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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 421 में से

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पृष्ठ 136

८२ ] गणितसारसंग्रहः ४. ७१- ]
द्विभक्तनवमांशकप्रहतसप्तविंशांशकः प्रमोदमवतिष्ठते करिकुलस्य पृथ्वीतले ।
विनीलजलदाकृतिर्विहरति त्रिभागो नगे वद त्वमधुना सखे करिकुलप्रमाणं मम ॥ ७१ ॥
साधूत्कृतेर्निवसति षोडशांशकस्त्रिभाजितः स्वकगुणितो वनान्तरे ।
पादो गिरौ मम कथयाशु तन्मितिं प्रोत्तीर्णवान् जलधिसमं प्रकीर्णकम् ॥ ७२ ॥
इति भिन्नदृश्यजातिः ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ प्रकीर्णको नाम तृतीयव्यवहारः समाप्तः ॥
को उसी झुंड के १/९ वें भाग से गुणित करने तथा २ द्वारा विभाजित करने से प्राप्त फल प्रमाण के
हाथी मैदान में प्रसन्न दशा में तिष्ठे हैं । शेष ( बचा हुआ ) १/३ भाग झुंड जो बादलों के समान अत्यन्त
काले हाथियों का है, पर्वत पर क्रीड़ा कर रहा है । हे मित्र ! बतलाओ कि हाथियों के झुंड का
संख्यात्मक मान क्या है ? ॥ ७१ ॥ साधुओं के समूह का १/१६ वां भाग ३ द्वारा विभाजित करने के
पश्चात् स्व द्वारा गुणित ( अर्थात् १/१६ ÷ ३ द्वारा गुणित ) करने से प्राप्त भाग प्रमाण वन के अन्तः भाग
में रह रहा है; उस समूह का ( बचा रहने वाला ) १/४ भाग पर्वत पर रह रहा है । हे जलधि सम
प्रकीर्णक के प्रोत्तीर्णवान् ! मुझे शीघ्रही साधुओं के समूह का संख्यात्मक मान बतलाओ । ॥७२॥
इस प्रकार, 'भिन्न दृश्य' जाति प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में 'प्रकीर्णक' नामक तृतीय
व्यवहार समाप्त हुआ ।

  • र/य क = ० से स्पष्ट है ।
    (७१) 'पृथ्वी' शब्द जो इस गाथा में आया है, उसका अर्थ पृथ्वी है तथा यह उस छन्द का
    नाम भी है जिसमें यह गाथा संरचित हुई है ।