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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

प्रकीर्णक व्यवहार एवं त्रैराशिक व्यवहार (Proportion & Ratios)

८२ ] गणितसारसंग्रहः ४. ७१- ]
द्विभक्तनवमांशकप्रहतसप्तविंशांशकः प्रमोदमवतिष्ठते करिकुलस्य पृथ्वीतले ।
विनीलजलदाकृतिर्विहरति त्रिभागो नगे वद त्वमधुना सखे करिकुलप्रमाणं मम ॥ ७१ ॥
साधूत्कृतेर्निवसति षोडशांशकस्त्रिभाजितः स्वकगुणितो वनान्तरे ।
पादो गिरौ मम कथयाशु तन्मितिं प्रोत्तीर्णवान् जलधिसमं प्रकीर्णकम् ॥ ७२ ॥
इति भिन्नदृश्यजातिः ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ प्रकीर्णको नाम तृतीयव्यवहारः समाप्तः ॥
को उसी झुंड के १/९ वें भाग से गुणित करने तथा २ द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल प्रमाण के
हाथी मैदान में प्रसन्न दशा में तिष्ठे हैं । शेष ( बचा हुआ ) १/३ भाग झुंड जो बादलों के समान अत्यन्त
काले हाथियों का है, पर्वत पर क्रीड़ा कर रहा है । हे मित्र ! बतलाओ कि हाथियों के झुंड का
संख्यात्मक मान क्या है ? ॥ ७१ ॥ साधुओं के समूह का १/१६ वां भाग ३ द्वारा विभाजित करने के
पश्चात् स्व द्वारा गुणित ( अर्थात् १/१६ ÷ ३ द्वारा गुणित ) करने से प्राप्त भाग प्रमाण वन के अन्तः भाग
में रह रहा है; उस समूह का ( बचा रहने वाला ) १/४ भाग पर्वत पर रह रहा है । हे जलधि सम
प्रकीर्णक के प्रोत्तीर्णवान् ! मुझे शीघ्रही साधुओं के समूह का संख्यात्मक मान बतलाओ । ॥७२॥
इस प्रकार, 'भिन्न दृश्य' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में 'प्रकीर्णक' नामक तृतीय
व्यवहार समाप्त हुआ ।

  • र/य क = ० से स्पष्ट है ।
    (७१) 'पृथ्वी' शब्द जो इस गाथा में आया है, उसका अर्थ पृथ्वी है तथा यह उस छन्द का
    नाम भी है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।

५. त्रैराशिकव्यवहारः
त्रिलोकबन्धवे तस्मै केवलज्ञानभानवे । नमः श्रीवर्धमानाय निर्धूताखिलकर्मणे ॥ १ ॥
इतः परं त्रैराशिकं चतुर्थव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
तत्र करणसूत्रं यथा—
त्रैराशिकेऽत्र सारं फलमिच्छासंगुणं प्रमाणाप्तम् ।
इच्छाप्रमयोः साम्ये विपरीतेयं क्रिया व्यस्ते ॥ २ ॥
पूर्वार्धोद्देशकः
दिवसैस्त्रिभिः सपादैर्योजनषट्कं चतुर्थभागोनम् । गच्छति यः पुरुषोऽसौ दिनयुतवर्षेण किं कथय ॥३॥
व्यर्धाष्टाभिरहोभिः क्रोशाष्टांशं स्वपञ्चमं याति ।
पङ्गुः सपञ्चभागैर्वर्षैस्त्रिभिरत्र किं ब्रूहि ॥ ४ ॥
अङ्गुलचतुर्थभागं प्रयाति कीटो दिनाष्टभागेन । मेरोर्मूलाच्छिखरं कतिभिरहोभिः समाप्नोति ॥५॥
१ P, K और M में स्व के लिये स पाठ है ।
५. त्रैराशिकव्यवहार
तीनों लोकों के बन्धु तथा सूर्य के समान केवल ज्ञान के धारी श्री वर्द्धमान को नमस्कार है
जिन्होंने समस्त कर्म ( मल ) को निर्धूत कर दिया है । ॥१॥
इसके पश्चात्, हम त्रैराशिक नामक चतुर्थ व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
त्रैराशिक सम्बन्धी नियम—
यहाँ त्रैराशिक नियम में, फल को इच्छा द्वारा गुणित कर प्रमाण द्वारा विभाजित करने से
इष्ट उत्तर प्राप्त होता है, जब कि इच्छा और प्रमाण समान ( अनुक्रम direct अनुपात में ) होते
हैं । जब यह अनुपात प्रतिलोम ( inverse ) होता है तब यह गुणन तथा भाग की क्रिया विपरीत हो
जाती है ( ताकि भाग की जगह गुणन हो और गुणन के स्थान में भाग हो ) । ॥२॥
पूर्वार्ध, अनुक्रम त्रैराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
वह मनुष्य जो ३ १/४ दिन में ५ ३/४ योजन जाता है, १ वर्ष और १ दिन में कितनी दूर जाता है ?
॥३॥ एक लंगड़ा मनुष्य ७ १/२ दिन में एक क्रोश का १/८ तथा उसका १/५ भाग चलता है । बतलाओ वह
३ १/५ वर्षों में कितनी दूरी तय करता है ? ॥४॥ एक कीड़ा १/८ दिन में १/४ अंगुल चलता है । बतलाओ कि
वह मेरुपर्वत की तली से उसके शिखर पर कब पहुँचेगा ? ॥५॥ वह मनुष्य जो ३ १/२ दिन में १ १/४ कार्षा-
( २ ) प्रमाण और फल के द्वारा अर्घ ( rate ) प्राप्त होती है । फल, इष्ट उत्तर के समान
राशि होती है और प्रमाण, इच्छा के समान होता है । 'इच्छा' वह राशि है जिसके विषय में, किसी अर्घ
( दर ) से, कोई वस्तु निकालना होती है । जैसे कि गाथा ३ के प्रश्न में ३ १/४ दिन प्रमाण है, ५ ३/४ योजन
फल है, और १ वर्ष १ दिन इच्छा है ।
( ५ ) मेरु पर्वत की ऊँचाई ९९,००० योजन अथवा ७६,०३२,०००,००० अंगुल मानी जाती है ।

८४ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ६-

कार्षापणं सपादं निर्विशति त्रिभिरहोभिरर्धयुतैः । यो ना पुराणशतकं सपणं कालेन केनासौ ॥६॥

कृष्णागुरुसत्खण्डं द्वादशहस्तायतं त्रिविस्तारम् । क्षयमेत्यङ्गुलमहः क्षयकालः कोऽस्य वृत्तस्य ॥७॥

स्वर्णैर्दशभिः सार्धैर्द्रोणाढककुडुबमिश्रितः क्रीतः । वरराजमाषवाहः किं हेमशतेन सार्धेन ॥ ८ ॥

सार्धैस्त्रिभिः पुराणैः कुङ्कुमपल मष्टभागसंयुक्तम् । संप्राप्यं यत्र स्यात् पुराणशतकेन किं तत्र ॥ ९ ॥

सार्धार्द्रक सप्रपलैश्चतुर्दशार्धोनिताः पण लब्धाः । द्वात्रिंशदार्द्रकपलैः सपञ्चमैः किं सखे ब्रूहि ॥१०॥

कार्षापणैश्चतुर्भिः पञ्चाशायुतैः पलानि रजतस्य । षोडश सार्धानि नरो लभते किं कर्षनियुतेन ॥११॥

कर्पूरस्याष्टपलैस्त्र्यंशोनैर्नात्र पञ्च दीनारान् । भागांशकलायुक्तान् लभते किं पलसहस्रेण ॥ १२ ॥

सार्धैस्त्रिभिः पणैरिह घृतस्य पलपञ्चकं सपञ्चांशम् । क्रीणाति यो नरोऽयं किं सार्धमकर्षशतकेना ॥१३॥

सार्धैः पञ्चपुराणैः षोडश सदलानि वस्त्रयुगलानि । लब्धानि सैकषष्ट्या कर्षाणां किं सखे कथय ॥१४॥

वापी समचतुरश्रा सलिलवियुक्ताष्टहस्तघनमाना । शैलस्तस्यास्तीरे संमुत्थितः शिखरतस्तस्य ॥१५॥

वृत्ताङ्गुलविष्कम्भा जलधारा स्फटिकनिर्मला पतिता ।

वाप्यन्तरजलपूर्णा नगोच्छ्रितिः का च जलसंख्या ॥ १६ ॥

१ B में सत्कृष्णागुरुखण्डं पाठ है । २ M और B में लभ्याः पाठ है । ३ B में समुत्थिता शि पाठ है ।

पण उपयोग में लाता है वह १ पण सहित १०० पुराण कितने दिन में खर्च करेगा ।॥६॥ १२ हाथ

लम्बे ( आयत ) तथा ३ हाथ व्यास ( विस्तार ) वाले कृष्णागुरु का सत्खंड ( अच्छा टुकड़ा ) एक दिन

में एक घन अंगुल के अर्घ ( rate ) से क्षय होता है । बतलाओ कुल बेलनाकार टुकड़े को क्षय

होने में कितना समय लगेगा ? ॥७॥ १० १/२ स्वर्ण में श्रेष्ठ काले चने का १ वाह, १ द्रोण, १ आढक और

१ कुडव खरीदे जाते हैं । बतलाओ १०० १/२ स्वर्ण में कितना कितना प्रमाण खरीदा जा सकेगा ? ॥८॥

यदि ३ १/२ पुराणों के द्वारा १ १/८ पल कुङ्कुम प्राप्त हो सकता हो तो १०० पुराणों में कितना प्राप्त हो सकेगा ?

॥९॥ ७ १/२ पल 'आर्द्रक' के द्वारा १३ १/२ पण प्राप्त किये गये । हे मित्र ! ३२ २/५ पल आर्द्रक में क्या प्राप्त

होगा ? ॥१०॥ ४ ३/४ कार्षापण में एक मनुष्य १६ १/२ पल रजत प्राप्त करता है तो उसे १००,००० कर्ष में

कितनी रजत प्राप्त होगी ? ॥११॥ ७ २/३ पल कर्पूर के द्वारा एक मनुष्य ५ दीनार तथा १ भाग, १ अंश

और १ कला प्राप्त करता है । बतलाओ कि उसे १००० पल के द्वारा क्या प्राप्त होगा ? ॥१२॥ वह

मनुष्य जो ३ १/२ पण में ५ ३/५ पल घी प्राप्त करता हो तो वह १०० १/२ कर्ष में कितना प्राप्त करेगा ? ॥१३॥ ५ १/२

पुराण के द्वारा एक मनुष्य १६ १/२ युगल वस्त्र प्राप्त करता है । हे मित्र ! ६१ कर्ष में उसे कितने प्राप्त होंगे ?

जल रहित एक वर्गाकार कूप ५१२ घन हस्त है । उसके तीर पर एक पहाड़ी है । उसके

शिखर से स्फटिक की भाँति निर्मल जल धारा जिसके वर्त्तुल छेद ( circular section ) का व्यास

१ अंगुल है, तली में गिरती है और कूप पानी से पूरी तरह भर जाता है । पहाड़ी की ऊँचाई क्या है

तथा पानी का माप ( संख्यात्मक मान में ) क्या है ? ॥१५-१६॥ किसी राजा ने संक्रांति के अवसर पर

( ७ ) यहाँ क्रिया में दिये गये व्यास से रंभ ( बेलन ) के अनुप्रस्थ छेद ( cross-section )

का क्षेत्रफल शत मान लिया जाता है । वृत्त का क्षेत्रफल अनुमानतः व्यास के वर्ग को ४ द्वारा भाजित

कर और ३ द्वारा गुणित करने से प्राप्त राशि मान लिया जाता है ।

कृष्णागुरु एक प्रकार की सुगन्धित लकड़ी है जिसे सुगन्ध के लिए अग्नि में जलाते हैं ।

(१५-१६) इस प्रश्न में पानी की धारा की लम्बाई पर्वत की ऊँचाई के बराबर है, जिससे ज्योंही

वह पर्वत की तली में पहुँचती है, त्योंही वह शिखर से बहना बंद हुई मान ली जाती है । वाहों में

-५. २० ] त्रैराशिकव्यवहारः [ ८५
मुद्गद्रोणयुगं नवाज्यकुडुबान् षट् तण्डुलद्रोणका-
नष्टौ वस्त्रयुगानि वत्ससहिता गाष्षट् सुवर्णत्रयम् ।
संक्रान्तौ ददता नराधिपतिना षड्भ्यो द्विजेभ्यः सखे
षट्त्रिंशत्त्रिशतेभ्य आशु वद किं तद्दत्तमुद्गादिकम् ॥ १७ ॥
इति त्रैराशिकः ।
व्यस्तत्रैराशिके तुरीयपादस्योद्देशकः
कल्याणकनकनवतेः कियन्ति नववर्णकानि कनकानि ।
साष्टांशकदशवर्णकसगुञ्जहेम्नां शतस्यापि ॥ १८ ॥
व्यासेन दैर्घ्येण च षट्कराणां चीनाम्बराणां त्रिशतानि तानि ।
त्रिपञ्चहस्तानि कियन्ति सन्ति व्यस्तानुपातक्रमविद्वद त्वम् ॥ १९ ॥
इति व्यस्तत्रैराशिकः ।
व्यस्तपञ्चराशिक उद्देशकः
पञ्चनवहस्तविस्तृतदैर्ध्यायां चीनवस्त्रसप्तत्याम् । द्वित्रिकरव्यासायति तच्छ्रुतवस्त्राणि कति कथय ॥२०॥
१ इस श्लोक के स्थान में B और K में निम्न

८६ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. २१-
व्यस्तसप्तराशिक उद्देशकः
व्यासायामोदयतो बहुमाणिक्ये चतुर्नवाष्टकरे ।
द्विषडेकहस्तमितयः प्रतिमाः कति कथय तीर्थकृताम् ॥ २१ ॥
व्यस्तनवराशिक उद्देशकः
विस्तारदैर्घ्योदयतः करस्य षट्त्रिंशदष्टप्रमिता नवार्घा ।
शिला तया तु द्विषडेकमानास्ताः पञ्चकार्घाः कति चैत्ययोग्याः ॥ २२ ॥
इति व्यस्तपञ्चसप्तनवराशिकाः ।
गतिनिवृत्तौ सूत्रम् —
निजनिजकालोद्गतयोर्गमननिवृत्त्योर्विशेषणाज्जाताम् ।
दिनशुद्धगतिं न्यस्य त्रैराशिकविधिमतः कुर्यात् ॥ २३ ॥
अत्रोद्देशकः
क्रोशस्य पञ्चभागं नौर्याति दिनत्रिसप्तभागेन । वोधौ¹ वाताविद्धा प्रत्येति क्रोशनवमांशम् ॥ २४ ॥
कालेन केन गच्छेत् त्रिपञ्चभागोनयोजनशतं सा ।
संख्याब्धिसमुत्तरणे बाहुबलिंस्त्वं समाचक्ष्व ॥ २५ ॥
१ B और K में तस्मिन्काले वार्धौ, पाठ है ।
व्यस्त सप्तराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
बतलाओ कि ४ हस्त चौड़े, ९ हस्त लम्बे, ८ हस्त ऊंचे बड़े मणि में से २ हस्त चौड़ी ६
हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची तीर्थंकरों की कितनी प्रतिमाएँ बन सकेंगी ? ॥२१॥
व्यस्त नव राशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जिसकी कीमत ९ है ऐसी ६ हस्त चौड़ी ३० हस्त लम्बी तथा ८ हस्त ऊँची एक शिला दी
गई है। बतलाओ कि जिन मंदिर बनवाने के लिये इस शिला में से, जिसकी कीमत ५ है ऐसी २
हस्त चौड़ी ६ हस्त लम्बी तथा १ हस्त ऊँची कितनी शिलायें प्राप्त हो सकेंगी ? ॥२२॥
इस प्रकार व्यस्त पंचराशिक, सप्तराशिक और नवराशिक प्रकरण समाप्त हुआ।
गति निवृत्ति सम्बन्धी नियम—
दिन की शुद्ध गति को लिखो जो अग्र तथा पश्च ( आगे तथा पीछे की ओर होने वाली )
गतियों के दिये गये अर्घों ( rates ) के अन्तर से प्राप्त होती है, जबकि इन अर्घों में से प्रत्येक को
प्रथम उनके विशिष्ट समयों द्वारा विभाजित कर लिया जाता है। और तब, इस शुद्ध दैनिक गति के
सम्बन्ध में त्रैराशिक नियम की क्रिया करो।
उदाहरणार्थ प्रश्न
३/७ दिन में, एक जहाज समुद्र में १/५ क्रोश जाती है; उसी समय वह पवन के विरोध से १/९
क्रोश पीछे हट जाती है। हे संख्या समुद्र को पार करने के अर्थ बाहुबल धारी ! बतलाओ कि वह
जहाज ९९ २/५ योजन कितने समय में जावेगी ? ॥२४-२५॥ एक मनुष्य जो ३½ दिनों में १४½ स्वर्ण

ghatoṁ)?
Wait, look at: 'पदों द्वारा'! In Hindi, it's definitely printed as "पदों द्वारा" or "घटों द्वारा"?
Wait, look at the first letter: it's 'प'!
Wait, why would Hindi say "पदों द्वारा"?
Wait, could "षट्पद" be split as "षट्पद-पद"?
No, what if the Sanskrit text in this edition has a typo, or literally reads:
"षट्पदपदोद्भिन्नाङ्घ्रिगण्डस्थलः" or "षट्पदप्रोद्भिन्नाङ्ग"?
Wait, let's search for this exact verse:
Verse 27:
"गन्धेभो मदलुब्धषट्पद..."
"सार्धं योजनपञ्चमं व्रजति यः षड्भिर्दलोनैर्दिनैः ।"
"प्रत्यायाति दिनैस्त्रिभिश्च सदलैः क्रोशद्विपञ्चांशकं"
"ब्रूहिक्रोशदलोनयोजनशतं कालेन केनाप्नुयात् ॥ २७ ॥"

LOOK AT THE PROBLEM:
Forward rate:
"सार्धं योजनपञ्चमं व्रजति यः षड्भिर्दलोनैर्दिनैः ।"
= goes 1 1/2 of 1/5 yojana (or 1/5 + 1/2? "सार्धं योजनपञ्चमं" = 1/5

८८ ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ३२ -
पञ्चसप्तनवराशिकेषु करणसूत्रम्—
लोभं नीत्वान्योन्यं विभजेत् पृथुपङ्क्तिमल्पया पंक्त्या ।
गुणयित्वा जीवानां क्रयविक्रययोस्तु तानेव ॥ ३२ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वित्रिचतुःशतयोगे पञ्चाशत्षष्टिसप्ततिपुराणाः । लाभार्थिना प्रयुक्ता दशमासेष्वस्य का वृद्धिः ॥३३॥
हेम्नां सार्धाशीतेर्मासत्र्यंशेन वृद्धिरध्यर्धा । सत्रिचतुर्थनवत्याः कियती पादोनषण्मासैः ॥३४॥
१ P में निम्नलिखित पाठान्तर है ।
प्रकारान्तरेण सूत्रम्—
संक्रम्य फलं छिन्द्याल्लघुपंक्त्यानेकराशिकां पंक्तिम् । स्वगुणामश्वादीनां क्रयविक्रययोस्तु तानेव ।
अन्यदपि सूत्रम्—
संक्रम्य फलं छिन्द्यात् पृथुपंक्त्यभ्यासमन्यया पंक्त्या । अश्वादीनां क्रयविक्रययोरश्वादिकांश्च संक्रम्य ॥
B केवल बाद का श्लोक दिया गया है जिसके दूसरे चौथाई भाग का पाठान्तर यह है—
पृथुपंक्त्यभ्यासमल्पपंक्त्याहृत्या ।
साथ गुणित करने के पश्चात् ), सबको साथ लेकर गुणित की गई विभिन्न राशियों की छोटी संख्याओं
वाली पंक्ति द्वारा विभाजित करना चाहिये । परन्तु, जीवित पशुओं को बेचने और खरीदने के प्रश्नों में
केवल उन्हें प्ररूपण करनेवाली संख्याओं के सम्बन्ध में ही पक्षान्तरण करते हैं ॥३२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यक्ति द्वारा ५०, ६० और ७० पुराण क्रमशः २, ३ और ४ प्रतिशत प्रतिमास के अर्घ
( दर ) से लाभ के लिये ब्याज पर दिये गये । दस माह में उसे कितना ब्याज प्राप्त होगा ? ॥३३॥
१/३ मास में ८० १/२ स्वर्ण मुद्राओं पर ब्याज १ १/२ होता है । ५ ३/४ माह में ९० ३/४ स्वर्ण मुद्राओं पर वह
कितना होगा ? ॥३४॥ वह जो १६ वर्ण के १०० स्वर्ण खंडों में २० रत्न प्राप्त करता है तो १० वर्ण
( ३२ ) फल का पक्षान्तरण तथा अन्य कथित क्रियायें निम्नलिखित साधित उदाहरण से स्पष्ट हो
जावेंगी । गाथा ३६ के प्रश्न में दिया गया न्यास ( data ) प्रथम निम्न प्रकार प्ररूपित किया जाता है ।
९ मानी | १ वाह + १ कुम्भ
३ योजन | १० योजन
६० पण |
जब यहाँ फल, जो ६० पण है, को अन्य पंक्ति में पक्षान्तरित करते हैं तब—
९ मानी | १ वाह + १ कुम्भ = १ १/४ वाह
३ योजन | १० योजन
| ६० पण
अब, जिसमें विभिन्न राशियों की संख्या अधिक है ऐसी दाहिने हाथ की पंक्ति की सब राशियों को
गुणित कर उसे वाम पंक्ति (जिसमें विभिन्न राशियों की संख्या कम है) की सब राशियों को गुणित करने से
प्राप्त गुणनफल द्वारा भाजित करना चाहिये । तब हमें पणों की संख्या प्राप्त होगी जो कि इष्ट उत्तर होगा ।
यथा, (१ १/४ × १० × ६०) / (९ × ३)

-५. ४१ ] त्रैराशिकव्यवहारः [ ८९
षोडशवर्णककाञ्चनशतेन यो रत्नविंशतिं लभते । दशवर्णसुवर्णानामष्टाशीतिद्विशत्या किम् ॥३५॥
गोधूमानां मानीर्नव नयता योजनत्रयं लब्धाः । षष्टिः पणाः सवाहं कुम्भं दशयोजनानि कति ॥३६॥
भाण्डप्रतिभाण्डस्योद्देशकः
कस्तूरीकर्षत्रयमुपलभते दशभिरष्टभिः कनैर्कैः ।
कर्षद्वयकपूरं मृगनाभित्रिशतकर्षर्कैः कति नौ ॥३७॥
पनसानि षष्टिमष्टभिरुपलभतेऽशीतिमातुलुङ्गानि ।
दशभिर्मोषैर्नवशतपनसैः कति मातुलुङ्गानि ॥३८॥
जीवक्रयविक्रययोरुद्देशकः
षोडशवर्षास्तुरगा विंशतिरर्हन्ति नियुतकनकानि ।
दशवर्षसप्तसप्ततिरिह कति गणकाग्रणीः कथय ॥ ३९ ॥
स्वर्णत्रिशती मूल्यं दशवर्षाणां नवा

९० ] गणितसारसंग्रहः [ ५. ४२-
सप्तराशिक उद्देशकः
त्रिचतुर्व्यासायामौ श्रीखण्डावर्हतोऽष्टहेमानि ।
षण्णवविस्तृतिदैर्घ्या हस्तेन चतुर्दशात्र कति ॥ ४२ ॥
इति सप्तराशिकः ।
नवराशिक उद्देशकः
पञ्चाष्टत्रिव्यासद्दैर्ध्योद्याम्भो धत्ते वापी शालिनी वाहषट्कम् ।
सप्तन्यासा हस्ततः षष्टिदैर्घ्याः पात्सेधोः किं नवाचक्ष्व विद्वन् ।। ४३ ।।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ त्रैराशिको नाम चतुर्थव्यवहारः ॥
१ ४३ वें श्लोक के सिवाय K और B में निम्नलिखित श्लोक प्राप्य है-
द्वयष्टाशीतिव्यासद्दैर्ध्योन्नताम्भो धत्ते वापी शालिनी सार्धवाहौ ।
हस्तादष्टायामकाः षोडशोच्छ्राः षट्कव्यासाः किं चतस्रा वद त्वम् ॥
——————————————————————————————————————————————————————
सप्तराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनमें प्रत्येक का व्यास ३ हस्त और लम्बाई ( आयाम ) ४ हस्त है, ऐसे संदल-लकड़ी के
दो टुकड़ों का मूल्य ८ स्वर्ण मुद्राएं हैं। इस अर्घ से, जिनमें प्रत्येक ६ हस्त व्यास में और ९ हस्त
लम्बाई में है ऐसे संदल-लकड़ी के १४ टुकड़ों का क्या मूल्य होगा ? ॥४२॥
नवराशिक पर उदाहरणार्थ प्रश्न
जो चौड़ाई, लम्बाई और ( तली से ) ऊंचाई में क्रमशः ५, ८ और ३ हस्त है ऐसी किसी घर
की वापिका में ६ वाह पानी भरा है। हे विद्वान् ! बतलाओ कि ७ हस्त चौड़ी, ६० हस्त लम्बी
और तली से ५ हस्त ऊँचो ९ वापिकाओं में कितना पानी समावेगा ? ॥४३॥
इस प्रकार सप्तराशिक और नवराशिक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में त्रैराशिक नामक चतुर्थ
व्यवहार समाप्त हुआ ।

(४३) इस गाथा में 'शालिनी' शब्द का अर्थ "घर की" होता है । यह उस छंद का भी नाम है
जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।

६. मिश्रकव्यवहारः
प्राप्तानन्तचतुष्टयान् भगवतस्तीर्थस्य कर्तॄन् जिनान्
सिद्धान् शुद्धगुणांस्त्रिलोकमहितानाचार्यवर्यानपि ।
सिद्धान्तार्णवपारगान् भवभृतां नेतॄनुपाध्यायकान्
साधून् सर्वगुणाकरान् हितकरान् वन्दामहे श्रेयसे ॥ १ ॥
इतः परं मिश्रगणितं नाम पञ्चमव्यवहारमुदाहरिष्यामः । तद्यथा—
संक्रमणसंज्ञाया विषमसंक्रमणसंज्ञायाश्च सूत्रम्—
युतिवियुतिदलनकरणं संक्रमणं छेदलब्धयो राश्योः ।
संक्रमणं विषममिदं प्राहुर्गणितार्णवान्तगताः ॥ २ ॥
६. मिश्रकव्यवहार
जिन्होंने अनन्त चतुष्टय प्राप्त कर धर्म तीर्थ की प्रवर्तना की है ऐसे अरिहंत प्रभुओं की, जो
अष्टक्षायिक गुण सम्पन्न हैं तथा तीनों लोकों में आदर को प्राप्त हैं ऐसे सिद्ध प्रभुओं को, श्रेष्ठ
आचार्यों की, जो जैन सिद्धान्त सागर के पारगामी हैं तथा संसारी जीवों को मोक्षमार्ग के उपदेशक हैं
ऐसे उपाध्यायों की और जो सर्व सद्गुणों के धारक हैं तथा दूसरों के हितकर्ता हैं ऐसे साधुओं की हम
अपने सर्वोपरि हित के लिये वन्दना करते हैं ॥१॥
इसके पश्चात् हम मिश्रित उदाहरण नामक पाँचवें व्यवहार का प्रतिपादन करेंगे ।
पारिभाषिक शब्द ‘संक्रमण’ और ‘विषम संक्रमण’ के अर्थों को स्पष्ट करने के लिये सूत्र—
गणित समुद्र के पारगामी, किन्हीं दो राशियों के योग अथवा अन्तर के आधा करने को
संक्रमण कहते हैं । और, ऐसी दो राशियाँ जो क्रमशः भाजक तथा भजनफल रहती हैं, उनके संक्रमण
को विषम संक्रमण कहते हैं ॥२॥
( १ ) कर्म और जन्म मरण के दुःखों से पूर्ण संसारीजीवनरूपी नदी को पार करने के लिये
‘तीर्थ’ शब्द का प्रयोग ‘एक ऐसे स्थान के लिये हुआ है जो उथला होने के कारण नदी को पार करने
में सहायक सिद्ध होता है । संसार अर्थात् चतुश्चक्रभ्रमण के दुःखों रूपी सागर को पार कराने के लिये भगवान्
आत्माओं के लिये नैमित्तिक सहायक माने गये हैं । इसलिये इन जिनों को तीर्थंकर कहा जाता है ।
( २ ) बीजीय रूप से, दो राशियों अ और ब का संक्रमण (अ + ब)/२ और (अ ~ ब)/२ के मान निका-
लना है । उनका विषम संक्रमण, (ब + अ/ब)/२ और (ब ~ अ/ब)/२ के मान निकालना है ।

९२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३-
अत्रोद्देशकः
द्वादशसंख्याराशेर्द्वाभ्यां संक्रमणमत्र किं भवति ।
तस्माद्राशेर्भक्तं विषमं वा किं तु संक्रमणम् ॥ ३ ॥
पञ्चराशिकविधिः
पञ्चराशिकस्वरूपवृद्ध्यानयनसूत्रम्—
इच्छाराशिः स्वस्य हि कालेन गुणः प्रमाणफलगुणितः ।
कालप्रमाणभक्तो भवति तदिच्छाफलं गणिते ॥ ४ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकषट्कशते पञ्चाशतषष्टिसप्ततिपुराणाः । लाभार्थतः प्रयुक्ताः का वृद्धिर्मासषट्कस्य ॥ ५ ॥
व्यर्धाष्टकशत्युक्तास्त्रिंशत्कार्षापणाः पणाश्चाष्टौ । मासाष्टकेन जाता दलहीनेनैव का वृद्धिः ॥ ६ ॥
षष्ट्या वृद्धिर्दृष्टा पञ्च पुराणाः पणत्रयविमिश्राः । मासद्वयेन लब्धा शतवृद्धिः का तु वर्षस्य ॥ ७ ॥
सार्धशतकप्रयोगे सार्धकमासेन पञ्चदश लाभः । मासदर्शकेन लब्धा शतत्रयस्यात्र का वृद्धिः ॥८॥
साष्टशतकाष्टयोगे त्रिषष्टिकार्षापणा विशा दत्ताः । सप्तानां मासानां पञ्चमभागान्वितानां किम्॥९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जब संख्या १२, दो से आयोजित हो तो संक्रमण क्या होगा ? और, २ के सम्बन्ध में उसी
संख्या १२ का भागीय विषम संक्रमण क्या होगा ?
पंचराशिक विधि
पंचराशिक प्रकार के ब्याज को निकालने की विधि के लिये नियम—
इच्छा का प्ररूपण करनेवाली संख्या, अर्थात् जिस पर ब्याज निकालना इष्ट होता है ऐसे धन
को उससे सम्बन्धित समय द्वारा गुणित किया जाता है और तब दिये हुए मूलधन पर ब्याज दर का
निरूपण करने वाली संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । गुणनफल को समय तथा मूलधन राशि द्वारा
भाजित किया जाता है । यह भजनफल, गणित में, इष्ट धन का ब्याज होता है ॥४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५०, ६० और ७० पुराण क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रतिमाह की दर ( rate ) से ब्याज पर
दिये गये, उनका ६ माह में ब्याज क्या होगा ? ॥५॥ ३० कार्षापण और ८ पण, ७ ½ प्रतिशत प्रतिमाह
की दर से ब्याज पर दिये गये, ७ ½ माह में कितना ब्याज होगा ? ॥६॥ ६० पर २ माह में ५ पुराण और
३ पण ब्याज होता है; १०० पण १ वर्ष का ब्याज बतलाओ ॥७॥ १५० को १ ½ माह तक उधार देने
से १५ ब्याज प्राप्त होता है । इसी अर्ध से ३०० पर १० माह का ब्याज क्या होगा ? ॥८॥ एक
व्यापारी ने ६३ कार्षापण, १०८ पर ८ प्रतिमाह की दर से उधार दिये, बतलाओ ७ ⅕ माह में कितना
ब्याज होगा ॥९॥
ध × अ × बा
( ४ ) बीजीय रूप से ब = ―――――――――― जहाँ आ, धा और बा प्रमाण अथवा दर सम्बन्धी क्रमशः
आ × धा
अवधि, मूलधन और ब्याज हैं और अ, ध तथा ब इच्छा की क्रमशः अवधि, मूलधन और ब्याज हैं ।
प्रमाण और इच्छा के विशेष स्पष्टीकरण के लिये अध्याय ५ की गाथा २ की पाद टिप्पणी देखिये ।
( ५ ) ब्याज की दर यदि उल्लिखित न हो तो उसे प्रतिमास समझना चाहिये ।

–६. १४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९३
मूलानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं स्वफलेन विभाजितं तदिच्छायाः ।
कालेन भजेल्लब्धं फलेन गुणितं तदिच्छा स्यात् ॥ १० ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चार्धकशतयोगे पञ्च पुराणान्दलोनमासौ द्वौ । वृद्धिं लभते कश्चित् किं मूलं तस्य मे कथय ॥११॥
सप्तत्याः सार्धमासेन फलं पञ्चार्धमेव च । व्यर्धाष्टमासे मूलं किं फलयोः सार्धयोर्द्वयोः ॥ १२ ॥
त्रिकपञ्चकषट्कशते यथा नवाष्टादशाथ पञ्चकृतिः ।
पञ्चांशकेन मिश्रा षट्सु हि मासेषु कानि मूलानि ॥ १३ ॥
कालानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं स्वफलेच्छाभ्यां हृतं ततः कृत्वा ।
तदिहेच्छाफलगुणितं लब्धं कालं बुधाः प्राहुः ॥ १४ ॥
——————————————————————————————————————
उधार दिये गये मूलधन को निकालने के लिये नियम—
मूलधन राशि को उसो से सम्बन्धित समय द्वारा गुणित करते हैं और सम्बन्धित ब्याज द्वारा
विभाजित करते हैं । तब इस भजनफल को (उधार दिये गये) मूलधन से सम्बन्धित अवधि द्वारा
विभाजित करते हैं; यह अंतिम भजनफल जब उपार्जित ब्याज द्वारा गुणित किया जाता है तब वह
मूलधन प्राप्त होता है जिस पर कि उक्त ब्याज प्राप्त हुआ है ॥१०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याज दर २ ½ प्रतिशत प्रतिमाह से १ ½ माह तक रकम उधार देकर एक व्यक्ति ५ पुराण
ब्याज प्राप्त करता है । मुझे बतलाओ कि उस ब्याज के सम्बन्ध में मूलधन क्या है ? ॥११॥
७० पर १ ½ माह में २ ½ ब्याज होता है । यदि ७ ½ माह में २ ½ ब्याज होता हो तो बतलाओ कि
कितना मूलधन ब्याज पर दिया गया है ? ॥१२॥ क्रमशः ३, ५ और ६ प्रतिशत प्रति माह की दर से
उधार देने पर ६ माह में प्राप्त होने वाले ब्याज क्रमशः ९, १८ और २५ ⅕ हैं; कौन-कौन से मूलधन
ब्याज पर दिये गये हैं ? ॥१३॥
अवधि निकालने के लिये नियम—
मूलधन को सम्बन्धित अवधि से गुणित करो; तब इस गुणनफल को उसो से सम्बन्धित ब्याज
दर से भाजित करो और उधार दी हुई रकम से भी भाजित करो । प्राप्त भजनफल को उधार दी हुई
रकम के ब्याज द्वारा गुणित करो । बुद्धिमान मनुष्य कहते हैं कि परिणामी गुणनफल (उपार्जित ब्याज
की) अवधि होता है ॥१४॥
.........................................................................................................................
धा × आ × बा
(१०) प्रतीक रूप से, ─────────── = ध
बा × अ
धा × आ × ब
(१४) प्रतीक रूप से, ────────── = अ
बा × घ

९४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १५–
अत्रोद्देशकः
सप्तार्धशतकयोगे वृद्धिरस्त्वष्टाप्रविंशतिरशीत्या ।
कालेन केन लब्धा कालं विगणय्य कथय सखे ॥ १५ ॥
विंशतिषट्शतकस्य प्रयोगतः सप्तगुणषष्टिः । वृद्धिरपि चतुरशीतिः कथय सखे कालमाशु त्वम् ॥१६॥
षट्कशतेन हि युक्ताः षण्णवतिर्वृद्धिरत्र संदृष्टा । सप्रोत्तरपञ्चाशत् त्रिपञ्चभागश्च कः कालः ॥१७॥
भाण्डप्रतिभाण्डसूत्रम्—
भाण्डस्वमूल्यभक्तं प्रतिभाण्डं भाण्डमूल्यसंगुणितम् ।
स्वेच्छाभाण्डाभ्यस्तं भाण्डप्रतिभाण्डमूल्यफलमेतत् ॥ १८ ॥
अत्रोद्देशकः
क्रीतान्यष्टौ शुण्ठ्याः पलानि षड्भिः पणैः सपादांशैः ।
पिप्पल्याः पलपञ्चकमथ पादोनैः पणैर्नवभिः ॥ १९ ॥
शुण्ठ्याः पलैश्च केनचिदशीतिभिः कति पलानि पिप्पल्याः ।
क्रीतानि विचिन्त्य त्वं गणितविदाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥ २० ॥
इति मिश्रकव्यवहारे पञ्चराशिविधिः समाप्तः ।
वृद्धिविधानम्
इतः परं मिश्रकव्यवहारे वृद्धिविधानं व्याख्यास्यामः ।
१ M और B दोनों में अशुद्ध पाठ है : कश्चित् त्वशीतिभिः स च पलानि पिप्पल्याः.
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! अवधि की गणना कर बतलाओ कि ३½ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ८० पर २८
ब्याज कितने समय में प्राप्त होगा ? ॥१५॥ २० प्रति ६०० प्रतिमाह के अर्घ से उधार दिया गया धन
४२० है । ब्याज भी ८४ है । हे मित्र ! मुझे शीघ्र बतलाओ कि यह ब्याज कितनी अवधि में उपार्जित
हुआ है ?॥१६॥ ६ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ९६ उधार दिये जाते हैं । उन पर ५७⅗ ब्याज होता
है । यह ब्याज कितनी अवधि में प्राप्त हुआ होगा ? ॥१७॥
भांडप्रतिभांड (वस्तुओं के पारस्परिक विनिमय) के सम्बन्ध में नियम —
बदले में ली गई वस्तु के परिमाण को उसके स्वमूल्य तथा बदले में दी गई वस्तु के परिमाण
द्वारा विभाजित करते हैं । तब, उसे बदले में दी गई वस्तु के मूल्य द्वारा गुणित करते हैं और तब,
बदली जाने वाली (जिसे बदलना इष्ट है) वस्तु के परिमाण द्वारा गुणित करते हैं। यह परिणामी
गुणनफल, बदले में ली गई वस्तु तथा बदले में दी गई वस्तु के मूल्यों की संवादी इष्ट राशि
होती है ॥१८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
८ पल शुण्ठि (सूखी अदरख) ६¼ पण में खरीदी गई और ५ पल लम्बी मिर्च ८¾ पण में
खरीदी गई । हे गणितज्ञ ! विचारकर मुझे शीघ्र बतलाओ कि ऊपर लिखी हुई दर से खरीदी जाने वाली
लम्बी मिर्च, ८० पल सूखी अदरख (सोंठ) के बदले में कितने पल खरीदी जा सकेगी ? ॥१९–२०॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में पंचराशिक विधि नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
वृद्धि विधान [ब्याज]
इसके पश्चात्, मिश्रक व्यवहार में हम ब्याज पर व्याख्या करेंगे ।

-६. २४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९५
मूलवृद्धिमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
रूपेण कालवृद्ध्या युतेन मिश्रस्य भागहारविधिम् । कृत्वा लब्धं मूल्यं वृद्धिमूलोनमिश्रधनम् ॥२१॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतप्रयोगे द्वादशमासैर्धनं प्रयुङ्क्ते चेत् । साष्टा चत्वारिंशन्मिश्रं तन्मूलवृद्धी के ।। २२ ।।
पुनरपि मूलवृद्धिमिश्रविभागसूत्रम्—
इच्छाकालफलघ्नं स्वकालमूलेन भाजितं सैकम् । संमिश्रस्य विभक्तं लब्धं मूलं विजानीयात् ॥२३॥
अत्रोद्देशकः
सार्धद्विशतकयोगे मासचतुष्केण किमपि धनमेकः ।
दत्त्वा मिश्रं लभते किं मूल्यं स्यात् त्रयस्त्रिंशत् ॥ २४ ॥
कालवृद्धिमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालगुणितं स्वफलेच्छाभ्यां हृतं ततः कृत्वा ।
मिश्रित रकम में से धन और ब्याज अलग करने के लिये नियम—
मूलधन और ब्याज सम्बन्धी दिये गये मिश्रधन को जो दी गई अवधि के ब्याज में जोड़कर
प्राप्त किया जाता है, ऐसी ( ब्याज ) राशि द्वारा हासित किया जाय तो इष्ट मूलधन प्राप्त होता है;
और इष्ट ब्याज को मिश्रित धन में से ( निकाले हुए ) इष्ट मूलधन को घटाकर प्राप्त कर लेते हैं ॥२१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि कोई धन ५ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से ब्याज पर दिया जाय तो १२ माह में मिश्रधन
४८ हो जाता है । बतलाओ कि मूलधन और ब्याज क्या हैं ? ॥२२॥
मिश्रधन में से मूलधन और ब्याज अलग करने के लिये दूसरा नियम—
दिये गये समय तथा ब्याज दर के गुणनफल को समयदर तथा मूलधनदर द्वारा भाजित
करते हैं । प्राप्त फल में १ जोड़ने से प्राप्त राशि द्वारा मिश्रधन को भाजित करते हैं जिससे परिणामी
भजनफल इष्ट मूलधन होता है ॥२३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२ ½ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से रकम को ब्याजपर देने से किसी को चार माह में ३३ मिश्रधन
प्राप्त होता है । बतलाओ मूलधन क्या है ? ॥२४॥
मिश्र योग में से अवधि तथा ब्याज को अलग करने के लिये नियम—
मूलधनदर को अवधि दर द्वारा गुणित करो और ब्याज दर तथा दिये गये मूलधन द्वारा
( २१ ) प्रतीक रूप से ध = म / [ १ + ( १ × अ × बा ) / ( आ × घा ) ] , जहाँ म = ध + ब है; इसलिये ब = म - ध
( २३ ) प्रतीक रूप से, ध = म ÷ { ( अ × बा ) / ( आ × घा ) + १ } , स्पष्ट है कि यह बहुत कुछ गाथा २१ में
दिये गये सूत्र के समान है ।

".
Wait, look at the letter in L28:
It looks like व!
Wait, could it be ब? Look at ब in बा: the circle has a diagonal slash.
Look at this letter: does it have a diagonal slash? It looks very similar to व, but in some prints the slash inside ब is faint or missing. But wait, व for वृद्धि makes sense too! Let's write व (or ब? Wait, let's look really closely at that letter:
It is ४ followed by a letter. In Hindi text: "ब्याज की चौगुनी राशि". If it's ब्याज, symbol is ब. But in Sanskrit: "कालचतुर्वृद्धि" -> वृद्धि = व. So व is totally plausible).
Wait, look at the sign after it:
Is it ± or ×?
Wait, look at it:
It has an upper part and lower part.
Wait, let's look at the character after it: म.
And then }.
And below is २.
And to the right of } is = घ अथवा अ, ( यथा.

Wait, how should we write these formula lines without LaTeX?
Let's check if we can write:

( २५ ) प्रतीक रूप से, ब = म ÷ { (धा × आ)/(बा × घ) + १ } = ब, जहाँ म = ब +

-६. ३४ ] मिश्रकव्यवहारः [ ९७
अत्रोद्देशकः
सप्तत्या वृद्धिरियं चतुःपुराणाः फलं च पञ्चकृतिः ।
मिश्रं नव पञ्चगुणाः पादेन युतास्तु किं मूलम् ॥ ३० ॥
त्रिकषष्ट्या दत्त्वैकः किं मूलं केन कालेन । प्राप्तोऽष्टादशवृद्धिं षट्षष्टिः कालमूलमिश्रं हि ॥ ३१ ॥
अध्यर्धमासिकफलं षष्ट्याः पञ्चार्धमेव संदृष्टम् ।
वृद्धिरस्तु चतुर्विंशतिरथ षष्टिर्मूलयुक्तकालश्च ॥ ३२ ॥
प्रमाणफलेच्छाकालमिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मूलं स्वकालवृद्धिद्विकृतिगुणं छिन्नमितरमूलेन । मिश्रकृतिशेषमूलं मिश्रे क्रियते तु संक्रमणम् ।।३३।।
अत्रोद्देशकः
अध्यर्धमासकस्य च शतस्य फलकालयोश्च मिश्रधनम् ।
द्वादश दलसंमिश्रं मूलं त्रिंशत्फलं पञ्च ॥ ३४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
४ पुराण, ७० पर प्रतिमाह ब्याज है । कुल पर प्राप्त ब्याज २५ है । मूलधन तथा ब्याज की
अवधि का मिश्रयोग ४५ १/४ है । कितना मूलधन उधार दिया गया है ? ।।३०।। ३ प्रति ६० प्रतिमास
के अर्घ से कोई मनुष्य कितना मूलधन कितने समय के लिये ब्याज पर लगाये ताकि उसे ब्याज १८
प्राप्त हो जबकि उस अवधि तथा उस मूलधन का मिश्रयोग ६६ दिया गया है ।।३१।। ६० पर १ १/२ माह
में ब्याज केवल २ १/२ है । यहाँ ब्याज २४ है और मूलधन तथा अवधि का मिश्रयोग ६० है । समय
तथा मूलधन क्या हैं ? ।।३२।।
ब्याजदर तथाइष्ट अवधि को मिश्रितयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम—
मूलधनदर स्व समयदर द्वारा गुणित किया जाता है, तथा दिये गये ब्याज से और ४ से भी
गुणित करने के उपरान्त अन्य दिये गये मूलधन द्वारा विभाजित किया जाता है । इस परिणामी भजन-
फल को दिये गये मिश्रयोग के वर्ग में से घटाकर प्राप्त शेष के वर्गमूल को मिश्रयोग के सम्बन्ध में
संक्रमण क्रिया करने के उपयोग में लाते हैं ।।३३।।
उदाहरणार्थ प्रश्न
अर्ध अधिक प्रतिशत प्रतिमाह की इष्ट दर से ब्याज दर और अवधि का मिश्रयोग १२ १/२ होता
है । मूलधन ३० है और उस पर ब्याज ५ है । बतलाओ ब्याज दर और अवधि क्या-क्या हैं ? ।।३४।।
(३३) प्रतीक रूप से, √[ म² - (धा × आ × ब × ४) / छ ] को 'म' के साथ इष्ट संक्रमण क्रिया करने
के उपयोग में लाते हैं । यहाँ म = बा + अ है ।
ग० सा० सं०-१३

९८ ] गणितसारसंग्रहः [ -६. ३५
मूलकालवृद्धि मिश्रविभागानयनसूत्रम्—
मिश्रादूनितराशिः कालस्तस्यैव रूपलाभेन । सैकेन भजेन्मूलं स्वकालमूलोनितं फलं मिश्रम् ॥३५॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकशतप्रयोगे न ज्ञातः कालमूलफलराशिः । तन्मिश्रं द्वां¹शीतिर्मूलं किं कालवृद्धी के ॥ ३६ ॥
बहुमूलकालवृद्धि मिश्रविभागानयनसूत्रम्—
विभजेत्स्वकालताडितमूलसमासेन फलसमासहतम् ।
कालाभ्यस्तं मूलं पृथक् पृथक् चादिशेद् वृद्धिम् ॥ ३७ ॥
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्त्रिंशद्विंशतिपञ्चाशदत्र मूलानि । मासाः पञ्चचतुस्त्रिकषट् फलपिण्डश्चतुस्त्रिंशत् ॥३८॥
१ हस्तलिपि में यह अशुद्ध रूप प्राप्य है; शुद्ध रूप 'द्व्यशीति' छंद की आवश्यकता को समाधानित
नहीं करता है ।
मूलधन, ब्याज और समय को उनके मिश्रयोग में से अलग-अलग प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये मिश्रयोग में से कोई मन से चुनी हुई संख्या को घटाने पर इष्ट समय प्राप्त हुआ
मान लिया जाता है । उस अवधि के लिये १ पर ब्याज निकालकर उसमें १ जोड़ते हैं । तब, दिये गये
मिश्रितयोग में से मन से चुनी गई अवधि घटाकर शेष राशि को उपर्युक्त प्राप्त राशि द्वारा विभाजित
करते हैं । परिणामी भजनफल इष्ट मूलधन होता है । मिश्रयोग को निज के संवादी समय और मूलधन
द्वारा ह्रासित करने पर इष्ट ब्याज प्राप्त होता है ॥३५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ प्रतिशत प्रतिमाह के अर्घ से उधार दी गई रकम के विषय में अवधि, मूलधन और ब्याज का
निरूपण करने वाली राशियाँ ज्ञात नहीं हैं । उनका मिश्रयोग ८२ है । अवधि, मूलधन और ब्याज
निकालो ॥३६॥
विभिन्न धनों पर विभिन्न अवधियों में उपार्जित विभिन्न ब्याजों को उन्हीं के मिश्रयोग में से
अलग-अलग ब्याज प्राप्त करने के लिये नियम—
प्रत्येक मूलधन संवादी समय से गुणित होकर तथा ब्याजों की कुल दत्त रकम द्वारा गुणित
होकर, अलग-अलग उन गुणनफलों के योग द्वारा विभाजित किया जाता है जो प्रत्येक मूलधन को
उसके संवादी समय द्वारा गुणित करने पर प्राप्त होते हैं । प्राप्त फल उस मूलधन सम्बन्धी ब्याज
घोषित किया जाता है ॥३७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में दिये गये मूलधन ४०, ३०, २० और ५० हैं; और मास क्रमशः ५, ४, ३ और
६ हैं । ब्याज की राशियों का योग ३४ है । प्रत्येक ब्याज राशि निकालो ॥३८॥
(३५) यहाँ ३ अज्ञात राशियाँ दी गई हैं । समय का मान मन से चुन लिया जाता है और अन्य
दो राशियाँ अध्याय ६ की २१वीं गाथा के नियमानुसार प्राप्त हो जाती हैं ।
(३७) प्रतीक रूप से, ध₁ अ₁ म = ब₁; और
─────────────────────
ध₁अ₁ + ध₂अ₂ + ध₃अ₃ + ...
ध₂ अ₂ म
───────────────────── = ब₂; जहाँ म = ब₁ + ब₂ + ब₃ + ...; ध₁, ध₂, ध₃
ध₁अ₁ + ध₂अ₂ + ध₃अ₃ + ...
आदि विभिन्न मूलधन हैं तथा अ₁, अ₂, अ₃ आदि विभिन्न अवधियाँ हैं ।

जहाँ म = ध₁ + ध₂ + ध₃ + ... इत्यादि
ब₁ ब₂ ब₃ अ₂
── + ── + ── + ...
अ₁ अ₂ अ₃

And then:

(४२) प्रतीक रूप से,
म ब₁
──────────────────── × ── = अ₁, जहाँ म = अ₁ + अ₂ + अ₃ +
ब₁ ब₂ ब₃ ध₁
── + ── + ── + ...
ध₁ ध₂ ध₃

And the last line:
`...इत्यादि; इसी तरह अ₂, अ₃ इत्यादि के मान निकालते हैं ।`

Let's transcribe this cleanly line-by-line using Unicode characters (fractions/horizontal rules or standard text layout) without any LaTeX.
Wait, let's keep each printed line mapped to `[L...]`.
Let's count the visual lines of the equations in the image:

Looking at the equation block:
Left: `(३९) प्रतीक रूप से,`
Then:
Line:
`                          म             ब₁`
Line:
`                   ─────────────── × ── = ध₁ ;`
Line:
`                    ब₁    ब₂   ब₃        अ₁`
`                    ── + ── + ── + ...`
`                    अ₁    अ₂   अ₃`

Wait, in the original book, it's printed as:

१०० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ४३-
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्त्रिंशद्विंशतिपञ्चाशदत्र मूलानि ।
दशाष्टत्रिषञ्चदश फलमष्टादश कालमिश्रधनराशिः ॥ ४३ ॥
प्रमाणराशौ फलेन तुल्यमिच्छाराशिमूलं च तदिच्छाराशौ वृद्धिं च संपीड्य तन्मिश्रराशौ
प्रमाणराशेर्वृद्धिविभागानयनसूत्रम्—
कालगुणितप्रमाणं परकालहृतं तदेकगुणमिश्रधनात् ।
इतरार्धकृतियुतान् पद्ममितरार्धोनं प्रमाणफलम् ॥ ४४ ॥
अत्रोद्देशकः
मासचतुष्कशतस्य प्रनष्टवृद्धिः प्रयोगमूलं तत् ।
स्वफलेन युतं द्वादश पञ्चकृतिस्तस्य कालोऽपि ॥ ४५ ॥
मासत्रितयाशीत्याः प्रनष्टवृद्धिः स्वमूलफलराशेः । पञ्चमभागेनोनाश्वाष्टौ वर्षेण मूलवृद्धी के ॥४६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में, दिये गये मूलधन ४०, ३०, २० और ५० हैं तथा संवादी ब्याज राशियाँ क्रमशः
१०, ६, ३ और १५ हैं । विभिन्न अवधियों का मिश्रयोग १८ है । बतलाओ कि अवधियाँ क्या-
क्या हैं ? ॥४३॥
ब्याजदर के बराबर दिया गया मूलधन और इस उधार दिये गये मूलधन के ब्याज, इन दोनों
के मिश्रयोग को निरूपित करनेवाली राशि में से मूलधनदर एवं ब्याजदर अलग-अलग निकालने
के लिये नियम —
मूलधनदर को अवधिदर द्वारा गुणित कर उसे जिस समय तक ब्याज लगाया गया है उस
समय द्वारा विभाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल को दिये गये मिश्रयोग द्वारा एक बार गुणित
करते हैं, और तब, उसमें उपर्युक्त भजनफल की आधी राशि के वर्ग को जोड़ते हैं । इस तरह प्राप्त राशि
का वर्गमूल निकालते हैं । प्राप्त फल को उसी भजनफल की अर्द्धराशि द्वारा ह्रासित करते हैं तो मूलधन
के बराबर इष्ट ब्याजदर प्राप्त होती है ॥४४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ब्याजदर प्रतिशत प्रति ४ माह अज्ञात है । वही अज्ञात राशि उधार दिया गया मूलधन भी
है । यह खुद के ब्याज से जोड़ी जाने पर १२ हो जाती है । २५ माह अवधि है जिसमें कि वह ब्याज
उपार्जित हुआ है । ब्याजदर को निकालो जो मूलधन के तुल्य है ॥४५॥ ब्याजदर प्रति ८० प्रति ३ माह
अज्ञात है । एक साल के ब्याज तथा उस अज्ञात राशि के तुल्य मूलधन का मिश्रयोग ७६ ४/५ है । बतलाओ
कि मूलधन और ब्याजदर क्या क्या हैं ? ॥४६॥
(४४) प्रतीक रूप से, √[ (घा आ / अ) × म + (घा आ / २अ)² ] - (घा आ / २अ) = बा जो ध के तुल्य है ।

-६. ५२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १०१
समानमूलवृद्धिमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यकालविनिहतमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
कालविशेषेण हृते तेषां मूलं विजानीयात् ॥ ४७ ॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चाशदष्टपञ्चाशन्मिश्रं षट्षष्टिरेव च । पञ्च सप्तैव नव हि मासाः किं फलमानय ॥ ४८ ॥
त्रिंशच्चैकत्रिंशद् द्वित्र्यंशाः स्युः पुनस्त्रयस्त्रिंशत् । सत्र्यंशा मिश्रधनं पञ्चत्रिंशच्च गणकादात् ॥४९॥
कश्चिन्नरश्चतुर्णां त्रिभिश्चतुर्भिश्च पञ्चभिः षड्भिः । मासैर्लब्धं किं स्यान्मूलं शीघ्रं ममाचक्ष्व ॥५०॥
समानमूलकालमिश्रविभागसूत्रम्-
अन्योन्यवृद्धिसंगुणमिश्रविशेषस्य तस्य भागाख्यम् ।
वृद्धिविशेषेण हृते लब्धं मूलं बुधाः प्राहुः ॥ ५१ ॥
अत्रोद्देशकः
एकत्रिपञ्चमिश्रितविंशतिरिह कालमूलयोर्मिश्रम् ।
षड् दश चतुर्दश स्युर्लाभाः किं मूलमत्र साम्यं स्यात् ॥ ५२ ॥
मूलधन जो सब दशाओं में एकसा रहता है, और ( विभिन्न अवधियों के ) ब्याजों को, उनके
मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो दिये गये मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज की अवधियों द्वारा गुणित
करने से प्राप्त राशियों के अंतर द्वारा विभाजित करने पर जो भजनफल प्राप्त होता है वह उन दिये गये
मिश्रयोगों सम्बन्धी इष्ट मूलधन है ॥४७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मिश्रयोग ५०, ५८ और ६६ है और अवधियाँ जिनमें कि ब्याज उपार्जित हुए हैं, क्रमशः ५,७
और ८ माह हैं । प्रत्येक दशा में ब्याज बतलाओ ॥४८॥ हे गणितज्ञ ! किसी मनुष्य ने ४ व्यक्तियों
को क्रमशः ३, ४, ५ और ६ मास के अन्त में उसो मूलधन और ब्याज के मिश्रयोग ३०, ३१ २/३,
३३ १/३ और ३५ दिये । मुझे शीघ्र बतलाओ कि यहाँ मूलधन क्या है ? ॥ ४९-५० ॥
मूलधन ( जो प्रत्येक दशा में वही रहता हो ) और अवधि ( जितने समय में ब्याज उपार्जित
किया गया हो ) को उन्हीं के मिश्रयोग में से अलग-अलग करने के लिये नियम--
कोई भी दो मिश्रयोगों को क्रमशः एक दूसरे के ब्याज द्वारा गुणित कर, प्राप्त राशियों के अन्तर
को दो चुने हुए ब्याजों के अन्तर द्वारा विभाजित करने पर भजनफल के रूप में इष्ट मूलधन प्राप्त होता
है, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥५१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मूलधन और अवधियों के मिश्रयोग २१, २३ और २५ हैं । यहाँ ब्याज ६, १० और १४ हैं ।
बतलाओ कि समान अर्हो वाला मूलधन क्या है ? ॥५२॥ दिये गये मिश्रयोग ३५, ३७ और ३९ हैं;
( ४७ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ अ₂ ~ म₂ अ₁ ) / ( अ₁ ~ अ₂ ) = ध
( ५१ ) प्रतीक रूप से, ( म₁ ब₂ ~ म₂ ब₁ ) / ( ब₁ ~ ब₂ ) = ध, जहाँ म₁, म₂, आदि, विभिन्न मिश्रयोग हैं ।