गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २३१-
अत्रोद्देशकः
शिबिकां नयन्ति पुरुषा विंशतिरथ योजनद्वयं तेषाम् ।
वृत्तिर्दीनाराणां विंशत्यधिकं च सप्तशतम् ॥२३१॥
क्रोशद्वये निवृत्तौ द्वावुभयोः क्रोशयोस्त्रयश्चान्ये ।
पञ्च नरः शेषार्धाद्व्यावृताः का भृतिस्तेषाम् ॥२३२॥
इष्टगुणितपोट्टलकानयनसूत्रम्—
सैकगुणा स्वस्वेष्टं हित्वाऽन्योन्यघ्नशेषमितिः ।
अपवर्त्य योज्य मूलं ( विष्णोः ) कृत्वा व्येकेन मूलेन ॥२३३॥
पूर्वापवर्तराशीन् हत्वा पूर्वापवर्तराशियुतेः ।
पृथगेव पृथक् त्यक्त्वा हस्तगताः स्वधनसंख्याः स्युः ॥२३४॥
ताः स्वस्वं हित्वैव त्वशेषयोगं पृथक् पृथक् स्थाप्य ।
स्वगुणघ्नाः स्वकरगतैरूनाः पोट्टलकसंख्याः स्युः ॥२३५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
२० मनुष्यों को कोई पालकी २ योजन दूर ले जाने पर ७२० दीनार मिलते हैं। दो मनुष्य
दो क्रोश दूर जाकर रुक जाते हैं; दो क्रोश दूर और जाने पर अन्य तीन रुक जाते हैं, तथा शेष की
आधी दूरी जाने पर ५ मनुष्य रुक जाते हैं। ढोने वाले विभिन्न मजदूरों को क्या-क्या मजदूरी
मिलती है ? ॥२३१-२३२॥
किसी थैली में भरी हुई रकम को निकालने के लिये नियम, जो कुछ मनुष्यों में से प्रत्येक के
हाथ में जितनी रकम है उसमें जोड़ी जाने पर, अन्य के हाथों में रखी हुई रकमों के योग की विशिष्ट
गुणज ( multiple ) बन जाती है—
प्रश्न में विशिष्ट गुणज ( multiple ) संख्याओं में से प्रत्येक में एक जोड़कर योग राशियां
प्राप्त करते हैं। इन योगों को एक दूसरे से, प्रत्येक दशा में, विशेष उल्लिखित गुणज के सम्बन्धी योग
को उपेक्षित करते हुए, गुणित करते हैं। इन्हें, साधारण गुणनखंडों को हटा कर, अल्पतम पदों में प्रह्रासित
(लघुकृत) करते हैं। तब इन प्रह्रासित (लघुकृत) राशियों को जोड़ा जाता है। इस परिणामी योग का
वर्गमूल प्राप्त किया जाता है, जिसमें से एक घटा दिया जाता है। उपर्युक्त प्रह्रासित राशियों को इस १
द्वारा ह्रासित वर्गमूल द्वारा गुणित किया जाता है। तब इन्हें अलग-अलग उन्हीं प्रह्रासित राशियों के योग
में से घटाया जाता है। इस प्रकार, कई व्यक्तियों में से प्रत्येक के हाथ की रक़में प्राप्त होती हैं। उन
व्यक्तियों में से केवल एक के पास के धन के मान को प्रत्येक दशा में जोड़ से वञ्चित कर, इन सब
हाथ की रक़मों की राशियों को एक दूसरे में जोड़ना पड़ता है। इस प्रकार प्राप्त कई योग अलग-अलग
लिखे जाते हैं। इन्हें क्रमशः उपर्युक्त उल्लिखित गुणज राशियों द्वारा गुणित किया जाता है। इस
प्रकार प्राप्त कई गुणनफलों में से हाथ की रकमों को अलग-अलग घटाया जाता है। तब हाथ में कई
रकमों में से प्रत्येक के सम्बन्ध में अलग-अलग थैली की रकम का वही मान प्राप्त होता है ॥२३३-२३५॥
⎼ ( २३३-२३५ ) गाथा २३६-२३७ में दिये गये प्रश्न में, मानलो क, ख, ग हाथ में रखी हुई
तीन व्यापारियों की रक़में हैं; और थैली में य रकम है।