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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 421 में से

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पृष्ठ 199

-६. २१६ ] मिश्रकव्यवहारः [ १४५
अत्रोद्देशकः
स्वर्णपरीक्षकवणिजौ परस्परं याचितौ ततः प्रथमः ।
अर्धं प्रादात् तामपि गुलिकां स्वसुवर्ण आयोज्य ॥२१३॥
वर्णदशकं करीमीत्यपरोऽवादीत् त्रिभागमात्रतया ।
लब्धे तथैव पूर्णं द्वादशवर्णं करोमि गुलिकाभ्याम् ॥२१४॥
उभयोः सुवर्णमाने वर्णौ संचिन्त्य गणिततत्त्वज्ञ ।
सौवर्णगणितकुशलं यदि तेऽस्ति निगद्यतामाशु ॥२१५॥
इति मिश्रकव्यवहारे सुवर्णकुट्टीकारः समाप्तः ।
विचित्रकुट्टीकारः
इतः परं मिश्रकव्यवहारं विचित्रकुट्टीकारं व्याख्यास्यामः । सत्यानृतसूत्रम्—
पुरुषाः सैकैष्टगुणा द्विगुणेष्टोना भवन्त्यसत्यानि । पुरुषकृतिस्तैरुना सत्यानि भवन्ति वचनानि ॥२१६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
स्वर्ण के मूल्य को परखने में कुशल दो व्यापारियों ने एक दूसरे से स्वर्ण बदलने के लिये
कहा । पहिले ने दूसरे से कहा, “यदि अपना आधा स्वर्ण मुझे दे दो, तो उसे मैं अपने स्वर्ण में
मिलाकर कुल स्वर्ण को १० वर्ण वाला बना लूँगा ।” तब दूसरे ने कहा, “यदि मैं तुम्हारा केवल १/३
भाग स्वर्ण प्राप्त करलूँ, तो मैं पूरे स्वर्ण को दो गोलियों की सहायता से १२ वर्ण वाला बना लूँगा ।”
हे गणित तत्त्वज्ञ ! यदि तुम स्वर्ण गणित में कुशल हो तो सोचविचार कर शीघ्र बतलाओ कि उनके
पास कितने-कितने वर्ण वाला कितना-कितना स्वर्ण ( भार में ) है ? ॥२१३-२१५॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में सुवर्ण कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
विचित्र कुट्टीकार
इसके पश्चात् , हम मिश्रक व्यव्हार में विचित्र कुट्टीकार की व्याख्या करेंगे ।
( ऐसी परिस्थिति में जैसी कि नीचे दी गई है, जहाँ दोनों बातें साथ ही साथ सम्भव हैं, )
सत्य और असत्य वचनों की संख्या ज्ञात करने के लिये नियम—
मनुष्यों की संख्या को उनमें से चाहे गये मनुष्यों की संख्या को १ द्वारा बढ़ाने से प्राप्त संख्या
द्वारा गुणित करो, और तब उसे चाहे गये मनुष्यों की संख्या की दुगुनी राशि द्वारा हासित करो । जो
संख्या उत्पन्न होगी वह असत्य वचनों की संख्या होगी । सब मनुष्यों का निरूपण करनेवाली संख्या का
वर्ग इन असत्य वचनों की संख्या द्वारा हासित होकर सत्य वचनों की संख्या उत्पन्न करता है ॥२१६॥
को पहिले बदले में १६ तक बढ़ाना पड़ता है । इन दो वर्णों ८ और १६ को, दूसरे बदले में प्रयुक्त
करने से, हमें औसतवर्ण ३६/५ के बदले में ३५/५ प्राप्त होता है ।
इस प्रकार, दूसरे बदले में हम देखते हैं कि भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में ( ४०-
३५ ) अथवा ५ की बढ़ती है, जबकि पूर्व के चुने हुए वर्णों के सम्बन्ध में घटती और बढ़ती क्रमशः
९ - ८ = १ और १६ - १३ = ३ हैं ।
परन्तु दूसरे बदले में भार और वर्ण के गुणनफलों के योग में बढ़ती ३६ - ३५ = १ है ।
त्रैराशिक के नियम का प्रयोग करने पर हमें वर्णों में संगत घटती और बढ़ती १/५ और ३/५ प्राप्त होती हैं ।
इसलिये वर्ण क्रमशः ९ - १/५ या ८ ४/५ और १३ + ३/५ = १३ ३/५ हैं ।
( २१६ ) इस नियम का मूल आधार गाथा २१७ में दिये गये प्रश्न के निम्नलिखित बीजीय
ग० सा० सं०-१९