सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

१६२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २७९½
इष्टसंख्याहीनयुक्तवर्गमूलानयनसूत्रम्—
उद्दिष्टो यो राशिस्त्वर्धीकृतवर्गितोऽथ रूपयुतः । यच्छति मूलं स्वेष्टात्संयुक्ते चापनीते च ॥२७९½॥
अत्रोद्देशकः
दशभिः संमिश्रोऽयं दशभिस्तैर्वर्जितस्तु संशुद्धम् ।
यच्छति मूलं गणक प्रकथय संचिन्त्य राशिं मे ॥ २८०½ ॥
इष्टवर्गीकृतराशिद्वयादिष्टघ्नादन्तरमूलदिष्टानयनसूत्रम्—
सैकेष्टव्येकेष्टावर्धीकृत्याथ वर्गितौ राशी । एताविष्टघ्नावथ तद्विश्लेषस्य मूलमिष्टं स्यात् ॥२८१½॥
जो किसी ज्ञात संख्या द्वारा बढ़ाई अथवा हासित की जाती है, ऐसी अज्ञात संख्या के वर्गमूल
को निकालने के लिये नियम—
दी गई ज्ञात राशि को आधा करके वर्गित किया जाता है और तब उसमें एक जोड़ा जाता है ।
परिणामी संख्या को, जब या तो इच्छित दी हुई राशि द्वारा बढ़ाते हैं अथवा उसी दी हुई राशि द्वारा
हासित करते हैं, तब यथार्थ वर्गमूल प्राप्त होता है ॥ २७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक संख्या है, जो जब १० द्वारा बढ़ाई जाती है अथवा १० द्वारा हासित की जाती है, तो यथार्थ
वर्गमूल को देती है । हे गणक, ठीक तरह सोच कर वह संख्या बताओ ॥ २८०½ ॥
ज्ञात संख्या द्वारा गुणित इष्ट वर्ग राशियों की सहायता से, और साथ ही इन गुणनफलों के
[L

-६. २८६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६३
अत्रोद्देशकः
यौकौचिद्वर्गीकृतराशी गुणितौ तु सैकसप्तत्या । सद्विश्लेषपदं स्यादेकोत्तरसप्ततिश्च राशी कौ ॥
विगणय्य चित्रकुट्टिकगणितं यदि वेत्सि गणक मे ब्रूहि ॥ २८३ ॥
युतहीनप्रक्षेपकगुणकारानयनसूत्रम्—
संवर्गितेष्टशेषं द्विष्ठं रूपेष्टयुतगुणाभ्यां तत् । विपरीताभ्यां विभजेत्प्रक्षेपौ तत्र हीनौ वा ॥२८४॥
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चक संवर्गः पञ्चदशाष्टादशैव चेष्टमपि । इष्टं चतुर्दशात्र प्रक्षेपः कोऽत्र हानिर्वा ॥२८५॥
विपरीतकरणानयनसूत्रम्—
प्रत्युत्पन्ने भागो भागे गुणितोऽधिके पुनः शोध्यः । वर्गे मूलं मूले वर्गो विपरीतकरणमिदम् ॥२८६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो अज्ञात वर्गित राशियों को ७१ द्वारा गुणित किया जाता है । इन दो परिणामी गुणनफलों
के अंतर का वर्गमूल भी ७१ होता है। हे गणक, यदि चित्र कुट्टीकार से परिचित हो, तो गणना कर
उन दो अज्ञात राशियों को मुझे बतलाओ ॥ २८२½-२८३ ॥
किसी दिये गये गुण्य और दिये गये गुणकार ( multiplier ) के सम्बन्ध में इष्ट बढ़ती या
घटती को निकालने के लिये नियम ( ताकि दत्त गुणनफल प्राप्त हो )—
इष्ट गुणनफल और दिये गये गुण्य तथा गुणकार का परिणामी गुणनफल (इन दोनों गुणनफलों)
के अंतर को दो स्थानों में लिखा जाता है । परिणामी गुणनफल के गुणावयवों में से किसी एक में १
जोड़ते हैं, और दूसरे में इष्ट गुणनफल जोड़ते हैं । ऊपर दो स्थानों में इच्छानुसार लिखा गया वह अंतर
अलग-अलग इस प्रकार प्राप्त होने वाले योगों द्वारा व्यस्त क्रम में भाजित किया जाता है। ये उन राशियों
को उत्पन्न करते हैं, जो क्रमशः दिये गये गुण्य और गुणकार अथवा क्रमशः उनमें से घटाई जाने वाली
राशियों में जोड़ी जाती हैं ॥ २८४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
३ और ५ का गुणनफल १५ है । इष्ट गुणनफल १८ है, और वह १४ भी है । गुण्य और गुण-
कार में यहाँ कौन सी तीन राशियाँ जोड़ी जाँय अथवा उनमें से घटाई जाँय ? ॥ २८५ ॥
विपरीतकरण (working backwards) क्रिया द्वारा इष्ट फल प्राप्त करने के लिए नियम—
जहाँ गुणन है वहाँ भाजन करना, जहाँ भाजन है वहाँ गुणन करना, जहाँ जोड़ किया गया है
वहाँ घटाना करना, जहाँ वर्ग किया गया है वहाँ वर्गमूल निकालना, जहाँ वर्गमूल दिया गया है वहाँ
वर्ग करना—यह विपरीतकरण क्रिया है ॥ २८६ ॥
( २८४ ) जोड़ी जानेवाली और घटाई जानेवाली राशियाँ ये हैं—
द ~ अब द ~ अब
-------- और -------- ;
द + ब अ + १
/ द ~ अब \ / द ~ अब
क्योंकि ( अ ± -------- ) ( ब + -------- ) = द, जहाँ अ और ब दिये गये गुणनखंड हैं, और
\ द + ब / \ अ + १ /
द इष्ट गुणज है ।

१६४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २८७-
अत्रोद्देशकः
सप्तहृते को राशिस्त्रिगुणो वर्गीकृतः शरैर्युक्तः ।
त्रिगुणितपञ्चांशहृतस्त्वर्धितमूलं च पञ्चरूपाणि ॥ २८७ ॥
साधारणशरपरिध्यानयनसूत्रम्—
शरपरिधित्रिकमिलनं वर्गितमेतत्पुनस्त्रिभिः सहितम् ।
द्वादशहृतेऽपि लब्धं शरसंख्या स्यात्कलापकाविष्टा ॥ २८८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
वह कौन सी राशि है, जो ७ द्वारा भाजित होकर, तब ३ द्वारा गुणित होकर, तब वर्गित की-
जाकर, तब ५ द्वारा बढ़ाई जाकर, तब ३/५ द्वारा भाजित होकर; तब आधी होकर, और तब वर्गमूल
निकाले जाने पर, ५ होती है ? ॥ २८७ ॥
तरकश के साधारण परिध्यान ( common circumferential layer ) की संरचना
करनेवाले तीरों की युग्म संख्या की सहायता से किसी तरकश में रखे हुए बाणों की संख्या निकालने
के लिये नियम—
परिध्यान बनाने वाली बाणों की संख्या में ३ जोड़ो, तब इस परिणामी योग को वर्गित करो,
और उस वर्गित राशि में फिर से ३ जोड़ो। यदि प्राप्तफल १२ द्वारा भाजित किया जाय, तो भजनफल
तरकश के तीरों की संख्या का प्रमाण बन जाता है ॥२८८॥
( २८८ ) तीरों की कुल संख्या प्राप्त करने के लिये, यहाँ दिया गया सूत्र [( न + ३ )² + ३] / १२ है;
जहाँ 'न' परिध्यान शरों की संख्या है। यह सूत्र निम्नलिखित रीति से भी प्राप्त हो सकता है—
रेखागणित ( ज्यामिति ) से सिद्ध किया जा सकता है कि किसी वृत्त के चारों ओर केवल ६ वृत्त
खींचे जा सकते हैं । ऐसे सभी वृत्त तुल्य होते हैं, तथा प्रत्येक वृत्त दो आसन्न वृत्तों को स्पर्श करता हुआ
बीच के ( केन्द्रीय ) वृत्त को भी स्पर्श करता है। इन वृत्तों के चारों ओर फिर से उतने ही नापके १२
वृत्त उसी प्रकार खींचे जा सकते हैं, और फिर से इन वृत्तों के चारों ओर केवल ऐसे ही १८ वृत्त खींचे
जाना सम्भव है, इत्यादि। इस प्रकार, प्रथम घेरे में ६ वृत्त, दूसरे में १२, तीसरे में १८ होते हैं,
इत्यादि । इसलिये प वें घेरे में ६ प वृत्त होंगे । अब प घेरों में वृत्तों की कुल संख्या ( केन्द्रीय वृत्त से
गिनी जाकर ) —
१ + १ × ६ + २ × ६ + ३ × ६ + ...... + प × ६ = १ + ६ ( १ + २ + ३ + ...... + प )
= १ + ६ [ प (प + १) / २ ] = १ + ३ प (प + १) होगी। यदि ६ प का मान 'न' दिया गया हो, तो कुल
वृत्तों की संख्या १ + ३ × न/६ ( न/६ + १ ) होगी, जो इस नोट के आरम्भ में दिये गये सूत्र रूप में
प्रहासित की जा सकती है ।

-६. २९१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६५
अत्रोद्देशकः
परिधिशरा अष्टादश तूणीरस्थाः शराः के स्युः ।
गणितज्ञ यदि विचित्रे कुट्टीकारे श्रमोऽस्ति ते कथय ॥ २८९ ॥
इति मिश्रकव्यवहारे विचित्रकुट्टीकारः समाप्तः ।
श्रेढीबद्धसंकलितम्
इतः परं मिश्रकगणिते श्रेढीबद्धसंकलितं व्याख्यास्यामः ।
हीनाधिकचयसंकलितधनानयनसूत्रम्—
व्येकार्धपदोनाधिकचयघातोनान्वितः पुनः प्रभवः ।
गच्छाभ्यस्तो हीनाधिकचयसमुदायसंकलितम् ॥ २९० ॥
अत्रोद्देशकः
चतुरुत्तरदश चादिर्हीनचयस्त्रीणि पञ्च गच्छः किम् ।
द्वावादिवृद्धिचयः षट् पदमष्टौ धनं भवेदत्र ॥ २९१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
परिध्यान शरों की संख्या १८ है । कुल मिलाकर तरकश में कितने शर हैं, हे गणितज्ञ, यदि
तुमने विचित्र कुट्टीकार के सम्बन्ध में कष्ट किया है, तो इसे हल करो ॥२८९॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में विचित्र कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
श्रेढीबद्ध संकलित ( श्रेणियों का संकलन )
इसके पश्चात् हम गणित में श्रेणियों के संकलन की व्याख्या करेंगे ।
धनात्मक अथवा ऋणात्मक प्रचयवाली समान्तर श्रेणी के योग को निकालने के लिये नियम:—
प्रथमपद उस गुणनफल के द्वारा या तो घटाया अथवा बढ़ाया जाता है, जो ऋणात्मक या
धनात्मक प्रचय में श्रेणी के एक कम पदों की संख्या की अर्द्ध राशि का गुणन करने से प्राप्त होता है ।
तब यह प्राप्तफल श्रेणी के पदों की संख्या से गुणित किया जाता है । इस प्रकार, धनात्मक अथवा
ऋणात्मक प्रचयवाली समान्तर श्रेणी के योग को प्राप्त किया जाता है ॥२९०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद १४ है; ऋणात्मक प्रचय ३ है; पदों की संख्या ५ है । प्रथमपद २ है; धनात्मक प्रचय
६ है; और पदों की संख्या ८ है । इन दशाओं में से प्रत्येक में श्रेणी का योग बतलाओ ॥२९१॥
( २९० ) बीजीय रूप से, ( (न - १)/२ ब ± अ ) न = श, जहाँ न पदों की संख्या है, अ प्रथम पद है;
ब प्रचय है, और श श्रेणीका योग है ।

१६६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २९२-
अधिकहीनोत्तरसंकलितधने आद्युत्तरानयनसूत्रम्—
गच्छविभक्ते गणिते रूपोनपदार्धगुणितचयहीने ।
आदिः पदहृतवित्तं चाद्यूनं व्येकपददलहृतः प्रचयः ॥ २९२ ॥
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशद्गणितं गच्छः पञ्च त्रयः प्रचयः । न ज्ञायतेऽधुनादिः प्रभवो द्विः प्रचयमाचक्ष्व ॥२९३॥
श्रेढीसंकलितगच्छानयनसूत्रम्—
आदिविहीनो लाभः प्रचयार्धहृतः स एव रूपयुतः ।
गच्छो लाभेन गुणो गच्छः ससंकलितधनं च संभवति ॥ २९४ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रीण्युत्तरमादिर्द्वे वनिताभिश्चोत्पलानि भक्तानि ।
एकस्या भागोऽष्टौ कति वनिताः कति च कुसुमानि ॥ २९५ ॥
धनात्मक अथवा ऋणात्मक प्रचयवाली समान्तर श्रेणी के योग के सम्बन्ध में प्रथमपद और
प्रचय निकालने के लिये नियम—
श्रेणी के दिये गये योग को पदों की संख्या द्वारा भाजित करो, और परिणामी भजनफल में से
प्रचय द्वारा गुणित एक कम पदों की संख्या की आधीराशि को घटाओ । इस प्रकार, श्रेणी का प्रथमपद
प्राप्त होता है । श्रेणी के योग को पदों की संख्या द्वारा भाजित करते हैं । इस परिणामी भजनफल में से
प्रथम पद घटाते हैं । शेष को जब १ कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा भाजित करते हैं, तो
प्रचय प्राप्त होता है ॥२९२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
श्रेणी का योग ४० है; पदों की संख्या ५ है; प्रचय ३ है; प्रथमपद अज्ञात है । उसे निकालो ।
यदि प्रथमपद २ हो, तो प्रचय प्राप्त करो ॥ २९३ ॥
जो योग को पदों की अज्ञात संख्या से भाजित करने पर भजनफल के रूप में प्राप्त होता है,
ऐसे ज्ञात लाभ की सहायता से समान्तर श्रेणी में योग और पदों की संख्या निकालने के लिये नियम—
लाभ को प्रथम पद ( आदिपद ) द्वारा हासित किया जाता है, और तब प्रचय की आधी राशि
द्वारा भाजित किया जाता है । परिणामी राशि में १ जोड़ने पर श्रेणी के पदों की संख्या प्राप्त होती है ।
श्रेणी के पदों की संख्या को लाभ द्वारा गुणित करने पर श्रेणी का योग प्राप्त होता है ॥ २९४ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समान्तर श्रेणी के योग प्ररूपक, कोई संख्या के, उत्पल फूल लिये गये । २ प्रथमपद है, ३
प्रचय है । कोई संख्या की स्त्रियों ने आपस में ये फूल बराबर-बराबर बाँटे । प्रत्येक स्त्री को ८ फूल
हिस्से में मिलें । स्त्रियाँ कितनी थीं, और फूल कितने थे ? ॥ २९५ ॥
( २९२ ) बीजीय रूप से,
अ = श/न - (न - १)/२ ब; और ब = (श/न - अ) ÷ (न - १)/२.
( २९४ ) बीजीय रूप से, न = (ल - अ)/(ब/२) + १, जहाँ ल = श/न जो लाभ है ।
( २९५ ) स्त्रियों की संख्या ही इस प्रश्न में पदों की संख्या है ।

-६. २९८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६७
वर्गसंकलितानयनसूत्रम्—
सैकेष्टकृतिर्द्विघ्ना सैकेष्टोनेष्टदलगुणिता। कृतिघनचितिसंघातस्त्रिभक्तो वर्गसंकलितम् ॥ २९६ ॥
अत्रोद्देशकः
अष्टाष्टादशविंशतिषष्ट्येकाशीतिषट्कृतीनां च।
कृतिघनचितिसंकलितं वर्गचितिं चाशु मे कथय ॥ २९७ ॥
इष्टाद्युत्तरपदवर्गसंकलितधनानयनसूत्रम्—
द्विगुणैकोनपदोत्तरकृतिहतिषष्ठांशमुखचयहतयुतिः ।
व्येकपदघ्ना मुखकृतिसहिता पदताडितेष्टकृतिचितिका ॥ २९८ ॥

एक से आरम्भ होने वाली दी गई संख्या की प्राकृत संख्याओं के वर्गों का योग निकालने के
लिये नियम —
दी गई संख्या को एक द्वारा बढ़ाते हैं, और तब वर्गित करते हैं। यह वर्गित राशि २ से
गुणित की जाती है, और तब एक द्वारा बढ़ाई गई दत्त राशि द्वारा हासित की जाती है। इस प्रकार
प्राप्त शेष को दत्त संख्या की

१६८ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २९९-
पुनरपि इष्टाद्युत्तरपदवर्गसंकलितानयनसूत्रम्—
द्विगुणेकोनपदोत्तरकृतिहतिरेकोनपदहताङ्गहृता ।
व्येकपदादिचयाहतिमुखकृतियुक्ता पदाहता सारम् ॥ २९९ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रीण्यादिः पञ्च चयो गच्छः पञ्चास्य कथय कृतिचितिकाम् ।
पञ्चादित्रीणि चयो गच्छः सप्तास्य का च कृतिचितिका ॥ ३०० ॥
घनसंकलितानयनसूत्रम्—
गच्छार्धवर्गराशी रूपाधिकगच्छवर्गसंगुणितः ।
घनसंकलितं प्रोक्तं गणितेऽस्मिन् गणिततत्त्वज्ञैः ॥ ३०१ ॥
अत्रोद्देशकः
षण्णामष्टानां मपि सप्तानां पंचविंशतीनां च ।
षट्पंचाशन्मिश्रितशतद्वयस्यापि कथय घनपिण्डम् ॥ ३०२ ॥
पुनः समान्तर श्रेणी में कोई संख्या के पदों के वर्गों का योग

ी श्रेढि की दी हुई संख्या के पदों का योग निकालने के लिए नियम, जहाँ पद उत्तरोत्तर १ से लेकर निर्दिष्ट सीमा तक प्राकृत संख्याओं के योग हों, तथा ये सीमित संख्यायें दी हुई समान्तर श्रेढि के पद हों— समान्तर श्रेढि में दी गई श्रेढि की पदों की संख्या की दुगुनी राशि को एक द्वारा कम करते हैं, और तब प्रचय के वर्ग द्वारा गुणित करते हैं । यह गुणनफल ६ द्वारा भाजित किया जाता है । प्राप्त फल प्रचय की अर्द्धराशि में जोड़ा जाता है, और साथ ही प्रथम पद और प्रचय के गुणनफल में भी जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग को एक कम पदों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । प्राप्त गुणन- फल को प्रथम पद तथा १ में प्रथम पद जोड़ने से प्राप्तराशि के गुणनफल में जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्तराशि को जब श्रेढि के पदों की संख्या की अर्द्ध राशिद्वारा गुणित किया जाता है, तो ऐसी श्रेढि का इष्ट योग प्राप्त होता है, जिसके स्वपद ही निर्दिष्ट श्रेढि के योग होते हैं ॥३०५-३०५½॥`

Horizontal dividing line.

Next line:
( ३०३ ) बीजीय रूप से,
± श अ ( अ ~ ब ) + श² ब = समान्तर श्रेढि के पदों के घनों का योग,
Wait, look at the formula:
`± श अ

१७० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३०६½-
अत्रोद्देशकः
आदिः षट् पञ्च चयः पदमप्यष्टादशाथ संदृष्टम् ।
एकायेकोत्तरचितिसंकलितं किं पदाष्टदशकस्य ॥ ३०६½ ॥
चतुस्संकलितानयनसूत्रम्—
सैकपदार्धपदाहृतिरसप्तैर्निहता पदोनिता त्र्याप्ता ।
सैकपदघ्ना चितिचितिचितिकृतिघनसंयुतिर्भवति ॥ ३०७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यह देखा जाता है कि किसी श्रेढि का प्रथम पद ६ है, प्रचय ५ है, और पदों की संख्या १८ है ।
इन १८ पदों के सम्बन्ध में, उन विभिन्न श्रेढियों के योगों के योग को बतलाओ, जो कि १ प्रथम पद
वाली और १ प्रचय वाली हैं ॥३०६½॥
( नीचे निर्दिष्ट और किसी दी हुई संख्या द्वारा निरूपित ) चार राशियों के योग को निकालने
के लिये नियम—
दी गई संख्या १ द्वारा बढ़ाई जाकर, आधी की जाती है, और तब निज के द्वारा तथा ७ द्वारा
गुणित की जाती है । इस परिणामी गुणनफल में से वही दत्त संख्या घटाई जाती है । परिणामी शेष
को ३ द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त भजनफल जब एक द्वारा बढ़ाई गई उसी दत्त
संख्या द्वारा गुणित किया जाता है, तब चार निर्दिष्ट राशियों का इष्ट योग प्राप्त होता है । ऐसी चार
निर्दिष्ट राशियाँ, क्रमशः, दी हुई संख्या तक की प्राकृत संख्याओं का योग, दी गई संख्या तक की प्राकृत
संख्याओं के योगों के योग, दी गई संख्या का वर्ग और दी गई संख्या का घन होती हैं ॥३०७½॥
( ३०५-३०५½ ) बीजीय रूप से, [ { ( २ न - १ ) ब² / ६ + ब / २ + अब } ( न - १ )

  • अ ( अ + १ ) ] न / २
    यह समान्तर श्रेढि का योग है, जहाँ प्रथमपद किसी सीमित संख्या तक की प्राकृत संख्याओं
    वाली श्रेढि के योग का निरूपण करता है—ऐसी सीमित संख्या जो किसी समान्तर श्रेढि का ही एक
    पद है ।
    ( ३०७½ ) बीजीय रूप से, [ { [ न × ( न + १ ) × ७ ] / २ - न } / ३ ] × ( न + १ )
    इस नियम में, निर्दिष्ट चार राशियों का योग है । यहाँ चार निर्दिष्ट राशियाँ, क्रमशः, ये हैं :—
    ( १ ) 'न' प्राकृत संख्याओं का योग, ( २ ) 'न' तक की विभिन्न प्राकृत संख्याओं द्वारा क्रमशः
    सीमित विभिन्न प्राकृत संख्याओं के योग, ( ३ ) 'न' का वर्ग और ( ४ ) 'न' का घन ।

-६. ३१०½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७१
अत्रोद्देशकः
सप्ताष्टनवदशानां षोडशपञ्चाशदेकषष्टीनाम् ।
ब्रूहि चतुःसंकलितं सूत्राणि पृथक् पृथक् कृत्वा ॥ ३०८½ ॥
संघातसंकलितानयनसूत्रम्—
गच्छस्त्रिरूपसहितो गच्छचतुर्भागताडितः सैकः ।
सपद्पदकृतिविघ्नो भवति हि संघातसंकलितम् ॥ ३०९½ ॥
अत्रोद्देशकः
सप्तकृतेः षट्षष्ट्यास्त्रयोदशानां चतुर्दशानां च ।
पञ्चाग्रविंशतीनां किं स्यात् संघातसंकलितम् ॥ ३१०½ ॥
भिन्नगुणसंकलितानयनसूत्रम्—
समदलविषमखरूपं गुणगुणितं वर्गताडितं द्विष्टम् ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दी हुई संख्याएँ ७, ८, ९, १०, १६, ५० और ६१ हैं । आवश्यक नियमों को विचारकर, प्रत्येक
दशा में, चार निर्दिष्ट राशियों के योग को बतलाओ ॥३०८½॥
( पूर्व व्यवहृत चार प्रकार की श्रेणियों के ) सामूहिक योग को निकालने के लिये नियम—
पदों की संख्या को ३ में जोड़ते हैं, और प्राप्तफल को पदों की संख्या के चतुर्थ भाग द्वारा
गुणित करते हैं । तब उसमें एक जोड़ा जाता है । इस परिणामी राशि को जब पदों की संख्या के वर्ग
को पदों की संख्या द्वारा बढ़ाने से प्राप्तराशि द्वारा गुणित किया जाता है, तब वह इष्ट सामूहिक योग
को उत्पन्न करती है ॥३०९½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
४९, ६६, १३, १४ और २५ द्वारा निरूपित विभिन्न श्रेणियों के सम्बन्ध में इष्ट सामूहिक योग
क्या होगा ? ॥३१०½॥
गुणोत्तर श्रेढि में भिन्नों की श्रेढि के योग को निकालने के लिये नियम—
श्रेढि के पदों की संख्या को अलग-अलग स्तम्भ में, क्रमशः, शून्य तथा १ द्वारा चिह्नित
( marked ) कर लिया जाता है । चिह्नित करने की विधि यह है कि युग्ममान को आधा किया
जाता है, और अयुग्म मान में से १ घटाया जाता है । इस विधि को तब तक जारी रखा जाता है, जब
तक कि अन्ततोगत्वा शून्य प्राप्त नहीं होता । तब इस शून्य और १ द्वारा बनी हुई प्ररूपक श्रेढि को,
क्रमवार, अन्तिम १ से उपयोग में लाते हैं, ताकि यह १ साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित हो । जहाँ १
अभिधानी पद (denoting item) रहता है, वहाँ इसे फिर से साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित करते
हैं । और जहाँ शून्य अभिधानी पद होता है, वहाँ वर्ग प्राप्त करने के लिये उसे साधारण निष्पत्ति द्वारा
( ३०९½ ) बीजीय रूप से, { ( न + ३ ) न/४ + १ } ( न² + न ) योगों का सामूहिक योग •
है, अर्थात् नियम २९६, ३०१ और ३०५ से ३०५½ में बतलाई गई श्रेणियों के योगों तथा 'न' तक की
प्राकृत संख्याओं के योग ( इन सब योगों ) का सामूहिक योग है ।

मिश्रक व्यवहार एवं क्षेत्रगणित व्यवहार (Geometry of Polygons)

१७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३११½-
अंशाप्तं व्येकं फलमाद्यन्यघ्नं गुणोनरूपहृतम् ॥ ३११½ ॥
अत्रोद्देशकः
दीनारार्धं पञ्चसु नगरेषु चयस्त्रिभागोऽभूत् । आदिस्त्र्यंशः पादो गुणोत्तरं सप्त भिन्नगुणचितिका ।
का भवति कथय शीघ्रं यदि तेऽस्ति परिश्रमो गणिते ॥ ३१३ ॥
अधिकहीनगुणसंकलितानयनसूत्रम्—
गुणचितिरन्यादिहृता विपदाधिकहीनसंगुणा भक्ता ।
व्येकगुणेनान्या फलरहिता हीनेऽधिके तु फलयुक्ता ॥ ३१४ ॥
गुणित करते हैं । इस क्रिया का फल दो स्थानों में लिखा जाता है । इस प्रकार प्राप्त, एक स्थान में रखे
हुए, फल के अंश को फल द्वारा ही भाजित करते हैं । तब उसमें से १ घटाया जाता है । परिणामी राशि
को श्रेढि के प्रथमपद द्वारा गुणित किया जाता है, और तब दूसरे स्थान में रखी हुई राशि द्वारा गुणित
किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त गुणनफल जब १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है, तब श्रेढि का इष्ट योग उत्पन्न होता है ॥ ३११½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ नगरों के सम्बन्ध में, प्रथम पद १/२ दीनार है, और साधारण निष्पत्ति १/३ है । उन सबमें प्राप्त
दीनारों के योग को निकालो । प्रथमपद १/३ है, साधारण निष्पत्ति १/४ है और पदों की संख्या ७ है । यदि
तुमने गणना में परिश्रम किया हो, तो यहाँ गुणोत्तर भिन्नीय श्रेढि का योग बतलाओ ॥३१२½-३१३॥
गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने के लिये नियम, जहाँ किसी दी गई ज्ञात राशि द्वारा किसी
निर्दिष्ट रीति से पद या तो बढ़ाये या घटाये जाते हों—
जिसके सम्बन्ध में प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या दी गई है ऐसी शुद्ध गुणो-
त्तर श्रेढि के योग को दो स्थानों में लिखा जाता है । इनमें से एक को दिये गये प्रथमपद द्वारा भाजित
किया जाता है । इस परिणामी भजनफल में से पदों की दी गई संख्या को घटाया जाता है । परिणामी
शेष की प्रस्तावित श्रेढि के पदों में जोड़ी जानेवाली अथवा उनमें से घटाई जानेवाली दत्त राशि द्वारा
गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है । दूसरे स्थान में रखे हुए योग को इस अन्तिम परिणामी भजनफल राशि द्वारा हासित किया
जाता है, जब कि श्रेढि के पदों में से दी गई राशि घटाई जाती हो । पर, यदि वह जोड़ी जाती हो, तो
दूसरे स्थान में रखे हुए गुणोत्तर श्रेढि के योग को उक्त परिणामी भजनफल द्वारा बढ़ाया जाता है ।
प्रत्येक दशा में प्राप्तफल निर्दिष्ट श्रेढि का इष्ट योग होता है ॥ ३१४ ॥
( ३११½ ) इस नियम में, भिन्नीय साधारण निष्पत्ति का अंश हमेशा १ ले लिया जाता है ।
अध्याय २ की ९४ वीं गाथा तथा उसकी टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
( ३१४ ) बीजीय रूप से, ± ( श/अ - न ) म ÷ ( र - १ ) + श; यह निम्नलिखित रूपवाली श्रेढि
का योग है—
अ, अर ± म, (अर ± म) र ± म, { (अर ± म) र ± म } र ± म, ..... इत्यादि ।

-६. ३१८ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७३
अत्रोद्देशकः
पञ्च गुणोत्तरमादिर्द्वौ त्रीण्यधिकं पदं हि चत्वारः ।
अधिकगुणोत्तरचितिका कथय विचिन्त्याशु गणिततत्त्वज्ञ ॥ ३१५ ॥
आदित्रीणि गुणोत्तरमष्टौ हीनं द्वयं च दश गच्छः ।
हीनगुणोत्तरचितिका का भवति विचिन्त्य कथय गणकाशु ॥ ३१६ ॥
आद्युत्तरगच्छधनमिश्राद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम् —
मिश्रादुद्धृत्य पदं रूपोनेच्छाघनेन सैकेन । लब्धं प्रचयः शेषः सरूपपदभाजितः प्रभवः ॥३१७॥
अत्रोद्देशकः
आद्युत्तरपदमिश्रं पञ्चाशद्धनमिहैव संदृष्टम् । गणितज्ञाचक्ष्व त्वं प्रभवोत्तरपदधनान्याशु ॥३१८॥
संकलितगतिध्रुवगतिभ्यां समानकालानयनसूत्रम्—
ध्रुवगतिरादिविहीनश्चयदलभक्तः सरूपकः कालः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
साधारण निष्पत्ति ५ है, प्रथमपद २ है, विभिन्न पदों में जोड़ी जानेवाली राशि ३ है, और पदों
की संख्या ४ है । हे गणित तत्त्वज्ञ, विचार कर शीघ्र ही (निर्दिष्ट रीति के अनुसार निर्दिष्ट राशि द्वारा
बढ़ाए जाते हैं पद जिसके ऐसी) गुणोत्तर श्रेढि के योग को बतलाओ ॥ ३१५ ॥
प्रथमपद ३ है, साधारण निष्पत्ति ८ है, पदों में से घटाई जानेवाली राशि २ है, और पदों की
संख्या १० है । ऐसी श्रेढि का, हे गणितज्ञ, योग निकालो ॥ ३१६ ॥
प्रथमपद, प्रचय, पदों की संख्या और किसी समान्तर श्रेढि के योग के मिश्रित योग में से प्रथम
पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने के लिये नियम —
श्रेढि के पदों की संख्या का निरूपण करनेवाली मन से चुनी हुई संख्या को दिये गये मिश्रित
योग में से घटाया जाता है । तब १ से आरम्भ होने वाली और एक कम पदों की (मन से चुनी
हुई) संख्यावाली प्राकृत संख्याओं का योग १ द्वारा बढ़ाया जाता है । इस परिणामी फल को भाजक
मान कर, ऊपर कथित मिश्रित योग से प्राप्त शेष को भाजित करते हैं । यह भजनफल इष्ट प्रचय होता
है, और इस भाजन की क्रिया में जो शेष बचता है उसे जब एक अधिक (मन से चुनी हुई) पदों की
संख्या द्वारा भाजित करते हैं, तो इष्ट प्रथमपद प्राप्त होता है ॥ ३१७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यह देखा जाता है कि किसी समान्तर श्रेढि का योग, प्रथमपद, प्रचय और पदों की संख्या में
मिलाये जाने पर, ५० होता है । हे गणक, शीघ्रही प्रथमपद, प्रचय, पदों की संख्या और श्रेढि के
योग को बतलाओ ॥ ३१८ ॥
सङ्कलित गति * तथा ध्रुव गति से गमन करने वाले दो व्यक्तियों (को एक साथ रवाना
होने पर एक जगह फिर से मिलने) के लिये समय की समान सीमा निकालने के लिये नियम —
अपरिवर्तनशील गति को समान्तर श्रेढि वाली गतियों के प्रथम पद द्वारा ह्रासित करते हैं, और
तब प्रचय की अर्द्ध राशि द्वारा भाजित करते हैं । इस परिणामी राशि में जब १ जोड़ते हैं, तब मिलने
( ३१७ ) अध्याय दो की गाथाएँ ८० – ८२ तथा उनके नोट देखिये ।

  • समान्तर श्रेढि के पदों के रूप में प्ररूपित उत्तरोत्तर गतियों रूप गति ।

१७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३१९-
द्विगुणो मार्गस्तद्गतियोगहृतो योगकालः स्यात् ॥ ३१९ ॥
अत्रोद्देशकः
कश्चिन्नरः प्रयाति त्रिभिरादा उत्तरैस्तथाष्टाभिः ।
नियतगतिरेकविंशतिरनयोः कः प्राप्तकालः स्यात् ॥ ३२० ॥
अपरार्धोदाहरणम् ।
षड् योजनानि कश्चित्पुरुषस्त्वपरः प्रयाति च त्रीणि ।
उभयोरभिमुखगत्योरष्टोत्तरशतकयोजनं गम्यम् ।
प्रत्येकं च तयोः स्यात्कालः किं गणक कथय मे शीघ्रम् ॥ ३२१½ ॥
संकलितसमागमकालयोजनानयनसूत्रम् —
उभयोराद्योः शेषश्चयशेषहृतो द्विसंगुणः सैकः ।
युगपत्प्रयाणयोः स्यान्मार्गे तु समागमः कालः ॥ ३२२½ ॥
का इष्ट समय प्राप्त होता है । ( जब दो मनुष्य निश्चित गति से विरुद्ध दिशाओं में चल रहे हों, तब
उनमें से किसी एक के द्वारा तय की गई औसत दूरी की दुगुनी राशि पूरी तय की जानेवाली यात्रा
होती है । जब यह उनकी गतियों के योग द्वारा भाजित की जाती है, तब उनके मिलने का समय प्राप्त
होता है । ) ॥ ३१९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई मनुष्य आरम्भ में ३ की गति से और उत्तरोत्तर ८ प्रचय द्वारा नियमित रूप से बढ़ाने
वाली गति से जाता है । दूसरे मनुष्य की निश्चित गति २१ है । यदि वे एक ही दिशा में, एक समय,
उसी स्थान से प्रस्थान करें, तो उनके मिलने का समय क्या होगा ? ॥ ३२० ॥
( ऊपर की गाथा के ) उत्तरार्द्ध के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य ६ योजन की गति से और दूसरा ३ योजन की गति से यात्रा करता है । उनमें से
किसी एक के द्वारा तय की गई औसत दूरी १०८ योजन है । हे गणक, उनके मिलने का समय
निकालो ॥ ३२१-३२१½ ॥
यदि दो व्यक्ति एक ही स्थान से, एक ही समय तथा विभिन्न संकलित गतियों से प्रस्थान करें,
तो उनके मिलने का समय और तय की गई दूरी निकालने के लिये नियम—
उक्त दो प्रथम पदों का अंतर जब उक्त दो प्रचयों के अंतर से भाजित होकर और तब २ से
गुणित होकर १ द्वारा बढ़ाया जाय, तो युगपत् यात्रा करने वाले व्यक्तियों के मिलने का समय उत्पन्न
होता है ॥ ३२२½ ॥

( ३१९ ) बीजीय रूप से, ( व - अ ) ÷ ब/२ + १ = स, जहाँ व निश्चल वेग है, ब प्रचय है,
और स समय है ।
( ३२१½ ) बीजीय रूप से, न = (अ ~ अ₁) / (ब - ब₁) × २ + १ .

-६. ३२६½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७५
अत्रोद्देशकः
चत्वार्याद्यष्टोत्तरमेको गच्छत्यथो द्वितीयो ना ।
द्वौ प्रचयश्च दशादिः समागमे कस्तयोः कालः ॥ ३२३½ ॥
वृद्ध्युत्तरहीनोत्तरयोः समागमकालानयनसूत्रम्—
शेषञ्चाद्योरुभयोश्चययुतदलभक्तरूपयुतः ।
युगपत्प्रयाणकृतयोर्मार्गे संयोगकालः स्यात् ॥ ३२४½ ॥
अत्रोद्देशकः ।
पञ्चाद्यष्टोत्तरतः प्रथमो नाथ द्वितीयनरः ।
आदिः पञ्चान्नव प्रचयो हीनोऽष्ट योगकालः कः ॥ ३२५½ ॥
शीघ्रगतिमन्दगत्योः समागमकालानयनसूत्रम्—
मन्दगतिशीघ्रगत्योरेकाशागमनमत्र गम्यं यत् ।
तद्गत्यन्तरभक्तं लब्धदिनैस्तैः प्रयाति शीघ्रोऽल्पम् ॥३२६½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक व्यक्ति ४ से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर प्रचय ८ द्वारा बढ़ने वाली गतियों से यात्रा
करता है । दूसरा व्यक्ति १० से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर २ प्रचय द्वारा बढ़ने वाली गतियों
से यात्रा करता है । उनके मिलने का समय क्या है ? ॥ ३२३½ ॥
एक ही स्थान से रवाना होने वाले और एक ही दिशा में समान्तर श्रेढि में बढ़नेवाली गतियों
से यात्रा करने वाले दो व्यक्तियों के मिलने का समय निकालने के लिए नियम, जब कि प्रथम दशा में
प्रचय धनात्मक है, और दूसरी दशा में ऋणात्मक है :—
उक्त दो प्रथम पदों के अंतर को उक्त दो दिये गये प्रचयों का प्ररूपण करनेवाली संख्याओं के
योग की अर्द्ध राशि द्वारा भाजित करने के पश्चात् प्राप्त फल में १ जोड़ा जाता है । यह उन दो
यात्रियों के मिलने का समय होता है ॥३२४½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम व्यक्ति ५ से आरम्भ होने वाली और उत्तरोत्तर प्रचय ८ द्वारा बढ़नेवाली गतियों से यात्रा
करता है । दूसरे व्यक्ति की आरम्भिक गति ४५ है और प्रचय ऋण ८ है । उनके मिलने का समय
क्या है ? ॥३२५½॥
भिन्न समयों पर रवाना होनेवाले और क्रमशः तीव्र और मंद गति से एक ही दिशा में चलनेवाले
दो मनुष्यों के मिलने का समय निकालने के लिए नियम—
मंदगति और तीव्रगति वाले दोनों एक ही दिशा में गमनशील हैं । तय की जानेवाली दूरी को
यहाँ उन दो गतियों के अंतर द्वारा भाजित किया जाता है । इस भजनफल द्वारा प्ररूपित दिनों में, तीव्र
गतिवाला मंदगति वाले की ओर जाता है ॥३२६½॥
( ३२४½ ) इसकी तुलना ३१२½ वीं गाथा में दिये गये नियम से करो ।

१७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३२७½-
अत्रोद्देशकः
नवयोजनानि कश्चित्प्रयाति योजनशतं गतं तेन ।
प्रतिदूतो व्रजति पुनस्त्रयोदशाप्नोति कैर्दिवसैः ॥३२७½॥
विषमबाणैस्तूणीरबाणपरिधिकरणसूत्रम्—
परिणाहस्त्रिभिरधिको दलितो वर्गीकृतस्त्रिभिर्भक्तः ।
सैकः शरास्तु परिधेरानयने तत्र विपरीतम् ॥३२८½॥
अत्रोद्देशकः
नव परिधिस्तु शराणां संख्या न ज्ञायते पुनस्तेषाम् ।
त्र्युत्तरदशबाणास्तत्परिणाहशरांश्च कथय मे गणक ॥३२९½॥
श्रेढीबद्धे इष्टकानयनसूत्रम्—
तरवर्गो रूपोनस्त्रिभिर्विभक्तस्तरेण संगुणितः ।
तरसंकलिते स्वेष्टप्रताडिते मिश्रतः सारम् ॥३३०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई व्यक्ति ९ योजन प्रतिदिन की गति से यात्रा करता है । उसके द्वारा १०० योजन की दूरी
पहिले ही तय की जा चुकी है । एक संदेशवाहक उसके पीछे १३ योजन प्रति दिन की गति से भेजा
गया । यह कितने दिनों में उससे जाकर मिलेगा ? ॥३२७½॥
तरकश में भरे हुए ज्ञात अयुग्म संख्या के शरों की सहायता से तरकश के शरों की परिध्यान-
संख्या निकालने के लिये ( तथा विलोम क्रमेण ) नियम—
परिध्यान शरों की संख्या को ३ द्वारा बढ़ाकर आधा किया जाता है। इसे वर्गित किया जाता है, और
तब ३ द्वारा भाजित किया जाता है । इस परिणामी राशि में १ जोड़ने पर तरकश के शरों की संख्या प्राप्त
होती है। जब परिध्यान शरों की संख्या निकालनी होती है, तो विपरीत क्रिया करनी पड़ती है ॥३२८½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शरों की परिध्यान संख्या ९ है । उनकी कुल संख्या अज्ञात है । वह कौन सी है ? तरकश में
कुल शरों की संख्या १३ है । हे गणितज्ञ, परिध्यान शरों की संख्या बतलाओ ॥३२९½॥
किसी भवन की श्रेणीबद्ध ( एक के ऊपर दूसरी ) इष्टकाओं ( ईंटों ) की संख्या निकालने के
लिये नियम—
सतहों की संख्या के वर्ग को १ द्वारा ह्रासित कर ३ द्वारा भाजित किया जाता है, और तब
सतहों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि में वह गुणनफल जोड़ते हैं, जो सबसे
ऊपर की सतह की ईंटों को प्ररूपित करनेवाली ( मन से चुनी हुई ) संख्या और एक से आरंभ होकर
दी गई सतहों की संख्या तक की प्राकृत संख्याओं के योग का गुणन करने से प्राप्त होता है । प्राप्तफल
इष्ट उत्तर होता है ॥३३०½॥

  • ( ३३०½ ) बीजीय रूप से- $\frac{न^२ - १}{३} \times न + अ \times \frac{न (न + १)}{२}$, यह, बनावट की कुल ईंटों की
    संख्या है; जहाँ ‘न’ सतहों की संख्या है, और ‘अ’ सर्वोच्च सतह में ईंटों की मन से चुनी हुई संख्या है ।
  • ६. ३३३½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७७
    अत्रोद्देशकः
    पञ्चस्तरैकेनाग्रं व्यवघटिता गणितविन्मिश्रे । समचतुरश्रश्रेढी कतीष्टकाः स्युर्ममाचक्ष्व ॥३३१½॥
    नन्द्यावर्ताकारं चतुस्तराः षष्टिसमघटिताः । सर्वेष्टकाः कति स्युः श्रेढीबद्धं ममाचक्ष्व ॥३३२½॥
    छन्दः शास्त्रोक्तषट्प्रत्ययानां सूत्राणि—
    समदलविषमखरूपं द्विगुणं वर्गीकृतं च पदसंख्या ।
    संख्या विषमा सैका दलतो गुरुरेव समदलतः ॥३३३½॥
    उदाहरणार्थ प्रश्न
    ५ सतहवाली एक वर्गाकार बनावट तैयार की गई है । सबसे ऊपर की सतह में केवल १ ईंट
    है । हे प्रश्न की गणना जानने वाले मित्र, इस बनावट में कुल कितनी ईंटें हैं ? ॥३३१½॥ नन्द्यावर्त के
    आकार की एक बनावट उत्तरोत्तर ईंटों की सतहों से तैयार की गई है । एक पंक्ति में सबसे ऊपर की
    ईंटों का संख्यात्मक मान ६० है, जिसके द्वारा ४ सतहें सम्मितीय बनाई गई हैं । बतलाओ इसमें कुल
    कितनी ईंटें लगाई गई हैं ? ॥३३२½॥
    छन्द ( prosody ) शास्त्रोक्त छः प्रत्ययों को जानने के लिये नियम—
    दिये गये शब्दांशिक छन्द में शब्दांशों ( अक्षरों ) अथवा पदों की युग्म और अयुग्म संख्या
    को अलग स्तम्भ में क्रमशः ० और १ द्वारा चिन्हित किया जाता है । ( चिन्हित करने की विधि इसी
    अध्याय के ३११½ वें सूत्र में देखिये ।) वह इस प्रकार है : युग्ममान को आधा किया जाता है, और
    अयुग्म मान में से १ घटाया जाता है । इस विधि को तब तक जारी रखा जाता है, जब तक कि अंततो-
    गत्वा शून्य प्राप्त नहीं होता । इस प्रकार प्राप्त अंकों की शृङ्खला में अंकों को दुगुना कर दिया जाता है,
    और तब शृङ्खला की तली से शिखर तक की संतत गुणन क्रिया में, वे अंक, जिनके ऊपर शून्य आता
    है, वर्गित कर दिये जाते हैं । इस संतत गुणन का परिणामी गुणनफल छन्द के विभिन्न सम्भव श्लोकों
    की संख्या होता है ॥३३३½॥ इस प्रकार प्राप्त सभी प्रकार के श्लोकों में लघु और गुरु
    किसी भी सतह की लम्बाई अथवा चौड़ाई पर ईंटो की संख्या, अग्रिम निम्न ( नीची ) सतह की ईंटों से
    १ कम होती है ।
    ( ३३२½ ) गाथा में निर्दिष्ट नन्द्यावर्त आकृति यह है— 卐
    ( ३३३½-३३६½ ) गुरु और लघु शब्दांशों ( syllables ) के भिन्न-भिन्न विन्यास के संवादी
    कई विभेद उत्पन्न होते हैं, क्योंकि श्लोक ( stanza ) के एक चौथाई भाग को बनानेवाले पद ( line )
    में पाया जानेवाला प्रत्येक शब्दांश या तो लघु अथवा गुरु हो सकता है । इन विभेदों के विन्यासों के
    लिये कोई निश्चित क्रम उपयोग में लाया जाता है । यहाँ दिये गये नियम हमें निम्नलिखित को निकालने
    में सहायक होते हैं, ( १ ) निर्दिष्ट शब्दांशों की संख्या वाले छन्द में सम्भव विभेदों की संख्या, ( २ )
    इन प्रकारों में शब्दांशों के विन्यास की विधि, ( ३ ) स्वक्रमसूचक स्थिति द्वारा निर्दिष्ट किसी विभेद में
    शब्दांशों का विन्यास, ( ४ ) शब्दांशों के निर्दिष्ट विन्यास की क्रमसूचक स्थिति, ( ५ ) निर्दिष्ट संख्या •
    के गुरु और लघु शब्दांशों वाले विभेदों की संख्या, और ( ६ ) किसी विशेष छन्द के विभेदों का प्रदर्शन
    करने के लिये उदग्र ( लम्ब रूप ) जगह का परिमाण ।
    ग० सा० सं०-२३

१७८ ] . गणितसारसंग्रहः [ ६. ३३४½-
स्याल्लघुरेवं क्रमशः प्रस्तारोऽयं विनिर्दिष्टः ।
नष्टाङ्कार्धे लघुरथ तस्सैकदले गुरुः पुनः पुनः स्थानम् ॥३३४½॥
अक्षरों ( syllables ) के विन्यास को इस प्रकार निकालते हैं—
१ से आरम्भ होनेवाली तथा दिये गये छन्दों में श्लोकों की महत्तम सम्भव संख्या के माप
में अंत होनेवाली प्राकृत संख्याएँ लिखी जाती हैं। प्रत्येक अयुग्म संख्या में १ जोड़ा जाता है, और तब
उसे आधा किया जाता है। जब यह क्रिया की जाती है, तब गुरु अक्षर (syllable) निश्चित पूर्वक सूचित
होता है। जहाँ संख्या युग्म होती है वह तत्काल ही आधी कर दी जाती है, जिससे वह लघु प्रत्यय
( syllable ) को सूचित करती है। इस प्रकार, दशा के अनुसार (उसी समय संवादी गुरु और लघु
श्लोक ३३७½ में दिये गये प्रश्नों को निम्नलिखित रूप में हल करने पर ये नियम स्पष्ट हो जावेंगे—
( १ ) छन्द में ३ शब्दांश होते हैं; अब हम इस प्रकार आगे बढ़ते हैं—
३ - १ १ दाहिने हाथ की श्रृंखला के अङ्कों को २ द्वारा गुणित करने पर हमें २
२।२ ० ० प्राप्त
१ - १ १ २
० होता है। अध्याय २ के ९४ वें श्लोक ( गाथा ) की टिप्पणी में समझाये
अनुसार गुणन और वर्ग करने की विधि द्वारा हमें ८ प्राप्त होता है। यही
विभेदों की संख्या है।
( २ ) प्रत्येक विभेद में शब्दांशों के विन्यास की विधि इस प्रकार प्राप्त होती है—
प्रथम प्रकार : १ अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश है; इसलिये प्रथम शब्दांश गुरु है। इस १ में
( विभेद ) १ जोड़ो, और योग को २ द्वारा भाजित करो। भजनफल अयुग्म है, और दूसरे गुरु
शब्दांश को दर्शाता है। फिर से, इस भजनफल १ में १ जोड़ते हैं, और योग को २
द्वारा भाजित करते हैं; परिणाम फिर से अयुग्म होता है, और तीसरे गुरु शब्दांश
को दर्शाता है। इस प्रकार, प्रथम प्रकार में तीन गुरु शब्दांश होते हैं, जो इस प्रकार
दर्शाये जाते हैं ऽ ऽ ऽ
द्वितीय प्रकार : २ युग्म होने के कारण लघु शब्दांश सूचित करता है। जब इस २ को २ द्वारा
( विभेद ) भाजित करते हैं, तो भजनफल १ होता है जो अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश को
सूचित करता है। इस १ में १ जोड़ो, और योग को २ द्वारा भाजित करो; भजनफल
अयुग्म होने के कारण गुरु शब्दांश को सूचित करता है। इस प्रकार, हमें यह
प्राप्त होता है । ऽ ऽ
इसी प्रकार अन्य विभेदों को प्राप्त करते हैं।
( ३ ) उदाहरण के लिये, पाँचवाँ प्रकार ( विभेद ) उपर की तरह प्राप्त किया जा सकता है।
( ४ ) उदाहरण के लिये, । ऽ । प्रकार ( विभेद ) की क्रमसूचक स्थिति निकालने के लिये हम
यह रीति अपनाते हैं—
। ऽ ।
१ २ ४
इन शब्दांशों के नीचे, जिसकी साधारण निष्पत्ति २ है और प्रथमपद १ है ऐसी गुणोत्तर श्रेढि
लिखो। लघु शब्दांशों के नीचे लिखे अंक ४ और १ जोड़ो, और योग को १ द्वारा बढ़ाओ। हमें ६ प्राप्त

[- ६. ३३६½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७९

रूपाद्द्विगुणोत्तरतस्तूद्दिष्टे लाङ्कसंयुतिः सैका ।
एकाद्येकोत्तरतः पदमूर्ध्वाधर्यतः क्रमोत्क्रमशः ॥३३५½॥
स्थाप्य प्रतिलोमघ्नं प्रतिलोमघ्नेन भाजितं सारम् ।
स्याल्लघुगुरुकियेयं संख्या द्विगुणैकवर्जिता साध्वा ॥३३६½॥


अक्षर देखते हुए ), १ जोड़ने अथवा नहीं जोड़ने के साथ आधी करने की क्रिया, नियमित रूप से, तब
तक जारी रखना चाहिये, जब तक कि, प्रत्येक दशा में छन्द के प्रत्ययों की यथार्थ संख्या प्राप्त नहीं
हो जाती ।
यदि स्वाभाविक क्रम में किसी प्रकार के पद का प्ररूपण करनेवाली संख्या, ( जहाँ अक्षरों का
विन्यास ज्ञात करना होता है ) युग्म हो तो वह आधी कर दी जाती है और लघु अक्षर को सूचित
करती है । यदि वह अयुग्म हो, तो उसमें १ जोड़ा जाता है और तब उसे आधा किया जाता है : और
यह गुरु अक्षर दर्शाती है । इस प्रकार गुरु और लघु अक्षरों को उनकी क्रमवार स्थितिमें बारबार रखना
पड़ता है जब तक कि पद में अक्षरों की महत्तम संख्या प्राप्त नहीं हो जाती । यह, श्लोक ( stanza )
के इष्ट प्रकार में, गुरु और लघु अक्षरों के विन्यास को देता है ॥३३४½॥
जहाँ किसी विशेष प्रकार का श्लोक दिया होने पर उसकी निर्दिष्ट स्थिति ( छन्द में सम्भव
प्रकारों के श्लोकों में से ) निकालना हो, वहाँ एक से आरम्भ होनेवाली और २ साधारण निष्पत्ति
वाली गुणोत्तर श्रेढि के पदों ( terms ) को लिख लिया जाता है, ( यहाँ श्रेढि के पदों की संख्या,
दिये गये छन्दों में अक्षरों की संख्या के तुल्य होती है ) । इन पदों ( terms ) के ऊपर संवादी गुरु
या लघु अक्षर लिख लिये जाते हैं । तब लघु अक्षरों के ठीक नीचे की स्थिति वाले सभी पद
( terms ) जोड़े जाते हैं । इस प्रकार प्राप्त योग एक द्वारा बढ़ाया जाता है । यह इष्ट निर्दिष्ट
क्रमसंख्या होती है ।
१ से आरम्भ होने वाली ( और छन्द में दिये गये अक्षरों की संख्या तक जाने वाली ) प्राकृत
संख्याएँ, नियमित क्रम और व्युत्क्रम में, दो पंक्तियों में, एक दूसरे के नीचे लिख ली जाती हैं । पंक्ति
की संख्याएँ १, २, ३ ( अथवा एक ही बार में इनसे अधिक ) द्वारा दाएँ से बाएँ ओर गुणित की
जाती हैं । इस प्रकार प्राप्त ऊपर की पंक्ति सम्बन्धी गुणनफल नीचे की पंक्ति सम्बन्धी संवादी गुणन-
फलों द्वारा भाजित किये जाते हैं । तब प्राप्त भजनफल, कविता ( verse ) में १, २, ३ या इनसे
अधिक, छोटे या बड़े अक्षरों वाले ( दिये गये छन्द में ) श्लोकों ( stanzas ) के प्रकारों की संख्या
की प्ररूपणा करता है । इसे ही निकालना इष्ट होता है ।
दिये गये छन्द ( metre ) में श्लोकों के विभेदों की सम्भव संख्या को दो द्वारा गुणित
कर एक द्वारा ह्रासित किया जाता है । यह फल अध्वान का माप देता है ।
यहाँ, छन्द के प्रत्येक दो उत्तरोत्तर विभेदों ( प्रकारों ) के बीच श्लोक ( stanzas ) के तुल्य
अंतराल ( interval ) का होना माना जाता है ॥३३५½-३३६½॥


होता है । इसलिये ऐसा कहते हैं कि त्रि-शब्दांशिक छन्द में यह छठवाँ प्रकार ( विभेद ) है ।
( ५ ) मानलो प्रश्न यह है : २ छोटे शब्दांशों वाले विभेद कितने हैं ?
प्राकृत संख्याओं को नियमित और विलोम क्रम में एक दूसरे के नीचे इस प्रकार रखो : $\begin{matrix} १ & २ & ३
३ & २ & १ \end{matrix}$
दाहिने ओर से बाईं ओर को, ऊपर से और नीचे से दो पद ( terms ) लेकर, हम पूर्ववर्ती गुणनफल

१८० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३३७½-
अत्रोद्देशकः
संख्यां प्रस्तारविधिं नष्टोद्दिष्टे लगक्रियाध्वानौ ।
षट्प्रत्ययांश्च शीघ्रं त्र्यक्षरवृत्तस्य मे कथय ॥३३७½॥
इति मिश्रकव्यवहारे श्रेढीबद्धसङ्कलितं समाप्तम् ।
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतो मिश्रकगणितं नाम पञ्चमव्यवहारः समाप्तः ॥
—-❖-—
उदाहरणार्थ प्रश्न
३ अक्षरों (syllables) वाले छन्द के सम्बन्ध में ६ प्रत्ययों को बतलाओ—.
(१) छन्द के सम्भव श्लोकों (stanzas) की महत्तम संख्या, (२) उन श्लोकों में
अक्षरों के विन्यास का क्रम, (३) किसी दिये गये प्रकार के श्लोकों में अक्षरों (शब्दांशों) का
विन्यास, जहाँ छन्द में सम्भव प्रकारों की क्रमसूचक स्थिति ज्ञात है, (४) दिये गये श्लोक की
क्रमसूचक स्थिति, (५) किसी दी गईं लघु या गुरु अक्षरों (शब्दांशों) की संख्यावाले दिये गये
छन्द (metre) में श्लोकों की संख्या, और (६) अध्वान नामक राशि ॥३३७½॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में श्रेढिबद्ध संकलित नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणितशास्त्र में मिश्रक नामक पञ्चम
व्यवहार समाप्त हुआ ।
—-❖-—

को उत्तरवर्ती गुणनफल द्वारा भाजित करते हैं । भजनफल ३ इष्ट उत्तर है ।
(६) ऐसा कहा गया है कि छन्द के किसी भी प्रकार के गुरु और लघु शब्दांशों के निरूपण
करनेवाले प्रतीक, एक अंगुल उदग्र (vertical) जगह ले लेते हैं, और कोई भी दो विभेदों के बीच
का अंतराल (जगह) भी एक अंगुल होना चाहिये । इसलिये, इस छन्द के ८ प्रकारों (विभेदों) के
लिये इष्ट उदग्र (vertical) जगह का परिमाण २ x ८ - १ अथवा १५ अंगुल होता है ।
—-❖-—

७. क्षेत्रगणित व्यवहारः
सिद्धेभ्यो निश्चितार्थेभ्यो वरिष्टेभ्यः कृतादरः । अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं नमस्कुर्वे पुनः पुनः ॥ १ ॥
इतः परं क्षेत्रगणितं नाम षष्ठगणितमुदाहरिष्यामः । तद्यथा--
क्षेत्रं जिनप्रणीतं फलाश्रयाद्व्यावहारिकं सूक्ष्ममिति ।
भेदाद् द्विधा विचिन्त्य व्यवहारं स्पष्टमेतदभिधास्ये ॥ २ ॥
त्रिभुजचतुर्भुजवृत्तक्षेत्राणि स्वस्वभेदभिन्नानि । गणितार्णवपारगतैराचार्यैः सम्यगुक्तानि ॥ ३ ॥
त्रिभुजं त्रिधा विभिन्नं चतुर्भुजं पञ्चधाष्टधा वृत्तम् । अवशेषक्षेत्राणि ह्येतेषां भेदभिन्नानि ॥ ४ ॥
त्रिभुजं तु समं द्विसमं विषमं चतुरश्रमपि समं भवति ।
द्विद्विसमं द्विसमं स्यात्त्रिसमं विषमं बुधाः प्राहुः ॥ ५ ॥
समवृत्तमर्धवृत्तं चायत्तवृत्तं च कम्बुकावृत्तम् । निम्नोन्नतं च वृत्तं बहिरन्तश्चक्रवालवृत्तं च ॥ ६ ॥

७. क्षेत्र-गणित व्यवहार ( क्षेत्रफल के माप सम्बन्धी गणना )
अपने इष्ट अर्थ की सिद्धि के लिये मैं मन, वचन, काय से कृतकृत्य और सर्वोत्कृष्ट सिद्धों को
वारंवार सादर नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
इसके पश्चात् हम क्षेत्र गणित नामक विषय की छः प्रकार की गणना की व्याख्या करेंगे जो
निम्नलिखित है—
जिन भगवान् ने क्षेत्रफल का दो प्रकार का माप प्रणीत किया है, जो फल के स्वभाव पर
आधारित है; अर्थात् एक वह जो व्यावहारिक प्रयोजनों के लिये अनुमानतः लिया जाता है, और दूसरा
वह जो सूक्ष्म रूप से शुद्ध होता है । इसे विचार में लेकर मैं इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाऊँगा
॥ २ ॥ गणित रूपी समुद्र के पारगामी आचार्यों ने सम्यक् ( ठीक ) रूप से विविध प्रकार के क्षेत्रफलों
के विषय में कहा है । उन क्षेत्रफलों में त्रिभुज, चतुर्भुज और वृत्त ( वक्ररेखीय ) क्षेत्रों को इन्हीं
क्रमवार प्रकारों में वर्णित किया है ॥ ३ ॥ त्रिभुज क्षेत्र को तीन प्रकार में, चतुर्भुज को पाँच प्रकार में,
और वृत्त को आठ प्रकार में विभाजित किया गया है । शेष प्रकार के क्षेत्र वास्तव में इन्हीं विभिन्न
प्रकारों के क्षेत्रों के विभिन्न भेद हैं ॥ ४ ॥ बुद्धिमान लोग कहते हैं कि त्रिभुज क्षेत्र, समत्रिभुज,
द्विसम त्रिभुज ( समद्विबाहु त्रिभुज ) और विषम त्रिभुज हो सकता है, और चतुर्भुज क्षेत्र भी सम-
चतुरश्र ( वर्ग ), द्विद्विसमचतुरश्र ( आयत ), द्विसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज जिसकी दो असमा-
नान्तर भुजायें बराबर नापकी हों ), त्रिसमचतुरश्र ( समलम्ब चतुर्भुज, जिसकी तीन भुजायें बराबर
नापकी हों ), विषम चतुरश्र ( साधारण चतुर्भुज क्षेत्र ) हो सकता है ॥ ५ ॥ वक्रसरल क्षेत्र, समवृत्त
( वृत्त ), अर्धवृत्त, आयतवृत्त ( ऊनेन्द्र अथवा अंडाकार क्षेत्र ), कम्बुकावृत्त ( शंखाकार क्षेत्र ),
निम्नावृत्त ( नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), उन्नतावृत्त ( उन्नतोदर वृत्तीय क्षेत्र ), बहिश्चक्रवाल वृत्त ( बाह्य
स्थित कङ्कण ), एवं अंतश्चक्रवाल वृत्त ( भीतर स्थित कङ्कण ) हो सकता है ॥ ६ ॥

(५-६) इन गाथाओं में कथित विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ अगले पृष्ठ पर दर्शाई गई हैं—