सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

-६. २७८½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६१
शेषैक्यार्धयुतोनिता फलमिदं राशिर्भवेद्वाञ्छयो-
स्त्याज्यात्याज्यमहत्त्वयोरथ कृतेर्मूलं ददात्येव सः ॥ २७५½ ॥
अत्रोद्देशकः
राशिः कश्चिद्दशभिः संयुक्तः सप्तदशभिरपि हीनः ।
मूलं ददाति शुद्धं तं राशिं स्यान्ममाशु वद गणक ॥ २७६½ ॥
राशिः सप्तभिरूनो यः सोऽष्टादशभिरन्वितः कश्चित् ।
मूलं यच्छति शुद्धं विगणय्याचक्ष्व तं गणक ॥ २७७½ ॥
राशिर्द्वित्र्यंशोनस्त्रिसप्तभागान्वितस्स एव पुनः ।
मूलं यच्छति कोऽसौ कथय विचिन्त्याशु तं गणक ॥ २७८½ ॥
है । परिणामी राशि को क्रमशः ऐसी दो राशियों के आधे अन्तर में जोड़ा जाता है, अथवा अर्द्ध अन्तर
में से घटाया जाता है, जिन्हें कि अयुग्म बनानेवाली अतिरेक राशि द्वारा उन दशाओं में हासिल किया
जाता है अथवा बढ़ाया जाता है, जब कि घटाई जानेवाली दी गई मूल राशि जोड़ी जानेवाली दी गई
मूल राशि से बड़ी अथवा छोटी होती है । इस प्रकार प्राप्त फल वह संख्या होती है, जो दत्त राशियों
से इच्छानुसार सम्बन्धित होकर, निश्चित रूप से वर्गमूल को उत्पन्न करती है ॥ २७५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई संख्या जब १० से बढ़ाई अथवा १७ से घटाई जाती है, तब वह यथार्थ वर्गमूल बन
जाती है । यदि सम्भव हो तो, हे गणितज्ञ, मुझे शीघ्र ही वह संख्या बतलाओ ॥ २७६½ ॥ कोई राशि
जब ७ द्वारा हासित की जाती है अथवा १८ द्वारा बढ़ाई जाती है, तो वह यथार्थ वर्गमूल बन जाती
है । हे गणक ! उस संख्या को गणना के पश्चात् बतलाओ ॥ २७७½ ॥ कोई राशि २/३ द्वारा हासित
होकर, अथवा ३/७ द्वारा बढ़ाई जाकर यथार्थ वर्गमूल उत्पन्न करती है । हे गणक, सोचकर शीघ्र ही वह
सम्भव संख्या बतलाओ ॥ २७८½ ॥
( २७५½ ) बीजीय रूप से, मानलो निकाली जानेवाली राशि क है, और उसमें जोड़ी जानेवाली
अथवा उसमें से घटाई जानेवाली राशियां क्रमशः अ, ब हैं, तब इस नियम का निरूपण करनेवाला सूत्र
निम्नलिखित होगा* —
{ (अ + ब) × (१ + १) ÷ २ }² - १ अ ~ ब ± १
{ ----------------------------- } + १ ± ----------- ; इसका मूलभूत सिद्धान्त इस
४ २
प्रकार निकाला जा सकता है । (न + १)² - न² = २ न + १ जो अयुग्म संख्या है; और (न + २)² -
न² = ४न + ४ जो युग्म संख्या है; जहाँ 'न' कोई भी पूर्णांक है । नियम बतलाता है कि हम २न + १
और ४न + ४ से किस प्रकार न² + अ प्राप्त कर सकते हैं, जब कि हम जानते हैं कि २न + १ अथवा
४न + ४ को अ + ब के बराबर होना चाहिये ।
( २७८½ ) गाथा २७५½ के नोट में ब और अ द्वारा निरूपित संख्यायें ( जो वास्तव में २/३ और
३/७ हैं ), इस प्रश्न में भिन्नीय होने के कारण, यह आवश्यक है कि दिये गये नियम के अनुसार उन्हें

  • इसे रंगाचार्य ने निम्न प्रकार दिया है जो नियम से नहीं मिलता है ।
    (a + b) + (1 + 1) ÷ २ }² a ~ b ± 1
    { --------------------- } - 1 + 1 ± ------------- .
    4 2
    ग० सा० सं०-२१