रम्—
स्कन्धाप्तमूलचितिगुणितस्कन्धेच्छाग्रघातियुतमूलं स्यात् ।
स्कन्धे कालेन फलं स्कन्धोद्धृतकालमूलहतकालः ॥ ७१ ॥
अत्रोद्देशकः
केनापि संप्रयुक्ता षष्टिः पञ्चकशतप्रयोगेण । मासत्रिपञ्चभागात् सप्तोत्तरतश्च सप्तादिः ॥ ७२ ॥
तत्षष्टिसप्तमांशकपदमितिसंकलितधनमेव । दत्त्वा तत्सप्तांशकवृद्धिं प्रादाच्च चितिमूलम् ॥
किं तद्वृद्धिः का स्यात् कालस्तदृणस्य मौक्षिको भवति ॥ ७३ १/२ ॥
उत्पन्न हुए व्याजों को मूलधनों में जोड़ने पर देखा जाता है कि वे बराबर हो जाते हैं । उन विनियोजित
रकमों को निकालो ॥ ७० ॥
समान्तर श्रेढि बद्ध किस्तों द्वारा चुकाई गई ऋण की रकम के सम्बन्ध में धन, ब्याज और
ऋण मुक्ति का समय निकालने के लिये नियम—
इष्ट ऋण धन वह मूलधन है जो मन से चुनी हुई (महत्तम प्राप्य किस्त की) रकम और
श्रेढि के पदों की संख्या के भिन्नीय भाग के गुणनफल को (१ जिसका प्रथम पद है, १ प्रचय है और
उपर्युक्त महत्तम ऋण की रकम को प्रथम किस्त द्वारा विभाजित करने से प्राप्त पूर्णाङ्क मान वाली संख्या
(भजनफल) जिसके पदों की संख्या है, ऐसी) समान्तर श्रेढि द्वारा गुणित प्रथम किस्त से मिलाने पर
प्राप्त होता है । ब्याज वह है जो किस्त की अवधि में उत्पन्न होता है । किस्त की अवधि को प्रथम
किस्त द्वारा विभाजित करने और मन से चुनी हुई ऋण की महत्तम रकम द्वारा गुणित करने पर जो
प्राप्त होता है वह ऋण मुक्त होने का समय है ॥ ७१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर से ब्याज लगाये जाने वाले ऋण की मुक्ति के लिये
६० को महत्तम रकम चुना तथा ७ प्रथम किस्त चुनी जो उत्तरोत्तर ३/५ माह में होनेवाली किस्तों में ७ द्वारा
बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने ६०/७ पदों वाली समान्तर श्रेढि के योग को ऋण रूप में चुकाया
तथा उन ७ के अपवर्त्यो ( multiples ) पर लगने वाले ब्याज को भी चुकाया । श्रेढि के योग की
संवादी ऋण रकम को निकालो, चुकाये गये ब्याज को निकालो और बतलाओ कि उस ऋण की मुक्ति
का समय क्या है ? ॥ ७२–७३ १/२ ॥ किसी मनुष्य ने ५ प्रतिशत प्रतिमास ब्याज की दर लगाये जाने
(७१) यह नियम (कई शब्द छूट जाने के कारण) अत्यन्त भ्रमोत्पादक है तथा ७२–७३ १/२
वीं गाथा के उदाहरण हल करने पर स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ मूल अथवा किस्त की महत्तम प्राप्य रकम
६० है । यह प्रथम किस्त की रकम ७ द्वारा विभाजित होने पर ६०/७ अथवा ८ ४/७ होती है जिसमें से ८
समान्तर श्रेढि के पदों की संख्या है । ऐसी समान्तर श्रेढि का १ प्रथम पद है, १ प्रचय है और ४/७ अग्र
अथवा ऊपर का भिन्नीय भाग है । उपर्युक्त श्रेढि के योग ३६ को प्रथम किस्त ७ द्वारा गुणितकर ४/७
और ६० के गुणनफल में जोड़ देते हैं । यहाँ ६० महत्तम प्राप्य रकम है । इस प्रकार ३६ × ७ + ४/७ × ६०
= ३०० ४/७ प्राप्त होता है जो ऋण का इष्ट मूलधन है । ३०० ४/७ पर ३/५ माह में ५ प्रतिशत प्रतिमाह की दर
से पूर्ण पर चुकाया गया ब्याज होगा । ऋण मुक्ति की अवधि ( ३/५ ÷ ७ ) × ६० = ३६/७ माह होगी ।
-६. ७८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७७
केनापि संप्रयुक्ताशीतिः पञ्चकशतप्रयोगेण ।। ७४½ ।।
अष्टाद्यष्टोत्तरतस्तदशीत्यष्टांशगच्छेन । मूलधनं दत्त्वाष्टाद्यष्टोत्तरतो धनस्य मासार्धात् ।। ७५½ ।।
वृद्धिं प्रादान्मूलं वृद्धिश्च विमुक्तिकालश्च । एषां परिमाणं किं विगणय्य सखे समाचक्ष्व ।। ७६½ ।।
एकीकरणसूत्रम्—
वृद्धिसमासं विभजेन्मासफलैक्येन लब्धमिष्टः कालः । कालप्रमाणगुणितस्तदिष्टकालेन संभक्तः ।।
वृद्धिसमासेन हतो मूलसमासेन भाजितो वृद्धिः ।। ७७½ ।।
अत्रोद्देशकः
युक्ता चतुरशतीह द्विकत्रिकपञ्चकचतुष्कशतेन । मासाः पञ्च चतुर्द्वित्रयः प्रयोगैककालः कः ।।७८½।।
इति मिश्रकव्यवहारे वृद्धिविधानं समाप्तम् ।
वाले ऋण की मुक्ति के लिये ८० को महत्तम रकम चुना । इसके साथ, ८ प्रथम किस्त की रकम थी
जो प्रति ½ माह में उत्तरोत्तर ८ द्वारा बढ़ती चली गई । इस प्रकार, उसने समान्तर श्रेढि के योग
को ऋण रूप में चुकाया । इस समान्तर श्रेढि में ८०/८ पदों की संख्या थी। इन ८ के अपवर्त्यो पर
ब्याज भी चुकाया गया । हे मित्र ! श्रेढि के योग की संवादी ऋण की रकम, चुकाया गया ब्याज
और ऋण मुक्ति का समय अच्छी तरह गणना कर निकालो ।। ७३½-७६ ।।
औसत साधारण ब्याज को निकालने के लिये नियम —
( विभिन्न उपार्जित होने वाले ) ब्याजों के योग को ( विभिन्न संवादी ) एक माह के दातव्य
ब्याजों के योग द्वारा विभाजित करने पर परिणामी भजनफल, इष्ट समय होता है । ( काल्पनिक )
समयदर और मूलधनदर के गुणनफउ को इष्ट समय द्वारा विभाजित करते हैं और ( उपार्जित होने
वाले विभिन्न ) ब्याजों के योग द्वारा गुणित करते हैं । प्राप्तफल को विभिन्न दिये गये मूलधनों के
योग द्वारा फिर से विभाजित करते हैं । इससे इष्ट ब्याज दर प्राप्त होती है । ॥ ७७-७७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, चार सौ की ४ रकमें अलग-अलग क्रमशः २, ३, ५ और ४ प्रतिशत प्रतिमास की
दर से ५, ४, २ और ३ माहों के लिये ब्याज पर लगाई गईं । औसत साधारण अवधि और ब्याजदर
निकालो ।। ७८½ ।।
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में वृद्धि विधान नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
( ७७ और ७७½ ) विभिन्न उत्पन्न होने वाले ब्याज वे होते हैं जो अलग-अलग रकमों के, विभिन्न
दरों पर उनकी क्रमवार अवधियों के लिये ब्याज होते हैं ।
प्रतीक रूप से, { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
{ (ध₁ × १ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × १ × बा₂) / (आ × घा) + ............ }
= अ_औ अथवा औसत अवधि ;
और [(घा × आ) / अ_औ] × { (ध₁ × अ₁ × बा₁) / (आ × घा) + (ध₂ × अ₂ × बा₂) / (आ × घा) + ............ } ÷
( ध₁ + ध₂ + ............ ) = ब_औ अथवा औसत ब्याज ।
१०८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ७९½-
प्रक्षेपकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारे प्रक्षेपकुट्टीकारगणितं व्याख्यास्यामः ।
प्रक्षेपकरणमिदं सवर्गविच्छेदनाशयुतिहृतमिश्रः ।
प्रक्षेपगुणकारः कुट्टीकारो बुधैः समुद्दिष्टम् ॥ ७९½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुष्षड्भागैर्विभाज्यते द्विगुणषष्टिरिह हेम्नाम् ।
भृत्येभ्यो हि चतुर्भ्यो गणकाचक्ष्वाशु मे भागान् ॥ ८०½ ॥
प्रथमस्यांशत्रितयं त्रिगुणोत्तरतश्च पञ्चभिर्भक्तम् ।
दीनाराणां त्रिशतं त्रिषष्टिसहितं क एकांशः ॥ ८१½ ॥
आदाय चाम्बुजानि प्रविश्य सच्छावकोऽथ जिननिलयम् ।
पूजां चकार भक्त्या पूजार्हेभ्यो जिनेन्द्रेभ्यः ॥ ८२½ ॥
वृषभाय चतुर्थांशं षष्ठांशं शिष्टपार्श्वाय । द्वादशमथ जिनपतये त्र्यंशं मुनिसुव्रताय ददौ ॥ ८३½॥
नष्टाष्टकर्मणे जगदिष्टायारिष्टनेमयेऽष्टांशम् । षष्ठघ्नचतुर्भागं भक्त्या जिनशान्तये प्रददौ ॥ ८४½ ॥
कमलान्यशीतिमिश्राण्यायातान्यथ शतानि चत्वारि ।
कुसुमानां भागार्थं कथय प्रक्षेपकाख्यकरणेन ॥ ८५½ ॥
प्रक्षेप कुट्टीकार ( समानुपाती भाग )
इसके पश्चात् हम इस मिश्रक व्यवहार में समानुपाती भाग के गणित का प्रतिपादन करेंगे—
समानुपाती भाग की क्रिया वह है जिसमें दी गई ( समूह वाचक ) राशि पहिले ( विभिन्न
समानुपाती भागों का निरूपण करने वाले ) समान ( साधारण ) हर वाले भिन्नों के अंशों के योग द्वारा
विभाजित की जाती है । ऐसे समान हर वाले भिन्नों के हरों को उच्छेदित कर विचारते नहीं हैं ।
प्राप्त फल को प्रत्येक दशा में क्रमशः इन समानुपाती अंशों द्वारा गुणित करते हैं । इसे बुधजन (विद्वज्जन)
'कुट्टीकार' कहते हैं ॥ ७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में १२० स्वर्ण मुद्राएँ ४ नौकरों में क्रमशः १/२, १/३, १/४ और १/६ के भिन्नीय भागों में
बाँटी जाती हैं । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि उन्हें क्या मिला ? ॥ ८०½ ॥ ३६३ दीनारों
को पाँच व्यक्तियों में बाँटा गया । उनमें से प्रथम को ३ भाग मिले और शेष भाग को उत्तरोत्तर ३
की साधारण निष्पत्ति में बाँटा गया । प्रत्येक का हिस्सा बतलाओ ॥ ८१½ ॥ एक सच्चे श्रावक ने
किसी संख्या के कमल के फूल लिये और जिन मंदिर में जाकर पूज्यनीय जिनेन्द्रों की भक्तिभाव से
पूजा की । उसने वृषभ भगवान् को १/४, १/६ पूज्य पार्श्व भगवान् को, १/१२ जिन पति को, १/३ मुनि सुव्रत
भगवान् को भेंट किये; १/८ भाग आठों कर्मों का नाश करने वाले जगदिष्ट अरिष्टनेमि भगवान् को और
१/६ का १/४ शांति जिन भगवान् को भेंट किये । यदि वह ४८० कमल के फूल इस पूजा के लिये लाया हो
तो इस प्रक्षेप नामक क्रिया द्वारा फूलों का समानुपाती वितरण प्राप्त करो ॥ ८२½-८५½ ॥ ४८० की
( ७९½ ) ८०½ वीं गाथा के प्रश्न को इस नियमानुसार हल करने में हमें १/२, १/३, १/४, १/६ से
६/१२, ४/१२, ३/१२, २/१२ प्राप्त होते हैं । हरों को हटाने के पश्चात्, हमें ६, ४, ३, २ प्राप्त होते हैं । ये
प्रक्षेप अथवा समानुपाती अंश भी कहलाते हैं । इनका योग १५ है, जिसके द्वारा बाँटी जानेवाली रकम
- ६. ८९½ ] | मिश्रकव्यवहारः | [ १०९
--- | --- | ---
चत्वारि शतानि सखे युतान्यशीत्या नरैर्विभक्तानि ।
पञ्चभिराचक्ष्व त्वं द्वित्रिचतुःपञ्चषड्गुणितैः ॥ ८६½ ॥
इष्टगुणफलानयनसूत्रम्—
भक्तं रूपैर्मूल्यं गुणगुणितं तेन योजितं प्रक्षेपम् ।
तद्द्रव्यं मूल्यघ्नं क्षेपविभक्तं हि मूल्यं स्यात् ॥ ८७½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
फलगुणकारैर्हत्वा पणान् फलैरेव भागमादाय ।
क्षेपेषु ये गुणाः स्युस्त्रैराशिकः फलं वदेन्मतिमान् ॥ ८८½ ॥
अस्मिन्नर्थे पुनरपि सूत्रम्—
स्वफलहृताः स्वगुणघ्नाः पणास्तु तैर्भवति पूर्ववच्छेषः ।
इष्टफलं निर्दिष्टं त्रैराशिकसाधितं सम्यक् ॥ ८९½ ॥
रकम ५ व्यक्तियों में २, ३, ४, ५ और ६ के अनुपात में विभाजित की गई । हे मित्र ! प्रत्येक के हिस्से में कितनी रकम पड़ी ? ॥ ८६½ ॥
इष्ट गुणफल को प्राप्त करने के लिये नियम—
मूल्यदर
११० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ९०½-
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां त्रीणि त्रिभिः पञ्च पञ्चभिः सप्त मानकैः ।
दाडिमाम्रकपित्थानां फलानि गणितार्थवित् ॥ ९०½ ॥
कपित्थात् त्रिगुणं ह्याम्रं दाडिमं षड्गुणं भवेत् ।
क्रीत्वानय सखे शीघ्रं त्वं षट्सप्ततिभिः पणैः ॥ ९१½ ॥
दध्याज्यक्षीरघटैर्जिनबिम्बस्याभिषेचनं कृतवान् ।
जिनपुरुषो द्वासप्ततिपलैस्त्रयः पूरिताः कलशाः ॥ ९२½ ॥
द्वात्रिंशत्प्रथमघटे पुनश्चतुर्विंशतिर्द्वितीयघटे ।
षोडश तृतीयकलशे पृथक् पृथक् कथय मे कृत्वा ॥ ९३½ ॥
तेषां दधिघृतपयसां ततश्चतुर्विंशतिर्घृतस्य पलानि ।
षोडश पयःपलानि द्वात्रिंशद् दधिपलानीह ॥ ९४½ ॥
वृत्तिस्त्रयः पुराणाः पुंसश्चारोहकस्य तत्रापि । सर्वेऽपि पञ्चषष्टिः केचिद्भग्ना धनं तेषाम् ॥ ९५½ ॥
संनिहितानां दत्तं लब्धं पुंसा दशैव चैकस्य ।
के संनिहिता भग्नाः के मम संचिन्त्य कथय त्वम् ॥ ९६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अनार, आम और कपित्थ क्रमशः २ पण में ३, ३ पण में ५ और ५ पण में ७ की दर से प्राप्य
हैं। हे गणना के सिद्धांतों को जानने वाले मित्र ! ७६ पणों के फल लेकर शीघ्र आओ ताकि आमों की
संख्या कपित्थों की संख्या की तिगुनी हो और अनारों की संख्या ६ गुनी हो ॥ ९०½-९१½ ॥ किसी
जिनानुगामी ने जिन प्रतिमा का दही, घी और दुग्ध से पूरित कलशों द्वारा अभिषेक कराया ।
इनके ७२ पलों द्वारा ३ पात्र भर गये । प्रथम घट में ३२ पल, दूसरे घट में २४ तथा तीसरे में १६
पल पाये गये । इन दधि, घी, दूध मिश्रित पात्रों में मिश्रित द्रव्यों को अलग-अलग ज्ञात और प्राप्त
करो जबकि कुल मिलाकर २४ पल घी, १६ पल दूध और ३२ पल दही है ॥ ९२½-९४½ ॥
एक अश्वारोही सैनिक का वेतन ३ पुराण था । इस दर पर कुल ६५ व्यक्ति नियुक्त थे । उनमें से कुछ
मारे गये और उनके वेतन की रकम रणक्षेत्र में शेष रहनेवाले सैनिकों को दे दी गई । इस प्रकार,
प्रत्येक मनुष्य को १० पुराण प्राप्त हुए । मुझे बतलाओ कि रणक्षेत्र में कितने सैनिक खेत रहे और
कितने जीवित बचे ? ॥ ९५½-९६½ ॥
करते हैं । इस प्रकार हमें २/३ × ६, २/३ × ३, २/३ × १ से क्रमशः ४, २ और २/३ प्राप्त होते हैं । ये समानुपाती
भाग हैं । ८८½ और ८९½ सूत्रों में इन समानुपाती भागों के संबंध में प्रक्षेप की क्रिया का प्रयोग करना
पड़ता है । परन्तु, ८७½ करण नियम में यह क्रिया पूरी तरह वर्णित है ।
[-६. १०१½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १११
इष्टरूपाधिकहीनप्रक्षेपककरणसूत्रम्—
पिण्डोऽधिकरूपोनो हीनोत्तररूपसंयुतः शेषात् । प्रक्षेपककरणमतः कर्तव्यं तैर्युता हीनाः ॥ ९७½॥
अत्रोद्देशकः
प्रथमस्यैकांशोऽतो द्विगुणद्विगुणोत्तराद्भजन्ति नराः ।
चत्वारोऽशः कः स्यादेकस्य हि सप्तषष्टिरिह ॥ ९८½ ॥
प्रथमाद्ध्यर्धगुणात् त्रिगुणाद्रूपोत्तराद्विभाज्यन्ते ।
साष्टा सप्ततिरेभिश्चतुर्भीरांशकान् ब्रूहि ॥ ९९½ ॥
प्रथमाद्ध्यर्धगुणाः पञ्चार्धगुणोत्तराणि रूपाणि । पञ्चानां पञ्चाशत्सैका चरणत्रयाभ्यधिका॥१००½॥
प्रथमात्पञ्चार्धगुणारचतुर्गुणोत्तरविहीनभागेन ।
भक्तं नरैश्चतुर्भिः पञ्चदशोनं शतचतुष्कम् ॥ १०१½ ॥
समानुपाती भाग सम्बन्धी नियम, जहाँ मन से चुनी हुई कुछ पूर्णांक राशियों को जोड़ना अथवा घटाना होता है—
दी गई कुल राशि को जोड़ी जाने वाली पूर्णांक राशियों द्वारा ह्रासित किया जाता है, अथवा घटाई जानेवाली पूर्णांक धनात्मक राशियों में मिलाया जाता है । तब इस परिणामी राशि की सहायता से समानुपाती भाग की क्रिया की जाती है, और परिणामी समानुपाती भागों को क्रमशः उनमें जोड़ी जानेवाली पूर्णांक राशियों से मिला दिया जाता है; अथवा, वे उन घटाई जानेवाली पूर्णांक राशियों द्वारा क्रमशः ह्रासित की जाती हैं ॥ ९७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
चार मनुष्यों ने उत्तरोत्तर द्विगुणित समानुपाती भागों में और उत्तरोत्तर द्विगुणित अन्तरों वाले योग में अपने हिस्सों को प्राप्त किया । प्रथम मनुष्य को एक हिस्सा मिला । ६७ बाँटी जाने वाली राशि है । प्रत्येक के हिस्से क्या हैं ? ॥ ९८½ ॥ ७८ की रकम इन चार मनुष्यों में ऐसे समानुपाती भागों में वितरित की जाती है जो उत्तरोत्तर प्रथम से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से १½ गुणे हैं और ( योग में ) जिनका अन्तर एक से आरम्भ होकर तिगुना वृद्धि रूप है । प्रत्येक के द्वारा प्राप्त भागों के मान बतलाओ । ॥ ९९½ ॥ पाँच मनुष्यों के हिस्से क्रमिकरूपेण प्रथम से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से १½ गुने हैं, और योग में अन्तर की राशियाँ वे हैं जो उत्तरोत्तर ( पूर्ववर्ती अन्तर ) से २½ गुणी हैं । ५१¾ विभाजित की जाने वाली कुल राशि है । प्रत्येक के द्वारा प्राप्त भागों के मान बतलाओ ॥ १००½ ॥ ४०० ऋण १५ को चार मनुष्यों के बीच ऐसे भागों में विभाजित किया जाता है जो पहिले से आरम्भ होकर प्रत्येक पूर्ववर्ती से २½ गुणे हैं, और जो उन अंतरों द्वारा ह्रासित हैं जो उत्तरोत्तर पूर्ववर्ती अंतर से ४ गुने हैं । विभिन्न भागों के मानों के प्राप्त करो ॥१०१½॥
(९७½) समानुपाती भाग की क्रिया यहाँ ८७½ से ८९½ में दिये गये नियमों में से किसी भी एक के अनुसार की जा सकती है ।
( ९८½ ) हिस्सों में जोड़ी जानेवाली अंतर राशि यहाँ १ है जो दूसरे मनुष्य के संबंध में है । यह दो शेष मनुष्यों में से प्रत्येक के लिये पूर्ववर्ती अंतर की दुगुनी है । यह अंतर दूसरे मनुष्य के लिये स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है जैसा कि इस उदाहरण में १ उल्लिखित है । १००½ वीं गाथा और १०१½ वीं गाथा के उदाहरण में भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है ।
११२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १०२½-
समधनार्घानयनतज्ज्येष्ठधनसंख्यानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठधनं सैकं स्यात् स्वविक्रयेऽन्त्यार्घगुणमपैकं तत् ।
क्रयणे ज्येष्ठानयनं समानयेत् करणविपरीतात् ॥ १०२½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वावष्टौ षट्त्रिंशन्मूलं नृणां षडेव चरमार्घः । एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥१०३½॥
सार्धैकमर्धमर्धद्वयं च संगृह्य ते त्रयः पुरुषाः ।
क्रयविक्रयौ च कृत्वा षड्भिःपश्चार्घात्समधना जाताः ॥ १०४½ ॥
( व्यापार में लगाई गई ) सबसे ऊँची रकम ज्येष्ठ धन का मान तथा बेचने की तुल्य रकमें
उत्पन्न करने वाली कीमतों के मान को निकालने के लिये नियम—
लगाया गया सबसे बड़ा धन, १ में मिलाने पर ( बेची जाने वाली ) वस्तु के विक्रय की
दर हो जाता है । वही ( बेचने की दर ) जब शेष वस्तु की ( दी गई ) बेचने की कीमत द्वारा
गुणित होकर एक द्वारा हासित की जाती है तब खरीदने की दर उत्पन्न होती है। इस विधि को
विपर्यसित ( उल्टा ) करने पर कारबार में लगाया गया सबसे बड़ा धन निकाला जा सकता है ॥१०२½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन मनुष्यों ने क्रमशः २, ८ और ३६ रकमें लगाईं । ६ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं
बेची जाती हैं । उसी दर पर खरीद कर और बेच कर वे तुल्य धन वाले बन जाते हैं । खरीद और
बेचने की कीमतों को निकालो ॥ १०३½ ॥ उन्हीं तीन मनुष्यों ने क्रमशः १½, ½ और २½ धनों को
व्यापार में लगाया और उन्हीं कीमतों पर उसी वस्तु का क्रय और विक्रय किया । अंत में, शेष को
६ द्वारा निरूपित राशि में बेचने पर वे समान धन वाले बन गये । खरीदने और बेचने के दामों को
निकालो ॥ १०४½ ॥ समान धन वाली राशि ४१ है । जिस कीमत पर अन्त में शेष वस्तुएं बेची
१०२½ ) इस नियम पर किये जानेवाले प्रश्नों में, विभिन्न मूल रकमों से किसी साधारण दर पर कोई
वस्तु खरीदी हुई समझ ली जाती है । तब इस तरह खरीदी हुई वस्तु कोई अन्य साधारण दर पर बेची
जाती है । व्यापार में लगाये गये धन की इकाई में बेची जाने के लिये पर्याप्त न होने के कारण जितनी
वस्तु की मात्रा बच रहती है वह यहाँ पर 'शेष' कहलाती है । जिस कीमत पर यह 'शेष' बेची जाती है
उसे अवशिष्ट-मूल्य ( अंत्यार्घ ) कहते हैं । प्रतीक रूपसे, मानलो अ, अ + ब और अ + ब + स मूलधन
हैं । यहाँ अन्तिम ( अ + ब + स ) ज्येष्ठधन अर्थात् सबसे बड़ा धन है । मानलो प चरमार्घ ( अन्त्यार्घ )
अथवा अवशिष्ट-मूल्य है; तब, इस नियमानुसार अ + ब + स + १ = बेचने की दर; और ( अ + ब +
स + १ ) प - १ = खरीदने की दर होती हैं । यह सरलतापूर्वक दिखलाया जा सकता है कि वस्तु को
बेचने की दर पर और शेष को अवशिष्ट-मूल्य पर बेचने से जो रकमें प्राप्त होती हैं उनका योग प्रत्येक
दशा में एकसा होता है ।
यह आलोकनीय है कि खरीदने की दर, इस नियम पर आश्रित प्रश्नों में, समधन अथवा समान
विक्रयोदय ( बिक्री की रकमो ) के मान के समान होती है ।
-६. १०९½ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११३
चत्वारिंशत् सैका समधनसंख्या भवेच्च चरमार्घः ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं ज्येष्ठधनं किं च कानि मूलानि ॥ १०५½ ॥
समधनसंख्या पञ्चत्रिंशद्भवन्ति यत्र दीनाराः ।
चत्वारश्चरमार्थो ज्येष्ठधनं किं च गणक कथय त्वम् ॥ १०६½ ॥
चरमार्घभिन्नजातौ समधनार्घानयनसूत्रम्—
तुल्यापच्छेदधनान्त्यार्घार्भ्यां विक्रयक्रयार्थी प्राग्वत् ।
छेदच्छेदकृतिघ्नावनुपातात् समधनानि भिन्नेऽन्त्यार्धे ॥ १०७½ ॥
अर्धत्रिपादभागा धनानि षट्पञ्चमांशकाश्चरमार्घः ।
एकार्घेण क्रीत्वा विक्रीय च समधना जाताः ॥ १०८½ ॥
पुनरपि अन्त्यार्धे भिन्ने सति समधनानयनसूत्रम्—
ज्येष्ठांशाद्विद्विरहतिः सान्त्यहरा विक्रयोऽन्त्यमूल्यघ्नः ।
नैकोद्वयखिलहरघ्नः स्यात्क्रयसंख्यानुपातोऽथ ॥ १०९½ ॥
जाती हैं वह ६ है । हे अंकगणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि कौन सी सबसे ऊंची लगाई गई रकम
है और विभिन्न अन्य रकमें कौन-कौन हैं ? ॥ १०५½ ॥ उस दशा में जब कि ३५ दीनार समान धन
राशि है, और ४ वह कीमत है जिस पर शेष वस्तुएं बेची जाती हैं, हे गणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि
सबसे ऊंची लगाई जाने वाली रकम क्या है ? ॥ १०६½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय रूप में हों तब समान बेचने की रकमें उत्पन्न
करने वालो कीमतों के मान निकालने के लिये नियम—
अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्य अर्घ ) भिन्नीय होने पर बेचने और खरीदने की दरों को पहिले की
भाँति प्राप्त करते हैं जब कि लगाई गई रकमों और अवशिष्ट-कीमत को समान हर वाला बना कर
उपयोग में लाते हैं । यह हर इस समय उपेक्षित कर दिया जाता है । तब इष्ट बेचने और खरीदने
की दरों को प्राप्त करने के लिये इष्ट बेचने और खरीदने की दरों को इस हर और हर के वर्ग द्वारा
गुणित करते हैं । तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को त्रैराशिक के नियम द्वारा प्राप्त
करते हैं ॥ १०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यापार में ½, ¾, ⅚ तीन व्यक्तियों द्वारा लगाई गई रकमें हैं। अवशिष्ट-कीमत
( अन्त्यार्घ ) ६/५ है। उन्हीं कीमतों पर खरीदने और बेचने पर वे समान धन राशि वाले बन जाते हैं।
बेचने की कीमत और खरीदने की कीमत तथा समान विक्रय-धन निकालो ॥ १०८½ ॥
जब अवशिष्ट-कीमत ( अन्त्यार्घ ) भिन्नीय हो तब समान विक्रयोदय ( बेचने की रकमों ) को
निकालने के लिये दूसरा नियम—
सबसे बड़े अंश, दो और ( लगाई गई मूल रकमों के प्राप्य ) हरों का संतत गुणनफल जब अव-
शिष्ट-मूल्य के मान के हर में जोड़ा जाता है तब बेचने की दर उत्पन्न होती है । जब इसे अवशिष्ट-मूल्य
( अन्त्यार्घ ) से गुणित कर और १ द्वारा हासित कर और फिर उत्तरोत्तर दो तथा समस्त हरों द्वारा
गुणित किया जाता है, तब खरीदने की दर प्राप्त होती है। तत्पश्चात्, त्रैराशिक की सहायता से
बेचने की रकमों ( sale-proceeds ) का साधारण मान प्राप्त होता है ॥ १०९½ ॥
१०५½ ) यहाँ आलोचनीय है कि इस नियमानुसार केवल सबसे बड़ी रकम निकाली जाती है ।
अन्य रकमें मन से चुन ली जाती हैं, ताकि वे सबसे बड़ी रकम से छोटी हों ।
ग० सा० सं०-१५
] जो कि इस दी गई उपांतिम राशि से संयवित (associated) है । सब विभिन्न दी गई राशियों -> wait, "संयवित" or "संयुत"?
Look at line 25: संयवित -> wait, letter is सं, then य, then वि or चि? No, सं य वि त? Wait, let's zoom in on line 25:
"संयवित" -> wait, सं य वि त? Or संबंधित?
Wait! Look at the characters:
स with anusvara: सं
next: ब? No, it has y loop: य? Or बं? Wait, let's look at संयोजित?
Wait, सं then य then वि? No, सं then य then चि?
Wait, "associated" in Hindi is often "संबंधित" or "संयोजित"!
Look at the letters:
स + anusvara (सं)
then ब? No, look at संबंधित:
Wait, look at line 25:
स with anusvara (सं)
then य or व? Wait: संबन्धित?
Wait, there is a व?
Let's read: सं य `
११५३or११५ १/२? Let's look at the header: -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Ah, it's -६. ११५३ ]or-६. ११५ १/२ ]? Let's look at the fraction: ११५with a horizontal line and२below. Yes,११५ १/२` (115 1/2).
- Let's look at the verse number:
११५३or११५ १/२? It's११५३or११५ १/२? It's११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write११५३or११५ १/२? Let's write `१
११६ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ११५½
अन्तिम अयुग्म स्थिति क्रम वाले अल्पतम शेष में जोड़कर परिणामी योगफल को ऊपर की भाजन श्रृंखला
के अन्तिम भाजक द्वारा विभाजित करने के पश्चात् प्राप्त संख्या को रखना चाहिये । इस प्रकार 'इस बाद
वाचक मान' को निकालना इष्ट होता है । अब इस नियम के अनुसार हम पहिले राशि अथवा समूह-
वाचक संख्या ६३ को छेद अथवा भाजक २३ द्वारा भाजित करते हैं, और तब हम जिस प्रकार दो
संख्याओं का महत्तम समापवर्त्य निकालते हैं उसी प्रकार की भाग विधि को यहाँ जारी रखते हैं ।
२३ ) ६३ ( २ यहाँ प्रथम भजनफल २ को उपेक्षित कर दिया
४६ १ जाता है; अन्य भजनफल बाजू के स्तम्भ में एक पंक्ति में
१७ ) २३ ( १ २ एक के नीचे एक लिखे गये हैं । अब हमें एक ऐसी
१७ १ संख्या चुनना पड़ती है जो जब अन्तिम शेष १ के द्वारा
६ ) १७ ( २ ४ गुणित की जाती है, और फिर ७ में जोड़ी जाती है, तो
१२ वह अन्तिम भाजक १ के द्वारा भाजन योग्य होती है ।
५ ) ६ ( १ इसलिये, हम १ को चुनते हैं, जो श्रृंखला में अन्तिम अंक
५ के नीचे लिखा हुआ है । इस चुनी हुई संख्या के नीचे,
१ ) ५ । ४ फिरसे चुनी हुई संख्या की सहायता से, उपर्युक्त भाग में
४ प्राप्त भजनफल लिखा जाता है । इस प्रकार हमें बाजू में
१ प्रथम स्तम्भ के अंकों में श्रृंखला अथवा वल्लिका प्राप्त
यहाँ हम पाँचवें शेष के साथ ही हो जाती है । तब हम श्रृंखला के नीचे उप अन्तिम अंक
भाग रोक देते हैं, क्योंकि वह भाजन अर्थात् १ को लिखकर उसके ऊपर के अंक ४ द्वारा गुणित
की श्रेणियों में अयुग्म स्थिति क्रम वाला करते हैं, और ८ जोड़ते हैं । यह ८, श्रृंखला की अंतिम
अल्पतम शेष है । संख्या है । परिणामी १२ इस तरह लिख दिया जाता है
१ — ५१ ताकि वह ४ के संवादी स्थान में हो । तत्पश्चात् इस १२ को
२ — ३८ वल्लिका श्रृंखला में उसके ऊपर के अंक १ द्वारा गुणित करते
१ — १३ हैं और १ जोड़ने पर (जो कि उसके उसी प्रकार नीचे है)
४ — १२ हमें १३ एक के संवादी स्थान में प्राप्त होता है । इसी
१ प्रकार, क्रिया को जारी रखकर हमें ३८ और ५१ भी प्राप्त
८
होते हैं जो २ और १ के संवादी स्थान में प्राप्त किये जाते हैं। इस ५१ को २३ द्वारा भाजित किया
जाता है; और शेष ५ एक गुच्छे में फलों की अल्पतम संख्या दृष्टिगत होती है । निम्नलिखित बीजीय
निरूपण द्वारा इस नियम का मूलभूत सिद्धान्त ( rationale ) स्पष्ट हो जावेगा—
( वा क + ब ) / आ = ख ( जो एक पूर्णांक है ) = फ₁ क + प₁, जहाँ प₁ = [ ( वा - आफ₁ ) क + ब ] / आ
∴ क = ( आ प₁ - ब ) / र₁, ( जहाँ र₁ = वा - आफ, जो प्रथम शेष है ) = फ₂ प₁ + प₂, जहाँ प₂
= ( र₂ प₁ - ब ) / र₁, और फ₂ दूसरा भजनफल है तथा र₂ दूसरा शेष है ।
इसलिये, प₁ = ( र₁ प₂ + ब ) / र₂ = फ₃ प₂ + प₃, जहाँ प₃ = ( र₃ प₂ + ब ) / र₂ और फ₃ तीसरा
भजनफल तथा र₃ तीसरा शेष है ।
An elegant, line-by-line transcription of the page in pure Unicode Devanagari is provided below.
-६. ११५३] मिश्रकव्यवहारः [ ११७
के मिश्रित प्रश्न के हल के लिये इष्ट लता समान अंकों की शृङ्खला प्राप्त की जाती है । यह शृङ्खला
पहिले की भाँति नीचे से ऊपर की ओर बर्त्ती जाती है और, पहिले की तरह, परिणामी संख्या को इस
इसी तरह, प₂ = (र₂ प₃ - ब) / र₃ = फ४ प₃ + प४, जहाँ प४ = (र४ प₃ - ब) / र₃ है ; प₃ = (र₃ प४ + ब) / र४
= फ५ प४ + प५, जहाँ प५ = (र५ प४ + ब) / र४ है । इस प्रकार हमें निम्नलिखित सम्बन्ध प्राप्त होते हैं -
क = फ₂ प₁ + प₂ ; प₁ = फ₃ प₂ + प₃ ; प₂ = फ४ प₃ + प४ ; प₃ = फ५ प४ + प५ ;
प४ का मान इस तरह चुनते हैं ताकि (र५ प४ + ब) / र४ ( जो कि ऊपर बतलाए अनुसार प५ का मान
है ), एक पूर्णांक बन जावे । इस प्रकार, शृंखला फ₂, फ₃, फ४, प
११८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ११५½-
अन्तिम भाजन शृङ्खला के प्रथम भाजक द्वारा विभाजित करते हैं । ( इस क्रिया में प्राप्त ) शेष को
(अधिक बड़े समूह वाचक मान सम्बन्धी) भाजक द्वारा गुणित करते हैं, और परिणामी गुणनफल में इस
अधिकबड़े समूह वाचक मान को जोड़ देते हैं । ( इस प्रकार दी गई समूह संख्या के इष्ट गुणक का
मान प्राप्त किया जाता है, जो दो विचाराधीन विशिष्ट विभाजनों का समाधान करता है ) ॥११५½॥
इस विधि का मूल भूत सिद्धान्त ( rationale ) निम्नलिखित विमर्श से स्पष्ट हो जावेगा—
( १ ) (बा₁क + व₁) / आ₁ पूर्णांक है; ( २ ) (बा₂क + व₂) / आ₂ पूर्णांक है; और ( ३ ) (बा₃क + व₃) / आ₃ पूर्णांक है ।
( १ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₁ है ।
( २ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₂ है ।
( ३ ) में मानलो क का अल्पतम मान = स₃ है ।
( ४ ) जब (१) और (२) दोनों का समाधान करना पड़ता है, तब दआ₁ + स₁ को क्षआ₂
- स₂ के तुल्य होना पड़ता है, ताकि स₁ - स₂ = क्षआ₂ - दआ₁ हो; अर्थात्, [आ₁द + (स₁ - स₂)] / आ₂
= क्ष, हो ।
अज्ञात मानवाली राशियों द और क्ष सहित होने से अनिर्धृत ( indeterminate )
समीकरण ( ४ ) से, जैसा कि पहले ही सिद्ध किया जा चुका है उसके अनुसार, द के अल्पतम धनात्मक
पूर्णांक को प्राप्त कर सकते हैं । द के इस मान को आ₁ द्वारा गुणित करने, और तब स₁ में जोड़ने पर
क का मान प्राप्त होता है जो ( १ ) और ( २ ) का समाधान करता है ।
मानलो यह त₁ है, और इन दोनों समीकारों का समाधान करने वाला क का और अधिक बड़ा
मान मानलो त₂ है ।
( ५ ) अब, त₁ + नआ₁ = त₂ है,
( ६ ) और, त₁ + मआ₂ = त₂ है ।
∴ आ₁ / आ₂ = म / न . इस प्रकार, आ₁ = म . प, और आ₂ = न . प, जहाँ आ₁ और आ₂ का
सबसे बड़ा साधारण गुणनखंड ( मह. समा. ) प है । ∴ म = आ₁ / प , और न = आ₂ / प .
( ५ ) अथवा ( ६ ) में इनका मान रखने पर, त₁ + (आ₁ आ₂) / प = त₂ होता है ।
इससे स्पष्ट है कि क का दूसरा उच्चतर मान जो दो समीकरणों का समाधान करता है वह आ₁
और आ₂ के लघुत्तम समापवर्त्य को निम्नतर मान में जोड़ने पर प्राप्त होता है ।
फिर से, मानलो तीनों सभी समीकारों का समाधान करने वाले क का मान व है ।
तब, व = त₁ + (आ₁ आ₂) / प × र, ( जहाँ र धनात्मक पूर्णांक है ) = ( मानलो ) त₁ + लर और
व = स₂ + ष आ₃ = त₁ + ल र , ∴ र = (ष आ₃ + स₃ - त₁) / ल होगा ।
पिछले समीकार में वल्लिका कुट्टीकार के सिद्धान्त का प्रयोग करने पर ष का मान प्राप्त हो जाता
-६. १२०$\frac{१}{२}$ ] मिश्रकव्यवहारः [ ११९
अत्रोद्देशकः
जम्बूजम्बीररम्भाक्रमुकपनसखर्जूरहिन्तालताली-
पुन्नागाम्राद्यनेकद्रुमकुसुमफलैर्नम्रशाखाधिरूढम् ।
भ्राम्यद्भृङ्गाब्जवापीशुकपिककुलनानाध्वनिव्याप्तदिकं
पान्थाः श्रान्ता वनान्तं श्रमनुदममलं ते प्रविष्टाः प्रहृष्टाः ॥ ११६$\frac{१}{२}$ ॥
राशित्रिषष्टिः कदलीफलानां संपीड्य संक्षिप्य च सप्तभिस्तैः ।
पान्थैस्त्रयोविंशतिभिर्विशुद्धा राशेस्त्वमेकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११७$\frac{१}{२}$ ॥
राशीन् पुनर्द्वादश दाडिमानां समस्य संक्षिप्य च पञ्चभिस्तैः ।
पान्थैर्नैरैर्विंशतिभिर्निरैकैर्भक्तांस्तथैकस्य वद प्रमाणम् ॥ ११८$\frac{१}{२}$ ॥
दृष्ट्वाम्राशीन् पथिको यथैकत्रि