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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

१४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. १९९½-
बहुपदविनिमयसुवर्णकरणसूत्रम्—
वर्णघ्नकनकमिष्टस्वर्णेनाप्तं दृढक्षयो भवति ।
प्राग्वत्प्रसाध्य लब्धं विनिमयबहुपदसुवर्णानाम् ॥१९९½॥
अत्रोद्देशकः
वर्णचतुर्दशकनकं शतत्रयं विनिमयं प्रकुर्वन्तः । वर्णैर्द्वादशदशवसुनगैश्च शतपञ्चकं स्वर्णम् ।
एतेषां वर्णानां पृथक् पृथक् स्वर्णमानं किम् ॥२०१॥
विनिमयगुणवर्णकनकलाभानयनसूत्रम्—
स्वर्णघ्नवर्णयुतिहृतगुणयुतिमूलक्षयप्ररूपोनेन । आप्तं लब्धं शोध्यं मूलधनाच्छेषवित्तं स्यात् ॥२०२॥
तल्लब्धमूलयोगाद्विनिमयगुणयोगभाजितं लब्धम् ।
प्रक्षेपकेन गुणितं विनिमयगुणवर्णकनकं स्यात् ॥२०३॥
कई विशिष्ट प्रकार के बदले के परिणाम स्वरूप प्राप्त स्वर्ण के विभिन्न भारों को निकालने के
लिये नियम—
यदि बदले जाने वाले दत्त स्वर्ण के भार को उसके ही वर्ण द्वारा गुणित कर उसे बदले में
प्राप्त इष्ट स्वर्ण की मात्रा से भाजित किया जाय, तो समांग औसत वर्ण उत्पन्न होता है । इसके पश्चात् ,
पूर्व कथित क्रियाओं को प्रयुक्त करने पर, प्राप्त परिणाम बदले में प्राप्त विभिन्न प्रकार के स्वर्ण के इष्ट
भारों को उत्पन्न करता है ॥१९९½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य १४ वर्ण वाले ३०० भार के स्वर्ण के बदले में ५०० भार के विभिन्न वर्ण वाले
१२, १०, ८ और ७ वर्ण वाले स्वर्ण के प्रकारों को प्राप्त करता है । बतलाओ कि इन भिन्न वर्णों में से
प्रत्येक का संगत अलग-अलग स्वर्ण कितने-कितने भार का होता है ? ॥२००½—२०१॥
बदले में प्राप्त स्वर्ण के विभिन्न ऐसे भारों को निकालने के लिये नियम, जो ज्ञात वर्ण वाले हैं
और निश्चित गुणजों ( multiples ) के समानुपात में हैं—
दी गई समानुपाती गुणज (multiple) संख्याओं के योग को, (दी गई समानुपाती मात्राओं
वाले विभिन्न प्रकार के बदले में प्राप्त) स्वर्ण की मात्राओं को, (उनके विशिष्ट) वर्णों द्वारा गुणित
करने पर, प्राप्त गुणनफलों के योग द्वारा भाजित करते हैं । परिणामी भजनफल को बदले जाने वाले
स्वर्ण के मूल वर्ण द्वारा गुणित किया जाता है । यदि इस गुणनफल को १ द्वारा हासित कर इसके द्वारा
बदले में प्राप्त स्वर्ण के भार में जो बढ़ती हुई है उसे भाजित करें, और प्राप्त भजनफल को स्वर्ण के
मूल भार में से घटायें, तो (जो बदला नहीं गया है ऐसे) स्वर्ण का शेष भार प्राप्त होता है । यह
शेष भार मूल स्वर्ण के भार तथा बदले के कारण भार में हुई वृद्धि के योग में से घटाया जाता है ।
इस प्रकार प्राप्त परिणामी शेष को बदले से सम्बन्धित समानुपाती गुणज ( multiple ) संख्याओं के
योग द्वारा भाजित किया जाता है, और तब उन समानुपाती संख्याओं में से प्रत्येक द्वारा अलग-अलग
गुणित किया जाता है । तब बदले में प्राप्त स्वर्ण के विशिष्ट वर्ण वाले और विशिष्ट अनुपात वाले विभिन्न
भारों की प्राप्ति होती है ॥२०२–२०३॥
( १९९½ ) यहाँ उल्लिखित क्रिया १८५ वीं गाथा से मिलती है ।

-६. २०८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४३

अत्रोद्देशकः

कश्चिद्वणिक् फलार्थी षोडशवर्णं शतद्वयं कनकम् ।
यत्किंचिद्विनिमयकृतमेकाद्यं द्विगुणितं यथा क्रमशः ॥२०४॥
द्वादशवसुनवदशकक्षयकं लाभो द्व्युत्तरशतम् ।
शेषं किं स्याद्विनिमयकांस्तेषां चापि मे कथय ॥२०५॥
दृश्यसुवर्णविनिमयसुवर्णमूलानयनसूत्रम्-
विनिमयवर्णेनाप्तं स्वांशं स्वेष्टक्षयघ्नसंमिश्रात् ।
अंशक्यौनेनाप्तं दृश्यं फलमत्र भवति मूलधनम् ॥२०६॥

अत्रोद्देशकः

वणिजः कंचित् षोडशवर्णकसौवर्णगुलकमाहृत्य ।
त्रिचतुःपञ्चमभागान् क्रमेण तस्यैव विनिमयं कृत्वा ॥२०७॥
द्वादशदशवर्णैः संयुज्य च पूर्वशेषेण । मूलेन विना दृष्टं स्वर्णसहस्रं तु किं मूलम् ॥२०८॥

उदाहरणार्थ प्रश्न

कोई व्यापारी लाभ प्राप्त करने का इच्छुक है, और उसके पास १६ वर्ण वाला २०० भार का
स्वर्ण है । उसका एक भाग, १२, ८, ९ और १० वर्ण वाले चार प्रकार के स्वर्ण से बदला जाता है,
जिनके भार ऐसे अनुपात में हैं जो १ से आरम्भ होकर नियमित रूप से २ द्वारा गुणित किये जाते हैं ।
इस बदले के व्यापार के फलस्वरूप स्वर्ण के भार में १०२ लाभ होता है । शेष ( बिना बदले हुए )
स्वर्ण का भार क्या है ? उन उपर्युक्त वर्णों के संगत ( corresponding ) स्वर्ण-प्रकारों के भारों
कोभी बतलाओ, जो बदले में प्राप्त हुए हैं ॥२०४-२०५॥

जिसका कुछ भाग बदला गया है ऐसे स्वर्ण की सहायता से, और बदले के कारण बढ़ता देखा
गया है ऐसे स्वर्ण के भार की सहायता से स्वर्ण की मूल मात्रा के भार को निकालने के लिये नियम-

बदले जाने वाले मूल स्वर्ण के प्रत्येक विशिष्ट भाग को उसके बदले के संगत वर्ण द्वारा
भाजित किया जाता है । प्रत्येक दशा में, परिणामी भजनफल दिये गये मूल स्वर्ण के मन से गुने
हुए वर्ण द्वारा गुणित किये जाते हैं; और तब ये सब गुणनफल जोड़े जाते हैं । इस योग में से मूल,
स्वर्ण के विभिन्न भिन्नीय बदले हुए भागों के योग को घटाया जाता है । अब यदि बदले के कारण
स्वर्ण के भार की बढ़ती को इस परिणामी शेष द्वारा भाजित किया जाय, तो मूल स्वर्ण धन प्राप्त
होता है ॥२०६॥

उदाहरणार्थ प्रश्न

किसी व्यापारी की १६ वर्ण सोने की एक छोटी गेंद ली जाती है; तथा उसके १/३, १/४ और १/५
भाग क्रमशः १२, १० और ९ वर्ण वाले स्वर्ण से बदल दिये जाते हैं । इन बदले हुए विभिन्न प्रकार
के स्वर्णों के भारों को मूल स्वर्ण के शेष भाग में जोड़ दिया जाता है । तब मूल स्वर्ण के भार को
लेखा में से हटाने से भार में १००० बढ़ती देखी जाती है । इस मूल स्वर्ण का भार बतलाओ
॥२०७-२०८॥

१४४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २०९-
इष्टांशदानेन इष्टवर्णानयनस्य तदिष्टांशकयोः सुवर्णानयनस्य च सूत्रम्—
अंशाभ्यैकं व्यस्तं क्षिप्ट्वेष्टघ्नं भवेत् सुवर्णमयी ।
सा गुलिका तस्या अपि परस्परांशाग्नकनकस्य ॥ २०९ ॥
स्वेच्छक्षयेण वर्णौ प्रकल्पयेत्प्राग्वदेव यथा ।
एवं तद्द्वययोरप्युभयं साम्यं फलं भवेद्यदि चेत् ॥२१०॥
प्राक्कल्पनेष्टवर्णौ गुलिकाभ्यां निश्चयौ भवतः ।
नो चेत्प्रथमस्य तदा किंचिन्न्यूनाधिकौ क्षयौ कृत्वा ॥२११॥
तत्क्षयपूर्वक्षययोरन्तरिते शेषमत्र संस्थाप्य ।
त्रैराशिकविधिलब्धं वर्णौ तेनोनिताधिकौ स्पष्टौ ॥२१२॥
दूसरे व्यक्ति के पास के वाञ्छित भिन्नीय भाग वाले स्वर्ण की पारस्परिक दान की सहायता से
इष्ट वर्ण निकालने के लिये, तथा उन मन से चुने हुए दिये गये भागों के संगत स्वर्णों के भारों को
क्रमशः निकालने के लिये नियम—
(दो विशिष्ट रूप से) दिये गये भागों में से प्रत्येक के संख्यात्मक मान द्वारा १ को भाजित कर
व्युत्क्रम में लिखा जाता है । यदि इस प्रकार प्राप्त भजनफलों में से प्रत्येक को मन से चुनी हुई राशि
द्वारा गुणित किया जाय, तो वह सोने की दो छोटी गेंदों में से प्रत्येक के भार को उत्पन्न करता है ।
सोने की इन छोटी गेंदों में से प्रत्येक का वर्ण, तथा व्यापार में दूसरे मनुष्य के द्वारा दिये गये स्वर्ण
को, प्रत्येक दशा में, दिये गये अन्तिम औसत वर्ण की सहायता से प्राप्त करना पड़ता है । यदि इस
प्रकार से प्राप्त उत्तर दोनों कुलक (sets) प्रश्न के इष्ट मानों से मेल खाते हैं, तो मन से चुनी हुई
संख्या से प्राप्त दो वर्ण, (दो दिये गये छोटे स्वर्ण की गेंदों के सम्बन्ध में ), कथित सत्यापित वर्ण हो
जाते हैं । यदि ये उत्तर मेल नहीं खाते, तो उत्तरों के प्रथम कुलक के वर्णों को आवश्यकतानुसार छोटा
या कुछ बड़ा बनाना पड़ता है । तब सुधारे हुए संघटक वर्णों के संगत औसत वर्ण को आगे प्राप्त
करना पड़ता है । इसके पश्चात्, इस औसत वर्ण और पहिले प्राप्त (बिना मेल खानेवाले औसत)
वर्ण के अन्तर को लिख लिया जाता है; और इष्ट समानुपातिक राशियाँ त्रैराशिक नियम द्वारा प्राप्त की
जाती हैं । पहिली चुनी हुई संख्या के अनुसार प्राप्त वर्णों को जब इन दो राशियों में से क्रमशः एक
द्वारा ह्रासित और दूसरी द्वारा जोड़ा जाता है, तब यहाँ इष्ट वर्णों की प्राप्ति होती है । ॥२०९-२१२॥
(२०९-२१२) गाथा २१३-२१५ के प्रश्न का साधन निम्न भाँति करने पर नियम स्पष्ट
हो जावेगा—
१ को १/२ और १/३ द्वारा भाजित करने पर हमें क्रमशः २, ३ प्राप्त होते हैं । उनकी स्थिति बदल
कर उन्हें किसी चुनी हुई संख्या (मानलो १) द्वारा गुणित करने से हमें ३, २ प्राप्त होते हैं । ये दो
संख्याएं क्रमशः दो व्यापारियों की स्वर्ण मात्राओं का प्ररूपण करती हैं ।
९ को प्रथम व्यापारी के स्वर्ण का वर्ण चुनकर, हम उसके द्वारा प्रस्तावित बदले (विनिमय) में से,
दूसरे व्यापारी के स्वर्ण के वर्ण १३ को सरलता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं । ये वर्ण ९ और १३, दूसरे
व्यापारी द्वारा प्रस्तावित बदले में, औसत वर्ण ३५/३ को उत्पन्न करते हैं, जब कि प्रश्न में दिया गया औसत
वर्ण १२ अथवा ३६/३ होता है ।
इसलिये वर्ण ९ और १३ को बदलना पड़ता है । यदि ९ के स्थान पर ८ चुना जाय तो १३

-६. २१६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४५
अत्रोद्देशकः
स्वर्णपरीक्षकवणिजौ परस्परं याचितौ ततः प्रथमः ।
अर्धं प्रादात् तामपि गुलिकां स्वसुवर्ण आयोज्य ॥२१३॥
वर्णदशकं करीमीत्यपरोऽवादीत् त्रिभागमात्रतया ।
लब्धे तथैव पूर्णं द्वादशवर्णं करोमि गुलिकाभ्याम् ॥२१४॥
उभयोः सुवर्णमाने वर्णौ संचिन्त्य गणिततत्त्वज्ञ ।
सौवर्णगणितकुशलं यदि तेऽस्ति निगद्यतामाशु ॥२१५॥
इति मिश्रकव्यवहारे सुवर्णकुट्टीकारः समाप्तः ।
विचित्रकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारं विचित्रकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । सत्यानृतसूत्रम्—
पुरुषाः सैकैष्टगुणा द्विगुणेष्टोना भवन्त्यसत्यानि । पुरुषकृतिस्तैरुना सत्यानि भवन्ति वचनानि ॥२१६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण के मूल्य को परखने में कुशल दो व्यापारियों ने एक दूसरे से स्वर्ण बदलने के लिये
कहा । पहिले ने दूसरे से कहा, “यदि अपना आधा स्वर्ण मुझे दे दो, तो उसे मैं अपने स्वर्ण में
मिलाकर कुल स्वर्ण को १० वर्ण वाला बना लूँगा ।” तब दूसरे ने कहा, “यदि मैं तुम्हारा केवल १/३
भाग स्वर्ण प्राप्त करलूँ, तो मैं पूरे स्वर्ण को दो गोलियों की सहायता से १२ वर्ण वाला बना लूँगा ।”
हे गणित तत्त्वज्ञ ! यदि तुम स्वर्ण गणित में कुशल हो तो सोचविचार कर शीघ्र बतलाओ कि उनके
पास कितने-कितने वर्ण वाला कितना-कितना स्वर्ण ( भार में ) है ? ॥२१३-२१५॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में सुवर्ण कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
विचित्र कुट्टीकार
इसके पश्चात् , हम मिश्रक व्यव्हार में विचित्र कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
( ऐसी परिस्थिति में जैसी कि नीचे दी गई है, जहाँ दोनों बातें साथ ही साथ सम्भव हैं, )
सत्य और असत्य वचनों की संख्या ज्ञात करने के लिये नियम—
मनुष्यों की संख्या को उनमें से चाहे गये मनुष्यों की संख्या को १ द्वारा बढ़ाने से प्राप्त संख्या
द्वारा गुणित करो, और तब उसे चाहे गये मनुष्यों की संख्या की दुगुनी राशि द्वारा हासित करो । जो
संख्या उत्पन्न होगी वह असत्य वचनों की संख्या होगी । सब मनुष्यों का निरूपण करनेवाली संख्या का
वर्ग इन असत्य वचनों की संख्या द्वारा हासित होकर सत्य वचनों की संख्या उत्पन्न करता है ॥२१६॥
को पहिले बदले में १६ तक बढ़ाना पड़ता है । इन दो वर्णों ८ और १६ को, दूसरे बदले में प्रयुक्त
करने से, हमें औसतवर्ण ३६/५ के बदले में ३५/५ प्राप्त होता है ।
इस प्रकार, दूसरे बदले में हम देखते हैं कि भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में ( ४०-
३५ ) अथवा ५ की बढ़ती है, जबकि पूर्व के चुने हुए वर्णों के सम्बन्ध में घटती और बढ़ती क्रमशः
९ - ८ = १ और १६ - १३ = ३ हैं ।
परन्तु दूसरे बदले में भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में बढ़ती ३६ - ३५ = १ है ।
त्रैराशिक के नियम का प्रयोग करने पर हमें वर्णों में संगत घटती और बढ़ती १/५ और ३/५ प्राप्त होती हैं ।
इसलिये वर्ण क्रमशः ९ - १/५ या ८ ४/५ और १३ + ३/५ = १३ ३/५ हैं ।
( २१६ ) इस नियम का मूल आधार गाथा २१७ में दिये गये प्रश्न के निम्नलिखित बीजीय
ग० सा० सं०-१९

१४६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २१७-
अत्रोद्देशकः
कामुकपुरुषाः पञ्च हि वेश्यायाश्च प्रियास्त्रयस्तत्र ।
प्रत्येकं सा ब्रूते त्वमिष्ट इति कानि सत्यानि ॥२१७॥
प्रस्तारयोगभेदस्य सूत्रम्—
एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वाधर्गतः क्रमोत्क्रमशः ।
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नं प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम् ॥२१८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पाँच कामुक व्यक्ति हैं । उनमें से तीन व्यक्ति वास्तव में वेश्या द्वारा चाहे जाते हैं । वह
प्रत्येक से अलग-अलग कहती है, “मैं केवल तुम्हें चाहती हूँ ।” उसके कितने ( व्यक्त और उप-
लक्षित ) वचन सत्य हैं ? ॥२१७॥
दी हुई वस्तुओं में ( सम्भव ) संचयों के प्रकारों सम्बन्धी नियम—
एक से आरम्भकर, संख्याओं को, दी गई वस्तुओं की संख्या तक एक द्वारा बढ़ाकर, नियमित
क्रम में और व्यस्तक्रम में ( क्रमशः ) एक ऊपर और एक नीचे क्षैतिजपंक्ति में लिखो । यदि ऊपर
की पंक्ति में दाहिने से बाएँ ओर को लिया गया ( एक, दो, तीन अथवा अधिक संख्याओं का ) गुणन-
फल, नीचे की पंक्ति में भी दाहिने से बाएँ ओर को लिये गये ( एक, दो, तीन अथवा अधिक संख्याओं
के संगत ) गुणनफल द्वारा भाजित किया जाय, तो प्रत्येक दशा में ऐसे संचय की इष्ट राशि फलस्वरूप
प्राप्त होती है ॥ २१८ ॥
निरूपण से स्पष्ट हो जावेगा—
मानलो कुल मनुष्यों की संख्या अ है जिनमें से ब चाहे जाते हैं । वचनों की संख्या अ है,
और प्रत्येक वचन अ मनुष्यों के बारे में है, इसलिये वचनों की कुल संख्या अ × अ = अ² है । अब
इन अ मनुष्यों में से ब मनुष्य चाहे जाते हैं, और अ — ब चाहे नहीं जाते । जब ब मनुष्यों में से
प्रत्येक को यह कहा जाता है, 'केवल तुम्हीं चाहे जाते हो', तब प्रत्येक दशा में असत्य वचन ब — १
हैं ; इसलिये असत्य वचनों की ब वचनों में कुल संख्या ब ( ब — १ ) है...................( १ )
जब फिर से वही कथन अ — ब मनुष्यों में से प्रत्येक को कहा जाता है तब प्रत्येक दशा में असत्य
कथनों की संख्या ब + १ है । इसलिये अ — ब वचनों में कुल असत्य वचनों की संख्या (अ — ब) (ब + १)
है...(२) (१) और (२) का योग करने पर, हमें ब ( ब — १) + (अ — ब) (ब + १) = अ (ब + १)
— २ ब प्राप्त होता है । यह असत्य वचनों की कुल संख्या को निरूपित करती है । इसे अ² में से घटाने
पर, जो कि सब सत्य और असत्य वचनों की कुल संख्या है, हमें सत्य वचनों की संख्या प्राप्त होती है ।
( २१८ ) यह नियम संचय ( combination ) के प्रश्न से सम्बन्ध रखता है । यहाँ दिया
गया सूत्र यह है—
न (न — १) (न — २)······(न — र + १) |__ न
----------------------------------- और यह स्पष्ट रूप से ------------ के तुल्य है ।
१ ˙ २ ˙ ३·········र |__ र |__ न — र
( २२६ ) नियम में दिया गया सूत्र बीजीय रूप से निम्न प्रकार है—
अदा / अदा \ ²
--- - √ ( --- ) — अबद ( दा — द )
२ \ २ /
क = ---------------------------------------- , जहाँ क = निकाली जाने वाली मजदूरी
दा — द

-६. २२२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४७
अत्रोद्देशकः
वर्णांश्चापि रसानां कषायतिक्ताम्लकटुकलवणानाम् ।
मधुररसेन युतानां भेदान् कथयाधुना गणक ॥२१९॥
वज्रेन्द्रनीलमरकतविद्रुममुक्ताफलैस्तु रचितमालायाः ।
कति भेदा युतिभेदात् कथय सखे सम्यगाशु त्वम् ॥२२०॥
केतक्यशोकचम्पकनीलोत्पलकुसुमरचितमालायाः ।
कति भेदा युतिभेदात्कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥२२१॥
ज्ञाताज्ञातलाभैर्मूलानयनसूत्रम्—
लाभोनमिश्रराशेः प्रक्षेपकतः फलानि संसाध्य । तेन हृतं तल्लब्धं मूल्यं त्वज्ञातपुरुषस्य ॥२२२॥
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि छः रस—कषायला, कडुवा, खट्टा, तीखा, खारा और मीठा
दिये गये हों तो संचय के प्रकार और संचय राशियां क्या होगी ? ॥ २१९ ॥ हे मित्र ! हीरा, नील,
मरकत, विद्रुम और मुक्ताफल से रची हुई अंतहीन धागे की माला के संचय में परिवर्तन होने से कितने
प्रकार प्राप्त हो सकते हैं, शीघ्र बतलाओ ॥ २२० ॥ हे गणित तत्त्वज्ञ सखे ! मुझे बतलाओ कि केतकी,
अशोक, चम्पक और नीलोत्पल के फूलों की माला बनाने के लिये संचयों में परिवर्तन करने पर कितने
प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ?
किसी व्यापार में ज्ञात और अज्ञात लाभों की सहायता से अज्ञात मूल धन प्राप्त करने के लिये
नियम—
समानुपातिक विभाजन की क्रिया द्वारा समस्त लाभों के मिश्रित योग में से ज्ञात लाभ घटाकर
अज्ञात लाभों को निश्चित करते हैं । तब अज्ञात रकम लगाने वाले व्यक्ति का मूलधन, उसके लाभ को
ऊपर समानुपातिक विभाजन की क्रिया में प्रयुक्त उसी साधारण गुणनखण्ड द्वारा भाजित करने पर, प्राप्त
करते हैं ॥ २२२ ॥
────────────────────────────────────────────────────────────────────
अ = ढोया जाने वाला कुल भार, दा = कुल दूरी, द = तय की हुई ( जो चली जा चुकी है ऐसी ) दूरी,
और ब = निश्चित की गई कुल मजदूरी है । यह आलोकनीय है कि यात्रा के दो भागों के लिये मजदूरी
की दर एक सी है, यद्यपि यात्रा के प्रत्येक भाग के लिये चुकाई गई रकम पूरी यात्रा के लिए निश्चित
की गई दर के अनुसार नहीं है ।
प्रश्न के न्यास ( data दत्त सामग्री ) सहित निम्नलिखित समीकरण से सूत्र सरलतापूर्वक
प्राप्त किया जा सकता है—
क ब - क
—— = ————————— , जहाँ क अज्ञात है ।
अद (अ - क) (दा ~ द)

१४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २२३-
अत्रोद्देशकः
समये केचिद्वणिजस्त्रयः क्रयं विक्रयं च कुर्वीरन् ।
प्रथमस्य षट् पुराणा अष्टौ मूल्यं द्वितीयस्य ॥२२३॥
न ज्ञायते तृतीयस्य व्याप्तिस्तैर्नरैस्तु षण्णवतिः । अज्ञातस्यैव फलं चत्वारिंशद्धि तेनाप्तम् ॥२२४॥
कस्तस्य प्रक्षेप्यो वणिजोरुभयोर्भवेच्च को लाभः ।
प्रगणय्याचक्ष्व सखे प्रक्षेपं यदि विजानासि ॥२२५॥
भाटकानयनसूत्रम्—
भरभृतिगतगम्यहृतिं त्यक्त्वा योजनदलघ्नभारकृतेः ।
तन्मूलोनं गम्यच्छिन्नं¹ गन्तव्यभाजितं सारम् ॥२२६॥
अत्रोद्देशकः
पनसानि द्वात्रिंशन्नीत्वा योजनमसौ दलोनाष्टौ ।
गृह्णात्यन्तर्भाटकमर्धे भग्नोऽस्य किं देयम् ॥२२७॥
१ M और B में यहाँ त जुड़ा है; छंद की दृष्टि से यह अशुद्ध है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
समझौते के अनुसार तीन व्यापारियों ने खरीदने और बेचने की क्रिया की । उनमें से पहिले
की रकम ६ पुराण, दूसरे की ८ पुराण तथा तीसरे की अज्ञात थी । उन सब तीन मनुष्यों को ९६
पुराण लाभ प्राप्त हुआ । तीसरे व्यक्ति द्वारा अज्ञात रकम पर ४० पुराण लाभ प्राप्त किया गया
था । व्यापार में उसने कितनी रकम लगाई थी ? अन्य दो व्यापारियों को कितना-कितना लाभ हुआ ?
हे मित्र ! यदि समानुपातिक विभाजन की क्रिया से परिचित हो तो भलीभाँति गणना कर उत्तर
दो ॥ २२३-२२५ ॥
किसी दी गई दर पर किसी निश्चित दूरी के किसी भाग तक कुछ दी गईं वस्तुएँ ले जाने के
किराये को निकालने के लिये नियम—
ले जाये जाने वाले भार के संख्यात्मक मान और योजन में नापी गई तय दूरी की अर्द्ध राशि के
गुणनफल के वर्ग में से ले जाये जाने वाले भार के संख्यात्मक मान, तय किया गया किराया, पहुँची
हुई दूरी, इन सब के संतत गुणनफल को घटाओ । तब यदि ले जाये जाने वाले भार के भिन्नीय
भाग ( अर्थात् यहाँ आधा भाग ) को तय की गई पूरी दूरी द्वारा गुणित कर, और तब उपर्युक्त अंतर के
वर्गमूल द्वारा हासित कर, तय की जाने वाली ( जो अभी शेष है ऐसी ) दूरी के द्वारा भाजित किया
जाय, तो इष्ट उत्तर प्राप्त होता है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
यहाँ एक मनुष्य ऐसा है, जिसे ३२ पनस फलों को १ योजन दूर ले जाने पर मजदूरी में ७ ½
फल मिलते हैं । वह आधी दूर जाकर बैठ जाता है । उसे तय की गई मजदूरी में से कितनी मिलना
चाहिये ? ॥२२७॥

-६. २३० ] मिश्रकव्यवहारः [ १४९
द्वितीयतृतीययोजनानयनस्यसूत्रम्—
भरभाटकसंवर्गोऽद्वितीयभृतिकृतिविवर्जितश्छेदः ।
तद्भृत्यन्तरभरगतिहतेर्गतिः स्याद् द्वितीयस्य ॥२२८॥
अत्रोद्देशकः
पनसानि चतुर्विंशतिमा नीत्वा पञ्चयोजनानि नरः ।
लभते तद्भृतिमिह नव षड्भृतिवियुते द्वितीयनृगतिः का ॥२२९॥
बहुपद¹ भाटकानयनस्य सूत्रम्—
संनिहितनरहतेषु प्रागुत्तरमिश्रितेषु मार्गेषु ।
व्यावृत्तनरगुणेषु प्रक्षेपकासाधितं मूल्यम् ॥२३०॥
१. B में यहाँ 'पद' छूट गया है ।
जब पहिला अथवा दूसरा बोझ ढोने वाला थक कर बैठ जाता है, तब दूसरे अथवा तीसरे
बोझ ढोने वाले के द्वारा योजनों में तय की गईं दूरियों को निकालने के लिये नियम—
ले जाये जाने वाले कुल वजन और तय की गईं मजदूरियों के मान के गुणनफल में से प्रथम
ढोने वाले को दी गई मजदूरी के वर्ग को घटाओ । इस अन्तर को तय की गई मजदूरी और पहिले
ही दे दी गई मजदूरी के अन्तर, ढोया जाने वाला पूरा वजन, और तय की जानेवाली पूरी दूरी के
संतत गुणनफल के सम्बन्ध में भाजक के रूप में उपयोग में लाते हैं । परिणामी भजनफल दूसरे
मजदूर द्वारा तय की जाने वाली दूरी होता है ॥२२८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य को २४ पनस फल ५ योजन दूर ले जाने के लिये ९ फल मजदूरी के रूप में
प्राप्त हो सकते हैं । यदि प्रथम मनुष्य को इनमें से ६ फल मजदूरी के रूप में दिये जा चुके हों, तो
दूसरे ढोने वाले को अब कितनी दूरी तय करना है, ताकि वह शेष मजदूरी प्राप्त करले ? ॥२२९॥
विभिन्न दशाओं की संगत मजदूरियों के मानों को निकालने के लिये नियम, जब कि विभिन्न
मजदूर उन विभिन्न दूरियों तक दिया गया बोझ ले जावें—
मनुष्यों की विभिन्न संख्याओं द्वारा तय की गई दूरियों को वहाँ ढोने का काम करने वाले
मनुष्यों की संख्या द्वारा भाजित करो । प्राप्त भजनफलों को इस प्रकार संयुक्त करना पड़ता है,
कि उनमें से पहिला अलग रख लिया जाता है, और तब बाद के भजनफलों ( १, २, ३ आदि ) को
उसमें जोड़ दिया जाता है । इन परिणामी राशियों को क्रमशः विभिन्न स्थानों पर बैठ जाने वाले
मनुष्यों की संख्या द्वारा गुणित करना पड़ता है । तब इन परिणामी गुणनफलों के सम्बन्ध में प्रक्षेपक
क्रिया ( समानुपातिक विभाजन की क्रिया ) करने से विभिन्न स्थानों पर छोड़ने ( बैठने ) वाले मनुष्यों
की मजदूरियाँ प्राप्त होती हैं ॥२३०॥
(२२८) बीजीय रूप से : दा - द = [(ब - क) अ दा] / (अब - क²), जो पिछले नोट के समीकरण से सरलता-
पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है । यहाँ क अज्ञात राशि है ।

१५० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २३१-
अत्रोद्देशकः
शिबिकां नयन्ति पुरुषा विंशतिरथ योजनद्वयं तेषाम् ।
वृत्तिर्दीनाराणां विंशत्यधिकं च सप्तशतम् ॥२३१॥
क्रोशद्वये निवृत्तौ द्वावुभयोः क्रोशयोस्त्रयश्चान्ये ।
पञ्च नरः शेषार्धाद्व्यावृताः का भृतिस्तेषाम् ॥२३२॥
इष्टगुणितपोट्टलकानयनसूत्रम्—
सैकगुणा स्वस्वेष्टं हित्वाऽन्योन्यघ्नशेषमितिः ।
अपवर्त्य योज्य मूलं ( विष्णोः ) कृत्वा व्येकेन मूलेन ॥२३३॥
पूर्वापवर्तराशीन् हत्वा पूर्वापवर्तराशियुतेः ।
पृथगेव पृथक् त्यक्त्वा हस्तगताः स्वधनसंख्याः स्युः ॥२३४॥
ताः स्वस्वं हित्वैव त्वशेषयोगं पृथक् पृथक् स्थाप्य ।
स्वगुणघ्नाः स्वकरगतैरूनाः पोट्टलकसंख्याः स्युः ॥२३५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२० मनुष्यों को कोई पालकी २ योजन दूर ले जाने पर ७२० दीनार मिलते हैं। दो मनुष्य
दो क्रोश दूर जाकर रुक जाते हैं; दो क्रोश दूर और जाने पर अन्य तीन रुक जाते हैं, तथा शेष की
आधी दूरी जाने पर ५ मनुष्य रुक जाते हैं। ढोने वाले विभिन्न मजदूरों को क्या-क्या मजदूरी
मिलती है ? ॥२३१-२३२॥
किसी थैली में भरी हुई रकम को निकालने के लिये नियम, जो कुछ मनुष्यों में से प्रत्येक के
हाथ में जितनी रकम है उसमें जोड़ी जाने पर, अन्य के हाथों में रखी हुई रकमों के योग की विशिष्ट
गुणज ( multiple ) बन जाती है—
प्रश्न में विशिष्ट गुणज ( multiple ) संख्याओं में से प्रत्येक में एक जोड़कर योग राशियां
प्राप्त करते हैं। इन योगों को एक दूसरे से, प्रत्येक दशा में, विशेष उल्लिखित गुणज के सम्बन्धी योग
को उपेक्षित करते हुए, गुणित करते हैं। इन्हें, साधारण गुणनखंडों को हटा कर, अल्पतम पदों में प्रह्रासित
(लघुकृत) करते हैं। तब इन प्रह्रासित (लघुकृत) राशियों को जोड़ा जाता है। इस परिणामी योग का
वर्गमूल प्राप्त किया जाता है, जिसमें से एक घटा दिया जाता है। उपर्युक्त प्रह्रासित राशियों को इस १
द्वारा ह्रासित वर्गमूल द्वारा गुणित किया जाता है। तब इन्हें अलग-अलग उन्हीं प्रह्रासित राशियों के योग
में से घटाया जाता है। इस प्रकार, कई व्यक्तियों में से प्रत्येक के हाथ की रक़में प्राप्त होती हैं। उन
व्यक्तियों में से केवल एक के पास के धन के मान को प्रत्येक दशा में जोड़ से वञ्चित कर, इन सब
हाथ की रक़मों की राशियों को एक दूसरे में जोड़ना पड़ता है। इस प्रकार प्राप्त कई योग अलग-अलग
लिखे जाते हैं। इन्हें क्रमशः उपर्युक्त उल्लिखित गुणज राशियों द्वारा गुणित किया जाता है। इस
प्रकार प्राप्त कई गुणनफलों में से हाथ की रकमों को अलग-अलग घटाया जाता है। तब हाथ में कई
रकमों में से प्रत्येक के सम्बन्ध में अलग-अलग थैली की रकम का वही मान प्राप्त होता है ॥२३३-२३५॥
⎼ ( २३३-२३५ ) गाथा २३६-२३७ में दिये गये प्रश्न में, मानलो क, ख, ग हाथ में रखी हुई
तीन व्यापारियों की रक़में हैं; और थैली में य रकम है।

-६. २३६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५१
अत्रोद्देशकः
मार्गे त्रिभिर्वणिग्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्रैकः ।
पोट्टलकमिदं प्राप्य द्विगुणधनोऽहं भविष्यामि ॥२३६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन व्यापारियों ने सड़क पर एक थैली पड़ी हुई देखी । एक ने शेष उन से कहा, "यदि मुझे
यह थैली मिल जाय, तो तुम्हारे हाथ में जितनी रकमें हैं उनके हिसाब से मैं तुम दोनों लोगों से दुगुना
धनवान हो जाऊँगा ।" तब दूसरे ने कहा, "मैं तिगुना धनवान हो जाऊँगा ।" तब तीसरे ने कहा, "मैं
पांच गुना धनवान हो जाऊँगा ।" थैली की रकम तथा प्रत्येक के हाथ की रकमों को अलग-अलग
बतलाओ ॥२३६॥
हाथ की रकमों के मान तथा थैली की रकम निकालने के लिये नियम, जब कि थैली की रकम
का विशेष उल्लिखित भिन्नीय भाग दत्त-संख्या के मनुष्यों में, प्रत्येक के हाथ की रकम में क्रमशः
जोड़ने पर, प्रत्येक दशा में उनके धन की हाथ की रकम के वही गुणज ( multiple ) हो जावें—
तब य + क = अ ( ख + ग ), ⎞
य + ख = ब ( ग + क ), ⎬ जहाँ अ, ब, स प्रश्न में गुणजों का निरूपण करते हैं ।
य + ग = स ( क + ख ), ⎠
अब य + क + ख + ग = (अ + १) (ख + ग)
= (ब + १) (ग + क)
= (स + १) (क + ख).
तब {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (ख + ग) = (ब + १) (स + १),......( १ )
जहाँ ता = य + क + ख + ग है ।
इसी प्रकार, {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (ग + क) = (स + १) (अ + १)......( २ )
और {(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × (क + ख) = (अ + १) (ब + १)......( ३ )
( १ ), ( २ ) और ( ३ ) को जोड़ने पर,
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ (क + ख + ग)
= (ब + १) (स + १) + (स + १) (अ + १) + (अ + १) (ब + १) = शा......( ४ )
( १ ), ( २ ) और ( ३ ) को अलग-अलग २ द्वारा गुणित करके ( ४ ) में से घटाने पर—
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ क = शा – २ (ब + १) (स + १),
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ ख = शा – २ (स + १) (अ + १),
{(अ + १) (ब + १) (स + १) / ता} × २ ग = शा – २ (अ + १) (ब + १),

१५२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २३७-
हस्तगताभ्यां युवयोस्त्रिगुणधनोऽहं द्वितीय आहेति ।
पञ्चगुणोऽहं त्वपरः पोट्टलहस्तस्थमानं किम् ॥२३७॥
सर्वतुल्यगुणकपोट्टलकानयनहस्तगतानयनसूत्रम्—
व्येकपदघ्नव्येकगुणेष्टांशवधोनितांशयुतिगुणघातः ।
हस्तगताः स्युर्भवति हि पूर्ववदिष्टांशभाजितं पोट्टलकम् ॥२३८॥
प्रश्न में दिये गये सभी उल्लिखित भिन्नों के योग के हर की उपेक्षा कर, उसे (उल्लिखित साधारण)
अपवर्त्य संख्या ( multiple ) द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल में से वे राशियां अलग-
अलग घटाई जाती हैं, जो साधारण हर में प्रह्रासित उपर्युक्त भिन्नों में से प्रत्येक को एक कम मनुष्यों के
मामलों की संख्या और उल्लिखित अपवर्त्य के गुणनफल को एक द्वारा ह्रासित करने से प्राप्त राशि
द्वारा गुणित करने से प्राप्त होती हैं । परिणामी शेष, हाथ की रकमों के अलग-अलग मानों को स्थापित
करते हैं । पहिले की तरह क्रियायें करने पर और तब प्रश्न में विशेष उल्लिखित भिन्नीय भाग द्वारा
विभाजन करने पर थैली की रकम का मान प्राप्त हो जाता है ॥२३८॥
∴ क : ख : ग : : शा-२ (ब+१) (स+१) : शा-२ (स + १) (अ+१) : शा-२ (अ+१) (ब+१).
समानुपात के दाहिनी ओर, (यदि कोई हो तो) साधारण गुणनखंडों को हटाने से, हमें क, ख, ग
के सबसे छोटे पूर्णांक मान प्राप्त होते हैं । यह समानुपात नियम में सूत्र के रूप में दिया गया है । यह
देखने योग्य है कि नियम में कथित वर्गमूल केवल गाथा २३६-२३७ में दिये गये प्रश्न से सम्बन्धित
है । यदि शुद्ध रूप से लिखा जाय, तो “वर्गमूल” के स्थान में ‘३’ होना चाहिये । यह सरलता पूर्वक
देखा जा सकता है कि यह प्रश्न तभी सम्भव है, जब कि १/(अ + १), १/(ब + १) और १/(स + १) के कोई भी दो
का योग तीसरे से बड़ा हो ।
( २३८ ) नियम में दिया गया सूत्र यह है—
क = म ( अ + ब + स ) - अ ( २ म - १ ), ⎫ जहाँ क, ख, ग हाथ की रकमें हैं, म साधारण
ख = म ( अ + ब + स ) - ब ( २ म - १ ), ⎬ गुणज ( multiple ) है, और अ, ब, स
ग = म ( अ + ब + स ) - स ( २ म - १ ), ⎭ दिये गये उल्लिखित भिन्नीय भाग हैं ।
ये मान अगले समीकरणों से सरलता पूर्वक निकाले जा सकते हैं ।
पा. अ + क = म (ख + ग), ⎫
पा. ब + ख = म (ग + क), ⎬ जहाँ पा, थैली की रकम है ।
और पा. स + ग = म (क + ख), ⎭

-६. २४१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५३
अत्रोद्देशकः
वैश्यैः पञ्चभिरेकं पोट्टलकं दृष्टमाह चैकैकः ।
पोट्टलकषष्ठसप्तमनवमाष्टमदशमभागमाप्त्वैव ॥२३९॥
स्वस्वकरस्थेन सह त्रिगुणं त्रिगुणं च शेषाणाम् ।
गणक त्वं मे शीघ्रं वद हस्तगतं च पोट्टलकम् ॥२४०॥
इष्टांशेष्टगुणपोट्टलकानयनसूत्रम्—
इष्टगुणान्नान्यांशाः सेष्टांशाः सैकनिजगुणहृता युक्ताः ।
द्यूनपदघ्नेष्टांशन्यूनाः सैकेष्टगुणहृता हस्तगताः ॥२४१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पाँच व्यापारियों ने एक थैली देखी । उन्होंने (एक के बाद दूसरे से) इस प्रकार कहा कि
थैली की रकम का क्रमशः १/६, १/७, १/९, १/८ और १/१० भाग पाने पर वह अपने हाथ की रकम मिलाकर अन्य
व्यापारियों के कुल धन से तिगुना धनी हो जायगा । हे गणितज्ञ ! उनके हाथों की अलग-अलग रकम
तथा थैली में भरी हुई रकम को शीघ्र ही बतलाओ ॥२३९-२४०॥
थैली की रकम प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि उल्लिखित भिन्नीय भागों को, क्रमशः
उन व्यक्तियों के हाथ की रकम जोड़ने पर, प्रत्येक अन्य की कुल रकमों के मान से विशिष्ट गुणा
धनी बन जावे—
(इष्ट मनुष्य के भाग को छोड़कर,) शेष सभी से सम्बन्धित उल्लिखित भिन्नीय भागों को
साधारण हर में प्रहासित कर हर को उपेक्षित कर दिया जाता है । इन्हें (अलग-अलग दृष्ट मनुष्य
सम्बन्धी) निर्दिष्ट अपवर्त्य (multiple) द्वारा गुणित करते हैं । इन गुणनफलों में उस दृष्ट मनुष्य
के भिन्नीय भाग को जोड़ते हैं । परिणामी योगों में से प्रत्येक को अलग-अलग उसके संगत उल्लिखित
अपवर्त्य (multiple) से एक अधिक राशि द्वारा भाजित करते हैं । तब इन भजनफलों को भी
जोड़ा जाता है । अलग-अलग दशाओं सम्बन्धी इस प्रकार प्राप्त योगों को, दो कम दशाओं की संख्या
द्वारा गुणित कर, निर्दिष्ट भिन्नीय भाग द्वारा हासित करते हैं । अन्तर को एक अधिक निर्दिष्ट अपवर्त्य
द्वारा भाजित करते हैं । यह फल (इस विशिष्ट दशा में) हाथ की रकम है ॥२४१॥
( २४१ ) नियम में दिया गया सूत्र इस प्रकार है—
क = { (अ + मब)/(न + १) + (अ + मस)/(य + १) + (अ + मद)/(र + १) + ... - (श - २) अ } ÷ (म + १)
ख = { (ब + नअ)/(म + १) + (ब + नस)/(य + १) + (ब + नद)/(र + १) + ... - (श - २) ब } ÷ (न + १) इत्यादि;
जहाँ क, ख, ............ हाथ की रकमें हैं; अ, ब, स, द भिन्नीय भाग हैं;
म, न, य, र, ............ विभिन्न अपवर्त्य संख्यायें हैं; और श व्यापार सम्बन्धी व्यक्तियों की
संख्या है ।
ग० सा० सं०-२०

१५४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २४२-
अत्रोद्देशकः
द्वाभ्यां पथि पथिकाभ्यां पोट्टलकं दृष्टमाह तत्रैकः ।
अस्यार्धं संप्राप्य द्विगुणधनोऽहं भविष्यामि ॥२४२॥
अपरस्त्वंशद्वितयं त्रिगुणधनस्त्वत्करस्थधनात् ।
मत्करधनेन सहितं हस्तगतं किं च पोट्टलकम् ॥ २४३ ॥
दृष्टं पथि पथिकाभ्यां पोट्टलकं तद्‌गृहीत्वा च ।
द्विगुणमभूदाद्यस्तु स्वकरस्थधनेन चान्यस्य ॥
हस्तस्थधनादन्यस्त्रिगुणं किं करगतं च पोट्टलकम् ॥ २४४½ ॥
मार्गे नरैश्चतुर्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्राद्यः ।
पोट्टलकमिदं लब्ध्वा ह्यष्टगुणोऽहं भविष्यामि ॥ २४५½ ॥
स्वकरस्थधनेनान्यो नवसङ्गुणितं च शेषधनात् ।
दशगुणधनवानपरस्त्वेकादशगुणितधनवान् स्यात् ।
पोट्टलकं किं करगतधनं कियद्ब्रूहि गणकाशु ॥ २४७ ॥
मार्गे नरैः पोट्टलकं चतुर्भिर्दृष्टं हि तस्यैव तदा बभूवुः ।
पञ्चांशपादार्धतृतीयभागास्तद्द्वित्रिपञ्चघ्नचतुर्गुणाश्च १ ॥ २४८ ॥
१. M और B में स्युः पाठ है, जो स्पष्टरूप से अनुपयुक्त है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो यात्रियों ने सड़क पर धन से भरी हुई थैली देखी । उनमें से एक ने दूसरे से कहा, “थैली
की आधी रकम प्राप्त होने पर मै तुमसे दुगुना धनी हो जाऊँगा ।” दूसरे ने कहा, “इस थैली की २/३
रकम मिल जाने पर मैं हाथ की रकम मिलाकर तुम्हारे हाथ की रकम से तिगुनी रकमवाला हो
जाऊँगा ।” हाथ की अलग-अलग रकमें तथा थैली की रकम बतलाओ ॥२४२-२४३॥ दो यात्रियों ने
रास्ते पर पड़ी हुई धन से भरी थैलो देखी । एक ने उसे उठाया और कहा, “इस धन और हाथ के
धन को मिलाकर मैं तुमसे दुगुना धनी हूँ ।” दूसरे ने थैली को लेकर कहा, “मैं इस धन और हाथ के
धन को मिलाकर तुमसे तिगुना धनी हूँ ।” हाथ की रकमें और थैली की रकम अलग-अलग बतलाओ ।
॥२४४-२४४½॥ चार मनुष्यों ने धन से भरी एक थैली रास्ते में देखी । पहिले ने कहा, “यदि मुझे
यह थैली मिल जाय, तो मैं कुल धन मिलाकर तुम सभी के धन से आठगुना धनवान हो जाऊँ ।” दूसरे
ने कहा, “यदि यह थैली मुझे मिल जाय तो मेरा कुलधन तुम्हारे कुलधन से ९ गुना हो जाय ।”
तीसरे ने कहा, “मैं १० गुना धनी हो जाऊँगा ।” और चौथे ने कहा, “मैं ११ गुना धनी हो जाऊँगा ।”
हे गणितज्ञ ! थैली की रकम और उनमें से प्रत्येक के हाथ की रकमें बतलाओ ॥२४५½-२४७॥ चार
मनुष्यों ने रकम भरी थैली रास्ते में देखी । तब जो कुछ प्रत्येक के हाथ में था, यदि उसमें थैली का
क्रमशः १/५, १/४, १/२ और १/३ भाग मिलाया जाता, तो वह दूसरों के कुलधन से क्रमशः दुगुना, तिगुना,
पाँचगुना और चारगुना धन हो जाता । थैली की रकम और उनमें से प्रत्येक के हाथ की रकमें
बतलाओ ॥२४८॥ तीन व्यापारियों ने रास्ते में धन से भरी हुई थैली देखी । पहिले ने (शेष) उनसे

-६. २५२½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५५
मार्गे त्रिभिर्वणिग्भिः पोट्टलकं दृष्टमाह तत्राद्यः ।
यद्यस्य चतुर्थांशं लभेऽहमित्याह स युवयोर्द्विगुणः ॥ २४९ ॥
आह त्रिभागमपरः स्वहस्तधनसहितमेव च त्रिगुणः ।
अस्यार्धं प्राप्याहं तृतीयपुरुषश्चतुर्गुधनवान् स्याम् ।
आचक्ष्व गणक शीघ्रं किं हस्तगतं च पोट्टलकम् ॥ २५०½ ॥
याचितरूपैरिष्टगुणकहस्तगतानयनस्य सूत्रम्—
याचितरूपैक्यानि स्वसैकगुणवर्धितानि तैः प्राग्वत् ।
हस्तगतानां नीत्वा चेष्टगुणन्नेति सूत्रेण ॥ २५१½ ॥
सदृशच्छेदं कृत्वा सैकैष्टगुणाहतेष्टगुणयुत्या ।
रूपोनितया भक्तान् तानेव करस्थितान् विजानीयात् ॥ २५२½ ॥
कहा, “यदि मुझे इस थैली का ¼ धन मिल जाय, तो मैं अपने हाथ की रकम मिलाकर तुम सभी के
कुलधन से दुगुने धनवाला हो जाऊँ ।” दूसरे ने कहा, “यदि मुझे थैली का ⅓ धन मिल जाय, तो उसे
मिलाकर मैं तुम सभी के कुल धन से तिगुने धनवाला हो जाऊँ ।” तीसरे ने कहा, “यदि मुझे थैली
का आधा धन मिल जाय तो उसे मिलाकर मैं तुम दोनों के कुल धन से चौगुने धनवाला हो जाऊँ ।”
हे गणितज्ञ ! शीघ्र ही उनके हाथ की रकमें तथा थैली की रकम अलग-अलग बतलाओ ॥ २४९–२५०½ ॥
हाथ की ऐसी रकम निकालने का नियम, जो दूसरे से माँगे हुए धन में मिलने पर दूसरों के
हाथ की रकमों का निर्दिष्ट अपवर्त्य बन जाती है :—
माँगी हुई रकमों को अलग-अलग निज की संगत, अपवर्त्य ( multiple ) राशि में एक
जोड़ने से प्राप्तफल द्वारा गुणित करते हैं । इन गुणनफलों की सहायता से गाथा २४१ में दिये गये
नियम द्वारा हाथ की रकमों को प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार प्राप्त इन राशियों को साधारण हरवाली
बनाते हैं । प्रत्येक एक द्वारा बढ़ाई गईं अपवर्त्य ( multiple ) राशियों द्वारा क्रमशः निर्दिष्ट अप-
वर्त्य राशियों को भाजित करते हैं । तब साधारण हरवाली राशियों को अलग-अलग इन प्राप्त फलों के
एकोन योग द्वारा भाजित करते हैं । इन परिणामी भजनफलों को विभिन्न मनुष्यों के हाथों की रकमें
समझना चाहिये ॥ २५१½-२५२½ ॥
( २५१½–२५२½ ) बीजीय रूप से,
[ (अ + ब) (म + १) + म (स + द) (न + १)
[ क - { ─────────────────────────────────── +
न + १
(अ + ब) (म + १) + म (इ + फ) (प + १)
─────────────────────────────────── + .........
प + १
··· + ··· इत्यादि— (श - २) (अ + ब) (म + १) } ÷ (म + १) ] ÷
( म + न + प - १ )
───── ───── ─────
म + १ न + १ प + १
इसी प्रकार ख, ग के लिये, इत्यादि । यहाँ अ, ब, स, द, इ, फ एक दूसरे से माँगी हुई रकमें हैं ।

१५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २५३½-
अत्रोद्देशकः
वैश्यैस्त्रिभिः परस्परहस्तगतं याचितं धनं प्रथमः ।
चत्वार्यथ द्वितीयं पञ्च तृतीयं नरं प्रार्थ्य ॥ २५३½ ॥
द्विगुणोऽभवद् द्वितीयः प्रथमं चत्वारि षट् तृतीयमगात् ।
त्रिगुणं तृतीयपुरुषः प्रथमं पञ्च द्वितीयं च ॥ २५४½ ॥
षट् प्रार्थ्याभूतपञ्चकगुणः स्वहस्तस्थितानि कानि स्युः ।
कथयाशु चित्रकुट्टीमिश्रं जानासि यदि गणक ॥ २५५½ ॥
पुरुषास्त्रयोऽतिकुशलाश्चान्योन्यं याचितं धनं प्रथमः ।
स द्वादश द्वितीयं त्रयोदश प्रार्थ्य तत्त्रिगुणः ॥ २५६½ ॥
प्रथमं दश त्रयोदश तृतीयमभ्यर्थ्य च द्वितीयोऽभूत ।
पञ्चगुणितो द्वितीयं द्वादश दश याचयित्वायम् ॥ २५७½ ॥
सप्तगुणितस्तृतीयोऽभवन्नरो वाञ्छितानि लब्धानि ।
कथय सखे विगणय्य च तेषां हस्तस्थितानि कानि स्युः ॥ २५८½ ॥
अन्त्यस्योपान्त्यतुल्यधनं दत्त्वा समधनानयनसूत्रम्—
वाञ्छाभक्तं रूपं स उपान्त्यगुणः सरूपसंयुक्तः ।
शेषाणां गुणकारः सैकोऽन्यः करणमेतत्स्यात् ॥ २५९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन व्यापारियों ने एक दूसरे से उनके पास की रकमों में से रकमें माँगी । पहिला व्यापारी
दूसरे से ४ और तीसरे से ५ माँगकर शेष के कुल धन से दुगुना धन वाला बन गया । दूसरा पहिले से
४ और तीसरे से ६ मांग कर शेष के कुल धन से तिगुना धनवाला बन गया । तीसरा पहिले से ५ और
दूसरे से ६ मांग कर उन दोनों से पाँचगुना धनवाला बन गया । हे गणितज्ञ, यदि तुम विचित्र कुट्टीकार
विधि से परिचित हो, तो मुझे शीघ्र ही उनके हाथों की रकमें बतलाओ ॥२५३½-२५५½॥ तीन अति-
कुशल पुरुष थे । उन्होंने एक दूसरे से रकमें मांगीं । पहिला पुरुष दूसरे से १२ और तीसरे से १३
लेकर उन दोनों से ३ गुना धनवाला बन गया । दूसरा पहिले से १० और तीसरे से १३ लेकर शेष
दोनों से ५ गुना धनवाला बन गया तीसरा दूसरे से १२ और पहिले से १० लेकर शेष दोनों से ७
गुना धनवाला बन गया । उनकी वांछाएं पूर्ण हो गईं । हे मित्र ! गणना कर उनके हाथों की रकमों
को बतलाओ ॥२५६½-२५८½॥
समान धन राशियों को निकालने के लिये नियम,जब कि अन्तिम मनुष्य अपने खुद के धन में से
उपअन्तिम को उसी के धन के बराबर दे देता है । और फिर, यह उपांतिम मनुष्य बाद में आनेवाले
मनुष्य के सम्बन्ध में यही करता है, इत्यादि—
एक के द्वारा दूसरे को दिये जानेवाले धन के सम्बन्ध में मन से चुनी हुई गुणज ( multi-
ple ) राशि द्वारा १ को विभाजित करो । यह उपअंतिम मनुष्य के धन के सम्बन्ध में गुणज हो जाता
है । यह गुणज एक द्वारा बढ़ाया जाकर दूसरे के हस्तगत धनों का गुणज बन जाता है । इस अन्तिम
व्यक्ति के इस प्रकार प्राप्त धन में १ जोड़ा जाता है । यही रीति उपयोग में लाई जाती है ॥२५९½॥
( २५९½ ) गाथा २६३½ के प्रश्न को निम्नलिखित रीति से हल करने पर यह नियम स्पष्ट हो

-६. २६३½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५७

अत्रोद्देशकः
वैश्यात्मजास्त्रयस्ते मार्गगता ज्येष्ठमध्यमकनिष्ठाः ।
स्वधने ज्येष्ठो मध्यमधनमात्रं मध्यमाय ददौ ॥ २६०½ ॥
स तु मध्यमो जघन्यजघनमात्रं यच्छति स्मास्य ।
समधनिकाः स्युस्तेषां हस्तगतं ब्रूहि गणक संचिन्त्य ॥ २६१½ ॥
वैश्यात्मजाश्च पञ्च ज्येष्ठादनुजः स्वकीयधनमात्रम् ।
लेभे सर्वेऽप्येवं समवित्ताः किं तु हस्तगतम् ॥ २६२½ ॥
वणिजः पञ्च स्वस्वादर्धं पूर्वस्य दत्त्वा तु ।
समवित्ताः संचिन्त्य च किं तेषां ब्रूहि हस्तगतम् ॥ २६३½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी व्यापारी के तीन लड़के थे । बड़ा, मँझला और छोटा, तीनों किसी रास्ते से कहीं जा
रहे थे । बड़े ने अपने धन में से मँझले को उतना धन दिया जितना कि मँझले के पास था । इस
मंझले ने अपने धन में से छोटे को उतना दिया जितना कि छोटे के पास था । अंत में उनके पास
बराबर-बराबर धन हो गया । हे गणितज्ञ ! सोचकर बतलाओ कि आरम्भ में उनके पास (क्रमशः)
कितना-कितना धन था ? ॥ २६०½-२६१½ ॥ किसी व्यापारी के पाँच लड़के थे । द्वितीय पुत्र ने बड़े
से उतना धन लिया जितना कि उसका हस्तगत धन था । बाकी सभी ने ऐसा ही किया । अंत में
उन सबके पास बराबर-बराबर धन हो गया । बतलाओ कि आरम्भ में उनके पास कितनी-कितनी रकम
थी ? ॥ २६२½ ॥ पाँच व्यापारी समान धन वाले हो गये, जब कि उनमें से प्रत्येक ने अपनी खुद की
रकम में से, जो उसके सामने आया, उसे उसी के धन से आधा दे दिया । सोचकर बतलाओ कि उनके
पास आरम्भ में कितना-कितना धन था ? ॥ २६३½ ॥ ६ व्यापारी थे । बड़ों ने, जो कुछ उनके हाथ में
जावेगा—
१ ÷ १/२ या २ उपअंतिम मनुष्य के धन के सम्बन्ध में गुणज (multiple) है । यह २ एक
से मिलाने पर ३ हो जाता है, जो दूसरों के धनों के संबंध में गुणज अथवा अपवर्त्य (multiple)
हो जाता है ।
अब...........................................................................१, १ ।
उपअंतिम १ को २ से गुणित कर और अन्य को ३ द्वारा गुणित करने से हमें
यह प्राप्त होता है..................................................२, ३ ।
अन्त के अंक में १ जोड़ने पर यह प्राप्त होता है...................२, ४ ।
अब यह लिखते हैं.....................................................२, ४, ४ ।
उपअंतिम ४ को २ द्वारा और अन्य को ३ द्वारा गुणित कर और अंत के अंक में जोड़ने पर हमें
यह प्राप्त होता है ।..............................................६, ८, १३ ।
पुनः.............................................................६, ८, १३, १३ ।
ऊपर की तरह, फिर से उन्हीं क्रियाओं को दुहराने पर हमें यह प्राप्त होता है : १८, २४, २६, ४०,
५४, ७२, ७८, ८०, १२१ ।
अंतिम पंक्ति की संख्याएँ ५ व्यापारियों की अलग-अलग हस्तगत रकमों का निरूपण करती हैं ।
बीजीय रूप से :—अ - १/२ ब = ३/२ ब - १/२ स = ३/२ स - १/२ द = ३/२ द - १/२ इ = ३/२ इ;
जहाँ अ, ब, स, द, इ पाँच व्यापारियों की हस्तगत रकमें हैं ।

१५८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २६४½-
वणिजः षट् स्वधनाद्वित्रिभागमात्रं क्रमेण तज्ज्येष्ठः ।
स्वस्वानुजाय दत्त्वा समवित्ताः किं च हस्तगतम् ॥ २६४½ ॥
परस्परहस्तगतधनसंख्यामात्रधनं दत्त्वा समधनानयनसूत्रम्—
वाञ्छाभक्तं रूपं पदयुतमादावुपर्युपर्यैतत् ।
संस्थाप्य सैकवाञ्छागुणितं रूपोनमितरेषाम् ॥२६५½॥
अत्रोद्देशकः
वणिजस्त्रयः परस्परकरस्थधनमेकतोऽन्योन्यम् ।
दत्त्वा समवित्ताः स्युः किं स्याद्धस्तस्थितं द्रव्यम् ॥ २६६½ ॥
था, अपने से छोटों को क्रमशः २/३ रकम ( उसकी जो उनके हाथों में अलग-अलग थी ) क्रमानुसार दी ।
बाद में वे सब समान धन वाले हो गये । उन सबके पास अलग-अलग हाथ में कौन-कौन सी रकमें
थीं । ॥ २६४½ ॥
हाथ की समान रकमों को निकालने के लिये नियम, जब कि कुछ ( संख्या के ) मनुष्य एक
से दूसरे को आपस में ही उतना धन देते हैं, जितना कि क्रमशः उनके हाथ में तब रहता है—
प्रश्न में मन से चुनी हुई गुणज ( multiple ) राशि द्वारा एक को भाजित करते हैं । इसमें
इस व्यापार में भाग लेनेवाले मनुष्यों की संगत संख्या जोड़ते हैं । इस प्रकार प्रथम मनुष्य के हाथ
का प्रारम्भिक धन प्राप्त होता है । यह और उसके बाद के फल क्रम में लिखे जाते हैं, और उनमें से
प्रत्येक को एक द्वारा बढ़ाई गई मन से चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित किया जाता है, और फल को तब
एक द्वारा हासित करते हैं । इस प्रकार, प्रत्येक के पास का ( आरम्भ में उनके हाथ का ) धन ( जितना
था, उतना ) प्राप्त होता जाता है ॥ २६५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
३ व्यापारियों में से प्रत्येक ने दूसरों को जितना उनके पास उस समय था उतना दिया । तब
वे समान धनवान् बन गये । उनमें से प्रत्येक के पास अलग-अलग आरम्भ में कितनी-कितनी रकम
थी ? ॥२६६½॥ चार व्यापारी थे । उनमें से प्रत्येक ने दूसरों से उतनी रकम प्राप्त की जितनी कि उसके
( २६५½ ) गाथा २६६½ में दिये गये प्रश्न को निम्नरीति से हल करने पर नियम स्पष्ट
हो जावेगा—
१ को मन से चुने हुए गुणज ( multiple ) द्वारा भाजित करते हैं । इसमें मनुष्यों की संख्या
३ जोड़ने पर ४ प्राप्त होता है । यह प्रथम व्यक्ति के हाथ की रकम है । यह ४, मन से चुने हुए गुणज
१ को १ द्वारा बढ़ाने से प्राप्त २ द्वारा गुणित होकर, ८ बन जाता है । जब इसमें से १ घटाया जाता है,
तो हमें ७ प्राप्त होता है, जो दूसरे आदमी के हाथ की रकम है ॥२६५½॥
यह ७ ऊपर की तरह २ द्वारा गुणित होकर, और फिर एक द्वारा हासित होकर १३ होता है,
जो तीसरे आदमी के हाथ की रकम है । यह हल निम्नलिखित समीकरण से सरलता पूर्वक प्राप्त हो
सकता है—
४ ( अ - ब - स ) = २ { २ ब - ( अ - ब - स ) - २ स } = ४ स - २ ( अ - ब - स ) -
{ २ ब - ( अ - ब - स ) - २ स }

-६. २७०१/२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५९
वणिजश्चत्वारस्तेऽन्योन्यधनार्धमात्रमन्यस्मात् ।
स्वीकृत्य परस्परतः समवित्ताः स्युः कियत्करस्थधनम् ॥ २६७१/२ ॥
जयापजययोर्लाभानयनसूत्रम् —
स्वस्वच्छेदांशयुती स्थाप्योर्ध्वाधर्यतः क्रमोत्क्रमशः ।
अन्योन्यच्छेदांशकगुणितौ वज्रापवर्तनक्रमशः ॥ २६८१/२ ॥
छेदांशक्रमवत्स्थिततदन्तराभ्यां क्रमेण संभक्तौ ।
स्वांशहरघ्नान्यहरौ वाञ्छाघ्नौ व्यस्ततः करस्थामितिः ॥ २६९१/२ ॥
अत्रोद्देशकः
दृष्ट्वा कुक्कुटयुद्धं प्रत्येकं तौ च कुक्कुटिकौ । उक्तौ रहस्यवाक्यैर्मन्त्रौषधशक्तिमन्महापुरुषेण ॥२७०१/२॥
पास की आधी उस ( रकम देने के ) समय थी । तब वे सब समान धनवाले बन गये । आरम्भ में
प्रत्येक के पास कितनी-कितनी रकम थी ? ॥ २६७१/२ ॥
( किसी जुए में ) जीत और हार से ( बराबर ) लाभ निकालने के लिये नियम—
( प्रश्न में दी गई दो भिन्नीय गुणज ) राशियों के अंशों और हरों के दो योगों को एक दूसरे
के नीचे नियमित क्रम में लिखा जाता है, और तब व्युत्क्रम में लिखा जाता है । ( दो योगों के कुलकों
( sets ) में से पहिले की ) इन राशियों को वज्रापवर्तन क्रिया के अनुसार हर द्वारा गुणित करते हैं,
और दूसरे कुलक की राशियों को उसी विधि से दूसरी संकलित ( summed up ) राशि की संगत
भिन्नीय राशि के अंश द्वारा गुणित करते हैं । प्रथम कुलक सम्बन्धी प्राप्त फलों को हरों के रूप में लिख
लिया जाता है, तथा दूसरे कुलक सम्बन्धी प्राप्त फलों को अंशों के रूप में लिख लिया जाता है ।
प्रत्येक कुलक के हर और अंश का अंतर भी लिख लिया जाता है । तब इन अंतरों द्वारा ( प्रश्न में दिये
गये प्रत्येक गुणज भिन्नों के ) अंश और हर के योग को दूसरे के हर से गुणित करने से प्राप्त फलों को
क्रमशः भाजित किया जाता है । ये परिणामी राशियाँ, इष्ट लाभ के मान से गुणित होने पर, ( दाँव पर
लगाने वाले जुआड़ियों के ) हाथ की रकमों को व्युत्क्रम में उत्पन्न करती हैं ॥२६८१/२–२६९१/२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मन्त्र और औषधि की शक्ति वाले किसी महापुरुष ने मुर्गों की लड़ाई होती हुई देखी, और
मुर्गों के स्वामियों से अलग-अलग रहस्यमयी भाषा में मन्त्रणा की । उसने एक से कहा, "यदि तुम्हारा
पक्षी जीतता है, तो तुम मुझे दाँव में लगाया हुआ धन दे देना । यदि तुम हार जाओगे, तो मैं तुम्हें
दाँव में लगाये हुए धन का ३/२ दे दूंगा ।” वह फिर दूसरे मुर्गे के स्वामी के पास गया, जहाँ उसने

( २६८१/२–२६९१/२ ) बीजीय रूप से,
( स + द ) ब ( अ + ब ) द
क = ───────────────────────── × प, और ख = ───────────────────────── × प, जहाँ
( स + द ) ब - ( अ + व ) स ( अ + ब ) द - ( स + द ) अ
क और ख जुआड़ियों के हाथ की रकमें हैं, और अ/ब, स/द, उनमें से लिये गये भिन्नीय भाग हैं, और प
लाभ है । इसे समीकार से भी प्राप्त किया जा सकता है, यथा—
क - (स/द) ख = प = ख - (अ/ब) क, जहाँ क और ख अज्ञात राशियाँ हैं ।

१६० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २७१½-
जयति हि पक्षो ते मे देहि स्वर्णं ह्यविजयोऽसि दद्यां ते ।
तद्द्वित्र्यंशकमथेतपरं च पुनः स संसृत्य ॥ २७१½ ॥
त्रिचतुर्थं प्रतिवान्छत्युभयस्माद् द्वादशैव लाभः स्यात् ।
तत्कुक्कुटिककरस्थं ब्रूहि त्वं गणकमुखतिलक ॥ २७२½ ॥
राशिलब्धच्छेदमिश्रविभागसूत्रम्—
मिश्रादूनितसंख्या छेदः सैकेन तेन शेषस्य ।
भागं हृत्वा लब्धं लाभोनितशेष एव राशिः स्यात् ॥ २७३½ ॥
अत्रोद्देशकः
केनापि किमपि भक्तं सच्छेदो राशिमिश्रितो लाभः ।
पञ्चाशत्त्रिभिरधिका तच्छेदः किं भवेल्लब्धम् ॥ २७४½ ॥
इष्टसंख्यायोज्यत्याज्यवर्गमूलराश्यानयनसूत्रम् -
योज्यत्याज्ययुतिः सरूपविषमाघ्रघ्नार्धिता वर्गिता
व्यग्रा बन्धहृता च रूपसहिता त्याज्यैक्यशेषाप्रयोः ।
उन्हीं दशाओं में दाँव में लगाये गये धन का ३/४ धन देने की प्रतिज्ञा की । प्रत्येक दशा में उसे दोनों
से केवल १२ (स्वर्ण के टुकड़े) लाभ के रूप में मिले। हे गणक मुख तिलक ! बतलाओ कि प्रत्येक पक्षी
के स्वामी के पास दाँव में लगाने के लिये हाथ में कितना-कितना धन था ? ॥२७०-२७२½॥
अज्ञात भाज्य संख्या, भजनफल और भाजक को उनके मिश्रित योग में से अलग-अलग करने
के लिये नियम:—
कोई भी सुविधाजनक मनसे चुनी हुई संख्या जिसे दिये गये मिश्रित योग में से घटाना पड़ता
है प्रश्न में भाजक होती है। इस भाजक को १ द्वारा बढ़ाने से प्राप्त राशि द्वारा, मन से चुनी हुई संख्या
को दिये गये मिश्रित योग में से घटाने से प्राप्त शेष को, भाजित किया जाता है। इससे इष्ट भजनफल
प्राप्त होता है । वही ( उपर्युक्त ) शेष, इस भजनफल से हासित होकर, इष्ट भाज्य संख्या बन जाता
है ॥२७३½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई अज्ञात राशि किसी अन्य अज्ञात राशि द्वारा भाजित होती है । यहाँ भाजक, भाज्य संख्या
और भजनफल का योग ५३ है । वह भाजक क्या है, तथा भजनफल क्या है ? ॥२७४½॥
उस संख्या को निकालने के लिये नियम, जो मूल संख्या में कोई ज्ञात संख्या को जोड़ने पर,
वर्गमूल बन जाती है; अथवा जो मूल संख्या में से दूसरी ज्ञात संख्या घटाई जाने पर, वर्गमूल
बन जाती है—
जोड़ी जाने वाली राशि और घटाई जानेवाली राशि के योग को उस योग की निकटतम युग्म
संख्या से ऊपर के अतिरेक (excess above the even number) में एक जोड़ने से प्राप्त फला
द्वारा गुणित करते हैं । परिणामी गुणनफल को आधा किया जाता है, और तब वर्गित किया जाता है ।
इस वर्गित राशि में से उपर्युक्त सम्भव आधिक्य ( योग की निकटतम युग्म संख्या से ऊपर का अति-
रेक—excess ) घटाते हैं । यह फल ४ द्वारा भाजित किया जाता है, और तब १ में जोड़ा जाता

-६. २७८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६१
शेषैक्यार्धयुतोनिता फलमिदं राशिर्भवेद्वाञ्छयो-
स्त्याज्यात्याज्यमहत्त्वयोरथ कृतेर्मूलं ददात्येव सः ॥ २७५½ ॥
अत्रोद्देशकः
राशिः कश्चिद्दशभिः संयुक्तः सप्तदशभिरपि हीनः ।
मूलं ददाति शुद्धं तं राशिं स्यान्ममाशु वद गणक ॥ २७६½ ॥
राशिः सप्तभिरूनो यः सोऽष्टादशभिरन्वितः कश्चित् ।
मूलं यच्छति शुद्धं विगणय्याचक्ष्व तं गणक ॥ २७७½ ॥
राशिर्द्वित्र्यंशोनस्त्रिसप्तभागान्वितस्स एव पुनः ।
मूलं यच्छति कोऽसौ कथय विचिन्त्याशु तं गणक ॥ २७८½ ॥
है । परिणामी राशि को क्रमशः ऐसी दो राशियों के आधे अन्तर में जोड़ा जाता है, अथवा अर्द्ध अन्तर
में से घटाया जाता है, जिन्हें कि अयुग्म बनानेवाली अतिरेक राशि द्वारा उन दशाओं में हासिल किया
जाता है अथवा बढ़ाया जाता है, जब कि घटाई जानेवाली दी गई मूल राशि जोड़ी जानेवाली दी गई
मूल राशि से बड़ी अथवा छोटी होती है । इस प्रकार प्राप्त फल वह संख्या होती है, जो दत्त राशियों
से इच्छानुसार सम्बन्धित होकर, निश्चित रूप से वर्गमूल को उत्पन्न करती है ॥ २७५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई संख्या जब १० से बढ़ाई अथवा १७ से घटाई जाती है, तब वह यथार्थ वर्गमूल बन
जाती है । यदि सम्भव हो तो, हे गणितज्ञ, मुझे शीघ्र ही वह संख्या बतलाओ ॥ २७६½ ॥ कोई राशि
जब ७ द्वारा हासित की जाती है अथवा १८ द्वारा बढ़ाई जाती है, तो वह यथार्थ वर्गमूल बन जाती
है । हे गणक ! उस संख्या को गणना के पश्चात् बतलाओ ॥ २७७½ ॥ कोई राशि २/३ द्वारा हासित
होकर, अथवा ३/७ द्वारा बढ़ाई जाकर यथार्थ वर्गमूल उत्पन्न करती है । हे गणक, सोचकर शीघ्र ही वह
सम्भव संख्या बतलाओ ॥ २७८½ ॥
( २७५½ ) बीजीय रूप से, मानलो निकाली जानेवाली राशि क है, और उसमें जोड़ी जानेवाली
अथवा उसमें से घटाई जानेवाली राशियां क्रमशः अ, ब हैं, तब इस नियम का निरूपण करनेवाला सूत्र
निम्नलिखित होगा* —
{ (अ + ब) × (१ + १) ÷ २ }² - १ अ ~ ब ± १
{ ----------------------------- } + १ ± ----------- ; इसका मूलभूत सिद्धान्त इस
४ २
प्रकार निकाला जा सकता है । (न + १)² - न² = २ न + १ जो अयुग्म संख्या है; और (न + २)² -
न² = ४न + ४ जो युग्म संख्या है; जहाँ 'न' कोई भी पूर्णांक है । नियम बतलाता है कि हम २न + १
और ४न + ४ से किस प्रकार न² + अ प्राप्त कर सकते हैं, जब कि हम जानते हैं कि २न + १ अथवा
४न + ४ को अ + ब के बराबर होना चाहिये ।
( २७८½ ) गाथा २७५½ के नोट में ब और अ द्वारा निरूपित संख्यायें ( जो वास्तव में २/३ और
३/७ हैं ), इस प्रश्न में भिन्नीय होने के कारण, यह आवश्यक है कि दिये गये नियम के अनुसार उन्हें

  • इसे रंगाचार्य ने निम्न प्रकार दिया है जो नियम से नहीं मिलता है ।
    (a + b) + (1 + 1) ÷ २ }² a ~ b ± 1
    { --------------------- } - 1 + 1 ± ------------- .
    4 2
    ग० सा० सं०-२१